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शेखर मल्लिक ♦ ऐसे देश में जहां भगतसिंह और मार्क्स को पढ़ना अनपढ़ या अल्पपढ़ सत्ता की आंखों में अपराध है, खूंखार नक्सली साहित्य रखने और नक्सलियों को गुपचुप मदद करने जैसी संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के पर्याप्त सबूत पुलिस उसके ठिकाने से उगाह चुकी थी। वह पुस्तिका भी, जिसके जलते हर्फे थे, “… की रात लांगो गांव मौत की काली चादर ओढ़े थी… बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया था जनता की वीर संतान … का। कुछ अक्षरों में उन वीर शहीदों की जीवन गाथा समाप्त नहीं हो सकती। सिद्दो-कान्हू-बिरसा-तिलका की परंपरा से अनुप्राणित ये योद्धा शोषणमुक्त समाज तैयार करने के लक्ष्य में अपनी जिंदगी के अंत तक काम करते रहे…
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विनीत कुमार ♦ बाजार का मीडिया और जैसा बाजार चाहे, वैसा मीडिया। बाजार का कोई सपना नहीं होता, बाजार मुनाफे से चलता है और वो किसी का नहीं होता। बाजार मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित कर रहा है। बहसतलब 3 में “किसका मीडिया कैसा मीडिया” बहस का जो मुद्दा रखा गया, इस पर बात करते हुए मणिमाला की ये लाइन पूरी बहस के बीच सबसे ज्यादा असरदार रही। ये वो लाइन है, जिसके वक्ताओं के बदल जाने के वाबजूद बहस का एक बड़ा हिस्सा इसके आगे-पीछे चक्कर काटते हैं। इस लाइन को आप पूरी बहस के निष्कर्ष के तौर पर भी देख सकते हैं या फिर बहस का वो सिरा, जिसे लेकर सूत्रधार सहित कुल चारों वक्ता सहमत नजर आये। मीडिया को बाजार का हिस्सा मानने से हमारे कई भ्रम दूर होते हैं।
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पंकज नारायण ♦ पत्रकारों द्वारा आयोजित और संपन्न इस कार्यक्रम में बदलाव की दिशा में विकल्पों से जुड़ी रचनात्मकता और उसकी धार की शक्ति को लेकर कुछ बातें हो सकती थी और पूंजीवाद की जगह इसे स्थापित करने के रास्ते ढूंढे जा सकते थे। लेकिन ऐसे कई सवाल वहां नहीं उठे, जबकि वो सवाल सीधे पत्रकारों या विकल्पों से जुड़े थे। हमने उन मुद्दों पर बात की, जिसका हम कुछ नहीं कर सकते। सिर्फ उसको घटित होते हुए अपने सामने देख सकते हैं और कभी-कभार अपने भीतर के आदमी को डोज देने के लिए खुद को गलिया सकते हैं। सवालों का जिंदा रहना जरूरी है, लेकिन कुछ इस तरह जहां कुछ बूढ़े सवाल मरें और नये सवाल पैदा हों। वह बहस अधूरी है, जो समस्या को महिमामंडित करके हमें उसकी शरण में ले जाती है।
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मोहल्ला लाइव ♦ क्या मीडिया एक धंधा है और मालिकों के हित साधन की तरह है और इसके सिवा उसकी जो भी छवि है, क्या वह सिर्फ खामखयाली है – इस पर बात होनी बहुत जरूरी है। हमारी बहसतलब का इस बार का मुद्दा यही है।
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डॉ योगेंद्र ♦ सच तो यह है कि सिनेमा ने साहित्य की किसी भी रचनात्मक विधा से ज्यादा असर समाज पर डाला है। हालात यह है कि उसके असर से समाज का रॉल मॉडल बदल गया। बहुसंख्यक युवाओं के रॉल मॉडल न मार्क्स हैं, न गांधी, न भगत सिंह, न बुद्ध। वे इन लोगों की कहानियां पाठ्यक्रमों में दवाब से पढ़ लेते हैं, लेकिन जब भी उन्हें फुर्सत होती है, तब हीरो-हिरोइनों की दुनिया में खो जाते हैं। वे अपनी समस्याओं का हल भी सिनेमाई अंदाज से करना चाहते हैं। कभी गांधी टोपी और जयप्रकाश कट कुरता हुआ करता था, मगर अब तो कहीं सलमान है तो कहीं शाहरूख। सिनेमा ने समाज के सोचने-समझने के तरीके बदल दिये हैं।
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विश्वदीपक ♦ फिल्म गुलाल में जिस बदहवास से चेहरे को गोली मारी जाती है, उसका नाम है पृथ्वी बना और दुनिया के रंगमंच पर जिस खूबसूरत शख्स की हत्या की जाती है उसका नाम है हेमचंद्र पांडेय। पृथ्वी बना का चरित्र पियूष मिश्रा ने निभाया था और अखबारों में हेमचंद्र पांडेय हेमू के नाम से जाना जाता था। इन दोनों ने एक कॉमन गलती की थी। कॉरपोरेट-डेमोक्रेसी की संचरना पर सवाल उठाया था। ‘द रियल डेमोक्रेसी’ की त्रासदी और उसकी विडंबना पर तंज कसा था। जाहिर है, लोकतंत्र के नाम पर लूट और बर्बरता का साम्राज्य खड़ा करने वालों को ये मंजूर कैसे होता?
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अनीश ♦ सामाजिक बदलाव का ठेका फिल्मकारों, पत्रकारों या विभिन्न कला को अपनी जीविका बनाने वाले लोगों ने नहीं ले रखा है। समाज के हर आदमी की ये जिम्मेदारी है कि वो इसमें अपनी भूमिका निर्धारित करे। और उस पर अग्रसर हो। दूसरों को कठघरे में खड़ा करने के पहले खुद को कठघरे में खड़ा करके देखे और विचार करे। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि वो हमको कठघरे में खड़ा नहीं करे। दूसरा सवाल ये है कि जिस बदलाव या क्रांति की हम बात कर रहे हैं, उसका परिप्रेक्ष्य क्या है… अलग अलग लोगों के लिए इसके मायने अलग अलग हो सकते हैं। वो कौन सी विश्वदृष्टि है, जो सामाजिक बदलाव की दिशा तय करेगी।
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अनीश ♦ अगर कोई ऐसी कहानी मिल भी जाए तो अनुराग को या किसी को भी पैसे के लिए ऐसे लोगों के पास जाना पड़ेगा जिनकी सामाजिक प्रतिबद्धता आपकी जैसी नहीं होगी। मैं प्रस्ताव रखता हूं उन सभी बदलाव की इच्छा रखने वालों के समक्ष कि वो एक फंड शुरू करें ऐसी फिल्मों के लिए। मोहल्ला लाइव डॉट कॉम nodal agency की भूमिका में आये। अनुराग, मनोज और ऐसे बहुत सारे लोग मिलेंगे फिल्म इंडस्ट्री में, जो खुशी से इस फंड को खड़ा करने में सहयोग करेंगे। लोग वास्तव में यदि गंभीर हैं और बदलाव के लिए प्रतिबद्ध हैं तो आगे आएं। सवाल सिर्फ कहानी का नहीं है बल्कि धन और उसका चरित्र, प्लेटफॉर्म और दर्शक भी है। लोग आगे आएं, हम सब प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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अनुराग कश्यप ♦ हमारे यहां वो नहीं हो सकता, जो यूरोप और अन्य देशों में हुआ है। हमारे देश में डेमोक्रेसी के मायने अलग हैं। हमारे यहां पिक्चरों में मोची, चमार, बार्बर, तेली जैसे शब्द काट दिये जाते हैं, क्योंकि उनके जो पॉलिटिकल रिप्रजेंटेटिव हैं, वो आई और बी मिनिस्ट्री पे चढ़ बैठते हैं, जो सेंसर बोर्ड पे चढ़ बैठता है। गुलाल में से सिर्फ दो शब्द सेंसर किये गये, जब पृथ्वी बना कहता है, सारे गोल चश्मे वाले ऐसे ही होते हैं, गांधी अंबेदकर। उनके चश्मे गोल थे, अंडरस्टैंडिंग भी गोल थी। गांधी और अंबेडकर काट दिया गया। वाक्य का मतलब क्या रहा? आपका आइडियलिज्म जो है, यहां के यथार्थ में रह कर इस्तेमाल करिए।
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मनोज बाजपेयी ♦ अनुराग कश्यप को बुलाकर उनके होने पर ही सवाल उठाकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? जब अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, दिबाकर चटर्जी, नीरज पांडे जैसे युवा निर्देशक सामने आये तो उनकी संगत का भरपूर मजा लीजिए। न कि उनको कठघरे में खड़ा करना शुरू कीजिए। क्योंकि उन्होंने अपने सिनेमाई करियर की शुरुआत से लेकर अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिसे लेकर उन्हें भड़कने पर मजबूर किया जाए। अनुराग कश्यप से समाज को बदलने की अपेक्षा क्यों रखी जाती है? अनुराग कश्यप अगर सिनेमाई भाषा की परिभाषा बदलने में लगे हैं तो उन्हें बधाई दीजिए। उनके साथ चाय पीजिए और उस याद को घर लेकर जाइए। दलितों पर फिल्म नहीं बनायी जा सकती है, एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनायी जा सकती है।



