Category Archives: मोहल्‍ला लाइव

क्‍या सरोकार से लद कर ही आगे बढ़ सकता है सिनेमा?

♦ विनीत कुमार बायें से विनीत कुमार, अनुभव सिन्‍हा, आनंद एल राय, उदय प्रकाश, रघुवेंद्र सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज सिनेमा आपको बिल्कुल एक दूसरी दुनिया में ले जा रहा होता है, तभी बीच में पट्टी चलानी पड़ जाती है – धूम्रपान से कर्क रोग होता है, सिगरेट का सेवन स्वास्थ्य के लिए जानलेवा है… और

सिनेमा को मुंबई से छीनने के लिए शटलकॉक ब्‍वॉयज देखिए

अविनाश ♦ कल “शटलकॉक ब्‍वॉयज” रीलीज हो रही है। चार सालों के संघर्ष के बाद। इससे पहले कुछ फिल्‍म महोत्‍सवों में शटलकॉक ब्‍वॉयज दिखायी गयी है। अच्‍छा ये लग रहा है कि शटलकॉक ब्‍वॉयज उन फिल्‍मों की छोटी सी फेहरिस्‍त में शामिल हो गयी है, जिसने अपनी निर्माण प्रक्रिया में मुंबई का सहारा नहीं लिया। सिनेमा निर्माण के विकेंद्रीकरण को लेकर एक पूरी बहस इन दिनों चल रही है। एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने आधे घंटे की एक डॉक्‍युमेंट्री मेरठ में फिल्‍मों की खेती पर की थी। जैसे जैसे टेक्‍नॉलॉजी सस्‍ती और सुलभ होगी, उसकी विशेषज्ञता का समूह भी बड़ा होगा।

अनुराग अपनी फिल्‍मों में कब तक बचाये रख पाएंगे गीत?

संजय सेन सागर ♦ राज शेखर ने आज मेरा सालों से कायम एक मिथ तोड़ दिया था। दरअसल कुछ सालों पहले मैंने सुना था कि हमारे सागर के गीतकार और भूतपूर्व मंत्री विट्ठल भाई पटेल, जिन्होंने ”ना मांगू सोना चांदी” और ”झूठ बोले कौआ काटे” जैसे गीत लिखे हैं, वो खुद न लिखकर जो उनके यहां एक नौकर काम करता था, उससे लिखवाते थे और खुद के नाम से फिल्मो में देते थे। यह खबर सागर में कहीं भी सुनी जा सकती थी। इस जानकारी ने मेरे ऊपर ऐसा असर किया कि मुझे अधिकतर लेखक चोर नजर आने लगे थे। जब स्वानंद और राज शेखर को सुना, उनके भीतर के लेखक को समझा और उनकी संजीदगी को महसूस किया, तो लगा कि कहीं न कहीं लेखक सबके अंदर होता है।

हिंदुस्तान के साथ हुए हर हादसे का एक रूपक है #GOW

शिव विश्‍वनाथन ♦ अनुराग कश्यप दिखाते हैं कि हिंसा एक शृंखला की तरह घटित होती है। कोयला जो पुरुषों के साथ करता है, पुरुष वही महिलाओं के साथ करते हैं। यह वैषम्य निरंतर है। प्रकृति के बतौर महिलाएं लालसा पैदा करती हैं, लेकिन प्रकृति की तरह ही खोद कर नंगी की जाती हैं और छोड़ दी जाती हैं। कश्यप हिंसा की भाषा, उसकी देह, उसकी तकनीक को समझते हैं। अपनी क्रूरता के साथ चाकू हाथ का एक विस्तार है। जैसे ही हाथ में बंदूक या बम आता है, हिंसा और अधिक अवैयक्तिक हो जाती है। जब ऑटोमैटिक मशीनगन आती है, मौत औद्योगिक हो जाती है। ऑटोमैटिक के देसी शब्द बनने के साथ हिंसा की अवैयक्तिकता अपनी शक्ति में आठ गुनी बढ़ोतरी करती है।

महंगे सितारों को लेने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाये सिनेमा

दादा साहेब फाल्‍के ♦ मैंने बार-बार कहा है। वर्तमान परिस्थिति में, मेरा सुझाव है कि निर्माता लंबी फिल्मों का मोह छोड़ कर छोटी फिल्मों, जो 7-8 हजार फीट की हों, पर ध्यान केंद्रित करें, और उसके साथ एक शिक्षाप्रद फिल्म, एक रील का स्वस्थ हास्य, एक रील की कोई फिल्म जिसमें रेखाचित्र और जादुई दृश्य हों, एक रील का यात्रा-वृतांत आदि जोड़ दें। ऐसे कार्यक्रम मनोरंजक और शिक्षाप्रद होंगे। अगर हमारे निर्माता सही दिशा में कदम बढ़ाएंगे, तभी इस उद्योग के स्वस्थ विकास और विस्तार की आशा की जा सकती है। महंगे ‘सितारों’ को लेने और ढेर सारे गाने और लंबे-लंबे संवाद रखने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगना चाहिए। नाटकीय दृष्टि से भी इन फिल्मों का स्तर अत्यंत निम्न है।

सिनेमा के सौ बरस पर बहसतलब, 23-24 को दिल्‍ली पधारें

अविनाश ♦ तीन साल पहले सिनेमा पर बहसतलब का सिलसिला शुरू हुआ था। फिल्‍म महोत्‍सवों की समृद्ध परंपरा के बीच सिर्फ बातचीत का एक आयोजन करने का विचार इसलिए भी आया था, क्‍योंकि सिनेमा देखना पहले की तुलना में अब बहुत आसान हो गया है। अब कोई भी फिल्‍म ऐसी एक्‍सक्‍लूसिव नहीं रह जाती है, जैसे पहले हुआ करती थी। इसलिए फिल्‍म महोत्‍सवों का पहले जितना क्रेज था, अब उतना नहीं है। कम से कम भारत में तो नहीं है। हमारी समझ थी कि जो सिनेमा बनाते हैं, उन्‍हें अपने सिनेमा और सिनेमा के अलावा अपने समय की दूसरी गतिविधियों के बारे में बातचीत करनी चाहिए। फिल्‍मकारों का एक तेज-तर्रार समूह बहसतलब को समर्थन देने की मुद्रा में आ गया।

चवनिया की तर्ज पर वासेपुर की महिलाएं “वुमनिया” हैं!

अविनाश ♦ वासेपुर के गीतकार वरुण ग्रोवर ने वुमनिया गाने की यात्रा से जुड़ा यूट्यूब का एक लिंक फेसबुक पर शेयर करते हुए ऊपर की पंक्तियां लिखीं। पूरा बॉलीवुड जब परदेस में पनाह पाकर दर्प और गौरव से भर उठने की परंपरा निबाह रहा हो, वहीं एक फिल्‍म की यात्रा पटना और गया और बिहार के ऐसे ही छोटे-छोटे शहरों से शुरू होकर आज पूरे देश में धूम मचाने की तैयारी में है। मेट्रो शहरों के चमकते चौराहों और बाकी शहरों की सड़कों-गलियों पर खुलेआम एलान किया जा रहा है कि इस सावन में कह कर लूंगा। ताकीद करने की इस शैली में जो आत्‍मविश्‍वास की खुशबू है, वह इसलिए है कि फिल्‍म से जुड़े लोगों को पता है कि महीनों-सालों चुल्‍लू भर नींद लेकर उन्‍होंने एक चीज तैयार की है।

जो हम पर कुर्बान होते हैं, वही इरफान होते हैं!

राहुल तिवारी ♦ सवाल पर सवाल और हर सवाल पर उसी संयम और सहजता के साथ जवाब देख-सुन कर रामायण के राम और रावण के बीच चलने वाले तीर के टकरा कर गिर जाने का वो दृश्य याद आ रहा था, पर यहां राम एक थे और विपक्ष की ओर से आने तीरों की भरमार थी। संजीवनी के नाम पे एक पुड़िया पान मंगाया गया था उनके लिए। रात हो चुकी थी। उनका चश्मा था, जो उतरने का नाम नहीं ले रहा था। हो सकता है रेबैन कारण!! और इसी के साथ एक ऐतिहासिक दिन का अंत हुआ, जिसमें भविष्य के इतिहास पुरुष ने अपना इतिहास हमारे सामने साझा किया … यूं तो लोग उनसे हाथ मिलाने की होड़ लगा रहे थे, पर पता नहीं क्यूं मेरा मन हाथ मिलाने का बिलकुल भी नहीं हुआ और मेरा माथा झुक गया और मैंने उनके पैर छू लिये।

स्‍टारडम कुछ नहीं होता, असल चीज होती है कहानी!

महताब आलम ♦ इरफान जेएनयू पहुंच चुके थे। जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया। आयोजकों की ओर से औपचारिक स्वागत भी हुआ। तोहफे के तौर पर एक कलम, महान अभिनेता बलराज साहनी जी का एक भाषण, जो जेएनयू के एक कॉनवोकेशन में दिया गया था और रमाशंकर विद्रोही जी का काव्य संकलन, “नई खेती” पेश किया गया। मेरी समझ में इन तीनों में सबसे अहम विद्रोही जी का काव्य संकलन था, जो इरफान को पेश किया गया। जो विद्रोही को सुन चुके हैं, मिल चुके हैं, वो मेरी इस बात को अहम बताने की वजह समझ सकते हैं। हां, एक बात और कि मेरे कहने का मतलब ये बिलकुल नहीं की बलराज साहनी का भाषण कम अहम है। मामला असल में संदर्भों का है।

माय नेम इज़ खान… और मैं हीरो जैसा नहीं दिखता…

निखिल आनंद गिरि ♦ इरफान हीरो जैसा कम और एक हाजिरजवाब युवा ज्यादा लगने की कोशिश कर रहे थे। जेएनयू में पान मिलता नहीं, मगर बाहर से मंगवाकर पान चबाते हुए बात करना शायद माहौल बनाने के लिए बहुत जरूरी था। एकदम बेलौस अंदाज में इरफान ने लगातार कई सवालों के जवाब दिये। जैसे अपने रोमांटिक दिनों के बारे में कि कैसे वो दस-पंद्रह दिनों तक गर्ल्स हॉस्टल में रहने के बाद पकड़े गये और उनके खिलाफ हड़ताल हुई। या कि ‘हासिल’ के खांटी इलाहाबादी कैरेक्टर में ढलने के लिए उन्हें कैसे तजुर्बों से गुजरना पड़ा। हालांकि, राजनीति या सिनेमा पर पूछे गये कई सीरियस सवालों पर अटके भी और हल्के-फुल्के अंदाज में टाल भी गये।