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अब्राहम हिंदीवाला ♦ मोहल्ला पर अनुराग कश्यप के प्रशंसकों और आलोचकों के लिए एक खबर है कि उनकी अप्रदर्शित फिल्म ‘द गर्ल इन यलो बूट्स’ इस साल वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गयी है। बतौर निर्माता उनकी फिल्म ‘उड़ान’ इस साल जून में कान फिल्म फेस्टिवल में अधिकृत रूप से चुनी गयी थी। स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए यह प्रेरक खबर है, क्योंकि देश में बन रही सात-आठ सौ फिल्मों में से चंद फिल्में ही इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलों के लिए चुनी जाती हैं। आलोचक पूछ सकते हैं कि विदेशी तमगों से इन फिल्मों को क्या फायदा होगा? फायदा तो होता है। इंटरनेशनल पहचान से कृति और रचना का भाव बढ़ जाता है। हम भारतीय उसे नए नजरिए से देखने लगते हैं।
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चंद्र प्रकाश द्विवेदी ♦ हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्य के लिए सही नहीं है। यहां के निर्माता-निर्देशक मुनाफे और व्यवसाय की लीक पर चलते हैं। वे स्टारों पर आश्रित रहते हैं। अगर हिंदी प्रदेशों में सिनेमा विकसित होगा तो मुंबई का एकाधिकार टूटेगा और एकरसता भी खतम होगी। मुझे लगता है, तब भी हमारे समाज की कहानियां फिल्मों में आ पाएंगी। मुंबई के निर्माता-निर्देशकों ने अपने ऊपर यह बोझ ले लिया है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को संतुष्ट करना है। उसकी वजह से ही स्टार सिस्टम बढ़ा है। अभी भोजपुरी सिनेमा का विकास दिख रहा है लेकिन वह भटकाव का शिकार है। अधिकांश भोजपुरी फिल्में हिंदी फिल्मों की भोंडी नकल हैं।
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आमिर खान ♦ पीपली लाइव एक काल्पनिक कहानी है दो भाइयों की, जो किसान हैं। फिल्म की शुरुआत में कर्ज न चुकाने की वजह से वे अपनी जमीन खोने वाले हैं। इसी दौरान उन्हें पता चलता है एक सरकारी योजना के बारे में, जो कहती है कि जो किसान कर्जे की वजह से आत्महत्या करता है, उसके परिवार को एक लाख रुपये दिये जाएंगे। यह सुन कर बड़ा भाई छोटे भाई को मनाता है कि वह आत्महत्या कर ले ताकि परिवार को एक लाख रुपये मिल जाएं। बड़ा भाई थोड़ा तेज है। छोटा भोला है, तो उस वक्त तो वह मान जाता है। उस समय इन दोनों को बिल्कुल अंदाजा नहीं है कि जो कदम वे उठाने जा रहे हैं, उससे उस गांव में क्या होने वाला है। यह फिल्म एक मजाकिया नजर है हमारे समाज पर।
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डॉ योगेंद्र ♦ सच तो यह है कि सिनेमा ने साहित्य की किसी भी रचनात्मक विधा से ज्यादा असर समाज पर डाला है। हालात यह है कि उसके असर से समाज का रॉल मॉडल बदल गया। बहुसंख्यक युवाओं के रॉल मॉडल न मार्क्स हैं, न गांधी, न भगत सिंह, न बुद्ध। वे इन लोगों की कहानियां पाठ्यक्रमों में दवाब से पढ़ लेते हैं, लेकिन जब भी उन्हें फुर्सत होती है, तब हीरो-हिरोइनों की दुनिया में खो जाते हैं। वे अपनी समस्याओं का हल भी सिनेमाई अंदाज से करना चाहते हैं। कभी गांधी टोपी और जयप्रकाश कट कुरता हुआ करता था, मगर अब तो कहीं सलमान है तो कहीं शाहरूख। सिनेमा ने समाज के सोचने-समझने के तरीके बदल दिये हैं।
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विश्वदीपक ♦ फिल्म गुलाल में जिस बदहवास से चेहरे को गोली मारी जाती है, उसका नाम है पृथ्वी बना और दुनिया के रंगमंच पर जिस खूबसूरत शख्स की हत्या की जाती है उसका नाम है हेमचंद्र पांडेय। पृथ्वी बना का चरित्र पियूष मिश्रा ने निभाया था और अखबारों में हेमचंद्र पांडेय हेमू के नाम से जाना जाता था। इन दोनों ने एक कॉमन गलती की थी। कॉरपोरेट-डेमोक्रेसी की संचरना पर सवाल उठाया था। ‘द रियल डेमोक्रेसी’ की त्रासदी और उसकी विडंबना पर तंज कसा था। जाहिर है, लोकतंत्र के नाम पर लूट और बर्बरता का साम्राज्य खड़ा करने वालों को ये मंजूर कैसे होता?
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अनीश ♦ सामाजिक बदलाव का ठेका फिल्मकारों, पत्रकारों या विभिन्न कला को अपनी जीविका बनाने वाले लोगों ने नहीं ले रखा है। समाज के हर आदमी की ये जिम्मेदारी है कि वो इसमें अपनी भूमिका निर्धारित करे। और उस पर अग्रसर हो। दूसरों को कठघरे में खड़ा करने के पहले खुद को कठघरे में खड़ा करके देखे और विचार करे। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि वो हमको कठघरे में खड़ा नहीं करे। दूसरा सवाल ये है कि जिस बदलाव या क्रांति की हम बात कर रहे हैं, उसका परिप्रेक्ष्य क्या है… अलग अलग लोगों के लिए इसके मायने अलग अलग हो सकते हैं। वो कौन सी विश्वदृष्टि है, जो सामाजिक बदलाव की दिशा तय करेगी।
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डेस्क ♦ बहस तो होती ही रहती है और बहस तो होती ही रहेगी। इस पूरी कवायद में ये हुआ कि अनुराग कश्यप थोड़े उघड़े। निर्देशक, सर्जक के रूप में हमने उन्हें पहले ही अपने वोट उन्हें दे रखे हैं, एक खुले इंसान और दोस्त की तरह हमारे बीच आकर उन्होंने बेतकल्लुफ बातचीत की – इससे उनका एक नया अंतरंग भी हमारे सामने उपस्थित हुआ। अभी उनकी फिल्म उड़ान आने वाली है। जैसा कि इस फिल्म की कहानी के बारे में कहा जा रहा है, ये उस किशोर की कहानी है जो जीवन के बारे में अपने फैसले खुद लेता है। कहा ये भी जा रहा है कि इसकी कहानी अनुराग के अपने जीवन से मिलती-जुलती है। अनुराग ने 1993 में अपने माता-पिता ऐसे ही संकेतों वाली एक चिट्ठी लिखी थी।
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अनीश ♦ अगर कोई ऐसी कहानी मिल भी जाए तो अनुराग को या किसी को भी पैसे के लिए ऐसे लोगों के पास जाना पड़ेगा जिनकी सामाजिक प्रतिबद्धता आपकी जैसी नहीं होगी। मैं प्रस्ताव रखता हूं उन सभी बदलाव की इच्छा रखने वालों के समक्ष कि वो एक फंड शुरू करें ऐसी फिल्मों के लिए। मोहल्ला लाइव डॉट कॉम nodal agency की भूमिका में आये। अनुराग, मनोज और ऐसे बहुत सारे लोग मिलेंगे फिल्म इंडस्ट्री में, जो खुशी से इस फंड को खड़ा करने में सहयोग करेंगे। लोग वास्तव में यदि गंभीर हैं और बदलाव के लिए प्रतिबद्ध हैं तो आगे आएं। सवाल सिर्फ कहानी का नहीं है बल्कि धन और उसका चरित्र, प्लेटफॉर्म और दर्शक भी है। लोग आगे आएं, हम सब प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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अनुराग कश्यप ♦ हमारे यहां वो नहीं हो सकता, जो यूरोप और अन्य देशों में हुआ है। हमारे देश में डेमोक्रेसी के मायने अलग हैं। हमारे यहां पिक्चरों में मोची, चमार, बार्बर, तेली जैसे शब्द काट दिये जाते हैं, क्योंकि उनके जो पॉलिटिकल रिप्रजेंटेटिव हैं, वो आई और बी मिनिस्ट्री पे चढ़ बैठते हैं, जो सेंसर बोर्ड पे चढ़ बैठता है। गुलाल में से सिर्फ दो शब्द सेंसर किये गये, जब पृथ्वी बना कहता है, सारे गोल चश्मे वाले ऐसे ही होते हैं, गांधी अंबेदकर। उनके चश्मे गोल थे, अंडरस्टैंडिंग भी गोल थी। गांधी और अंबेडकर काट दिया गया। वाक्य का मतलब क्या रहा? आपका आइडियलिज्म जो है, यहां के यथार्थ में रह कर इस्तेमाल करिए।
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मनोज बाजपेयी ♦ अनुराग कश्यप को बुलाकर उनके होने पर ही सवाल उठाकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? जब अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, दिबाकर चटर्जी, नीरज पांडे जैसे युवा निर्देशक सामने आये तो उनकी संगत का भरपूर मजा लीजिए। न कि उनको कठघरे में खड़ा करना शुरू कीजिए। क्योंकि उन्होंने अपने सिनेमाई करियर की शुरुआत से लेकर अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिसे लेकर उन्हें भड़कने पर मजबूर किया जाए। अनुराग कश्यप से समाज को बदलने की अपेक्षा क्यों रखी जाती है? अनुराग कश्यप अगर सिनेमाई भाषा की परिभाषा बदलने में लगे हैं तो उन्हें बधाई दीजिए। उनके साथ चाय पीजिए और उस याद को घर लेकर जाइए। दलितों पर फिल्म नहीं बनायी जा सकती है, एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनायी जा सकती है।



