Category: मोहल्ला मुंबई

बॉलीवुड की नयी छिछोरी पहल देखी आपने?

एआईबी। यानी ऑल इंडिया बकचोद। इसी बैनर तले मुंबई में बॉलीवुड सितारों का एक मजमा लगा। चार हजार सेलिब्र‍िटीज का मजमा। इस मजमे की डेढ़ घंटे की वेल एडिटेड वीडियो रिकॉर्डिंग इन दिनों यूट्यूब...

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इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?

➧ विजय कुमार सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है? इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है? पिछले दिनों मुंबई के बांद्रा–कुर्ला कॉम्पलेक्स में एक भव्य इमारत में किसी कार्यक्रम...

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इस जिंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता!

उमेश पंत ♦ उस प्ले के किरदारों की विडंबना भी यही थी कि ये किसी को भी नहीं पता कि उस प्ले का निर्देशक कौन है? ठीक वैसा जैसा जिंदगी में होता है। हर मोड़ पे कोई नया किरदार आता है और जिंदगी को एक दिशा देने लगता है, तब पता चलता कि दरअसल अब तक जो घटनाएं हो रही थीं वो घटनाएं इसी निर्देशन के लिए हो रही थीं।

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भीड़भाड़ में एकांत की एक कथा-यात्रा

उमेश पंत ♦ लंबी यात्रा के बाद आप जब मुंबई लौटते हैं तो मुंबई को नये नजरिये से देखने की ललक होती है। मुंबई भले ही अफरातफरी से भरा शहर हो पर मुंबई के आसपास इस अफरातफरी से उपजे मानसिक तनाव को बहा आने के तटीय प्रबंध भी मौजूद हैं। पर आपको खुद के लिए और इन तटों तक पहुंचने के लिए वक्त निकालना होगा।

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आकाश पे एक खुदा है कहीं, आज सीढ़ी लगाके ढूंढें उसे!

उमेश पंत ♦ एक गाने का जि़क्र करते हुए गुलजार कहते हैं कि अब गुल्लक जैसे शब्द आम ज़िंदगी में प्रयोग से बाहर होने लगे हैं। बीड़ी जलइले गाने में कचेहरी जैसा शब्द इस्तेमाल किया है, पर कचेहरी अब कौन समझता है। ये एक अकेला शब्द पूरी जमींदाराना तहजीब को बयां कर देता है। गुलजार आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि मैं अपने दौर की तहजीब इकट्ठा कर लूं, तो…

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आखिरी दिन युद्ध, हत्‍या, कैद और सूचना का सिनेमा

अविनाश ♦ द फिफ्थ इस्‍टेट की पटकथा जोश सिंगर (Josh Singer) ने तैयार की है, जो जूलियन असांज को भी पढ़ने के लिए दी गयी थी। जूलियन ने इसकी पटकथा पर एतराज किया था। दरअसल फिल्‍म यह बताती है कि जूलियन असांज स्‍टेट के जिस भ्रष्‍टाचार को अपनी धमाकेदार लीक्‍स के जरिये एक्‍सपोज करना चाहता है, वह अन-एडिटेड (असंपादित) होने की वजह से अनैतिक है और खतरनाक है। फिल्‍म के मुताबिक इसी वजह से जूलियन की टीम टूटती है। फिल्‍म में लगभग शुरू से अंत तक विकीलीक्‍स के धाराप्रवाह भंडाफोड़ को अमानवीय बताने की कोशिश की गयी है। चाहे वो स्विस बैंक के गुप्‍त खातों की पोल-खोल हो या बगदाद में अमेरिकी सैनिकों के कुकृत्‍य को बेपर्दा करने की घटना हो। यह फिल्‍म मामी की अंतिम फिल्‍म थी और इसकी भव्‍यता असंदिग्‍ध थी। लेकिन कथा में निरपेक्ष होने की तमाम कोशिशों के बावजूद राज्‍य के पृष्‍ठ-पोषण का निर्देशक का पक्ष जाहिर हो ही जाता है।

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Money is the master #LeCapital #MAMI

अविनाश ♦ ले कैपिटल के संवाद भी शोले की तरह जलवाखेज हैं। मार्क अपनी कामयाबी के बाद जब अपने मां-बाप से मिलने पैतृक घर जाता है, तो उसका चाचा जो मार्क्सिस्‍ट बूढ़ा है, मार्क से एथिक्‍स को लेकर बहस करता है। चाचा कहता है कि हमारी जरूरत भर पैसा ही हमारी खुशी के लिए काफी है। मार्क कहता है कि खुशी की कोई सीमा नहीं है और आज पैसा ही सबको खुश कर सकता है, मनी इज द मास्‍टर। फिल्‍म का आखिरी संवाद ही पूरी कहानी का सार है, जब वह सिकंदर की तरह अपनी जीत का पहला भाषण शुरू करता है। कहता है, मैं आधुनिक रॉबिनहुड हूं, गरीबों से पैसे छीन कर अमीरों में बांटता हूं। एक लाजवाब फिल्‍म, जिसे न देखना बहुत अफसोसनाक होता।

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मस्‍तराम को खोज नहीं पाया हिंदी सिनेमा #MAMI

अविनाश ♦ “मस्‍तराम” का पोस्‍टर कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक पर शेयर किया था। अच्‍छा लगा था कि इस विषय को छूने का साहस अखिलेश ने दिखाया। क्‍योंकि हमारे यहां सेक्‍स शिक्षा नहीं है और इसकी खुली चर्चा पर परिवार और समाज में अघोषित प्रतिबंध है, मर्द भारत की जुगुप्‍साएं मस्‍तराम की किताबों में शांत होती रही हैं। लेकिन सिनेमा इस व्‍यापक मसले को पूरे वितान में उठाने के बजाय मस्‍तराम नाम के उस व्‍यक्ति की कहानी रचने में लग गया, जो शायद कोई एक आदमी था ही नहीं। मस्‍तराम एक अदृश्‍य रचनाकार था और देश के कई इलाकों में पाया जाता था। मजाहिया शायर चिरकन की शायरी से पहले भी सड़कछाप साहित्‍य रहा है। गद्य में संभवत: पहली बार मस्‍तराम ने स्‍वानंद की चिंगारी लगायी होगी, लेकिन वह यकीनन एक शख्‍स नहीं रहा होगा। प्रकाशक की ओर से दिया गया काल्‍पनिक नाम होगा और उसके लेखक भाषा के कई विद्यार्थी-शोधार्थी रहे होंगे।

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यौन हिंसा के खिलाफ मिस वर्ल्‍ड की मुहिम पर वृत्तचित्र

उमेश पंत ♦ ब्रेव मिस वर्ड नाम की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म से दिन की शुरुआत हुई। इजराइली सुंदरी लिनॉर अबार्गिल 1998 में मिस वर्ड चुनी जाती हैं। उन्हें ताज पहनाया जाता है, पर दुनिया नहीं जानती कि विश्व सुंदरी बनने से ठीक दो महीने पहले वो एक ऐसे अतीत से गुजरी हैं जिसे एक औरत का दु:स्वप्न कहा जा सकता है। उनके सर पर ताज है और आंखों में आंसुओं के साथ वो दो महीने पहले बीता वो लम्‍हा जब उनका बलात्कार किया गया था। दस साल उन्होंने इस घटना को राज रहने दिया, लेकिन दस साल बाद वो इसे दुनिया के सामने जाहिर करने का फैसला करती हैं और फैसला करती हैं कि वो दुनिया भर की महिलाओं को चुप न रहने का संदेश देंगी और वो दुनिया भर में यात्राएं करती हैं। बलात्कार पीड़ित महिलाओं से मिलती हैं।

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यौनिकता महज विपरीत लिंगों की मोहताज नहीं है

अविनाश ♦ यौनिकता महज विपरीत लिंगों की मोहताज नहीं है, वह समलिंगी एहसास भी है और पूरी तरह से प्राकृतिक है। दुनिया भर में समलिंगियों के बीच आकर्षण अपने सह-अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ रहे हैं और जीत रहे हैं। फिर भी हमारी सामाजिकता उसकी स्‍वाभाविकता की पहचान करने से परहेज कर रही है, हिचकिचा रही है। Abdellatif Kechiche की फिल्‍म Blue Is the Warmest Colour: La vie d’Adèle इस मसले को बहुत उदात्‍त ढंग से सुलझाती है, समझाती है। यह फ्रेंच फिल्‍म अडेले नाम की एक लड़की की कहानी है, जो जीवन का पहला यौन संबंध अपने स्‍कूल के साइंस सीनियर के साथ बनाती है। इस रिश्‍ते में उसे सुख का क्षणिक एहसास तो होता है, पर इस एहसास में उसे स्‍थायित्‍व नजर नहीं आता। धीरे-धीरे वह महसूस करती है कि वह लड़कों के मुकाबले लड़कियों की तरफ ज्‍यादा आकर्षित होती है। उसकी जिंदगी में एम्‍मा नाम की एक युवा चित्रकार आती है और दोनों सहजीवन में जाते हैं। दोनों एक दूसरे को लेकर पजेसिव हैं और रिश्‍ते की कांच जब गलतफहमी के पत्‍थर से चटकती है, दोनों अधूरे हो जाते हैं। यानी स्‍त्री-पुरुष के रिश्‍तों की तरह के ताने-बाने समलिंगी रिश्‍तों में भी नजर आते हैं, ब्‍लू इज द वार्मेस्‍ट कलर यही कहना चाहती है।