Category: मोहल्ला मुंबई

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जब पूंजी कांपती है, हम सब कांपते हैं #Capital

प्रकाश के रे ♦ 2008 की वैश्विक महामंदी का मुख्य कारण वे नीतियां थीं, जिनमें वित्तीय बाजार को नियंत्रण-मुक्त करने के लिए कई नियम लाये गये थे। इन नियमों को माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया वारेन बफे ने ‘सामूहिक बर्बादी के आर्थिक हथियार’ की संज्ञा दी थी। यह संकट इतना गहरा था कि अमरीकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख बेन बर्नान्की ने आशंका जतायी थी कि शायद यह पूंजीवाद का अंत है और तुरंत 700 बिलियन डॉलर की मांग की थी ताकि स्थिति को कुछ हद तक संभाला जा सके। अनुमानों के अनुसार इस संकट का तब का नुकसान 8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक था। फिल्म हमें यह बताती है कि यह सब ‘काउ बॉय कैपिटलिज्म’ और ‘तुरंत मुनाफा’ के पैरोकारों की कारस्तानी थी। तुरनील एक जगह कहता है कि वह आधुनिक रॉबिनहुड है जो गरीबों से छीन कर अमीरों को देता है। फिल्म इस संदेश के साथ खत्म होती है कि बैंकर मजे में हैं और यह मजा तब तक चलता रहेगा, जब तक सब कुछ टूटकर बिखर न जाए।

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मछली, कुत्ता और पुरुषत्‍व के बहाने मनुष्‍यता का सिनेमा

उमेश पंत ♦ कंवर अपने अस्तित्व से लड़ने के लिए अभिशप्त है। अपनी ही उन दो पहचानों के बीच जूझती हुई, जिनमें एक सच है, एक झूठ। वो जो झूठ है समाज उसे एक सच के रूप में जानता है। और वो जो सच है समाज अब उसे स्वीकार नहीं कर सकता। पर कंवर के लिए उस सच को अपनाना जरूरी है। एक झूठ आखिर कब तक जिया जा सकता है, वो भी तब जब वो आपकी लैंगिक पहचान से जुड़ा हो। नीली के भीतर की स्त्री, कंवर के भीतर की स्त्री को समझती है। वो उस सच से जूझने में अब तक पुरुष बनकर जिये अपने उस पति की मदद करती है, जो दरअसल एक स्त्री है।

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इतिहास नागरिकों का होता, तो नायक शहीद नहीं होते

अविनाश ♦ इतिहास नायकों का जरूर होता है, पर अगर वह आम जनसंघर्षों का होता, तो नायकों की कठिन शहादतों की कहानियां न होतीं। द लिबरेटर में नायक जब खुद को राष्‍ट्रपति घेषित करता है, उसका सलाहकार उससे कहता है कि यह जीत तुम्‍हारे अकेले की नहीं है। वह युद्ध में शामिल हर नागरिक की जीत है। अलबर्टो अलवेरो की स्‍पैनिश फिल्‍म द लिबरेटर अमेरिका के मुक्ति संघर्ष के एक योद्धा सिमॉन बोलिवर (1783-1830) की कहानी है। उसने स्‍पेन के खिलाफ वेनेजुएला, कोलंबिया, पनामा, पेरू और इक्‍वाडोर की स्‍ववायत्ता के लिए कठिन लड़ाइयों को संगठित किया। वह दूरदर्शी था, जैसा कि आम तौर पर नायक होते हैं। मौजूदा अमेरिकी लोकतंत्र, जिसमें प्रेसिडेंट सर्वोपरि होता है, उसकी नींव सिमॉन बोलिवर ने ही रखी थी। इतिहास और युद्ध की कुछ अच्‍छी फिल्‍मों में द लिबरेटर को शुमार किया जाएगा।

पांच में से एक फिल्‍म खराब निकल जाए, तो भी क्‍या? 0

पांच में से एक फिल्‍म खराब निकल जाए, तो भी क्‍या?

अविनाश ♦ पोर्न इंडस्‍ट्री मर्दों के यौनिक दुराग्रहों का सर्वाधिक कमाऊ बाजार है। Joseph Gordon-Levitt की फिल्‍म Don Jon इसी बाजार के एक अमेरिकी उपभोक्‍ता की कहानी है। जॉन मारटेलो न्‍यूजर्सी में बार टेंडर है। वह इंटरनेट पर पोर्न वीडियोज के जरिये अपनी यौनिक कल्‍पनाओं से खुद को सेक्‍सुअली राहत देने का आदी है। वह स्‍त्री को सिर्फ एक सेक्‍स ऑब्‍जेक्‍ट समझता है और बार में आने वाली लड़कियों को बिस्‍तर तक ले जाने की निरंतर फिराक में रहता है। इस शख्‍स को उसके जीवन में आयी दो औरतें ही रिश्‍तों की गरिमा का एहसास दिलाती है और बताती है कि जिस आदत को वह हर मर्द के लिए आम बताता है, वह दरअसल एक बीमारी है। पूरी कहानी में चर्च बार-बार आता है, जहां हर स्‍वीकारोक्ति (कनफेशन) के बाद मन का पाप पानी हो जाता है।

खराब शुरुआत के बाद ज़ि‍राफादा ने दिन बना दिया 0

खराब शुरुआत के बाद ज़ि‍राफादा ने दिन बना दिया

उमेश पंत ♦ कुछ देर इनफिनिटी के फूड कोर्ट में बैठे अगले दिन की फिल्मों की अग्रिम बुकिंग की सुविधा का लाभ लेने के बाद शाम की अगली फिल्म देखने के हम स्क्रीन एक के सामने लगी लंबी कतार में खड़े थे। वहां एक बुजुर्ग अंकल मिले, जिन्होंने गर्व से बताया कि वो तेरहवीं दफा मुंबई फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बन रहे हैं। वो अपने साथ एक बाकायदा लेमिनेशन की हुई पर्ची लाये थे, जिसमें उन 20 बेहतरीन फिल्मों की सूची थी, जिसे उन्हें फेस्टिवल के डायरेक्टर ने लिखवाया था। उस शहर में जहां फिल्में बनती हैं, ऐसे बुजुर्गों से मिलना अच्छा लगता है, जो फिल्मों पर मरते हैं। उनके साथ ही विप्रो में काम करने वाले एक नौजवान से भी मुलाकात हुई, जिन्हें इस फेस्टिवल की कुछ बेहतरीन फिल्मों के सिनॉप्सिस अच्छी तरह याद थे। इन लोगों से बात करते-करते उस लंबी कतार को कब पीछे छोड़ आये और कब सिनेमा हॉल की सीढ़ियां चढ़ गये, पता ही नहीं चला।

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तीन फिल्‍मों पर थोड़े में कुछ बातें #Mami

अविनाश ♦ हिंदुस्तान की तरह थाईलैंड में भी ऐसे गांव हैं, जहां निर्वासन की वीरानी देखी जा सकती है। आवारा बच्चे बचे हैं, जिनकी मांओं ने जिनके पिता को छोड़ दिया है – या जिनके पिताओं ने शहर में दूसरा घर बसा लिया है। सब इसलिए थोड़ी देर के लिए गांव लौटते हैं, क्योंकि यही वो जगह है, जहां कभी कभी वे लौट भी सकते हैं। “विलेज ऑफ होप” थाईलैंड के एक ऐसे ही गांव की कहानी है। सौर्न नाम का एक लड़का, जो माता-पिता की बेवफाइयों का पीड़ित है, खाली गांव के चंद बचे लोग भी उसकी उपेक्षा करते हैं। सौ की उम्र को छूती एक दादी है, जो तमाम दादियों की तरह कभी किसी गांव से नहीं निकलती, सौर्न से सहानुभूति रखती है।

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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाजार की तरह!

उमेश पंत ♦ गली की पहली दुकान बहुत पुरानी फिल्मों के पोस्टरों की थी। नास्तिक, विद्या, बागी… जैसे एसडी वर्मन का जमाना लौट आया हो, आनंद बक्सी उन पोस्टरों से झांक रहे हों… सोच सोचकर रोएं खड़े हो रहे थे कि कभी वक्त निकाल कर अमिताभ बच्चन यहां आ पाएं तो अपने पुराने दिनों को जीता हुआ देखकर उस एंग्री यंग मैन को कैसा लगेगा? हर कोई इतना भाग्यशाली कहां होता है कि उसके अतीत को अपनी दीवारों पर चस्‍पां करने के लिए लोग दूर दूर से उन कागज के टुकड़ों को ढूंढने चले आएं, जिनके पुराने रंगों में उस अतीत की ताजगी अब भी मौजूद है। अब जब सब डिजिटल हो गया है, तो उन पोस्टरों पे हाथ से की हुई कारीगरी के रंग बेशकीमती हो गये हैं।

एक छाता सा छाता है, कुछ खुशी सी खुशी है 0

एक छाता सा छाता है, कुछ खुशी सी खुशी है

♦ उमेश पंत कई लोग आपकी जिंदगी के वाक्‍यांशों में किसी कोमा की जगह आते हैं। आप थोड़ी देर ठहरते हैं और जब आगे बढ़ते हैं, तो देखते हैं वो वाक्य उनपर रुकने के...

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है 3

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है

किशोर कुमार ♦ दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों मैं इतनी फिल्में कर रहा था कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बीच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए। एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरी पैंट गिर रही है, मेरा विग बाहर निकल रहा है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रुमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रुमानियत। यह बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिये। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। यह करो। वह करो। यह मत करो। वह मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।

सफेदपोशों की शह पर चलती है रेल, अवाम अवाक रहती है! 2

सफेदपोशों की शह पर चलती है रेल, अवाम अवाक रहती है!

उमेश पंत ♦ रेल की इस रेलमपेल से इतर इन आठ दिनों में मुंबई को किसी बीच के स्टेशन में एक अनिश्चित समय के लिए ठहरे हुए किसी यात्री की नजर से देखा है। मुंबई का असल फील अब अंधेरी के यारी रोड में कॉस्टा कॉफी से ब्रू वर्ड कैफे के बीच मौजूद उस सड़क के इर्द-गिर्द वाले इलाके में ही आता है। वर्सोवा के समुद्री तट के किनारे बसे उस इलाके में कई जाने-पहचाने चेहरे जो नजर आते हैं। कुछ चेहरे जिन्हें कभी टीवी पे तो कभी फिल्मों में देखा होगा, कुछ चेहरे जिनके साथ पढ़ाई की है, कुछ चेहरे जिनके साथ काम के सिलसिले में जुड़े हैं। मुंबई में रिहाइश के इस अरसे में अब तक प्रोफेशनल होना नहीं सीखा है।