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Articles in the मोहल्ला पटना Category

मोहल्ला पटना »

[31 Aug 2010 | 4 Comments | ]
रंगमंच को आम जनता से जोड़ना होगा : सुधन्‍वा

अनीश अंकुर ♦ प्रेरणा के इस लंबे चले आयोजन में रंगकर्मियों, कलाकारों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा छात्रों, नौजवानों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। हसन इमाम के नेतृत्व में हुआ लगभग एक पखवारे का ये समूचा आयोजन जनपक्षधर संस्कृतिकर्म को समर्पित था। अपने ढाई दशक के पूरे सफर में `प्रेरणा´ ने सबसे ज्यादा इसी बात की कोशिश की कि कैसे बिहार में जनता की जरूरतों, आकांक्षाओं और उनके दुख-दर्द को प्रतिबिंबित करने वाले रंगकर्म का विकास हो सके। बिहार जैसे प्रदेश में जहां रंगमंच को सामाजिक समर्थन अपेक्षाकृत बेहद कम है – एक संस्था का 25 वर्ष तक धमक के साथ उपस्थिति बनाये रखना किसी उपलब्धि से कम नहीं।

मीडिया मंडी, मोहल्ला पटना »

[30 Aug 2010 | 5 Comments | ]
महासम्मेलन में उठी पेड न्यूज के खिलाफ आवाज

डेस्‍क ♦ शनिवार को पटना में पेड न्यूज के खिलाफ हुए सम्मेलन में ये आम सहमति दिखी कि पेड न्यूज के कारोबार ने पत्रकारिता की साख को खत्म कर दिया है और ये लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन गया है। अधिकांश वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारों द्वारा बुलाया गया ये महासम्मेलन पेड न्यूज के खिलाफ एक छोटी मगर महत्वपूर्ण पहल है क्योंकि ये आवाज पत्रकारों की तरफ से उठायी जा रही है। पेड न्यूज के खिलाफ इस महासम्मेलन में मीडिया और सामाजिक वर्गों के अलावा प्रदेश के प्रमुख दलों के कई दिग्गज नेताओं ने भागीदारी की। इनमें लालू यादव, राम विलास पासवान, दीपंकर भट्टाचार्य, शाहनवाज हुसैन, जगन्नाथ मिश्र, प्रेमचंद मिश्र, गुलाम गौस और राजीवरंजन शामिल थे।

मोहल्ला दिल्ली, मोहल्ला पटना »

[20 Aug 2010 | 9 Comments | ]
पत्रकार फूंकेंगे पेड न्यूज के खिलाफ बिगुल

मुकेश कुमार ♦ बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज के खिलाफ कमर कस ली है। पत्रकारों और पत्रकारिता की साख को चौपट करने वाली इस बीमारी का विरोध करने के लिए वे एकजुट हो रहे हैं और आगामी 28 अगस्त को बाकायदा अपनी आवाज भी बुलंद करेंगे। पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। पेड न्यूज पर लगाम लगाने की दिशा में एंटी पेड न्यूज फोरम 28 अगस्त को महासम्मेलन करने जा रहा है।

नज़रिया, मोहल्ला पटना »

[20 Aug 2010 | 4 Comments | ]
द ‘ग्रेट’ नेशनल सर्कस उर्फ ममता की खोखली मेधा

विश्‍वजीत सेन ♦ माओवादियों को संदेश भेजने के अलावा, ममता बनर्जी ने आजाद की मौत को ‘सुनियोजित साजिश’ की संज्ञा दी। ‘ग्रीन हंट’ को वापस लेने की मांग की। क्या यह वही ममता बनर्जी हैं, जो सिद्धार्थ शंकर राय के मुख्यमंत्रित्व काल में युवा कांग्रेस के हत्यारों का नेतृत्व किया करती थीं। वैसे हत्यारे भारत ने न कभी देखा है, न उसे देखना ही चाहिए – बंगाल के कितने घर उजड़ गये, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। उन घरों के बचे खुचे लोग ममता को सुन रहे हैं। खेद है कि उन लोगों के पास कोई मंच नहीं है। वरना, वे ममता को जवाब देते। ममता के साथ दो और लोग मंच पर थे – मेधा पाटकर तथा स्वामी अग्निवेश। आजकल इन लोगों के पास कोई मुद्दा नहीं है।

मोहल्ला पटना, मोहल्ला लखनऊ, विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[12 Aug 2010 | 7 Comments | ]
पटना से लेकर लखनऊ तक फूटे विरोध के स्‍वर

संजय कुमार ♦ छिनाल प्रकरण पर देर से ही सही, बिहार की राजधानी से विरोध के स्वर फूटे हैं। महिला लेखिकाओं के खिलाफ अपशब्द बोलने को लेकर बिहार के मीडिया में लेखकों का बयान आया। लखनऊ जसम के मुताबिक राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नया ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। वक्ताओं ने ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक की भी आलोचना की। उनका कहना था कि समाज व जीवन के ज्वलंत व जरूरी सवालों व सरोकारों से साहित्य को दूर ले जाकर उसे मात्र मसालेदार बनाने की दिशा में रवींद्र कालिया काम कर रहे हैं।

मोहल्ला पटना, विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[7 Aug 2010 | 8 Comments | ]
विभूति, कालिया को बचाने में सक्रिय है सवर्ण शक्तियों का नैक्सस

राकेश साह ♦ विभूति नारायण राय प्रकरण की जो आंधी चली है, उसकी नींव में कई लोगों की सहभागिता नजर आ रही है। यह प्रसंग बहुत सारी जनवादी और प्रगतिशील सवर्ण शक्तियों के नैक्सस को भी सामने ला रही है। सचमुच यह घोर अवसरपरस्त समय हो चला है, जहां लंपटता को ग्लैमराइज किया जा रहा है। कभी किसी ने कल्पना नही की होगी कि ज्ञानपीठ जैसा संगठन इस तरह की तुच्छताओं और क्षुद्रताओं के महिमांडन का मंच बनेगा। लेकिन यह सब धड़ल्ले से हो रहा है और पूरा हिंदी समाज विभूति और कालिया जैसे लंपटों की लंपटगीरी को सिर-आंखों पर बिठाये हुए है। अपने बिहार की बात कहूं तो पटना में जन संस्‍कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ की कुंठाएं जगजाहिर हैं।

नज़रिया, मोहल्ला पटना »

[26 Jul 2010 | 27 Comments | ]
बिहार में प्रतिक्रांति के पांच साल

प्रमोद रंजन ♦ नीतीश कुमार पिछड़ी जाति से आते हैं। यह तथ्य, उस मासूम उम्मीद की मुख्य वजह बना था कि वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में काम करेंगे। समान स्कूल प्रणाली आयोग तथा भूमि सुधार आयोग के हश्र तथा अति पिछड़ा वर्ग आयोग व महादलित आयोग के प्रहसन को देखने के बाद यह उम्मीद हवा हो चुकी है। इसके विपरीत नीतीश कुमार बिहार में पिछड़ा राजनीति या कहें गैरकांग्रेस की राजनीति की जड़ों में मट्ठा डालने वाले मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। 2005 में राश्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार भारी बहुमत से चुनाव जीत कर आये थे। उसके बाद से जिस रफ्तार से उनकी लोकप्रियता गिरी है, उसी गति से कांग्रेस का उठान हुआ है।

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[19 Jul 2010 | 9 Comments | ]
आज भी सिर्फ दस जातियां राज करती हैं…

श्रीकांत ♦ बीस साल में क्या बदला? 10 जातियां केवल हैं, जो स्टेट पावर पर काबिज होती हैं। जो राज करती हैं। आप किसी भी पार्टी में उठा कर देख लीजिए। अभी वीरेंद्र यादव ने 243 विधायकों की जाति की सूची निकाली है। सिर्फ 10 जातियां! पिछले 50 सालों में इस स्टेट में यही राज कर रही हैं। गरीबों की हालत है कि वे जहां पहले थे, वहीं आज भी हैं। सिर्फ ‘टेन परसेंट’ लोगों का, जो 10 प्रतिशत रिच क्लास है, उनके पास धन-संपत्ति बढ़ती जा रही है। आपको आश्‍चर्य होगा कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 278 रुपये आमदनी मासिक पर लोग गुजारा करते हैं। आप शहर में रह के 5-10 हजार की बात करते हैं, आप कल्पना कीजिए कि वो आदमी कैसे गुजारा करेगा?

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[17 Jul 2010 | 6 Comments | ]
बिहार के मीडिया का एक चेहरा देखें और समझें

संजय कुमार ♦ बिहार से प्रकाशित सभी अखबारों ने पहले पेज पर जगह दी। लेकिन बिहार के मीडिया का चेहरा एक बार फिर साफ हो गया कि आखिर उसकी सोच क्या है? यानी किसका मीडिया, कैसा मीडिया और किसके लिए? प्रश्न सामने आ ही गया। लोग भी चौंके। क्विंस बैटन रिले खबर तो बनी। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू समाचार पत्रों ने क्विंस बैटन रिले की खबर तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर तस्वीर के साथ प्रकाशित की। लेकिन बैटन के साथ कोई खिलाड़ी नजर नहीं आया। नजर आयी जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री नीतू चंद्रा। राज्यपाल के साथ बैटन थामे नीतू की तस्वीर ने मीडिया की सोच को सामने ला दिया।

नज़रिया, मोहल्ला पटना, शब्‍द संगत »

[2 Jul 2010 | 8 Comments | ]
पिछड़े वर्गों का सशक्‍तीकरण हो चुका, अब आगे बढ़ें…

प्रसन्‍न कुमार चौधरी ♦ ‘त्रिवेणी संघ’ पिछड़े वर्गों को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने वाला पहला संगठन था। 90 का दशक आते-आते पिछड़े वर्गों का राजनीतिक सशक्‍तीकरण संपन्न हो गया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि 50 के दशक और 90 के दशक के विधानसभा की संरचना देखें तो ये फर्क आपको साफ दिखाई देगा। वैसे भी किसी भी सामाजिक वर्ग के उत्थान में राजनीतिक सशक्‍तीकरण सबसे पहले होता है, बाद में उसके लिए और भी बहुत सारी चीजें चाहिए। तो एक त्रिवेणी संघ से जो आंदोलन शुरू हुआ, वो बिहार में लगभग पूरा हो गया है। अब है कि उसको हम किस रूप में पुर्नजीवित कर सकते हैं या उसको पुर्नजीवित करने के लिए अब क्या नया कार्यक्रम ले सकते हैं?