Category: मोहल्ला पटना

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मदरसों की अपनी कम्युनल पॉलीटिक्स है

बिहार में मुस्लिम राजनीति पर सेमिनार ♦ अरुण नारायण बिहार में मुस्लिम राजनीति को लेकर हमने अपने फेसबुक पर एक चर्चा छेड़ी कि गैर मुस्लिम उनकी राजनीति को लेकर क्या सोचते हैं? इस पर...

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पटना के गांधी मैदान से उठ रहा है धुआं [धुआंधार LiVE]

मलंग ♦ झक्कास भाषण चालू हो गया जिसके लिए महीनों से तैयारी हो रही थी। भीड़ गदगद थी। उसको लग रहा था कि अब बदलाव आने ही वाला है। तभी एक ने कहा – ई का बोलत बा हो, बरौनी करखाना में त हमार भतीजवा काम करेला, घर दुआर ओहीं मिलल बा, ई त कहत बाड़ें कि बंद हो गयील? इनका अवला पर बंद हो गयील का रे? बगल वाले ने कहा — चोप्प चाप सुनो न चच्चा, भाषण में कम बेसी होईये जाता है। तभी एक नव जवान ने कहा कि देखिए ई सब उल्टा-पुल्टा बक रहे हैं, कह रहे हैं कि गंगा के तीरे बिहारी लोगों से सिकंदर हार गया और पब्लिक ताली पीट रहा है, चोतिया समझे हैं का सबको? हम कंपटीशन की तैयारी कर रहे हैं, काले पढ़े हैं कि राजा पोरस से लड़ाई में सिंधु के पार सिकंदर की सेना पानी मांगने लगी थी और ऊ इधर अईबे नहीं किया था। बगल वाले ने फिर ललकारा — अरे साला कम्पटीशन देना है त रैली में काहें ले आया है रे, सुन जो बोला जा रहा है, बकबक करेगा त फेंफा धर के दीघा घाट चहुंपा देंगे। मोदी जी से अधिक जानता है तोरा किताब लिखे वाला?

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रात तारों भरी है, जिसके बीच चांद पसरा हुआ है

निवेदिता ♦ ऐसी ही अवसन्न सूनी दोपहर थी, जब हम सुनंदा से पहली बार मिले। सुनहले पीले रंगों के कपड़े में एक लड़की सालों बाद इस तरह मिलेगी, यह कभी सोचा नहीं था। कभी-कभी अतीत अचानक से आपके सामने खड़ा होता और आप हैरान हो जाते हैं। जैसे कोई पुराना सपना धीरे धीरे कदमों से आपके पास आ गया हो। देखते ही वह पहचान गयी। उसने पूछा तुम पटना वाली निवेदिता हो? मैंने सर हिलाया। वह मेरे गले से लिपट गयी। मैं सुनंदा। शीरीं वाली सुनंदा? वह चिल्लायी – हां। हम घंटों शीरीं के बारे में बातें करते रहे। जंग लगी पुरानी यादों को खुरच-खुरच कर ताजा करते रहे। उसने पूछा शीरीं की कोई खबर? नहीं यार। अंतिम बार चाचा के रहते मिले थे।

कुछ दुख होते हैं जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है 7

कुछ दुख होते हैं जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है

निवेदिता ♦ हमारी अंतिम मुलाकात अपूर्व के घर हुई थी। जब सीपीआई एमएल ने उसे सीवान में जाकर काम करने का जिम्मा दिया था। मां भी आयी हुई थी। इस बात से परेशान थी कि वह वहां काम नहीं करे। मां ने हमलोगों से कहा कि उसे समझाओ। सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक था। आज भी उसका आतंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हमलोगों ने कहा, तुम्हें अभी दिल्ली में ही काम करना चाहिए। तुम्हारी वहां जरूरत है। वह हमारी बातों से दुखी हो गया। उसने पूछा, क्या तुमलोग समझते हो शहाबुद्दीन के डर से हम काम करना छोड़ दें? क्या डर कर राजनीति की जा सकती है? हमलोगों ने समझाया कि डरने की बात कौन कर रहा है, पर लड़ाई लड़ने के पहले अपनी तैयारी करनी चाहिए। वह माना नहीं।

RTI को कुंद करने की बिहार सरकार की मंशा उजागर 0

RTI को कुंद करने की बिहार सरकार की मंशा उजागर

♦ विष्‍णु राजगढ़िया बिहार सरकार ने आरटीआई कानून की हत्या कर दी। अब कानूनी तौर पर भी इसका सुराग मिलने लगा है। पटना उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार को आरटीआई के एक अवैध नियम...

संस्कृति बगैर राजनीति, राजनीति बगैर संस्कृति…! असंभव!! 1

संस्कृति बगैर राजनीति, राजनीति बगैर संस्कृति…! असंभव!!

समाज में उथल-पुथल मचाने वाले सवालों के जवाब टालना कितना खतरनाक होता है, इसे गिरीश कर्नाड ने ‘तालेदंड’ (हिंदी में ‘रक्त कल्याण’) शीषर्क से लिखे नाटक के जरिये सामने रखा है। 1989 में गिरीश...

जरा सोचिए! समाज के पतन के लिए जिम्मेवार कौन है? 1

जरा सोचिए! समाज के पतन के लिए जिम्मेवार कौन है?

♦ पप्‍पू यादव → संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनास्मी जानताम, देवाभागम यथा पूर्वे संजानाना उपासते। समानी वा आकूति समाना हृदयानि वः, समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।। → गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णुः गुरुर देवो...

बिहार में तेज चल ही है तेज़ाबी हवा, झुलस रही हैं स्त्रियां 0

बिहार में तेज चल ही है तेज़ाबी हवा, झुलस रही हैं स्त्रियां

सरोज कुमार ♦ दैनिक जागरण महिलाओं के मामले में जिस तरह रिपोर्टिंग कर रहा है, उससे इसकी सामंतवादी सोच का पता चलता है। पिछले दिनों पटना में गैंग रेप की शिकार लड़की को जहां बेबुनियादी तर्कों के आधार पर वह कठघरे में खड़ा कर रहा था, वहीं इस मामले में भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। 26 अक्टूबर को अखबार लिखता है कि चंचल के फर्द बयान पर उसका अंगूठा क्यों लगा, जबकि वह इंटर की छात्रा है, हस्ताक्षर होना चाहिए था। इससे काफी कुछ पता चलता है कि गड़बड़ है। अब यह अखबार केवल इस बात से दबंगों पर आरोप को संदिग्ध बता रहा है। जबकि चंचल की हालत बिल्कुल नाजुक थी। वह निस्‍तेज पड़ी रहती थी। बोल पाने में असक्षम थी। ऐसे नाजुक हाल में हस्ताक्षर के बजाय अंगूठा ले लिया गया होगा।

बिहार रंगमंच में बाबाओं का अवतार और ‘किरपा’ की बारिश 24

बिहार रंगमंच में बाबाओं का अवतार और ‘किरपा’ की बारिश

अश्विनी कुमार पंकज ♦ कोई अगर यह कहता है कि भोजपुर, मगध या बिहार के अन्य रंगकर्मियों व नाट्य संस्थाओं ने ग्रांट पाने के लिए आवेदन ही नहीं किया होगा, या वे पात्रता ही नहीं पूरी करते होंगे, तो यह बात समझ से परे है। ग्रांट पाने वालों में जरूर कुछ व्यक्ति और संस्थाएं इस ग्रुपिज्म से बाहर होंगे, इससे इनकार नहीं है। कई ग्रांट से बेहतर काम भी कर रहे होंगे, पर हकीकत यही है कि ग्रांट पानेवाले कलाकारों में अधिकांश तक ‘किरपा’ उसी तरह से पहुंचती होगी, जैसे इस देश में विकास का पैसा अंतिम आदमी तक पहुंचता है। फिर किरपा पाने के लिए निर्मल बाबाओं को कुछ ‘भेंट’ भी चढ़ाना ही होता होगा।

कला में इरोटिका पोर्नोग्राफी नहीं होती है प्राचार्य महोदय! 7

कला में इरोटिका पोर्नोग्राफी नहीं होती है प्राचार्य महोदय!

गोपाला सून्‍य ♦ “कला अवं शिल्प महाविद्यालय, पटना” के एक छात्र को कला महावविद्यालय की एक महिला शिक्षिका ने ऐतिहासिक मुगल तथा राजस्थानी शैली में लघु चित्रण की प्रतिकृति का स्वतंत्र चित्रण करने के लिए कहा। ये कलाकृति महाविद्यालय की वार्षिक परीक्षा में छात्र के उत्तीर्ण होने में सहायक होता। छात्र ने लघु चित्रण (miniature painting) में कामसूत्र पर आधारित रति चित्रण (voyeurism) किया। परिणामस्वरूप छात्र को परीक्षा में अनुत्तीर्ण कर दिया गया। छात्र के कारण पूछे जाने पर महाविद्यालय के प्राचार्य का कहना है कि “किसी भी छात्र के द्वारा एक महिला शिक्षिका को इस तरह का अश्लील चित्र (pornography) नहीं दिया जा सकता है…