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डेस्क ♦ मोहल्ला लाइव पर छपी कथाकार गौरीनाथ की एक प्रतिक्रिया के लिए उन्हें कानूनी नोटिस भेजी गयी है। यह प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने खगेंद्र ठाकुर के उस आलेख पर दी थी, जिसमें उन्होंने गौरीनाथ को इशारों इशारों में अवसरवादी कहा था और इस अवसरवादिता के एक उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया था कि पटना पुस्तक मेले में मंच पर आकर गौरीनाथ ने आलोचक नामवर सिंह के पांव छूए। यह आलेख खगेंद्र ठाकुर ने रविवार डॉट कॉम के लिए लिखा था। इसकी प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने मोहल्ला लाइव डॉट कॉम को दी। इस प्रतिक्रिया से तिलमिला कर खगेंद्र ठाकुर ने अपने वकील के जरिये गौरीनाथ को कानूनी नोटिस भेजी है और चरित्र हनन का आरोप लगाया है।
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जनसत्ता ♦ पुणे के सतीश शेट्टी के बाद बिहार में बेगूसराय के शशिधर मिश्र ऐसे दूसरे शख्स थे, जिन्हें सिर्फ इसलिए जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों का पर्दाफाश करने के लिए सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल किया था। यों बिहार से लगातार ऐसी खबरें आती रही हैं कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई का इस्तेमाल करने वाले लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है या फिर झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें तबाह करने की कोशिश की जा रही है। एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या यह बताती है कि बदलाव और विकास के शोर के पीछे बिहार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
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हेमंत ♦ मैंने अपना सवाल पूछा। सवाल था, सांप्रदायिकता पर बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन जातिवाद के नये चेहरे पर कलम क्यों नहीं चल रही है? मौजूदा दौर का जातिवाद अलग किसम का है। अब छुआछूत की समस्या नहीं है। जाति के आधार पर अवसरों से वंचित करने कि साजिश बड़ी समस्या है। उम्मीद थी कि श्री राय सवाल सुन कर खुश होंगे और विस्तार से जवाब देंगे। लेकिन सवाल का असर उल्टा हुआ। उनका चेहरा उतर गया। अनमने ढंग से उन्होंने मेरे सवालों के जवाब दिये। जातिवाद पर बोलने के बदले उन्होंने सांप्रदायिकता पर छोटा सा जवाब दिया। मैं मायूस हो गया। लगा कि शायद श्री राय मेरा सवाल नहीं समझ पाये। ऐसा उनके प्रति मेरी आस्था के कारण हुआ।
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सुशांत झा ♦ नीतीश के मीडिया मैनेंजमेंट का एक बेहतरीन नमूना हाल ही में आयी बिहार के पीएजी (मुख्य लेखाकार) की रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2007 में कोसी में तटबंध के टूटने से आयी भीषण बाढ़ के पीछे बिहार सरकार की लापरवाही जिम्मेदार है। लेकिन हमारे मीडिया ने इस खबर को कोई तवज्जो नहीं दी। दरअसल मीडिया अपने द्वारा बनाये गये ‘पोपुलर सेंटीमेंट’ को कसैला नहीं बनाना चाहती। लेकिन आप याद कीजिए, 2007 में आयी उस भीषण बाढ़ को, जिसके बाद नीतीश सरकार ने सारा का सारा ठीकरा केंद्र के सर फोड़ दिया था कि नेपाल में हुई इस घटना के लिए वो कैसे जिम्मेदार हो सकती है।
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उपेंद्र चौहान ♦ 2008 में बिहार में जो भयानक बाढ़ आयी थी, उसमें गौरीनाथ सपरिवार फंसे हुए थे। उनकी पत्नी ने खगेंद्र जी को फोन पर इसकी जानकारी दी थी और मैं देख रहा था कि खगेंद्र जी गौरीनाथ और उसके परिवार को बाढ़ से उबारने के लिए कितने बेचैन थे। खगेंद्र जी ऐसे बेचैन हो गये थे, जैसे गौरीनाथ उनका अपना सगा हो। उद्विग्नता में जाबिर हुसेन, प्रेम कुमार मणि से लेकर जिलाधिकारी तक को फोन घुमाया था। इससे गौरीनाथ को कितनी मदद मिली, ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन खगेंद्र जी ने कोशिश बहुत की थी।
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गौरीनाथ ♦ असल बात यह है कि इन तमाम गढ़ी हुई बातों को परोस कर खगेंद्र जी अपने विश्वरंजन प्रेम और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान वाले सरकारी आयोजन में अपनी सहभागिता के कारणों से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं। ऐसा ही प्रयास खगेंद्र जी और उनके कुनबे के लोग सिंगूर और नंदीग्राम मामले में भी कर चुके हैं। उनसे इतना पूछने का मन करता है कि लंबे अरसे तक वे पटना के एमएलए फ्लैट में किस तिकड़म के तहत सरकारी लाभ भोग रहे थे? और विश्वरंजन के प्रति प्रेम को भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंचाने का क्या राज़ है?
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डेस्क ♦ 20 दिसंबर। प्रभात ख़बर के पटना संस्करण का बॉटम है – आइको है रोबोट वाइफ। उत्तेजक ख़बर है। एक दिन पहले हमने बताया था कि कैसे एक मामूली ख़बर को विशिष्ट बना कर और कैसे केंद्र के काम को राज्य के खाते में डाल कर तैयार की गयी एक ख़बर इस अख़बार में टॉप लीड बनायी गयी। झारखंड में अख़बार नहीं आंदोलन का नारा और बिहार में बिहार जागे देश आगे का स्लोगन इस्तेमाल करने वाले इस अख़बार की विडंबना दोनों ही जगह साफ जाहिर हो रही है। झारखंड में अपने संचालक संस्थान उषा मार्टिन के लिए लॉबिंग करने और बिहार में नीतीश सरकार का मुखपत्र बन जाने वाले प्रभात खबर का कंसर्न कायदे से बाज़ार भी है। किसी ने कहा कि प्रभात ख़बर का आज का बॉटम सॉफ्ट पॉर्न का मुजाहिरा है।
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डेस्क ♦ प्रभात खबर के पटना संस्करण में परसों की लीड स्टोरी है – पटना में बिज़नेस सबसे आसान। इसमें ज़्यादातर काम राज्य सरकार के दायरे से बाहर हैं। एकाध को छोड़ कर। हम सिर्फ एक सवाल रख रहे हैं। अपनी तरफ से कुछ कहे बिना। आप बताएं कि इनमें से कौन-कौन से काम में राज्य सरकारें पहले बिहार में बाधा डालती रही हैं और कौन से काम में राज्य सरकार चाहे भी, तो नागरिक के लिए मुश्किलें नहीं खड़ी कर सकती हैं? वैसे हैरानी इस बात की है कि क्या इस तरह की ख़बरों को अख़बार का टॉप लीड बनाया जा सकता है? ये रिपोर्ट सरकार की शुद्ध चमचागीरी है या इसे निम्नस्तरीय संपादकीय दृष्टि भी कही जा सकती है।
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हेमंत कुमार ♦ नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषियोग्य भूमि रखनेवाले किसानों में छोटे व सीमांत किसान 96.5 फ़ीसदी हैं। इनके पास ज़मीन 66 फ़ीसदी ही है। मध्यम व बड़े किसान केवल 3.5 प्रतिशत हैं, पर वे 33 फ़ीसदी जमीन के मालिक हैं। बड़े किसान केवल 0.1 प्रतिशत हैं। पर ज़मीन उनके पास 4.63 फ़ीसदी (19.76 लाख एकड़) है। यह कृषि संबंध विकास के रास्ते में सबसे बड़ा बाधक है। भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें इसी संबंध को बदलने के नेक इरादे से तैयार की गयी थी। बंद्योपाध्याय को पढ़ते हुए आप चर्चित माले नेता विनोद मिश्र को याद कर सकते हैं, जिन्होंने बहुत पहले बिहार के विकास को जटिल सवाल बताते हुए एक बड़े आपरेशन की ज़रूरत बतायी थी।
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डेस्क ♦ देशकाल के संपादक मुकेश कुमार लॉन्चिंग की प्रतीक्षा कर रहे प्रकाश झा के टीवी चैनल मौर्या टीवी की कमान संभालेंगे। वे ‘मौर्य टीवी’ के डायरेक्टर बनाये गये हैं। मुकेश को चैनल लांचिंग कराने से लेकर इसके न्यूज, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन समेत सभी विभागों का ज़िम्मा दिया गया है। मुकेश कुमार पुराने टीवी पत्रकारों में से रहे हैं और सुबह सबेरे के लोकप्रिय दूरदर्शनी दिनों में वे टीवी पर न्यूज़ पढ़ते थे और वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह से पुस्तक चर्चा करते थे। उनके पत्रकारीय सफ़र में जो कुछ अहम पड़ाव रहे हैं, उनमें गोहाटी का अख़बार द सेंटीनल, सहारा समय, वॉयस ऑफ इंडिया, एस वन का ज़िक्र किया जा सकता है।


