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Articles in the मोहल्ला पटना Category

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[6 Apr 2010 | One Comment | ]
नीतीश और शरद में खेमाबंदी – कुछ तो होकर रहेगा!

सुशांत झा ♦ महिला आरक्षण पर जब नीतीश ने खुलेआम जंग का एलान कर दिया तो शरद ने सुनियोजित चुप्पी साधी थी। जब राज्यसभा में महिला बिल पास हो रहा था, सिर्फ एजाज अली को छोड़कर तमाम एमपी नीतीश के साथ थे। ये एक राजनीतिक मजबूरी थी। उन्हें नीतीश के विधायकों ने चुनकर भेजा था और उन्हें आगे भी इसकी उम्मीद है। एजाज अली पहले ही शरद खेमा में होने के नाम पर एक्सपोज हो गये थे, सो उन्होंने खुलेआम शरद की लाइन ली।

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[5 Apr 2010 | One Comment | ]
कांग्रेस की ओर बढ़ते नीतीश के कदम, तैयारी पूरी

सुशांत झा ♦ कई लोग नीतीश को लोकतांत्रिक तानाशाह मानने लगे और बिहार में तमाम फैसले केंद्रीकृत आधार पर लिये जाने लगे। कैबिनेट तो कैबिनेट, नीतीश ने बिहार में गठबंधन को भी अपने वजूद का एहसास नहीं होने दिया। बिहार सरकार वन मैन शो बन गयी और सरकार का मतलब नीतीश होने लगा। इससे पार्टी में कुछ और असंतुष्ट पैदा हो गये। नीतीश घटनाओं को अपने हिसाब से मोड़ रहे थे, वे एक ऐसे मौके पर जाकर एनडीए से नाता तोड़ना चाहते थे, जब वे एक मुकम्मल ब्रांड बन जाएं और कांग्रेस से मनमाफिक समझौता कर पाएं।

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[4 Apr 2010 | 8 Comments | ]
जेडीयू दरकने को तैयार, कांग्रेस के साथ जाएंगे नीतीश

सुशांत झा ♦ जब नीतीश ने महिला आरक्षण बिल पर शरद के खिलाफ लाइन ले ली और जेडी-यू को तोड़ने की हद तक प्लानिंग कर ली, तभी बीजेपी के कान खड़े हो गये। सबसे पहले इस षडयंत्र को रविशंकर प्रसाद ने सूंघा था और शरद, मुलायम और लालू से भी बात की गयी। शरद को एक ‘सुनियोजित चुप्पी’ साधने की सलाह दी गयी और कुछ दिन इंतजार करने को कहा गया। बीजेपी ने भांप लिया कि इस खेल में अगर सबसे कमजोर कोई प्यादा है तो वो बीजेपी है। सवर्णों और मुसलमानों का काग्रेस की तरफ रुझान कांग्रेस-नीतीश को मजबूत बना सकता था।

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[29 Mar 2010 | One Comment | ]
बिहार को छवियों का बंधुआ नहीं बनना चाहिए

डेस्‍क ♦ नवभारत टाइम्स, पटना के पूर्व संपादक अरुण रंजन ने कहा कि मीडिया में बिहार की दो छवियां हैं – एक प्रगट है तो दूसरी अप्रगट। इन दोनों के बीच अंदर ही अंदर टकराहट चलती रहती है। जेपी आंदोलन के समय और आपातकाल के बाद बिहार में एक नयी पत्रकारिता का उदय हुआ, जिसने भूमि संघर्ष, बूथ कैप्चरिंग, अवैध हथियार के बारे में खुल कर लिखा। सामाजिक मान्यता प्राप्त अपराधियों के खिलाफ भी लिखा गया। इससे बिहार की खून खराबे वाली तस्वीर तो बनी, बदनामी भी हुई लेकिन उससे बड़ी एक और छवि बनी वह थी प्रतिरोध करने के जुझारूपन की। इसी जुझारूपन से राज्य और देश में बड़े बदलाव का रास्ता तैयार हुआ। नेगेटिव इमेज के डर से बड़े मकसद को छोड़ा नहीं जा सकता है।

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[26 Mar 2010 | 4 Comments | ]
बिहार की ‘मीडियावी’ छवि पर सेमिनार 28 को

डेस्‍क ♦ बिहार और बिहारियों के बीच ये सवाल अकसर उठता रहा है कि क्या मीडिया बिहार की वास्तविक तस्वीर दिखाता है या फिर कहीं वह पहले से बनी बनाई स्टीरियोटाइप इमेज को ध्यान में रखकर चीज़ों को पेश तो नहीं करता रहता? बिहार के लोग तो ये भी शिकायत करते मिल जाएंगे कि मीडिया ने बिहार की एक नकारात्मक छवि गढ़ी है जिससे ग़ैर बिहारियों की नज़र में वे दीन-हीन बन जाते हैं। उनका कहना है कि बिहार के बारे में मीडिया अपराध, जातिवाद, बाढ़, सूखा, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अराजकता, हिंसा और पलायन आदि की ख़बरें ही प्रमुखता से प्रकाशित करता है जबकि राज्य में सब कुछ बुरा ही हो रहा हो ऐसा नहीं है।

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[24 Mar 2010 | 5 Comments | ]
‘इमरजेंसी में हम डर से और अब पैसे के लिए गिर गये’

कुलदीप नैयर ♦ राजनीतिक दलों ने पैसा दिया और मालिक, उम्मीदवार सभी इस पाप में भागीदार रहे। इमरजेंसी के समय हम डर से और अब पैसे के लिए गिर गये। पहले के जर्नलिस्ट ऐसी धंधेबाजी में संलिप्त नहीं थे। कोई-कोई ही ऐसा मिलता था। लेकिन अब स्थितियां बदल गयी हैं। अब कोई-कोई ही ईमानदार मिलता है। हमारी क्रेडिविलिटी तभी आएगी, जब ईमानदारी से हम धर्म, जाति, राजनीति और पैसे पर न बिकने को संकल्पित हों। नया संकट यह है कि आज पत्रकारिता पर सरकार से ज्यादा कॉरपोरेट सेक्टर का दबाब है। पाठक अभी भी समझता है कि जो भी छपता है, वह सच है। 99 प्रतिशत अखबार फैमिली ओन हैं।

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[17 Mar 2010 | No Comment | ]
उन्‍होंने दुल्हिन कहा और कहा, ‘मेरे अनंत बेटे-बेटियां हैं’

मीना श्रीवास्तव ♦ एक शाम अचानक वो मेरे घर पहुंचीं। यह मेरे जीवन की कभी न भूलनेवाली शाम थी। उस दिन बिंध्‍य कला मंदिर में नृत्य की कक्षा समय से कुछ पहले समाप्त हो गयी थी और मैं वत्सला को लाने नहीं जा सकी थी। वो वत्सला को साथ लिये पहुंचीं। मैं अपने घर में उन्हें पाकर धन्य-धन्य हुई। उन्होंने हम सब के साथ दो घंटे बिताया। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने कुछ दुर्लभ धुनें और बोल बताये। उनके पास आजादी के संघर्ष के दिनों के ऐसे लोकगीतों का भी बड़ा खजाना था, जिसमें आजादी का इतिहास छिपा हुआ है। सन् उन्नीस सौ साठ के आसपास एचएमव्ही द्वारा रिकार्ड किये गये उनके गीतों में से एक ‘पिया ला दे रेशम की डोरी’ की मैंने याद दिलायी, तो वो खिलखिल हंस उठीं।

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[8 Mar 2010 | 10 Comments | ]
गौरीनाथ को खगेंद्र ठाकुर ने भेजा कानूनी नोटिस

डेस्‍क ♦ मोहल्‍ला लाइव पर छपी कथाकार गौरीनाथ की एक प्रतिक्रिया के लिए उन्‍हें कानूनी नोटिस भेजी गयी है। यह प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने खगेंद्र ठाकुर के उस आलेख पर दी थी, जिसमें उन्‍होंने गौरीनाथ को इशारों इशारों में अवसरवादी कहा था और इस अवसरवादिता के एक उदाहरण के तौर पर उन्‍होंने बताया था कि पटना पुस्‍तक मेले में मंच पर आकर गौरीनाथ ने आलोचक नामवर‍ सिंह के पांव छूए। यह आलेख खगेंद्र ठाकुर ने रविवार डॉट कॉम के लिए लिखा था। इसकी प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने मोहल्‍ला लाइव डॉट कॉम को दी। इस प्रतिक्रिया से ति‍लमिला कर खगेंद्र ठाकुर ने अपने वकील के जरिये गौरीनाथ को कानूनी नोटिस भेजी है और चरित्र हनन का आरोप लगाया है।

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[24 Feb 2010 | One Comment | ]
पुणे के सतीश शेट्टी… बेगूसराय के शशिधर मिश्रा…

जनसत्ता ♦ पुणे के सतीश शेट्टी के बाद बिहार में बेगूसराय के शशिधर मिश्र ऐसे दूसरे शख्स थे, जिन्हें सिर्फ इसलिए जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों का पर्दाफाश करने के लिए सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल किया था। यों बिहार से लगातार ऐसी खबरें आती रही हैं कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई का इस्तेमाल करने वाले लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है या फिर झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें तबाह करने की कोशिश की जा रही है। एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या यह बताती है कि बदलाव और विकास के शोर के पीछे बिहार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

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[10 Feb 2010 | 20 Comments | ]
“जाति के सवाल पर विभूति का चेहरा उतर गया था”

हेमंत ♦ मैंने अपना सवाल पूछा। सवाल था, सांप्रदायिकता पर बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन जातिवाद के नये चेहरे पर कलम क्यों नहीं चल रही है? मौजूदा दौर का जातिवाद अलग किसम का है। अब छुआछूत की समस्या नहीं है। जाति के आधार पर अवसरों से वंचित करने कि साजिश बड़ी समस्या है। उम्मीद थी कि श्री राय सवाल सुन कर खुश होंगे और विस्तार से जवाब देंगे। लेकिन सवाल का असर उल्टा हुआ। उनका चेहरा उतर गया। अनमने ढंग से उन्होंने मेरे सवालों के जवाब दिये। जातिवाद पर बोलने के बदले उन्होंने सांप्रदायिकता पर छोटा सा जवाब दिया। मैं मायूस हो गया। लगा कि शायद श्री राय मेरा सवाल नहीं समझ पाये। ऐसा उनके प्रति मेरी आस्था के कारण हुआ।