Category: मोहल्ला पटना

मुक्तिपर्व ने ही बिहार के जातीय रंगमंच को राष्‍ट्रीय पहचान दी 1

मुक्तिपर्व ने ही बिहार के जातीय रंगमंच को राष्‍ट्रीय पहचान दी

परवेज अख्‍तर ♦ केंद्रीय संगीत नाटक अकादेमी की ‘युवा निर्देशकों को प्रोत्साहन योजना’ के अंतर्गत मुक्तिपर्व वर्ष 1988 में डॉ अविनाश चंद्र मिश्र ने लिखा और उसी वर्ष मेरे निर्देशन में पहली बार इंफाल (मणिपुर) में इसका मंचन हुआ। भारत भवन (भोपाल), नांदिकार (कोलकाता), संगीत नाटक अकादेमी (नयी दिल्ली) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोहों सहित देश के कई प्रतिष्ठित नाट्योत्सवों में, तब इस प्रस्तुति को आमंत्रित किया गया था और उस वक्त देश की चर्चित प्रस्तुतियों में इसकी गणना होती थी। ‘मुक्ति-पर्व’ मेरे लिए विशेष नाटक है – न सिर्फ इसलिए कि इस नाटक ने बिहार के जातीय रंगमंच को राष्ट्रीय स्वीकृति दिलायी, बल्कि इसलिए भी कि यह नाट्य-भाषा के स्तर पर मेरे संघर्ष की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बना।

राजधर्म पर जातिवादी-आदमखोर-नायक भारी 44

राजधर्म पर जातिवादी-आदमखोर-नायक भारी

पप्‍पू यादव ♦ नीतीश ने दलित, महादलित, पिछड़ा पसमांदा मुसलमानों का नारा, पिछड़ा, अति पिछड़ा का नारा, जातीय व्यवस्था को काफी मजबूत करने का काम किया। जाति व्यवस्था को खत्म करने का दावा करने वाले नीतीश जी जातीय जनाधार वाले नेता, भले ही उसके खिलाफ कितना ही संगीन-संगीन अपराधिक मुकदमा चल रहा हो, को ही टिकट क्यों देते हैं? रणविजय सिंह, मुन्ना शुक्ला, सुनील पांडे, अनंत सिंह जैसे गंभीर अपराधिक छवि और पृष्ठभूमि वाले, जाति विशेष के नेताओं को क्यों टिकट दिया? अगर उन्हें अपने विकास की राजनीति पर इतना ही भरोसा था तो किसी अन्य बुद्धिजीवी नेता अथवा पार्टी कार्यकर्ता को वहां का टिकट दे देते! सीवान और मधुबनी का उपचुनाव नीतीश जी की जातीय व्यवस्था को समझने के लिए काफी है।

सरकार को स्त्रीलिंग बतलाने का भला क्या औचित्य है? 8

सरकार को स्त्रीलिंग बतलाने का भला क्या औचित्य है?

राजेंद्र प्रसाद सिंह ♦ हमारा हिंदी व्याकरण ही कुछ इस तरह से निर्मित हुआ कि वहां समतामूलक समाज न बने, इसके लिए पहले से ही कई तरह की विभेदक रेखाएं खींच दी गयी। एक ही वाक्य को ऊंच-नीच, बराबरी-गैरबराबरी के लिए कई तरह से व्यहृत किया गया। यह हिंदी में स्त्रीलिंग पुल्लिंग विन्यास का खेल देखिए। जितनी मुलायम, कमजोर एवं नाजुक चीजें हैं कोशकारों ने उसे पुल्लिंग बना दिया। और जितनी ताकतवर हैं, उसे स्त्रीलिंग। भला आप ही बताएं, सरकार को स्त्रीलिंग बतलाने का क्या औचित्य? क्या वह कमजोर होती है। सरकार का मतलब ही ताकत होता है। ये हास्यापद चीजें हैं, जिस पर विचार होना चाहिए। राजेंद्र प्रसाद ने माना कि हिंदी कोशों की तरह ही हिंदी आलोचना में प्रांतवाद का बोलबाला रहा।

दीन-ईमान बेचने के बाद बैकफुट पर आये मजहबी गिरोह 2

दीन-ईमान बेचने के बाद बैकफुट पर आये मजहबी गिरोह

इर्शादुल हक ♦ रहमानी फाउंडेशन, इमारत शरिया और एदारा शरिया… इन तीनों ही संगठनों को राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये दिये ताकि वे अपने संसाधनों, नेटवर्क और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से हुनर कार्यक्रम को लागू करें। कार्यक्रम के तहत बालिकाओं को सिलाई, पेंटिंग, ब्यूटीशियन और चाइल्ड केयर आदि का प्रशिक्षण देना था। पहले ही साल इस कार्यक्रम में लगभग 13 हजार लड़कियों को शामिल कर लिया गया। इस प्रकार राज्य के 38 में से अधिकतर जिलों तक इस कार्यक्रम की पहुंच हो गयी। लेकिन दस्तावेज, सबूत और तथ्य बताते हैं कि गरीब और अनाथ बच्चियों के हुनर के विकास के लिए शुरू की गयी यह योजना लूट खसोट और घपलों घोटालों की भेंट चढ़ चुकी है।

विस्‍तार है अपार… प्रजा दोनों पार… करे हाहाकार… 10

विस्‍तार है अपार… प्रजा दोनों पार… करे हाहाकार…

रवीश कुमार ♦ नयना से पता चला था पॉल राबसन के बारे में। ऐसा लगा कि मिसिसिपी गंगा की मौसी है। दोनों बहने हैं। दोनों की व्यथा एक है। भूपेन हजारिका की आवाज में सुना तो धड़कनें तेज हो गयीं। गंगा तुम बहती हो क्यों। किसके लिए ये नदी बहती आ रही है। मनुष्य का नदियों से प्रयोजन पूरा हो चुका है। वो नदी मार्ग से सड़क मार्ग की ओर प्रस्थान कर चुका है। नदियों की धाराओं और मार्गों के नाम को लेकर कोई लड़ाई नहीं है। हर मनुष्य का ख्वाब है कि कोई सड़क उसके नाम हो जाए। तब भी गंगा क्यों बही जा रही है। हम जैसे रिश्तेदारों को तड़पाने के लिए। कुछ तीज त्योहारों के लिए। गंगा उपक्रम नहीं रही है। वो कर्मकांड बन चुकी है। पॉल रॉबसन के बारे में जानकर बड़ा गर्व हुआ था।

कुपोषित शरीर में स्‍वाभिमान का इंजेक्‍शन? हद है जनाब! 7

कुपोषित शरीर में स्‍वाभिमान का इंजेक्‍शन? हद है जनाब!

डेस्‍क ♦ पिछले दिनों जब मार्कंडेय काटजू बिहार गये, तो उन्‍होंने एक सभा में वहां के मीडिया को सरकार के हाथों गिरवी बता दिया। यह बिहार का सच है। मौजूदा सरकार ने वहां के मीडिया का मुंह विज्ञापन से ठूंस दिया है और कोई सरकार को नाराज नहीं करना चाहता। सारे संपादक सरकार के आगे लोटते हुए नजर आते हैं। ऐसे में उम्‍मीद की तरह बिहार से चल कर एक कविता हमारे पास आयी है। बिहार-झारखंड में प्रसारित और पटना से संचालित आर्यन टीवी के संपादक अभिरंजन कुमार ने यह कविता भेजी है। गरीबी पर केंद्र सरकार के नये रुख और दुर्गंध को खूबसूरत चादर से ढंकने की बिहार सरकार की बाजीगरी पर उन्‍होंने इस कविता में तंज कसा है।

सुना है कि बिहार में प्रेस की आजादी बंधक है, क्‍या ये सच है? 3

सुना है कि बिहार में प्रेस की आजादी बंधक है, क्‍या ये सच है?

जस्टिस काटजू ♦ बिहार के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। मैंने सुना है कि लालू राज की तुलना में इस सरकार ने कानून व्यवस्था को सुधारा है। पर दूसरी बात मैंने ये भी सुनी है कि लालू के राज में फ्रीडम ऑफ प्रेस होती थी, लेकिन अब यहां फ्रीडम ऑफ प्रेस नहीं है।

एक छोटी सी घटना और बहुत बड़ी सीख! 0

एक छोटी सी घटना और बहुत बड़ी सीख!

बिपेंद्र कुमार ♦ मेरी समझ में नहीं आयी। आखिर जब इसी कार्यक्रम में लोग गाड़ी से आये थे, तो फिर उनके साथ सिन्हा साहब आये-गये क्यों नहीं। मैंने सवाल किया, तो उनका जवाब था – ये अफसर और राजनीतिज्ञ हैं। अगर कल कोई समाचार इनके खिलाफ आ जाएगा, उस वक्त तो अपना दायित्व निभाने में इनका एहसान याद आने लगेगा या फिर ये खुद याद दिलाने लगेंगे।

रंगशाला मुक्ति का संघर्ष अभिव्‍यक्ति की आजादी का संघर्ष था 0

रंगशाला मुक्ति का संघर्ष अभिव्‍यक्ति की आजादी का संघर्ष था

अपूर्वानंद ♦ नाटक यों भी समाज के लिए हाशिये की चीज है और जब तक किसी राष्ट्रीय हित पूर्ति के साधन के रूप में उसकी उपयोगिता स्पष्ट न हो, राज्य के लिए वह महत्‍वपूर्ण नहीं। प्रेमचंद रंगशाला के जन्म के साथ ही उसके साथ हुई यह दुर्घटना एक रूपक के तौर पर देखी जा सकती है।

महज 25 सालों में बदल गयी अखबारों की दुनिया! 0

महज 25 सालों में बदल गयी अखबारों की दुनिया!

बिपेंद्र कुमार ♦ अखबार के बाहर की दुनिया से उनका बस इतना भर रिश्ता था कि वे कनिष्ठ सहयोगियों के साथ दफ्तर के बाहर फुटपाथ पर लगे किसी भूंजे की दुकान पर भूंजा खाने या मौर्यालोक में मैगजीन की दुकान पर पत्र-पत्रिका देखने चले जाते थे। जब पटना से दिल्ली प्रधान संपादक बनकर जाने लगे, तो दो-तीन ब्रीफकेस में उनका सारा सामान अंट गया।