Category: फोटो

जुलिआनो की याद में हिल्‍ले ले झकझोर दुनिया हिल्‍ले ले! 2

जुलिआनो की याद में हिल्‍ले ले झकझोर दुनिया हिल्‍ले ले!

प्रकाश के रे ♦ तीस अप्रैल की शाम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली के सम्मुख सभागार में जाने-माने फलस्तीनी-इजरायली फिल्मकार और नाटककार जुलिआनो मेर खमीस को दिल्ली के कलाकारों और कलाप्रेमियों ने श्रद्धांजलि दी। इसी साल चार अप्रैल को फलस्तीन के जेनिन में गोली मार कर जुलिआनो की हत्या कर दी गयी थी। पेश हैं उस अवसर की कुछ तस्वीरें और एक छोटा-सा विडियो…

कुल तेरह महीने बाद लौटे अनामदास, एक अलबम लेकर 2

कुल तेरह महीने बाद लौटे अनामदास, एक अलबम लेकर

डेस्‍क ♦ जो हिंदी ब्‍लॉगिंग के शुरुआती-उत्‍साही दौर से परिचित हैं, वे अनामदास को जानते हैं। थोड़ा वक्‍त लेकर ही सही, अनामदास जब लिखते हैं, लगता है कि कलम की स्‍याही में कलेजा घोल कर लिखा है। हालांकि यह उपमा अब चलेगी नहीं, यह कहा जाएगा कि की-बोर्ड के तमाम अक्षरों में आत्‍मा फिट करके लिखा है। हमारी तरह अनामदास कभी जब-तब, जहां-तहां नहीं लिखते। हम ही हैं कि उनके लिखे को जब-तब, यहां-वहां उठाते-चिपकाते रहते हैं। जैसे 13 महीने बाद उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग पर तस्‍वीरों का जो ये अलबम निकाल कर रखा है, उसे वहां से चुरा रहे हैं।

इस नदी के किनारे कोई मेला नहीं लगता… 3

इस नदी के किनारे कोई मेला नहीं लगता…

डेस्‍क ♦ हम अपनी विरासत, अपने धरोहरों को लेकर बहुत जिज्ञासु समाज नहीं हैं। हम पीछे की तमाम रोशनियों को भूल जाने वाले समाज हैं। हम निराला का घर नहीं जानते, रामवृक्ष बेनीपुरी का गांव नहीं जानते, यहां तक कि प्रेमचंद की लमही भी हमारी सूचना-जिज्ञासा से बाहर का भूगोल है। कुछ लोग होते हैं, जो अपनी संवेदनशील जिद पूरी करते रहते हैं और हमें वक्‍त वक्‍त पर आईना दिखाते रहते हैं। कथाकार और रंग आलोचक हृषीकेश सुलभ ऐसे ही लोगों में से हैं। वे खड़ी बोली के पहले महाकाव्‍य ‘प्रि‍यप्रवास’ के रचयि‍ता अयोध्‍यासिंह उपाध्‍याय हरि‍औध के गांव गये, जहां से उनकी स्‍मृतियां मिट रही हैं, मिटायी जा रही हैं।

पाठकों का समंदर है और नोबेल-तुर्क ओरहान पामुक हैं 0

पाठकों का समंदर है और नोबेल-तुर्क ओरहान पामुक हैं

अविनाश ♦ पामुक जब बोल रहे रहे थे, तो नाइजीरिया में मुक्तिसंघर्ष की नौजवान लेखिका चिमामंदा, अरब में लोकतंत्र की बुलंद आवाज अबुलैला उन्‍हें बड़े गौर से सुन रही थीं।

कहां हो पुरातत्‍ववि‍दो? इति‍हास के गह्वर के अघ्‍येताओ? 1

कहां हो पुरातत्‍ववि‍दो? इति‍हास के गह्वर के अघ्‍येताओ?

हृषिकेश सुलभ ♦ करमागढ़। रायगढ़ (छत्तीसगढ़) का सीमांत गांव। संजय उपाध्‍याय और सत्‍यदेव त्रि‍पाठी के साथ गया। हमारे पथप्रदर्शक थे पापा भारती। रायगढ़ के मुमताज भारती, जि‍न्‍हें सारा रायगढ़ पापाजी कहता है। 74 वर्षीय पापाजी के साथ रायगढ़ से लगभग 25 किमी दूर। फि‍र लगभग 4 किमी बीहड़ वन में पैदल यात्रा। सघन वन के वृक्षों, लताओं, पशु-पक्षि‍यों और वन के मौन से बति‍याते इस दुर्गम राह पर हम सब चलते रहे। फि‍र मि‍ले ये शैलचि‍त्र। लगभग 5 हजार साल पुराने आदि‍म समाज की सांस्‍कृति‍क अभि‍व्‍यक्‍ति‍। हमारी यह धरोहर अब नष्‍ट हो रही है। पुरातत्‍व वि‍भाग को शायद मालूम भी नहीं। बस वन वि‍भाग का एक उजड़ा हुआ बोर्ड टंगा है यहां। कहां हो पुरातत्‍ववि‍दो?

सफ़दर की जनवरी थी और सौ साल के फैज़ अहमद फैज़ थे 1

सफ़दर की जनवरी थी और सौ साल के फैज़ अहमद फैज़ थे

अविनाश ♦ जमशेदपुर से आये एक खासे बुजुर्ग साथी ने फैज की नज्‍म पर बहुत खूबसूरत नृत्‍य पेश किया। रेखा राज की आवाज मानो इकबाल बानो की आत्‍मा से निकल रही थी, जब ताज उछाले जाएंगे, जब तख्‍त गिराये जाएंगे – हम देखेंगे। पाकिस्‍तान से आये नौजवान गायक अली सेठी ने फैज को जवां दिलों की धड़कन बताया। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संपादन में निकला नया पथ का फैज पर निकला अंक लोकार्पित हुआ… और शाम में हमारे समय के निहायत ही समझदार फिल्‍मकार-रंगकर्मी महमूद फारूकी और दानिश हुसैन ने फैज की दास्‍तान सुनायी। रात की ठंडी हवाएं हड्डी में घुसने को बेताब थीं, लेकिन मेले की भीड़ का आलम था कि खुले आसमान के नीचे भी जगह जगह लोग अपनी अपनी टोलियों में गुफ्तगू कर रहे थे।

दो चार दिन बनारस : छोटी गैबी में छन्‍नूलाल जी से मिले 10

दो चार दिन बनारस : छोटी गैबी में छन्‍नूलाल जी से मिले

अविनाश ♦ छन्‍नूलाल जी ऐसे मिले, जैसे कोई बेहद अपना मिलता है। ढेरों किस्‍से बताये। पद्मभूषण से मिलने वाली खुशी बतायी। हमने कहा कि आप इन तमाम पुरस्‍कारों से बड़े हैं। उन्‍होंने कहा कि बिना कहे मिला इसलिए खुशी है। अब कलक्‍टर भी सलाम करता है। क्‍योंकि राष्‍ट्रपति ने सम्‍मानित किया है। जब देश का राष्‍ट्रपति ही सम्‍मान दे, तो कलक्‍टर को तो खड़ा होना ही पड़ेगा। ऐसी निश्‍छल खुशी और बिंदास बनारसी बातों में शाम का अंधेरा नजदीक आने लगा। हालांकि उनके कमरे में दिन-रात का फर्क नहीं पता चलता। रोशनी के लिए कहीं से कोई खिड़की नहीं थी। एक बॉल्‍व से हल्‍की सी रोशनी छन कर आती थी। हमने रियाज के बारे में पूछा, तो उन्‍होंने बताया कि अब 77 साल की उम्र में क्‍या रियाज।

आइए, तस्‍वीरों के साथ उड़ें, “उड़ान” के नजारे लें… 16

आइए, तस्‍वीरों के साथ उड़ें, “उड़ान” के नजारे लें…

अब्राहम हिंदीवाला ♦ विक्रमादित्‍य मोटवाणी की ‘उड़ान’ कान फिल्‍म फेस्टिवल के ‘अनसर्टेन रिगार्ड’ खंड के लिए चुनी गयी थी। सात सालों के बाद किसी भारतीय फिल्‍म को यह अवसर मिला था। मजेदार तथ्‍य यह है कि उन दिनों कान में मौजूद हमारे स्‍टारों को इतनी फुर्सत भी नहीं मिली कि वे ‘उड़ान’ के शो में जाकर भारत के गौरव में शामिल हों। और मीडिया… उसकी आंखें तो कंगूरों (लंगूरों) से हटती ही नहीं… इसलिए ‘उड़ान’ की कोई खबर और फुटेज नहीं दिखी। निराश न हों अनुराग, संजय और विक्रमादित्‍य… आप अपने दर्शकों का नया समूह तैयार कर रहे हैं। (किसी भी मीडिया में पहली बार पेश है उड़ान की एक्‍सक्‍लूसिव तस्‍वीरें)

इन तस्वीरों पर गृह मंत्रालय को NHRC का नोटिस 1

इन तस्वीरों पर गृह मंत्रालय को NHRC का नोटिस

डेस्‍क ♦ इन तस्वीरों को पूरी दुनिया ने देखा है। ये तस्वीरें 17 और 18 जून को अख़बारों में छपी थीं। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में सुरक्षाबलों ने अपने अभियान में जिन लोगों को मारा था, उनके शवों भेड़-बकरियों की तरह टांग कर ले गये थे। इन्हीं तस्वीरों के आधार पर अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को नोटिस भेजा है। आयोग ने मंत्रालय से इस मसले पर 27 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा है। मानवाधिकार आयोग की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि अख़बारों में छपी रिपोर्ट सही हैं तो यह एक गंभीर मसला है।

नजर पर पर्दा या जिस्‍म पर पर्दा… देखिए स्‍पेशल रिपोर्ट! 4

नजर पर पर्दा या जिस्‍म पर पर्दा… देखिए स्‍पेशल रिपोर्ट!

डेस्‍क ♦ एनडीटीवी इंडिया हर शुक्रवार को प्राइम टाइम में रात साढ़े नौ बजे रवीश की रिपोर्ट नाम से, मुद्दों से जुड़ा विशेष कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसी कड़ी में, मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को लेकर जारी किये गये देवबंद के एक मौलाना के फतवे पर उठे व्यापक वाद-विवाद को समेटते हुए परदे में नजर प्रसारित हुआ। रवीश एक परिपक्व और मंझे हुए रिपोर्टर हैं। पिछले 15 वर्षों के रिपोर्टिंग के अनुभवों ने उन्हें मुद्दे की संवेदनशीलता और व्यापकता दोनों को सहेजने में माहिर बना दिया है। इसी महारत के साथ उन्होंने इस संवेदनशील और अंतरराष्‍ट्रीय बन चुके मुद्दे को भी उसके तमाम पहलुओं के साथ उभारा। इस मसले पर जब दुनिया भर में बच्चे से ले कर बूढ़ा तक एक तयशुदा नजरिया बना चुका है, रवीश ने पक्ष-विपक्ष के स्वर उभारे।