Articles in the मोहल्ला रायपुर Category
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला रायपुर, स्मृति »
गिरीश पंकज ♦ इसमें दो राय नहीं कि प्रभाष जी के जाने के बाद रचनात्मक पत्रकारिता का एक पुरोधा चला गया। यह एक युगांत भी है। ऐसे युगांत जो दुबारा नहीं आने वाला। बस उनका लेखन ही हमारे सामने रहेगा। आने वाली पीढ़ी अगर पत्रकारिता के चरित्र को उज्ज्वल बनाए रखना चाहती है, सचमुच पत्रकारिता करना चाहती है, तो वह प्रभाष जोशी के रास्ते पर चले। पत्रकार केवल सामाजिक विषयों पर ही न लिखे, वह खेल, विज्ञान आदि अन्य विषयों पर भी पढ़े और लिखे। प्रभाषजी यही करते थे। जितना अच्छा वे किसी राजनीतिक-सामाजिक विषय पर लिखते थे, उससे बेहतर भाषा में वे क्रिकेट पर भी लिखते थे। हिंदी के सुधी पाठक उनके इस शीर्षक को आज तक याद करते हैं, कि “जब तक सूरज-चांद रहेगा, अजहर तेरा नाम रहेगा”।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला रायपुर, शब्द संगत »
विश्वरंजन ♦ कुछ लेखक, जो माओवादी विचारधारा में आस्था रखते हैं या सलवा-जुडूम का विरोध कर रहे हैं, वे इसलिए शायद नहीं आना चाहते थे क्योंकि मैं सलवा जुडूम को समर्थन दे रहा था। मैं छत्तीसगढ़ 2007 में आया जबकि सलवा जुडूम 2005 से बस्तर में नक्सली आतंक का ख़िलाफ़त कर रहा है। फिर भी यह झूठ फैलाया जाता रहा कि मैं सलवा जुडूम का प्रणेता हूं। हालांकि मेरा यह भी मानना है कि हिंसा का सहारा लेकर नक्सली जिस तरह आदिवासियों को बस्तर में दबा रहे थे, तो आदिवासी कभी न कभी विरोध तो करते ही। 1985 से 1990-91 तक बस्तर में आदिवासियों ने नक्सली आतंक और हिंसा के ख़िलाफ़ काफ़ी सारे छोटे-मोटे आंदोलन किये थे, पर वे नक्सली हिंसा और दमन के सामने टिक नहीं पाये।
मोहल्ला रायपुर, समाचार »
आलोक प्रकाश पुतुल ♦ तमाम दावे और बयानों का झूठ भी इन 15 दिनों में चिमनी की तरह ही भरभरा कर गिर गया है। इन 15 दिनों में आज तक प्रशासन यह बताने की स्थिति में नहीं है कि घटना वाले दिन कितने मज़दूर काम कर रहे थे। हालत ये है कि इस दुर्घटना की जिम्मेवारी अब तक तय नहीं की जा सकी है। अब तक यह नहीं पता चला है कि जांच कौन करेगा और उसके बिंदू क्या होंगे। जाहिर है, इतने बड़े हादसे में अब तक किसी की गिरफ्तारी का तो सवाल ही नहीं है। जहां तक सिपको, वेदांता और जीडीसीएल के अधिकारियों के नहीं मिलने की बात है, प्रशासन ने पहले ही दिन बिना बयान लिये सेपको के 76 चीनी अधिकारियों को अपने संरक्षण में देश से बाहर जाने के लिए भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट भी पहुंचाया गया।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला रायपुर, शब्द संगत »
सत्यनारायण पटेल ♦ साम्राज्यवादी सत्ता कभी भी समझौता नहीं करती है। वह किसी क़ीमत पर यह नहीं कहती है कि अगर आप हमारे आयोजन में शामिल होंगे तो हम आदिवासियों, किसानों, मज़दूरों को उनके गांव, घर, खेत, जंगल, ज़मीन से खदेड़ना बंद कर देंगे। सत्ता हमेशा लालची और छद्म प्रगतिशीलों, जनवादियों को कभी कंडोम और कभी नक़ाब की तरह यूज करती है। मैं समझता हूं कि हाल ही में (10-11 जुलाई 09 को) छत्तीसगढ़ के रायपुर में प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा ‘राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी’ का आयोजन भी कुछ इसी तरह की मंशा के साथ आयोजित किया गया था।


