Category: मोहल्‍ला रायपुर

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हर मसले को काले-सफेद नजरिये से न देखें

रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव विवाद वाया जलेस: गतांक [1, 2, 3] से आगे रायपुर साहित्योत्सव से उपजे सवालों पर जनवादी लेखक संघ का आधिकारिक बयान मुझे संतुलित लगा, जिसमें उत्सव के स्वांग और छलावे की...

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साइबर स्‍पेस पर जनवादी लेखक गूंगे क्‍यों?

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी रायपुर साहित्य महोत्‍सव पर जनवादी लेखक संघ का बयान अनेक विलक्षण और संकीर्ण बातों की ओर ध्यान खींचता है। मसलन, बयान में लिखा गया है, छत्तीसगढ़ सरकार का यह आयोजन “लेखकों...

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लेखक अपना ग्‍लानिबोध सार्वजनिक करें

रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव विवाद वाया जलेस: गतांक से आगे… खरे साब का जो भी सौभाग्य रहा हो, यह हिंदी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस भाषा में काम करने वाले संभवनाशाली विचारक भी चीजों...

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जलेस का बयान: रायपुर गये लेखक निर्दोष

12-14 दिसंबर 2014 को मुख्यमंत्री रमण सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने जिस साहित्य-महोत्सव का आयोजन किया, उसे जनवादी लेखक संघ असहमति का सम्मान करने के स्वांग और एक राजनीतिक छलावे...

सोनी सोरी से वादे [बदले] की पहली किस्‍त पुलिस ने पूरी की 0

सोनी सोरी से वादे [बदले] की पहली किस्‍त पुलिस ने पूरी की

हिमांशु कुमार ♦ अदालत से वापिस जेल लौटते ही सोनी अवाक रह गयी। सोनी सोरी को पुलिस जेल से अस्पताल में अपने पति को देखने के लिए लेकर गयी। वहां सोनी का पति अनिल पूरी तरह बेबस हालत में पड़ा हुआ था। उसका पति अपने शरीर के सभी अंगों पर अपना काबू गंवा चुका था। वह लगभग जिंदा लाश बन चुका था। वह बोल भी नहीं पा रहा था। जेल अधिकारियों ने कहा कि हमने इसे रिहा कर दिया है। आज से इस पर कोई मुकदमा नहीं है। इसके बाद पुलिस सोनी सोरी को फिर से जेल ले गयी। सोनी सोरी के पति की कोर्ट से रिहाई अब किसी काम की नहीं थी। वह अब अपने बच्चों को पहचान भी नहीं सकता। इस तरह पुलिस ने इस परिवार को बरबाद करने के अपने वादे की पहली किस्‍त पूरी कर दी है।

मैं एक भारतीय आदिवासी हूं, क्‍या मेरी कोई इज्‍जत नहीं है? 3

मैं एक भारतीय आदिवासी हूं, क्‍या मेरी कोई इज्‍जत नहीं है?

हिमांशु कुमार ♦ कोई तो बचाओ इस लड़की को। संसद, सुप्रीम कोर्ट, टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं। और हमारे वक्‍त में ही एक जिंदा इंसान को तिल-तिल कर हमें चिढ़ा-चिढ़ा कर मारा जा रहा है। और सारा देश लोकतंत्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है। शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है, तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है। एक सभ्य समाज ऐसा नहीं होता। मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा। नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराये गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पंद्रह अगस्त को हमें लोकतंत्र का उपदेश देंगे।

इस देश के आदिवासियों की जिंदगी इतनी सस्‍ती क्‍यों है? 1

इस देश के आदिवासियों की जिंदगी इतनी सस्‍ती क्‍यों है?

ग्लैडसन डुंगडुंग ♦ बौद्धिक तर्क चाहे जो भी हों, लेकिन सच्‍चाई है कि वर्ष 2009 के बाद नक्सल-विरोधी अभियान के नाम पर देश भर में सैकड़ों बेगुनाह नागरिकों की हत्या की गयी है, लेकिन आज तक एक भी प्रमुख जांच नहीं बैठी। इसलिए कारपोरेट गृहमंत्री पी चिदंबरम को हर हाल में इस्तीफा दे देना चाहिए। इसलिए भी, क्योंकि छत्तीसगढ़ के कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के बेगुनाह 17 आदिवासियों समेत सभी बेगुनाह ग्रामीणों की जघन्य हत्या के एकमात्र जिम्मेवार वे ही हैं। पी चिदंबरम से सवाल पूछा जाना चाहिए कि 17 बेगुनाह लोगों की बेशकीमती जान ले लेने के बाद खेद भर कह देना काफी है क्या? क्या नक्सलविरोधी अभियान के नाम पर देश भर में हुए फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में वे सीबीआई जांच करवाएंगे?

मैं सत्ता अभियान का नहीं, कर्तव्‍यों का रणनीतिकार हूं! 0

मैं सत्ता अभियान का नहीं, कर्तव्‍यों का रणनीतिकार हूं!

विश्वरंजन ♦ आभार कि आपने मुझे छापा। बंधुवर, आपने मेरे बारे में लिखा – नक्‍सलियों के खिलाफ सत्ता अभियान के रणनीतिकार, लीडर। भाई इसमें ‘सत्ता अभियान के रणनीतिकार’ विशेषण क्या अनुचिति का इशारा नहीं है? एक पुलिस महानिदेशक सत्ता का नहीं, अपने कर्तव्यों का रणनीतिकार होता है, जो किसी राज्य की कानून और व्यवस्था की सुव्यवस्था के लिए जिम्मेदार है। आप भी सोचें – नक्सली क्या प्रचलित तंत्र के खिलाफ अपनी सत्ता के लिए अभियान नहीं चला रहे हैं? किंतु उन्हें हम सत्ता अभियान के रणनीतिकार नहीं कहते। क्यों?

विनायक सेन के लिए धरना, प्रदर्शन और चंद कविताएं 6

विनायक सेन के लिए धरना, प्रदर्शन और चंद कविताएं

डेस्‍क ♦ परसों से आज तक बिनायक सेन के लिए लिखी गयी तीन कविताएं मोहल्‍ला लाइव के पास आयी हैं। बिनायक गांधी के अंतिम आदमी के लिए लड़ रहे थे और उन्‍हें इसके लिए आजाद भारत में उम्रकैद मिली। 125 साल पूरे होने पर जो कांग्रेस इतिहास को नये सिरे से खंगाल रही है, हिरावल जनता ही एहसास दिला सकती है कि सन 47 और 2010 में कोई फर्क नहीं है। मुक्ति की लड़ाई अब भी जारी है। हम इस लड़ाई में सरकार और अदालत के खिलाफ हैं

यह सजा न्‍याय की भावना का गला घोंटने वाली है! 6

यह सजा न्‍याय की भावना का गला घोंटने वाली है!

अनिल ♦ रायपुर में शुक्रवार के दिन जिस वक्त डॉ बिनायक सेन को सजा सुनाई जा रही थी, वहीं उसी वक्त एक प्रकाशक असित सेनगुप्ता को भी राजद्रोह और साजिश के आरोप में ग्‍यारह साल के कारावास की सजा सुनायी गयी है। इस सजा के क्या मानक हैं, इसकी चर्चा जनमाध्यमों में कम हुई है। अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, जो कानून ही अवैध हों, जो कानून संवैधानिक मान्यताओं के सरासर उल्लंघन की बुनियाद पर टिके हों, उन्हें आधार बनाकर दिये गये फैसले कितने न्यायसंगत होंगे! दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर का यह आक्रोश गौरतलब है कि ’यह धोखाधड़ी है।’ डॉ बिनायक सेन को न्याय के किसी सिद्धांत के आधार पर राजद्रोह और साजिश का दोषी नहीं ठहराया गया है।