Category: मोहल्‍ला रायपुर

उस्‍ताद सरकार की जमूरी अदालतों को बंद करो! बंद करो! 6

उस्‍ताद सरकार की जमूरी अदालतों को बंद करो! बंद करो!

विनीत कुमार ♦ हमारे देश की सरकार भी एक सुरक्षित मुल्क बनाने में जी-जान से जुटी है। वो देश के नागरिकों को सुरक्षा देना चाहती है। लेकिन बिना उनसे पूछे और बिना उनसे जानें कि उन्हें उस सुरक्षा की जरूरत है भी या नहीं या फिर लोग आखिर सुरक्षा चाहते भी हैं तो किससे। बिना जनता की इच्छा के जो सुरक्षा मिलती है, उसे आप क्या कहेंगे? छत्तीसगढ़ की सरकार तो मानकर चल रही है कि उनकी जनता बहुत तकलीफ में है और असुरक्षित भी। तकलीफ की बात तो बाद में देखेंगे लेकिन फिलहाल तो उन्हें सुरक्षित रखना जरूरी है। ये मौका थोड़े ही है कि जनता तय करे कि उन्हें सुरक्षा चाहिए कि नहीं। जब सरकार को पता है कि उसकी जनता सुरक्षित नहीं है तो फिर जानते हुए वो अपनी प्यारी जनता को मरने कैसे दे।

अरुंधती और मेधा के ख़िलाफ भूमिका बना रही है पुलिस 1

अरुंधती और मेधा के ख़िलाफ भूमिका बना रही है पुलिस

डेस्‍क ♦ यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।

मैं माओवादी नहीं हूं, मुझे फंसाया जा रहा है : लिंगाराम 2

मैं माओवादी नहीं हूं, मुझे फंसाया जा रहा है : लिंगाराम

डेस्‍क ♦ छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से घोषित किये गये माओवादी मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी ने खुद को बेगुनाह बताया है। नम आंखों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कानफ्रेंस में लिंगाराम ने कहा कि वो बेगुनाह हैं और उनका कांग्रेस नेता अवधेश सिंह गौतम के घर पर हुए हमले से कोई लेना-देना नहीं है। लिंगाराम नोएडा के इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके मुताबिक मई के बाद से वो एनसीआर छोड़ कर कहीं नहीं गये। एक दिन पहले छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लुरी ने दावा किया था कि छह जुलाई को कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले का मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी है।

मुक्तिबोध की पत्‍नी का रायपुर में निधन 3

मुक्तिबोध की पत्‍नी का रायपुर में निधन

डेस्‍क ♦ कवि मुक्तिबोध की पत्‍नी शांता मुक्तिबोध का निधन गुरुवार रात हो गया। उनकी उम्र 88 वर्ष थी। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थीं। शुक्रवार सुबह 11 बजे उनका अंतिम संस्कार रायपुर के देवेंद्र नगर श्मशानघाट में किया गया। वे रमेश, दिवाकर, गिरीश व दिलीप मुक्तिबोध की मां थीं। उन्हें मुखाग्नि उनके कनिष्ठ पुत्र गिरीश मुक्तिबोध ने दी। हिंदी कविता के शीर्ष गजानन माधव मुक्तिबोध के संघर्ष के दिनों में शांता जी ने उनका हर वक्‍त साथ दिया। इस बात का जिक्र हरिशंकर परसाई, नेमिचंद जैन, अशोक वाजपेयी जैसे साहित्यकारों ने अपने संस्मरणों में किया है। पति के निधन के बाद बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ उनको मुकाम दिलाने में शांता जी ने अहम भूमिका निभायी।

भेड़ के बीच भेड़‍ियों (नक्‍सलियों) को कैसे पहचानें? 3

भेड़ के बीच भेड़‍ियों (नक्‍सलियों) को कैसे पहचानें?

दिवाकर मुक्तिबोध ♦ …जब ऐसी स्थितियां हों तो ग्रामीण नक्सलियों के खिलाफ होने के बावजूद पुलिस के सूचनादूत कैसे बन सकते हैं? इसीलिए पुलिस का सूचना तंत्र कमजोर है और नक्सलियों का मजबूत। पुलिस जब तब इसे ठीक नहीं कर पाएगी, नक्सलियों के खिलाफ जंग जीतना मुश्किल है। जाहिर है, लड़ाई बहुत लंबी है। यदि इसे जीतना है तो पुलिस या अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को आम आदमी बनकर गांवों में आदिवासियों के बीच रहना होगा। जंगलों को ठीक से जानना होगा तथा ग्रामीणों का विश्वास जीतना होगा। तभी वे भेड़ों के बीच भेड़िये की पहचान कर पाएंगे और फिर उन्हें मारने में आसानी होगी। वरना नक्सलियों के हमले इसी तरह जारी रहेंगे और जानें जाती रहेंगी।

जगदलपुर में बुद्धिजीवियों की शांतियात्रा, प्रेस कांफ्रेंस 1

जगदलपुर में बुद्धिजीवियों की शांतियात्रा, प्रेस कांफ्रेंस

डेस्‍क ♦ तमाम तरह की धमकियों की परवाह किये बगैर, शांति और न्याय के यात्रियों ने आज सुबह महात्मा गांधी की प्रतिमा के आगे नमन करने के बाद दंतेवाड़ा की ओर अपनी यात्रा को शुरू किया। दोपहर बाद यात्रा के पहले पड़ाव जगदलपुर में काफिला रुका, जहां भोजनोपरांत एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया था। शांति यात्री ज्यों ही पत्रकारों से मुखातिब हुए, जगदलपुर के कुछ नौजवानों ने इस शांति-यात्रा के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। लेकिन, यात्रियों के द्वारा वार्ता के आह्वान पर जगदलपुर के प्रदशनकारियों से एक लंबी बातचीत हुई। बहरहाल, जगदलपुर के नौजवानों ने आगे न जाने की हिदायत शांति यात्रियों को दी है, लेकिन अभी तक प्राप्त सूचना के अनुसार शांति का यह काफिला कल दंतेवाड़ा की ओर रवाना होगा।

लेखिका अरुंधती रॉय के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई 13

लेखिका अरुंधती रॉय के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई

डेस्‍क ♦ लेखिका अरुंधती राय के खिलाफ छत्तीसगढ़ पुलिस कानूनी कार्रवाई कर सकती है। उनके खिलाफ अनलॉफुल ऐक्टिविटिज (प्रिवेंशन) ऐक्ट (यूएनपीए) के तहत कार्रवाई हो सकती है। यह भी संभव है कि उन्हें छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून का सामना करना पड़े। पिछले दिनों अरुंधती राय ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के साथ मुलाकात और कुछ समय गुजारने के बाद अंग्रेजी-हिंदी की पत्रिका ‘आउटलुक’ में विस्तार से एक रिपोर्ट लिखी थी। इस रिपोर्ट की शिकायत रायपुर के एक नागरिक ने राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राज्य के पुलिस महानिदेशक को करने के साथ-साथ स्थानीय पुलिस थाने में भी शिकायत दर्ज करायी थी।

प्रभाष जी के लिए इतनी कटुता, इतनी घृणा? 9

प्रभाष जी के लिए इतनी कटुता, इतनी घृणा?

गिरीश पंकज ♦ इसमें दो राय नहीं कि प्रभाष जी के जाने के बाद रचनात्मक पत्रकारिता का एक पुरोधा चला गया। यह एक युगांत भी है। ऐसे युगांत जो दुबारा नहीं आने वाला। बस उनका लेखन ही हमारे सामने रहेगा। आने वाली पीढ़ी अगर पत्रकारिता के चरित्र को उज्ज्वल बनाए रखना चाहती है, सचमुच पत्रकारिता करना चाहती है, तो वह प्रभाष जोशी के रास्ते पर चले। पत्रकार केवल सामाजिक विषयों पर ही न लिखे, वह खेल, विज्ञान आदि अन्य विषयों पर भी पढ़े और लिखे। प्रभाषजी यही करते थे। जितना अच्छा वे किसी राजनीतिक-सामाजिक विषय पर लिखते थे, उससे बेहतर भाषा में वे क्रिकेट पर भी लिखते थे। हिंदी के सुधी पाठक उनके इस शीर्षक को आज तक याद करते हैं, कि “जब तक सूरज-चांद रहेगा, अजहर तेरा नाम रहेगा”।

ये प्रगतिशील नयी जाति व्‍यवस्‍था बनाना चाहते हैं! 8

ये प्रगतिशील नयी जाति व्‍यवस्‍था बनाना चाहते हैं!

विश्‍वरंजन ♦ कुछ लेखक, जो माओवादी विचारधारा में आस्था रखते हैं या सलवा-जुडूम का विरोध कर रहे हैं, वे इसलिए शायद नहीं आना चाहते थे क्योंकि मैं सलवा जुडूम को समर्थन दे रहा था। मैं छत्तीसगढ़ 2007 में आया जबकि सलवा जुडूम 2005 से बस्तर में नक्सली आतंक का ख़िलाफ़त कर रहा है। फिर भी यह झूठ फैलाया जाता रहा कि मैं सलवा जुडूम का प्रणेता हूं। हालांकि मेरा यह भी मानना है कि हिंसा का सहारा लेकर नक्सली जिस तरह आदिवासियों को बस्तर में दबा रहे थे, तो आदिवासी कभी न कभी विरोध तो करते ही। 1985 से 1990-91 तक बस्तर में आदिवासियों ने नक्सली आतंक और हिंसा के ख़िलाफ़ काफ़ी सारे छोटे-मोटे आंदोलन किये थे, पर वे नक्सली हिंसा और दमन के सामने टिक नहीं पाये।

वे मज़दूर थे, इसलिए उनकी मौत पर सरकार मौन है! 5

वे मज़दूर थे, इसलिए उनकी मौत पर सरकार मौन है!

आलोक प्रकाश पुतुल ♦ तमाम दावे और बयानों का झूठ भी इन 15 दिनों में चिमनी की तरह ही भरभरा कर गिर गया है। इन 15 दिनों में आज तक प्रशासन यह बताने की स्थिति में नहीं है कि घटना वाले दिन कितने मज़दूर काम कर रहे थे। हालत ये है कि इस दुर्घटना की जिम्मेवारी अब तक तय नहीं की जा सकी है। अब तक यह नहीं पता चला है कि जांच कौन करेगा और उसके बिंदू क्या होंगे। जाहिर है, इतने बड़े हादसे में अब तक किसी की गिरफ्तारी का तो सवाल ही नहीं है। जहां तक सिपको, वेदांता और जीडीसीएल के अधिकारियों के नहीं मिलने की बात है, प्रशासन ने पहले ही दिन बिना बयान लिये सेपको के 76 चीनी अधिकारियों को अपने संरक्षण में देश से बाहर जाने के लिए भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट भी पहुंचाया गया।