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Articles in the मोहल्ला रांची Category

मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »

[24 Aug 2010 | 2 Comments | ]
प्रभात खबर VS भास्‍कर : हम किसी से कम नहीं

अविनाश ♦ दैनिक भास्‍कर में ब्रांडिंग और सर्कुलेशन के कामों पर नजर रखते हैं गिरीश अग्रवाल। सुधीर अग्रवाल के छोटे भाई हैं। गुजरात में दिव्‍य भास्‍कर और मुंबई में डीएनए की लॉन्चिंग और एफएम केंद्रों के प्रबंधन में गिरीश की बड़ी भूमिका रही है। सुधीर अग्रवाल के धीरज के मुकाबले गिरीश उतावले ज्‍यादा हैं और यही वजह है कि रिजल्‍ट के लिए वे किसी भी हद तक चले जाते हैं। छवि के नुकसान की नहीं सोचते, यही सोचते हैं कि बिजनेस में फायदा कैसे हो। सुधीर अग्रवाल कभी अपने संपादक को खबर छापने से नहीं रोकते – लेकिन गिरीश रोकते हैं और बुरी तरह रोकते हैं। ठीक यही बात प्रभात खबर के प्रबंधकीय लीडर केके गोयनका में है। उन्‍हें भी पहले बिजनेस चाहिए – बाद में खबर।

मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »

[23 Aug 2010 | 11 Comments | ]
भास्‍कर हिंसा के रास्‍ते झारखंड में आगे बढ़ना चाहता है!

अविनाश ♦ 21 अगस्‍त की पूरी रात दैनिक भास्‍कर के जोशीले एकदिनी कार्यकर्ता रांची के हर चौराहे पर बैंड बजाते रहे। कानूनन रात में शोर न करने के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रात भर इस बैंड की आवाज ने सुबह का संदेश साफ कर दिया था। सुबह हॉकरों के एक समूह ने भास्‍कर की प्रतियां उठाने से मना कर दिया और इसके बाद ही झड़प की जमीन तैयार हुई। मौके पर क्‍या हुआ, ये तो नहीं कहा जा सकता – लेकिन कहा जा रहा है कि ट्रक में भर कर आये लोगों ने हॉकरों पर हमला बोल दिया। इसमें कई हॉकर बुरी तरह जख्‍मी हो गये। इसके बाद हॉकरों के समूह इकट्ठा हुए और हमलावरों की अगुवाई कर रहे दैनिक भास्‍कर के नेशनल हेड (सर्कुलेशन) को पुलिस के हवाले कर दिया।

मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »

[22 Aug 2010 | 8 Comments | ]
झारखंड में आज से आमने-सामने हैं मीडिया के दो दिग्‍गज

अविनाश ♦ सन चौरासी से छप रहे प्रभात खबर को सन 89 में जब उषा मार्टिन की ओर से हरिवंश जी ने अपने हाथ मे लिया, तब इसकी छह सौ कॉपी भी नहीं छपती थी। अपने जोशीले अंदाज, पत्रकारीय सूझबूझ और आक्रामक प्रबंधन शैली की वजह से हरिवंश जी ने इसे न सिर्फ झारखंड का नंबर वन अखबार बनाया बल्कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बेहतरीन क्षेत्रीय प‍त्रकारिता का उदाहरण भी पेश किया। एक सफल प्रयोग का आत्‍मविश्‍वास हरिवंश जी के साथ है, जो झारखंड में भास्‍कर से लड़ने में उनके काम आएगा। लेकिन दैनिक भास्‍कर से लड़ना प्रभात खबर के लिए उतना आसान नहीं होगा। भास्‍कर की कमान भी सुधीर अग्रवाल जैसे अतिशय सूझबूझ वाले शख्‍स के हाथ में है।

मोहल्ला रांची, शब्‍द संगत »

[2 Jul 2010 | 14 Comments | ]
चाहता हूं, इतिहास के गोरे पन्‍ने थोड़े सांवले हो जाएं

अविनाश ♦ अभी कल राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर गया, तो रंग प्रसंग के कमरे में कवि नीलाभ किसी से फोन पर बातें कर रहे थे और रणेंद्र की एक कविता की तारीफ दर तारीफ किये जा रहे थे। कह रहे थे, रेयाज के ब्‍लॉग पर है यह कविता। तब मुझे लगा कि मामला गंभीर है और मैंने उन्‍हीं से लेकर रणेंद्र जी की ये कविता पढ़ी। रणेंद्र जी अपने मित्र हैं और मुझे वाकई शर्मिंदगी हुई कि मैंने इतने कैजुअल ढंग से इस पूरे मामले को क्‍यों लिया। इस कविता में कवि कहता है कि वह उन तमाम चीजों पर कविता लिखने की कोशिश कर रहा है, जिनको इतिहास और जीवन के धवल-सवर्ण पन्‍नों जगह नहीं मिलती।

नज़रिया, मोहल्ला रांची »

[2 Jun 2010 | 8 Comments | ]
वे कौन हैं, जो विकास के लिए “हिंसा” को पवित्र मानते हैं?

अश्‍िवनी कुमार पंकज ♦ नहीं कह सकता कि देश में नक्सल-वादी कहां हैं, कहां नहीं हैं? पर दावे से कह सकता हूं कि दिल्ली, पटना, लखनऊ… और रांची में तो नक्सलवाद नहीं है। तो यहां विकास किसने रोका है? आजादी के छह दशक बाद भी देश के सभी बड़े शहरों में नागरिक सुविधाएं आज तक भी क्यों नहीं सुलभ हो सकी हैं? रांची आज भी अंधेरे में डूबी हुई है, क्यों? ‘मधु कोड़ा’ क्या नक्सलवाद की देन हैं? बोफोर्स दलाली के पीछे भी क्या नक्सलवादी ही थे? देश के किसी भी राज्य के किसी भी हिस्से में पुलिस जब चाहे जिस किसी को थाने में या फिर सरेआम मार देती है, यह भी नक्सलवादियों के इशारे पर होता है? दिल्ली हो या दंतेवाड़ा… घरों में घुसकर जो हत्याएं कर रहे हैं, लूट रहे हैं, सड़कों पर सरेआम रेप कर रहे हैं, क्या यह सब भी नक्सलवादियों का ही काम है?

नज़रिया, मोहल्ला रांची »

[28 May 2010 | 7 Comments | ]
जनता को बेवकूफ न बनाएं माननीय बाबूलाल मरांडी!

संदीप कुमार ♦ आरटीआई का एक जवाब बताता है (जो मेरे पास पड़ा है) कि कोडरमा के सांसद के तौर पर 2004 से 2009 के बीच (बीजेपी छोड़ने के बाद बीच में सांसदी से इस्तीफा दे दिया था और फिर से उपचुनाव में जीतकर संसद पहुंचे थे) संसद में मात्र 91 दिन मौजूद रहे जबकि संसद चली पूरे 310 दिन। मतलब एक-तिहाई दिन भी आप संसद में मौजूद नहीं रहे। साढ़े चार सालों में सिर्फ तीन महीने का संसद-प्रवास! इसका जवाब क्या है आपके पास? क्या करते थे मरांडी जी इतने दिन संसद से दूर रहकर? बताना तो पड़ेगा ही। तकदीर बदल देने के दावे के साथ वोट लिया और बस कोरम पूरा करने के लिए संसद में हाजिरी लगायी!

नज़रिया, मोहल्ला रांची »

[28 May 2010 | No Comment | ]
झारखंड में “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”

शेष नारायण सिंह ♦ बाबूलाल मरांडी अब इस जोड़तोड़ के खेल से बहुत आगे निकल आये हैं। पत्रकारों के एक दल को उन्होंने बताया कि वे किसी भी जोड़तोड़ वाली सरकार का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं। ऐसा लगता है कि झारखंड की राजनीति की जमीनी हकीकत उनके इस आत्मविश्वास को सही ठहराने के लिए तत्पर है। वे किसी और के खेल में शामिल होने को तैयार नहीं हैं। पिछले हफ्ते ही उन्होंने रांची में एक बहुत बड़ा अधिवेशन किया जो उनकी पार्टी का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन था। उन्होंने बताया कि पिछले चार साल से झारखंड के गावों में घूम घूम कर उन्होंने लोगों को तैयार किया है कि दिल्ली की पार्टियां बड़े औद्योगिक घरानों से मिलकर राज्य की सारी खनिज संपदा को लुटा देंगी।

नज़रिया, मोहल्ला रांची »

[27 May 2010 | 2 Comments | ]
कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद?

डेस्‍क ♦ 14 मई 21 को पॉस्‍को प्रतिरोध संग्राम समिति के संघर्षरत साथियों पर धिनकिया ग्राम में गोलीचालन की घटना हुई। 12 मई 21 को कलिंग नगर में गोलीचालन, नियमागिरि एवं पोटका झारखंड में दमनकारी कार्रवाई हुई। इसके खिलाफ जननेत्री दयामनी बारला के नेतृत्व में झारखंड के विभिन्न सांस्कृतिक व जनसंगठनों आंदोलन शुरू किया है। उड़ीसा सरकार और पॉस्‍को कंपनी के पुतला दहन से शुरू हुआ यह कार्यक्रम धीरे-धीरे व्यापक रूप ग्रहण कर रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह 24 मई 21 को रांची में संवाददाता सम्मेलन में निम्नलिखित सामग्री जारी की गयी है। इसे तैयार करने में अमित भादुड़ी की नयी किताब से सहायता ली गयी।

नज़रिया, मोहल्ला रांची »

[24 May 2010 | No Comment | ]
झारखंड की खंडित राजनीति और बाबूलाल मरांडी

शेष नारायण सिंह ♦ राज्य के सीधे सादे लोगों को बाबूलाल मरांडी ने बता दिया है कि अपने यहां से किसी भी सूरत में खनिजों की कच्चे माल की निकासी का विरोध करेंगे। अब झारखंड की जनता यह मांग करेगी कि आइरन ओर का निर्यात नहीं, लोहे की बनी वस्तुओं का निर्यात होगा। कोयला निर्यात करने की जरूरत नहीं है, उससे बिजली बनाकर बाकी राज्यों और उद्योगों को दिया जाएगा। बड़ी कंपनियों को झारखंड राज्य की सीमा में ही मुख्यालय रखना होगा। उन्होंने टाटा को भी चेताया है कि टाटा स्टील का मुख्यालय जमशेदपुर में होना चाहिए, मुंबई में नहीं। बाबूलाल मरांडी ने बताया कि अगर जरूरत पड़ी और दिल्ली में बैठे कलर ब्लाइंड लोगों की समझ में झारखंडी अवाम की बात न आयी तो जनता जाम भी लगाएगी और डंडा भी बजाएगी।

नज़रिया, बात मुलाक़ात, मोहल्ला रांची »

[24 May 2010 | 12 Comments | ]
बाबूलाल ने सुबह संकेत किया, शाम में साफ हो गया

अविनाश ♦ बाबूलाल न तो सरकार बनाएंगे, न किसी को समर्थन देंगे। झारखंड की राजनीति में अपनी हैसियत को लेकर विनम्रता के साथ उन्‍होंने कहा कि हमारे बिना भी कांग्रेस शिबू के साथ आगे बढ़ सकती है। यानी माइनस बीजेपी और माइनस जेविएम प्रजातांत्रिक भी झारखंड में सरकार बन सकती है और कांग्रेस और शिबू दोनों ही इस पर विचार कर रहे होंगे। बाबूलाल के कहने का ये भी मतलब था कि न तो बीजेपी 25 मई का इंतजार कर रही होगी, न ही गुरुजी हफ्ता काटने के मूड में होंगे। वही हुआ। रविवार की देर रात बीजेपी ने समर्थन वापसी का एलान कर दिया। मतलब बाबूलाल मरांडी को झारखंड की राजनीति में शिबू सोरेन के वैचारिक राजनीतिक आयामों की जितनी समझ है, बीजेपी शिबू सोरेन को उतना नहीं जानती।