Category: मोहल्ला रांची

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देश के लिए राष्ट्रीय शर्म है असम की घटना

इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली असम की घटना भारत की केंद्र और राज्य सरकारों की उस संवैधानिक स्थिति पर सवाल खड़ा करती है, जो अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में पूरी तरह से...

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गैर-आदिवासी नेतृत्‍व की ओर इशारा

झारखण्ड विधानसभा के जनादेश के मायने ♦ राहुल सिंह इलेक्ट्रानिक मीडिया की छवियों से विकसित होनेवाली समझदारी के लिए भले झारखंड के चुनाव परिणाम अप्रत्याशित लगे, पर जानकार लोगों के लिए इस बार यह...

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हम सब ग्‍लोबल गांव के बाशिंदे होते जा रहे हैं

विनय भरत ♦ आज रांची में बैठा युवक भी जिलेट जैसा महकता है, और लॉस एंजेल्स में बैठा युवक भी। आज रांची का बच्चा भी लेविस और फ्लाइंग मशीन की जींस पहनता है और अमेरिका का भी। तो लिबास भी एक सा हो गया है। सिर पर लगे जिलेट जेल और पैर में पहने रिबॉक जूते तक एक से हो गये हैं। बालों के रंग भी इस बात पर निर्भर नहीं हैं कि आप द्रविड़ि‍यन हैं या कि क्वाकोशियन। अमेरिकन हेयर डाई से हमारे बाल भी बिल्कुल उत्तरी ध्रुव और पश्चिमी अक्षांश वालों जैसी कर दी जा रही है। आबो-हवा में हवा का तो नहीं मालूम, पर आब (पानी) का स्वाद भी Kinley पीने वाले रांचीवासी लगभग वही पा रहे हैं, जो अमेरिका में बैठे कोका-कोला वाले लोग। (शायद ओजोन लेयर में हो रहे छिद्र से हवाएं भी एक जैसी गर्म रहने लगे, इसमें भी अब आश्चर्य नहीं लगता…)

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क्‍या झारखंड को सचमुच विशेष दर्जे की जरूरत है?

ग्लैडसन डुंगडुंग ♦ झारखंड एक विशेष राज्य है, जिसे आर्थिक पैकेज इसलिए चाहिए क्योंकि राज्य में उपलब्ध प्रकृतिक संसाधन का फायदा इसे नहीं मिल रहा है अपितु केंद्र सरकार सब कुछ ले जा रहा है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सचमुच इस पैकेज से जरूरतमंदों का कल्याण और विकास होगा या फिर से राज्य के नाम पर मलाई कोई और खाएगा? इसके लिए प्रभावशाली नेतृत्व, कर्तव्‍यनिष्ठ नौकरशाह और रचनात्मक राजनीति की जरूरत ज्यादा है, जिससे समावेशी विकास होगा। सवाल यह भी है कि क्यों गरीब राज्य के राजनेता, नौकरशाह, ठेकेदार, बिचौलिये और सरकारी कर्मचारियों की बिल्डिंग, गाड़ी और बैंक बैलेंस में भारी इजाफा होता जा रहा है, जबकि मैंगो पीपुल संसाधनहीनता का शिकार हो रहा है?

ड्रिफ्ट इरीगेशन तकनीक ने बंजर को दी नयी हरियाली 0

ड्रिफ्ट इरीगेशन तकनीक ने बंजर को दी नयी हरियाली

अनुपमा ♦ खेती की एक तकनीक ने किसानी और जीवन में इतने बदलाव इतनी तेजी से कर दी। वह तकनीक है ड्रिफ्ट एरिगेशन यानि टपक सिंचाई का। यानी बूंद-बूंद सिंचाई की तकनीक, जिसके जरिये एक-एक बूंद पानी सीधे फसलों की जड़ों में समाता है और फसल का उत्पादन और उसकी गुणवत्ता, दोनों में करिश्माई ढंग से इजाफा करता है। बालक दिखाते हैं कि अब हम इसके जरिये सिर्फ पानी ही नहीं पहुंचाते बल्कि पानी के साथ ही खाद वगैरह भी पहुंचा देते हैं, जिससे पूरे खेत में खाद छींट कर बर्बाद करने से मुक्ति मिल गयी है। खाद-पानी का खर्च भी कम हो गया है और आमदनी भी ज्यादा…! खेतिहर दुनिया में बूंद-बूंद वाली सिंचाई की इस तकनीक का करिश्‍मा आने वाले दिनों में और भी रंग दिखाने वाला है।

बस में सिनेमा दिखाकर चलता है किसानी का पाठ 0

बस में सिनेमा दिखाकर चलता है किसानी का पाठ

अनुपमा ♦ वह दृश्य और नजारा बहुत खास होता है, जब बस के अंदर नीचे दरी या बोरा बिछाकर किसान बहुत तन्मयता और एकाग्रता सिनेमा देखने में तल्लीन रहते हैं। और सिनेमा भी मार-धाड़-एक्शन से भरपूर या इश्क-मोहब्बत के फसानेवाले नहीं बल्कि भिंडी कैसे उपजाएं, बैंगन को कैसे बचाएं, मक्का की खेती के लिए कौन सी प्रणाली अपनाएं, पशुपालन कैसे करें, आदि। बस में किसानी के इस पाठ की पढ़ाई आप किसी रोज, किसी इलाके में देख सकते हैं। न कोई दिन तय होता है, न समय, न स्थान। बस, सिनेमा देखने और दिखानेवाले की आपसी समझदारी और सहूलियत पर यह तय हो जाता है। इस नये किस्म के सिनेमाघर और सिनेमा के प्रयोग को करीब सात साल पहले शुरू किया था कुछ नौजवानों ने, जिसके प्रमुख सूत्रधार बने थे विजय भरत।

क्‍या झारखंड के आदिवासी बुद्ध की परंपरा के अनुयायी हैं? 2

क्‍या झारखंड के आदिवासी बुद्ध की परंपरा के अनुयायी हैं?

मनराखन राम किस्कू ♦ आप इतिहास में जाएं तो पाएंगे कि बुद्ध का जन्म सरना वृक्ष के शालकुंज में हुआ और उनका महापरिनिर्वाण भी सखुआ वृक्ष के नीचे ही। बौद्ध धर्म में जब महायान और हीनयान नाम से दो अलग-अलग धाराएं निकलीं, तो हीनयान ने धम्मचक्र और वृक्ष को अपनाया। महायानी मूर्ति की पूजा करने लगे। मनराखन कहते हैं कि ऐसा लगता है आदिवासी हीनयानी राह पर चले। बौद्धकाल से पहले कभी भी कहीं आदिवासी जीवन में शाल वृक्ष की महत्ता की चर्चा नहीं मिलती। डीडी कौशांबी के इतिहास के किताबों का हवाला देते हुए मनराखन कहते हैं – कौशांबी ने साफ-साफ लिखा है कि बुद्ध का गोत्र नहीं बल्कि टोटम था, जो शाल ही था।

पुलिस और अखबार ने कलाकार को नक्‍सली बना दिया 0

पुलिस और अखबार ने कलाकार को नक्‍सली बना दिया

अश्विनी कुमार पंकज ♦ पांच साल पहले आंदोलन वाले अखबार ने एक निर्दोष संस्कृतिकर्मी जीतन मरांडी की फोटो फ्रंट पेज पर छापकर उसे फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया था। झारखंड हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष मानते हुए पिछले दिनों रिहा कर दिया। अब झारखंड के डीजीपी राजीव कुमार ने इस मामले की जांच का आदेश दिया है। जांच आईजी संपत मीणा करेंगी जिन्होंने सीआइडी के एसपी अमरनाथ मिश्रा के नेतृत्व में जांच टीम गठित कर दी है। यह टीम गलत अनुसंधान करने और एक निर्दोष को नक्सली साबित करनेवाले पुलिस अफसरों को चिन्हित करेगी। इस बीच झारखंड विशेष शाखा के एडीजीपी रेजी डुंगडुंग ने भी अपनी रिपोर्ट डीजीपी और गृह सचिव को दे दी है।

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बाप रे, ये रामनौमी तो डराने वाला है भाई!

♦ पुंज प्रकाश भारत विचित्रताओं से भरा देश है, इसलिए भारतीय संस्कृति का व्यावहारिक अध्ययन करना एक जरूरी अंग बन जाता है। किताबों में बातें जितनी कोमल और सुंदर लगती हैं किंतु ऐसा हो...

सांस्कृतिक संहार के विरुद्ध ‘भाषा कर रही है दावा’ 2

सांस्कृतिक संहार के विरुद्ध ‘भाषा कर रही है दावा’

♦ सविता मुंडा नब्बे के दौर में रांची रंगमंच जब बहुत सक्रिय था और रांची के साथ-साथ बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद, हजारीबाग, कोडरमा आदि जिलों में कई नाट्य समूह लगातार नाटकों का मंचन कर रहे...