Category: मोहल्ला रांची

‘उलगुलान का कभी अंत नहीं होगा’ 0

‘उलगुलान का कभी अंत नहीं होगा’

♦ रूपक जेल से दयामनी का संदेश आप लोगों को मेरा जोहार। मैं कुशल हूं। आशा करती हूं कि मेरी अनुपस्थिति में भी संघर्ष जारी रहेगा। खबर मिली कि आप सभी मंजिल की ओर...

सुषमा असुर को एक रिकॉर्डर और एक कैमरा दीजिए 0

सुषमा असुर को एक रिकॉर्डर और एक कैमरा दीजिए

सुषमा असुर की ये अपील झारखंड के सामाजिक-सांस्‍कृतिक कार्यकर्ता अश्विनी कुमार पंकज के सौजन्‍य से जारी हुई है। फेसबुक पर जारी इस अपील ने लोगों को उत्‍साहित किया और उमराव सिंह जाटव और ध्रुव...

झारखंड में सत्ता और न्‍याय आदिवासियों के लिए नहीं है 0

झारखंड में सत्ता और न्‍याय आदिवासियों के लिए नहीं है

पैनम कंपनी की वादाखिलाफी पर गूंगा लोकतंत्र ♦ ग्लैडसन डुंगडुंग झा15 नवंबर, 2012 को झारखंड की राजधानी रांची में राज्य का 12वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा था, वहीं राज्य के दूसरे हिस्से संतालपरगना...

जमीन किसकी जोते उसकी, धान किसका बोये उसका 0

जमीन किसकी जोते उसकी, धान किसका बोये उसका

बंदूक के साये में धान काटने को मजबूर नगड़ीवासी ♦ ग्लैडसन डुंगडुंग बspan style=”float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times, serif, Georgia;”>झारखंड की राजधानी रांची से सटे...

झारखंड को लुटेरों के चंगुल से कैसे बचाया जाए? 1

झारखंड को लुटेरों के चंगुल से कैसे बचाया जाए?

♦ अश्विनी कुमार पंकज जमीन अधिग्रहण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के सवाल पर झारखण्डी जनता का संघर्ष लगातार तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है. लेकिन ऐसे तमाम जनसंघर्षों की एक बुनियादी कमजोरी...

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वे आदिवासी औरतों को नोंचते हैं, गांव में कहर ढाते हैं

झारखंड में एसपीओ का आतंक ♦ ग्लैडसन डुंगडुंग झारखंड के ग्रामीण इलाकों में आतंक का पर्याय बने स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) का और एक घृणित चेहरा समाज के सामने आया है। 23 अक्टूबर, 2012...

जो भी जल, जंगल, जमीन की बात करेगा, जेल जाएगा 0

जो भी जल, जंगल, जमीन की बात करेगा, जेल जाएगा

नासिरुद्दीन ♦ दयामनी इस वक्त रांची के पास नगरी में ‘विकास’ के वास्ते आदिवासियों की जमीन लेने के खिलाफ चल रहे आंदोलन की सक्रिय कार्यकर्ता हैं। उन्हें चुप कराने के सभी तरीके जब नाकाम हो गये, तो यह आजमाया तरीका सरकार ने निकाला। कहीं से एकाएक 2006 का एक केस नमूदार हो गया। बकौल दयामनी, ‘सन 2006 में हमने मनरेगा मजदूरों के जॉब कार्ड बनवाने के लिए एक आंदोलन किया था। आंदोलन के दौरान सड़क जाम और हल्ला-हंगामा हुआ था। इसी मामले में उन पर एक केस दर्ज कर हुआ। इस केस का पता उन्हें छह साल बाद चला। वह भी तब, जब पिछले महीने यानी 22 सितंबर को उनके घर अचानक कुर्की जब्ती का वारंट पहुंचा। कुर्की इसलिए कि वो वारंट के बावजूद गायब थीं।

जमीन बचाने के लिए गांव से चल कर रांची पहुंचा मंगरा 1

जमीन बचाने के लिए गांव से चल कर रांची पहुंचा मंगरा

ग्‍लैडसन डुंगडुंग ♦ मंगरा उरांव की जमीन हड़पने और स्वयं को अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) घोषित करने के लिए झारखंड की मशहूर पत्रकार वासवी ने अपने गोत्र एवं पिता का नाम तीन बार बदल दिया। इस तरह से वासवी बोस ने खुद को कभी वासवी कुजूर, वासवी भगत, तो कभी वासवी किड़ो बनाया, जिनके तीन पिता क्रमश: स्‍व प्रफुल्लो बोस, स्‍व प्रफुल्ल कुमार (उरांव) एवं भोला कुजूर हैं। इस तरह से वासवी बोस ने आदिवासी का दर्जा प्राप्त कर आदिवासी के नाम पर फायदा उठाने के लिए ही इस तरह का असंवैधानिक कार्य किया है… भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) घोषित करने का अधिकार राज्यपाल की सिफारिश से सिर्फ देश के राष्‍ट्रपति को है।

हम लड़ेंगे क्‍योंकि जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश 2

हम लड़ेंगे क्‍योंकि जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश

ग्‍लैडसन डुंगडुंग ♦ नगड़ी मामले में राज्य सरकार की भूमिका काफी संदेहजनक लगती है। राज्य सरकार ने न्यायालय को बार-बार गुमराह किया। के.स. 2347/2012 ऑर्डर नं – 3 में कहा गया है कि महाधिवक्ता ने झारखंड उच्च न्यायालय को बताया कि नगड़ी की जमीन खेती योग्य नहीं है और वहां खेती नहीं होती थी। क्या सरकार यह बता सकती है कि अगर नगड़ी गांव में खेती नहीं होती है तो क्या नगड़ी के लोग पिछले 60 वर्षों तक मिट्टी खा कर जिन्दा थे? सरकार ने पहले न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए बंदूक के बल पर ग्रामीणों की जमीन छीनने की पूरी कोशिश की। लेकिन भयानक जनाक्रोष के बाद झारखंड उच्च न्यायालय ने ऑर्डर नं – 4 के तहत सरकार को इस मामले का हल ढूंढ़ने को कहा पर कुछ नहीं हुआ।

गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं, माय माटी छोड़ब नहीं… 1

गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं, माय माटी छोड़ब नहीं…

ग्लैडसन डुंगडुंग ♦ झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि नगड़ी की जमीन खेती योग्य नहीं है और खेती के उपयोग में नहीं थी और रैयतों ने जो कागजात उपलब्ध कराये हैं, उसका जमीन से कोई लेना-देना नहीं है। यह सरासर झूठ है। अगर नगड़ी में खेती नहीं होती थी, तो क्या नगड़ी के लोग पिछले 60 वर्षों से मिट्टी खा रहे थे? न्यायालय ने यह भी कहा कि जमाबंदी प्रमाण नहीं है। जमीन पर अधिकार जताने का तथा राजस्‍व रिकॉर्ड गलत है। रैयतों ने चुनौती नहीं दी और जिन्होंने चुनौती दी है, उन्‍होंने भूमि अधिग्रहण के समय जन्म नहीं लिया था, इसलिए उन्हें इसके बारे में पता नहीं है। इसके साथ 60 वर्ष बाद मामला उठाना निष्‍कपट नहीं प्रतीत होता है। न्यायालय का उपरोक्त कथन लोगों के अधिकारों को नकारने के लिए दिया गया।