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डेस्क ♦ प्रभात खबर की यह रिपोर्ट बताती है कि आंदोलनकारियों या व्यवस्था से नाराज़ लोगों का अब भी चौथे खंभे पर भरोसा है। यह भी कि तमाम झंझावातों के बावजूद प्रभात खबर झारखंड का सर्वाधिक विश्वसनीय अखबार है। माओवादी सरकार के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं, लेकिन अखबार के सामने झुकने को तैयार हैं। यह भी कि तमाम बोल-वचनों के बावजूद सरकार अपनी ही साख का कत्ल कैसे कर देती है।
पुस्तक मेला, मोहल्ला रांची, शब्द संगत »
विष्णु राजगढ़िया ♦ रणेंद्र का यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में महत्वपूर्ण प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को जमीन से बेदखल करना ज़रूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज्यादा जरूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेंद्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है।
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विष्णु राजगढ़िया ♦ ज्ञानपीठ ने इसी महीने रणेंद्र का उपन्यास प्रकाशित किया है – ग्लोबल गांव के देवता। सिंगूर, लालगढ़, सलवा जुड़ुम और आपरेशन ग्रीन हंट के इस दौर में यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व-मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को ज़मीन से बेदखल करना ज़रूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज़्यादा ज़रूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेंद्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है।
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तथागत ♦ छापे के बाद पता चलता है कि प्रदीप कुमार के खाते से झारखंड के एक पत्रकार के बेटे के खाते में 36 लाख रुपये ट्रांसफर हुए हैं। खाते से पैसे की निकासी भी हो जाती है। सीबीआई के अधिकारी खाताधारी तक पहुंचते हैं और फिर उनके पत्रकार पिता तक। दरअसल ये पत्रकार पिता कोई और नहीं, हरिनारायण सिंह ही थे। सीबीआई को उन्होंने बताया कि ये पैसे डाकुमेंटरी फिल्म बनाने के लिए लिये गये हैं – लेकिन वे इस किस्म का कोई प्रोपोज़ल पेश नहीं कर पाते। बहरहाल, सीबीआई को जो जानना था, उसने जान लिया लेकिन दुनिया यह नहीं जान पायी कि वे पत्रकार कौन हैं। कहा जाता है कि हरिनारायण सिंह ने ये पैसे प्रदीप कुमार के घपलों-घोटालों पर पर्दा डालने के लिए बतौर घूस लिये।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »
रवि प्रकाश ♦ क्या यह सच नहीं कि आउटलुक के सीनियर पत्रकार सुनील तिवारी जी को सिर्फ और सिर्फ कोड़ा के ख़िलाफ़ एक्सक्लूसिव ख़बरें लिखवाने के लिए थोड़े समय के लिए रखा गया। मधु कोड़ा के दोस्त विनोद सिन्हा के ख़िलाफ़ पहली ख़बर छपी – कौन है विनोद सिन्हा। इसके बाद चार ख़बरें और छपीं। फिर पता चला कि विनोद सिन्हा ने चाइबासा इलाके में बहुत कम ज़मीन पर खनन का पट्टा लिया है, लेकिन उससे बीस गुणा ज़्यादा ज़मीन पर खनन करवाता है। इसकी ख़बर निकालने के लिए सुनील तिवारी के साथ कुछ और रिपोर्टर चाइबासा भेजे गये। वहां विनोद के गुंडों ने उन्हें घेरा भी। किसी तरह बच-बचाकर वे लोग वापस रांची लौटे। तब हमारे पास फोटो थी। ख़बर भी। ख़बर लिखी गयी। लेकिन ख़बर नहीं छपी।
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एक पत्रकार ♦ रविप्रकाश जी सिटी का काम देखते थे, वे सिटी एडिटर नहीं थे। ऐसा कोई पद प्रभात खबर में नहीं है। मधु कोड़ा की ख़बर रोकने की बात भी पचती नहीं है क्योंकि मधु कोड़ा के ख़िलाफ़ तो लगातार प्रभात खबर में समाचार छपते रहे हैं। सुनील तिवारी के बारे में ज़िक्र था कि उन्हें हटा दिया गया था। सुनील तिवारी ने दो साल तक काम किया था। मैं न तो रवि प्रकाश का विरोधी हूं न ही किसी का समर्थक। लेकिन जब मैंने उनकी कलम से कुछ पढ़ा, तो अटपटा लगा, इसलिए लिख रहा हूं। ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जो मैं लिख रहा हूं, वह खुली किताब की तरह है। प्रभात खबर में काम करनेवाला हर कर्मचारी इसे जानता है। इसलिए जब रविप्रकाशजी ने एक रिपोर्ट के बारे में लिखा तो सबको ताज्जुब हुआ।
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निराला ♦ मधेश्वर ने गहरी सांस ली और इस बार मुस्कुराते हुए कहा, “भाई जी आप बुरा नहीं मानिएगा, आप जो अभी फोन पर प्रेम पर लंबा-लंबा भाषण किसी को सुना रहे थे तो मुझे और तेज गुस्सा आ रहा था। भला बताइए – मोबाइल के युग में प्रेम कहीं होता है भला। कितने प्रेम कहानी बने हैं इधर? सब ओही युग में बना है भाई जी, जब मोबाइल नहीं था। अनपढ़ी के युग में चाहे अधिक से अधिक चिट्ठी-पत्री वाले युग में। सब अमर प्रेम ओही युग में हुआ। चिट्ठी की बातें अलग होती हैं। अब मोबाइल के युग में कैसा प्रेम होता है, आप भी जानते होंगे। हाले दिन में हरियाणा वाला एगो मंत्री चांद बनके फिजां के साथे प्यार का प्रदर्शन कर रहा था। उ नौटंकी न हुआ कि उसको भी प्यार कहिएगा…
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हरिवंश ♦ घटते वोट क्या बताते हैं? हमारी मान्यता रही है, कोउ नृप होउ हमहि का हानी। कोई भी राजा हो, उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला? डॉ लोहिया ने भी निराशा के कर्तव्य में भारतीय मन की उदासी-तटस्थता का उल्लेख किया है। उनकी व्याख्या मानती है कि हज़ारों वर्ष की गुलामी ने हमें सत्वहीन कर दिया है। बाबरनामा में बाबर के सटीक अनुभव हैं। कैसे लाखोंलाख लोग सेना के मामूली टुकड़ी को मूकदर्शक बन कर स्वागत करते हैं। पराधीनता मान लेते हैं। इस तरह मतदाताओं के घटते रुझान की अनेक व्याख्या होती रही है। होती रहेगी। पर लोकतंत्र को हमारी मौजूदा राजनीति, अविश्वसनीय बना चुकी है। यह सच है।
आमुख, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची, समाचार »
डेस्क ♦ टीवी पत्रकार अनुरंजन झा के बारे में ख़बर है कि उन्हें झारखंड विधानसभा चुनाव में एक नया काम मिल गया है। वे इन दिनों रांची में हैं। स-दल-बल। मधु कोड़ा समर्थित प्रत्याशियों के मीडिया को मैनेज कर रहे हैं। ये ख़बर थोड़ा निराश इसलिए भी करती है कि मीडिया मेनस्ट्रीम में अच्छी-खासी जगह जमा चुके अनुरंजन को मधु कोड़ा का दामन थामना पड़ा। तब जबकि झारखंड का ख़ज़ाना खाली करने का आरोप मधु कोड़ा पर सार्वजनिक हो चुका है। माना जा रहा है कि अनुरंजन झा के साथ मधु कोड़ा ने अच्छी-खासी डील की है। डील के एवज़ में अनुरंजन झारखंड के मीडियाकर्मियों को लुभाएंगे और मधु कोड़ा के पक्ष में ख़बर लिखवाएंगे। टीवी चैनल्स को भी वे मधु कोड़ा के लिए मैनेज करेंगे।
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तथागत ♦ तय कीजिए कि शिनाख्तों पर आधारित खोजपरक पत्रकारिता करनी है या बयानों पर आधारित पत्रकारिता। विनोद शरण ने अपनी जितनी भी रिपोर्टों के उदाहरण दिये हैं, वे हास्यास्पद हैं। बताइए तो, किसी में प्रत्याशी बन्ना को रिपोर्टर मां-बाप का आशीर्वाद लेते देखते हैं और लहालोट होकर उसकी रिपोर्ट लिखते हैं, तो कहीं लिखते हैं – मोहन को मिल रहा जीत का आशीर्वाद। ये रिपोर्टिंग का कौन सा ककहरा है भाई। और मज़ेदार ये कि विनोद शरण लिखते हैं कि 20 साल से प्रभात खबर में हूं। कमाल है – 20 सालों में न तो खुद रिपोर्ट लिखना आया, न ही किसी ने सिखाया। रिपोर्टिंग की उनकी भाषा साफ बताती है कि मामला निष्पक्ष रिपोर्टिंग का नहीं बल्कि भक्तिभाव का है और ये भक्तिभाव बिना लेन-देन कहां आता है इस कलियुग में!




