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Articles in the मोहल्ला रांची Category

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[27 Nov 2009 | One Comment | ]
बिदकते वोटर!

हरिवंश ♦ घटते वोट क्या बताते हैं? हमारी मान्यता रही है, कोउ नृप होउ हमहि का हानी। कोई भी राजा हो, उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला? डॉ लोहिया ने भी निराशा के कर्तव्य में भारतीय मन की उदासी-तटस्थता का उल्लेख किया है। उनकी व्याख्या मानती है कि हज़ारों वर्ष की गुलामी ने हमें सत्वहीन कर दिया है। बाबरनामा में बाबर के सटीक अनुभव हैं। कैसे लाखोंलाख लोग सेना के मामूली टुकड़ी को मूकदर्शक बन कर स्वागत करते हैं। पराधीनता मान लेते हैं। इस तरह मतदाताओं के घटते रुझान की अनेक व्याख्या होती रही है। होती रहेगी। पर लोकतंत्र को हमारी मौजूदा राजनीति, अविश्वसनीय बना चुकी है। यह सच है।

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[26 Nov 2009 | No Comment | ]
मधु कोड़ा के लिए मीडिया मैनेज कर रहे हैं अनुरंजन झा

डेस्‍क ♦ टीवी पत्रकार अनुरंजन झा के बारे में ख़बर है कि उन्‍हें झारखंड विधानसभा चुनाव में एक नया काम मिल गया है। वे इन दिनों रांची में हैं। स-दल-बल। मधु कोड़ा समर्थित प्रत्‍याशियों के मीडिया को मैनेज कर रहे हैं। ये ख़बर थोड़ा निराश इसलिए भी करती है कि मीडिया मेनस्‍ट्रीम में अच्‍छी-खासी जगह जमा चुके अनुरंजन को मधु कोड़ा का दामन थामना पड़ा। तब जबकि झारखंड का ख़ज़ाना खाली करने का आरोप मधु कोड़ा पर सार्वजनिक हो चुका है। माना जा रहा है कि अनुरंजन झा के साथ मधु कोड़ा ने अच्‍छी-खासी डील की है। डील के एवज़ में अनुरंजन झारखंड के मीडियाकर्मियों को लुभाएंगे और मधु कोड़ा के पक्ष में ख़बर लिखवाएंगे। टीवी चैनल्‍स को भी वे मधु कोड़ा के लिए मैनेज करेंगे।

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[26 Nov 2009 | One Comment | ]
“प्रभात खबर ने सभी प्रत्‍याशियों से पैसे लिये”

तथागत ♦ तय कीजिए कि शिनाख्‍तों पर आधारित खोजपरक पत्रकारिता करनी है या बयानों पर आधारित पत्रकारिता। विनोद शरण ने अपनी जितनी भी रिपोर्टों के उदाहरण दिये हैं, वे हास्‍यास्‍पद हैं। बताइए तो, किसी में प्रत्‍याशी बन्‍ना को रिपोर्टर मां-बाप का आशीर्वाद लेते देखते हैं और लहालोट होकर उसकी रिपोर्ट लिखते हैं, तो कहीं लिखते हैं – मोहन को मिल रहा जीत का आशीर्वाद। ये रिपोर्टिंग का कौन सा ककहरा है भाई। और मज़ेदार ये कि विनोद शरण लिखते हैं कि 20 साल से प्रभात खबर में हूं। कमाल है – 20 सालों में न तो खुद रिपोर्ट लिखना आया, न ही किसी ने सिखाया। रिपोर्टिंग की उनकी भाषा साफ बताती है कि मामला निष्‍पक्ष रिपोर्टिंग का नहीं बल्कि भक्तिभाव का है और ये भक्तिभाव बिना लेन-देन कहां आता है इस कलियुग में!

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[24 Nov 2009 | One Comment | ]
कैसे हुई युवा भविष्‍य की हत्‍या?

हरिवंश ♦ झारखंड के लोग याद रखें कि जब सरकारें और राजनीतिक दल उनके भविष्य की हत्या कर रहे थे, तब झारखंड के वीवीआईपी के बच्चों के लिए क्या अवसर थे? गुज़रे आठ वर्षो तक लगातार विभिन्न कोटों से इनके बच्चे सीधे दाखिला पा रहे थे। मेडिकल में। भले ही ये बच्चे लिख-लोढ़ा पढ़ पत्थर की योग्यतावाले रहे हों, पर वे सीधे डॉक्टर बन रहे थे। उन्हें प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने की मजबूरी नहीं थी, क्योंकि वे वीवीआईपी लोगों के बच्चे थे। दरअसल ये राजनीतिज्ञ इस नये दौर के नये राजा-महाराजा हैं। ये बार-बार आपको छलेंगे। जाति के नाम पर। धर्म के नाम पर। क्षेत्रवाद का नाम देकर। मोह कर। भ्रम में डाल कर। क्योंकि ये मानते हैं कि नासमझ मतदाताओं के बीच ठग ही राज करते हैं।

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[21 Nov 2009 | 8 Comments | ]
मधु कोड़ा को ब्‍लैकमेल कर रहा था प्रभात खबर

रवि प्रकाश ♦ विनोद सिन्‍हा प्रकरण में एक बड़ी स्‍टोरी करायी गयी, लेकिन छापी नहीं गयी। लिखने वाले थे सुनील तिवारी। सुनील पहले आउटलुक के रिपोर्टर हुआ करते थे। बाद में प्रभात खबर ने उन्‍हें अप्‍वाइंट किया। केवल विनोद सिन्‍हा वाली खबर निकलवा कर उन्‍हें चलता कर दिया गया। तब मैं सिटी एडिटर था। यानी कि पहले दो किस्‍तों में स्‍टोरी छाप कर तत्‍कालीन मधु कोड़ा सरकार पर दबाव बनाया गया और तीसरी किस्‍त के लिए बार्गेनिंग करने की कोशिश की गयी। साफ है कि न सिर्फ मधु कोड़ा एंड कंपनी झारखंड के चमकते हुए हमाम में नहा रहे थे बल्कि पहले से नहाते आये उषा मार्टिन ग्रुप अपने लिए बड़ा हमाम मधु कोड़ा से चाह रहा था।

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[19 Nov 2009 | 10 Comments | ]
प्रभात खबर की खोजी पत्रकारिता के पीछे का सच

तथागत ♦ आउटलुक के ताज़े अंक में झारखंड पर कवर स्‍टोरी है। ज़ाहिर है, झारखंड इन दिनों मधु कोड़ा की वजह से चर्चा में है। स्‍टेट के ख़ज़ाने को खाली करने और बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट्स की दलाली करने जैसे आरोपों के चलते मधु कोड़ा पर सीबीआई की घेराबंदी मज़बूत हो रही है। मधु कोड़ा का लगातार बयान आ रहा है कि ये सब साज़‍िश है और उन्‍हें फंसाया जा रहा है। किसी भी ऐसे मामले में फंसने पर ऐसे बयान रस्‍मी होते हैं, लेकिन आउटलुक ने बताया है कि मधु कोड़ा का पूरा मामला एक्‍सपोज़ कैसे हुआ। खोजी और आंदोलनकारी पत्रकारिता के लिए मशहूर प्रभात खबर ने मधु कोड़ा के ख़‍िलाफ़ सीरीज़ में स्‍टोरी की।

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[18 Nov 2009 | 14 Comments | ]
प्रभात खबर की आचार संहिता पर सरयू राय भारी

तथागत ♦ कुछ दिनों पहले प्रभात खबर ने एक आचार संहिता का एलान किया था। इस अखबार ने अपने बारे में बार-बार कहा कि वह पक्षधर पत्रकारिता में विश्‍वास नहीं रखता, बल्कि निष्‍पक्षता उसकी शैली है। आचार संहिता में भी कुल यही बात कही। कहा कि पार्टियों से विज्ञापन लेंगे, लेकिन टेबल के ऊपर से। टेबल के नीचे से नहीं। लिहाज़ा अगर विज्ञापन वाली ख़बर भी छपी, तो उसके नीचे लिखेंगे कि ये ख़बर विज्ञापन का हिस्‍सा है। लेकिन प्रभात खबर की आचार संहिता एलान के 15 दिनों के भीतर दम तोड़ देगी, इसका क़तई अंदाज़ नहीं था।

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[7 Nov 2009 | No Comment | ]
हम परदेसी पंछी

हरिवंश ♦ प्रभाषजी व्यक्ति नहीं, प्रतीक बन गये थे। श्रेष्ठ मूल्यों के। जीने के मकसद के। पत्रकारिता के उच्च प्रतिमानों के। तीन दिनों पहले पटना से उनका फ़ोन आया था। वह प्रभात खबर के पथ प्रदर्शक थे। निजी जीवन में भी अभिभावक। अत्यंत संवेदनशील। गांधी और विनोबा के जीवन मूल्यों का उन पर गहरा असर था। साधन और साध्य उनके जीवन के मापदंड थे। उनकी रुचि बहुआयामी थी। लेखन, खेल, संगीत, इतिहास, पाककला सबमें निपुणता। 1983 में उनके नेतृत्व में निकला जनसत्ता हिंदी अखबारों में मानक है। श्रेष्ठ टीम। और ऐसा अखबार, जो लीक से हट कर था। कहें, एक नयी राह बनायी।

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[4 Nov 2009 | 3 Comments | ]
आप पागल हैं, तो दुनिया आपकी है!

रवि प्रकाश ♦ जाने-माने लेखक शिव खेड़ा ने एक बार इलाहाबाद में कहा कि किसी भी कंपनी के सिर्फ पांच फीसदी लोग अपना अस्सी फीसदी एफर्ट लगाते हैं, तो वह कंपनी चलती है। मतलब यह कि सिर्फ पांच परसेंट लोग ऐसे हैं, जो भीड़ से अलग दिखना चाहते हैं। बाकी लोग नौकरी करते हैं और भीड़ में शामिल होकर अपनी जिंदगी काट देते हैं। दुनिया उन्हें याद नहीं रखती। अब भीड़ से अलग दिखना बड़ा आसान-सा काम है। अगर आपमें अपने काम के प्रति जरा-सा भी पागलपन है, तो आप भीड़ से अलग दिख सकते हैं। इसके लिए किसी खास प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। मतलब भीड़ से अलग दिखने के लिए आपका पागल होना जरूरी है।

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[3 Nov 2009 | 2 Comments | ]
कितना धन चाहिए

हरिवंश ♦ कितना धन चाहिए, एक इंसान को? धन की भूख की कोई सीमा है? 23 महीने सत्ता में रह कर कैसे लोग हजारों करोड़ कमा लेते हैं? यह किसी एक व्यक्ति का सवाल नहीं है। यह मानस है, जो हर जगह, हर तरफ़ है। इस मानस-मनोवृति की ललक क्या है? इस भूख का मनोवैज्ञानिक राज क्या है? बड़ा आसान फ़ार्मूला है। उपभोक्ता मानस को दोष देना। कहना कि यह पश्चिमी मानस है। पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव। लोभ-लालच को इसकी जड़ बताना। फ़िर भी पूरा उत्तर नहीं मिलता। जीने के लिए कितना और क्या? सर ढकने के लिए कितनी छत चाहिए? कितने देशों में और कितने शहरों में?