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Articles in the रिपोर्ताज Category

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[5 Aug 2010 | 21 Comments | ]
सैकड़ों के सामने काट डाली महिला की जीभ, आइए चुप रहें

आवेश तिवारी ♦ लगभग 200 लोगों की भीड़ के सामने पंचायत में बैठे लोगों ने जागेश्वरी के दोनों हाथों और पैरों को जकड़ रखा था। जागेश्वरी का पति, अंधा पिता और उसके दो माह से लेकर आठ साल तक के चार बेटों के रोने से पूरा करहिया कांप रहा था। पंचायत ने कहा, जीभ बाहर निकालो। जागेश्वरी ने जीभ थोड़ी सी बाहर निकाली। वहीं मौजूद सहदेव के बेटे ने उसकी जीभ पकड़ कर बाहर खिंच दी और एक ही प्रहार में तेजधार बलुए से अलग कर दिया। पंचायत का मानना था कि जोगेश्वरी डायन है और उसकी वजह से ही उसके पड़ोसी सहदेव के एक नवजात बच्चे की अकाल मौत हुई थी। ये हिंदुस्तान में कानून व्यवस्था की कब्रगाह पर नाच रही पंचायतों का अब तक के सबसे खौफनाक कुकृत्यों में से एक था।

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[24 Jun 2010 | 6 Comments | ]
विद्रोह के केंद्र में… दिन और रातें…

डेस्‍क ♦ जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और ईपीडब्ल्यू के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा तथा स्वीडिश पत्रकार जॉन मिर्डल कुछ समय पहले भारत में माओवाद के प्रभाव वाले इलाकों में गये थे, जिसके दौरान उन्होंने भाकपा माओवादी के महासचिव गणपति से भी मुलाकात की थी। इस यात्रा से लौटने के बाद गौतम ने यह लंबा आलेख लिखा है, जिसमें वे न सिर्फ ऑपरेशन ग्रीन हंट के निहितार्थों की गहराई से पड़ताल करते हैं, बल्कि माओवादी आंदोलन, उसकी वजहों, भाकपा माओवादी के काम करने की शैली, उसके उद्देश्यों और नीतियों के बारे में भी विस्तार से बताते हैं। पेश है हाशिया से साभार इस लंबे आलेख का हिंदी अनुवाद। अनुवादक की जानकारी नहीं मिल पायी है।

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[23 Jun 2010 | 5 Comments | ]
हमने रेड कॉरिडोर में असहाय आदिवासियों के आंसू देखे!

ग्‍लैडसन डुंगडुंग ♦ मिट्टी के लाल घर की पीड़ा, विभा का रोना-बिलखना और पुलिस अधिकारी का वही रौब। यह सब कुछ देखने और सुनने के बाद हम लोग रेड कॉरिडोर से वापस आ गये। लेकिन हमारा कंधा खरवार आदिवासियों के दुःख, पीड़ा और अन्याय को देखकर बोझिल हो गया था। पुलिस जवानों के अमानवीय कृत्‍य देखकर हमारा सिर शर्म से झुक गया था और विभा की रुलाई ने हमें अत्‍यधिक सोचने को मजबूर कर दिया। मैं मां-बाप को खोने का दुःख, दर्द और पीड़ा को समझ सकता हूं। लेकिन यहां बात बहुत ही अलग है। जब मेरे माता-पिता की हत्या हुई थी, उस समय मैं उस दुःख, दर्द और पीड़ा को समझने और सहने लायक था। लेकिन जसिंता के बच्चे बहुत छोटे हैं।

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[23 Jun 2010 | One Comment | ]
वह जमीन रिफाइनरी की थी, दबंगों ने मंदिर बना दिया

राहुल कुमार ♦ पत्थर के उन टुकड़ों के चारों ओर रातों-रात पिलर ढाल दिये गये। छत की ढलाई हो गयी। सुबह जब निकला, तो देखा कि ईंट जुड़ाई का काम चल रहा था। इतनी तेज गति से किसी काम को देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। 24 घंटे के अंदर रिफाइनरी की जमीन पर एक ऐसा ढांचा तैयार था, जिसे तोड़ने के नाम पर ही मार-काट शुरू हो जाती है। मंदिर बनकर तैयार हो गया। मंदिर, जिसे देखकर लोग साइकिल से हों, मोटर साइकिल से हों, पैदल हों या चार चक्के से… एक हाथ से ही सही… सर झुकाकर प्रणाम की मुद्रा में जरूर आते हैं। फिर चाहे मंदिर की बुनियाद अधर्म से हथियायी जमीन पर ही क्यों न रखी गयी हो। अब दूर-दूर तक उपवन लगने लगे हैं। मंदिर दिनों-दिन अपना दायरा बढ़ा रहा है।

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[23 Jun 2010 | 7 Comments | ]
हर शाख पे एंडरसन बैठा है… उर्फ कथा सोनभद्र की!

आवेश तिवारी ♦ सोनभद्र से आठ नदियां गुजरती हैं, जिनका पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है। यह इलाका देश में कुल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्स्सर्जन का 16 फीसदी अकेले उत्सर्जित करता है। सीधे सीधे कहें तो यहां चप्पे चप्पे पर यूनियन कार्बाइड जैसे दानव मौजूद हैं, इसके लिए सिर्फ सरकार और नौकरशाही तथा देश के उद्योगपतियों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए मची होड़ ही जिम्मेदार नहीं है। सोनभद्र को ध्वंस के कगार पर पहुंचाने के लिए बड़े अखबारी घरानों और अखबारनवीसों का एक पूरा कुनबा भी जिम्मेदार है। कैसे पैदा होता है भोपाल, क्‍यों बेमौत मरते हैं लोग? अब तक वारेन एंडरसन के भागे जाने पर हो हल्ला मचाने वाला मीडिया कैसे नये नये भोपाल पैदा कर रहा है, आइए इसकी एक बानगी देखते हैं।

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[21 Jun 2010 | 7 Comments | ]
क्‍यों न राजीव गांधी से भारत रत्‍न छीन लिया जाए?

सुशांत झा ♦ हमें इस बात का जवाब चाहिए कि बीच के दौर में वीपी सिंह से लेकर वाजपेयी सरकार तक ने उस अमेरिकी हत्यारे को भारत न लाकर संविधान की किस धारा का उल्लंघन किया। कुछ लोगों की राय में राजीव गांधी तो दिवंगत हो चुके हैं, उनको जांच के दायरे में कैसे लाया जा सकता है? इसका जवाब ये है कि अगर जांच के बाद राजीव गांधी दोषी पाये जाते हैं, उनको दिये गये तमाम राष्ट्रीय सम्मान छीन लिये जाएं, जिनमें भारत रत्न भी शामिल है, और दूसरे जिंदा लोगों के पेंशन और सम्मान छीने जा सकते हैं। लेकिन मैं ये सवाल किससे कर रहा हूं? जब देश का पक्ष और विपक्ष ही इस नरमेघ में शामिल है तो फिर सवाल किससे और क्यों? शायद, मैं मूर्खों के स्वर्ग में रह रहा हूं!

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[17 Jun 2010 | 9 Comments | ]
कैसे पत्रकार थे, दर्द नहीं देह देख रहे थे!

विकास वश‍िष्‍ठ ♦ गजाला यहां के मीडिया के लिए ‘अहम किरदार’ हैं। जब भी भोपाल गैस त्रासदी का जिक्र आता है, हर मीडिया हाउस उनके पास पहुंच जाता है। ऊपर उनका छोटा सा परिचय देना इसीलिए जरूरी था। विधवा कॉलोनी यहां की ऐसी कॉलोनी है, जिसमें अधिकतर महिलाओं के शौहर गैस हादसे के शिकार हो गये थे और इस कॉलोनी का नाम विधवा कॉलोनी पड़ गया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सीनियर रिपोर्टर महोदय कुछ असहज सी चुप्पी लगाये मुस्कुराते रहते हैं। लेकिन कुछ कहने की हिम्मत वह भी नहीं कर पाये। यह आज तक समझ में नहीं आया कि ओहदे में सीनियर होते हुए वह कुछ बोल क्यों नहीं पाये। आज भी यही सोच रहा हूं और उस वक्त भी यही सोच रहा था।

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[9 Jun 2010 | 7 Comments | ]
जिला अदालत, भोपाल 2010, 12 बजकर 5 मिनट!

विकास वश‍िष्‍ठ ♦ यूनियन कार्बाइड कारखाने के सामने चिलचिलाती धूप में तपती उस औरत का वह स्टेच्यू आज जैसे अकेले ही अदालत के फैसले के इंतजार में था। यह स्टेच्यू हादसे के बाद बनाया गया था। जेपी नगर की सुबह आज कुछ ज्यादा अलग नहीं थी। रोजाना की तरह आज भी लोग अपने-अपने काम पर चले गये थे। लड़कों का झुरमुट जो शायद स्टेच्यू के पास वाली दुकान पर बैठने के लिए ही बना था, आज भी वैसे ही गपबाजी कर रहा था। वहीं पास में चौकड़ी लगाये कुछ आदमी ताशों के सहारे अपना वक्त काट रहे थे। लेकिन इन सबके बीच जेपी नगर की हवा में यूनियन कार्बाइड की 25 साल पुरानी वह गैस जैसे आज फिर से फैल रही थी।

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[7 Jun 2010 | 3 Comments | ]
नजर पर पर्दा या जिस्‍म पर पर्दा… देखिए स्‍पेशल रिपोर्ट!

डेस्‍क ♦ एनडीटीवी इंडिया हर शुक्रवार को प्राइम टाइम में रात साढ़े नौ बजे रवीश की रिपोर्ट नाम से, मुद्दों से जुड़ा विशेष कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसी कड़ी में, मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को लेकर जारी किये गये देवबंद के एक मौलाना के फतवे पर उठे व्यापक वाद-विवाद को समेटते हुए परदे में नजर प्रसारित हुआ। रवीश एक परिपक्व और मंझे हुए रिपोर्टर हैं। पिछले 15 वर्षों के रिपोर्टिंग के अनुभवों ने उन्हें मुद्दे की संवेदनशीलता और व्यापकता दोनों को सहेजने में माहिर बना दिया है। इसी महारत के साथ उन्होंने इस संवेदनशील और अंतरराष्‍ट्रीय बन चुके मुद्दे को भी उसके तमाम पहलुओं के साथ उभारा। इस मसले पर जब दुनिया भर में बच्चे से ले कर बूढ़ा तक एक तयशुदा नजरिया बना चुका है, रवीश ने पक्ष-विपक्ष के स्वर उभारे।

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[7 Jun 2010 | 5 Comments | ]
गुजरात में… जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे

शेष नारायण सिंह ♦ गुजरात में अब मुसलमानों में कोई अशांति नहीं है। सब अमन चैन से हैं। गुजरात के कई मुसलमानों से सूरत और वड़ोदरा में बात करने का मौका लगा। सब ने बताया कि अब बिलकुल शांति है। कहीं किसी तरह के दंगे की कोई आशंका नहीं है। उन लोगों का कहना था कि शांति के माहौल में कारोबार भी ठीक तरह से होता है और आर्थिक सुरक्षा के बाद ही बाकी सुरक्षा आती है। बड़ा अच्छा लगा कि चलो 10 साल बाद गुजरात में ऐसी शांति आयी है। लेकिन कुछ देर बाद पता चला कि जो कुछ मैं सुन रहा था, वह सच्चाई नहीं थी। वही लोग जो ग्रुप में अच्छी अच्छी बातें कर रहे थे, जब अलग से मिले तो बताया कि हालात बहुत खराब हैं। गुजरात में मुसलमान का जिंदा रहना उतना ही मुश्किल है, जितना कि पाकिस्तान में हिंदू का।