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Articles in the रिपोर्ताज Category

रिपोर्ताज, स्‍मृति »

[24 Jan 2010 | 3 Comments | ]
विकास का पहिया

ओम थानवी ♦ मुख्य सड़कों के समांतर बनी ये सड़कें लगभग आठ फुट चौड़ी होंगी। सड़कों पर तीन साइकिल सवार एक साथ गुजर सकते हैं। कार वाले साइकिल सवार के लिए अदब से रुक जाते हैं। साइकिल वाले पैदल चलने वाले के लिए। साइकिल पथ पर कई जगह अब लाल-हरी बत्तियां भी लगा दी गयी हैं। बत्तियों से पहले रेलिंग लगी हैं। इन पर लिखा है, ‘जनाब, यहां पांव रख कर सुस्ताएं। और शहर में साइकिल सवारी के लिए शुक्रिया।’ मुख्य सड़कों के हाशिये पर चौड़े से स्तंभ स्थापित हैं। इनमें लगा उपकरण पास से गुजरने वाली साइकिलों की गणना करता है। शहर के तापमान और वक्त के साथ आप देख सकते हैं कि उस रोज और महीने में अब तक कितने साइकिल सवार वहां से गुजर चुके हैं।

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[24 Jan 2010 | 5 Comments | ]
ऊबे हुए दुखी

ओम थानवी ♦ डेनमार्क में भ्रष्टाचार भी कम है। या कहें, ईमानदारी बहुत है। कहा जाता है, दुनिया में सबसे ज्यादा। इसका एक सुखद अनुभव मुझे भी हुआ। तड़के चार बजे हवाई अड्डे पहुंचा। टैक्सी वाले से पूछ लिया था कि कितना भाड़ा होगा। उसने कहा कि मीटर पर निर्भर है, पर अंदाजन ढाई सौ क्रोनर (ढाई हजार रुपये)। मैंने बताया कि मीटर ज्यादा बोला तो आपको बाकी यूरो लेने पड़ेंगे। वह राजी था। मैं रास्ते में सोचता रहा, पता नहीं कितने यूरो और देने होंगे। हवाई अड्डे पहुंच उसने बटन दबाकर मीटर देखा, मेरा सामान उतारा और बोला – दो सौ पच्चीस। मैंने सांस ली और ढाई सौ क्रोनर उसकी हथेली पर रख दिये – बाकी आपके। डेनमार्क में टिप का कायदा नहीं है। उसने कुछ झुक कर कहा – टक!

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[20 Jan 2010 | 4 Comments | ]
“वे पूछते हैं माओवादियों का पता और बुरी तरह पीटते हैं”

कृपाशंकर चौबे ♦ माध्यमिक की टेस्ट परीक्षा देने जा रहे झारग्राम विकास भारती हाईस्कूल के तीन छात्रों – ललित महतो, स्वदेश महतो और शांतनु महतो को जोयलभांगा गांव के पास सशस्त्र पुलिस वाहिनी ने रोका और उनसे माओवादियों का पता पूछा। तीनों परीक्षार्थियों ने कहा, ”हमें नहीं पता।” इससे गुस्साये सुरक्षा बलों ने तलाशी की आड़ में तीनों किशोरों का शर्ट-पैंट खुलवाया। पूरी तरह नंगा कर अत्याचार किया। इस घटना के विरोध में झारग्राम विकास भारती हाईस्कूल के विद्यार्थियों ने स्कूल के पास सड़क जाम आंदोलन शुरू किया। छात्रों के उस लोकतांत्रिक आंदोलन को भी सशस्त्र वाहिनी ने लाठी-गोली का भय दिखाकर खत्म कराया।

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[10 Jan 2010 | 15 Comments | ]
बेसाख्‍ता बर्फ फाख्‍ता जलवायु

ओम थानवी ♦ रेत भी कुछ इसी तरह बरसती है। कभी हलकी, कभी तेज; कभी अंधड़ और कभी तूफान की मानिंद। हवा ठहरी हो तो रेगिस्तान में आसमान बहुत चटक होता है। रात इतनी काली कि तारे गिन लें। पर आंधी चले तो थोड़ी देर में हर चीज रेत में नहा जाती है। आसमान भी। अनुकूलित वायु वाले घर नहीं होते, सो दरो-दीवार से लेकर नाक-कान जिह्वा-पलक सब जगह रेत जा बसती है। सुबह उठें तो घर के बाहर रेत का टीला रास्ता रोके मिल सकता है। गर्मियों में सड़क पर जमा हो गयी रेत उठवाने के लिए सरकार खास बंदोबस्त करती है। बड़े वाहनों में मिट्टी हटाने वाले फावड़े-बेलचे टंगे रहते हैं। कुछ ऐसा ही रंग कोपेनहेगन में बर्फ का दीखा।

मोहल्ला दिल्ली, रिपोर्ताज »

[7 Dec 2009 | No Comment | ]
भीड़ में अकेली जगह यानी रीगल

ब्रजेश कुमार झा ♦ रीगल जाएंगे तो पाएंगे कि उसकी ऊंची छत, अंदर लकड़ी का बना आलीशान बॉक्स, मेहराब, दीवारों पर टंगी पुराने फिल्मी सितारों की करीने से लगी तस्वीरें आदि-आदि। यह सब उसकी भव्यता की कहानी ही तो बयां करता है। रीगल के अंदर दाखिल होते ही एकबारगी ऐसा लगेगा कि कहीं किसी ऑपेरा हाउस में तो नहीं पहुंच गये। हल्ला-गुल्ला व चमक-दमक के बीच यह सिनेमाघर बहुत शांत और अपने में ही सिमटा मालूम पड़ता है। उसके टिकटघर पर खड़े होकर ही आप यह महसूस कर सकते हैं। यह सिनेमाघर नये दौर में पुराने ढंग की भव्यता लिये सामने खड़ा है। तमाम बदलाव के बावजूद अब भी ज़‍िंदा है।

मोहल्ला रांची, रिपोर्ताज »

[5 Dec 2009 | 8 Comments | ]
एन इनकाउंटर विद ए रिक्‍शावाला

निराला ♦ मधेश्वर ने गहरी सांस ली और इस बार मुस्कुराते हुए कहा, “भाई जी आप बुरा नहीं मानिएगा, आप जो अभी फोन पर प्रेम पर लंबा-लंबा भाषण किसी को सुना रहे थे तो मुझे और तेज गुस्सा आ रहा था। भला बताइए – मोबाइल के युग में प्रेम कहीं होता है भला। कितने प्रेम कहानी बने हैं इधर? सब ओही युग में बना है भाई जी, जब मोबाइल नहीं था। अनपढ़ी के युग में चाहे अधिक से अधिक चिट्ठी-पत्री वाले युग में। सब अमर प्रेम ओही युग में हुआ। चिट्ठी की बातें अलग होती हैं। अब मोबाइल के युग में कैसा प्रेम होता है, आप भी जानते होंगे। हाले दिन में हरियाणा वाला एगो मंत्री चांद बनके फिजां के साथे प्यार का प्रदर्शन कर रहा था। उ नौटंकी न हुआ कि उसको भी प्यार कहिएगा…

ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला मुंबई, रिपोर्ताज, स्‍मृति »

[26 Nov 2009 | 2 Comments | ]
एक मुंबई, जिसे टीवी ने नहीं देखा…

सीएसटी अभी भी टेलीविजन के स्क्रीन से दूर था। सीएसटी पर डोंडे अभी भी लगातार घोषणा कर रहे थे। सभी छह लोकल प्लेटफ़ार्म पर आ चुकी थीं। अब इसके बाद फ़िलहाल किसी और गाड़ी के आने की गुंजाइश नहीं थी। डोंडे लगातार प्लेटफ़ार्म पर निगाह डाल अनाउंसमेंट किये जा रहे थे। इसी बीच छह नंबर प्लेटफ़ार्म के ठीक सामने हाथ में एके-47 लिए शख्स ने उभार लिया। यह डोंडे को दिखनेवाला पहला आतंकी था। ‘एक उसके पीछे भी है।’ डोंडे के साथी उसे बताने लगे। डोंडे पूरी तरह से आतंकियों को देख नहीं पा रहे थे। लेकिन, उन्होंने अपनी घोषणाओं का सिलसिला बनाये रखा। उनके दोनों साथी शीशे से झांक-झांक कर उन दोनों आतंकियों को देख रहे थे।

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[26 Nov 2009 | No Comment | ]
उस रात पहली बार मुंबई की अमीर बस्तियों में दहशत थी

ज़ुबैर अहमद ♦ सच क्या है और झूठ क्या – इसका पता लगाना मुश्किल हो रहा था। दूसरी तरफ टीवी चैनलों में आपसी मुक़ाबलों के कारण कुछ चैनल अफ़वाहों को सही ख़बर की तरह प्रसारित कर रहे थे। अफ़वाहों की पुष्टि करने वाले अधिकारी मैदान में थे, इसलिए जिसकी मर्ज़ी में जो आ रहा था, वो कर रहा था। दूसरी तरफ सभी ख़बरें बेबुनियाद नहीं थीं। जैसे कि अजमल कसाब की गिरफ़्तारी के बाद उसका यह स्वीकार करना कि वो पाकिस्तान के पंजाब का है। लेकिन हमारे लिए दिक्कत यह थी कि बिना किसी अधिकारी की पुष्टि के यह ख़बर हम नहीं चला सकते थे। बहरहाल इन हमलों ने पहली बार मुंबई के अमीरों की बस्तियों में दहशत फैला दी थी। पहली बार बड़े-बड़े होटलों को निशाना बनाया गया था। शायद पहली बार अमीर लोगों के सगे-संबंधी हमलों में मारे गये थे।

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[23 Nov 2009 | 3 Comments | ]
गोधरा पीछे रह गया, गुजरात आगे बढ़ रहा है…

विभा रानी ♦ उसका नाम प्रवीण है। वह प्राइवेट टैक्सी का ड्राइवर है। नरोदा पटिया में रहता है। समय बिताना था। हमारी गाड़ी अपने गंतव्य को भागी जा रही थी। अहमदाबाद का नया बसा इलाका – सेटेलाइट सिटी। विकास की दौड़ में भागता शहर। चौड़ी सड़कें, चौतरफा मॉल से पटा इलाक़ा। एक फाइव स्टार होटल खुल चुका है। चार और खोलने की तैयारी है। सड़क बनने का काम हो रहा है। अभी इसके ऊपर फ्लाइओवर बननेवाला है। तब यहां का ट्रैफिक और भी कम हो जाएगा। इसरो का एक कार्यालय भी उधर दिखा। तब लगा कि एक ज़माने में यह कितना वीरान इलाका रहा होगा। आज यह अहमदाबाद का सबसे महंगा इलाक़ा है।

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[29 Oct 2009 | No Comment | ]
येर्रागुड्डा की रौनक फिर से वापस आ सकती है या नहीं?

चंदन पांडेय ♦ झूठ के ऊंचे पहाड़ों पर टिके सत्यम की दास्‍तान सबके सामने है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे छात्रों ने सत्यम से जुड़े सभी आंकड़ों को रट लिया होगा। कितने करोड़ का हवाला हुआ? कितने कर्मचारी प्रभावित हुए? कौन-कौन से बड़े नाम जुड़े हैं? सॉफ्टवेयर की दुनिया के दूसरे खिलाड़ियों पर इसका क्या असर होगा? इन विषयों पर कितनी स्याही खर्च की गयी होगी, ये किसी को शायद ही पता हो। इसलिए सत्यम से जुड़ी तमाम बड़ी बातों को रोज़ होने वाली चर्चा पर छोड़ते हुए हम अपनी बात एक मोहल्ले, उसके निवासियों तथा उनके रोज़गार की करते हैं।