Category: रिपोर्ताज

लाइव रिपोर्टिंग की यह विधा अब मृतप्राय है। अख़बारों में अब इसके लिए कोई जगह नहीं। हमारे यहां अब भी जगह है।

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दुनिया का मैक्डोनाल्डीकरण गलत है

स्टैनफोर्ड के सालाना यात्रा संभाषण सत्र 2001 के विशिष्ट मेहमान के तौर पर बिल ब्राइसन अपने लेखन और यात्राओं के बारे में अपने ढाई हजार प्रशंसकों से बात करने के लिए लंदन पधारे थे।...

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मेरे भीतर एक कायर है, उसे मार देना चाहिए

अनुराग अनंत ♦ आम आदमी की सीमाएं वहां मुझसे जीत गयीं और मैं हार गया। मेरी आंखों में मेरा घर परिवार नाचने लगा था, मेरी जिम्मेदारियां कोई मेरे कानों में आवाज मार-मार कर मुझे याद दिलाने लगा। मैंने पाया मैं कैद हूं… और मैं डर गया। मैंने महसूस किया कि संविधान से ले कर लोकतंत्र तक की सारी समझ किताबी है…

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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाजार की तरह!

उमेश पंत ♦ गली की पहली दुकान बहुत पुरानी फिल्मों के पोस्टरों की थी। नास्तिक, विद्या, बागी… जैसे एसडी वर्मन का जमाना लौट आया हो, आनंद बक्सी उन पोस्टरों से झांक रहे हों… सोच सोचकर रोएं खड़े हो रहे थे कि कभी वक्त निकाल कर अमिताभ बच्चन यहां आ पाएं तो अपने पुराने दिनों को जीता हुआ देखकर उस एंग्री यंग मैन को कैसा लगेगा? हर कोई इतना भाग्यशाली कहां होता है कि उसके अतीत को अपनी दीवारों पर चस्‍पां करने के लिए लोग दूर दूर से उन कागज के टुकड़ों को ढूंढने चले आएं, जिनके पुराने रंगों में उस अतीत की ताजगी अब भी मौजूद है। अब जब सब डिजिटल हो गया है, तो उन पोस्टरों पे हाथ से की हुई कारीगरी के रंग बेशकीमती हो गये हैं।

एक छाता सा छाता है, कुछ खुशी सी खुशी है 0

एक छाता सा छाता है, कुछ खुशी सी खुशी है

♦ उमेश पंत कई लोग आपकी जिंदगी के वाक्‍यांशों में किसी कोमा की जगह आते हैं। आप थोड़ी देर ठहरते हैं और जब आगे बढ़ते हैं, तो देखते हैं वो वाक्य उनपर रुकने के...

पोर्नोग्राफी को नयी तरह से समझाएगी फ्रैंक की सोहो 1

पोर्नोग्राफी को नयी तरह से समझाएगी फ्रैंक की सोहो

छप गयी फ्रैंक हुजूर की पुस्‍तक ‘सोहो: जिस्‍म से रूह का सफर’ पाकिस्‍तानी क्रिकेट के सिरमौर और दक्षिण एशिया की महत्‍त्‍वपूर्ण राजनीतिक हस्‍ती इमरान खान की जीवनयात्रा ‘इमरान वर्सेज़ इमरान: द अनटोल्‍ड स्‍टोरी’ दर्ज...

तब मेरी कलम युवा थी और उन्‍होंने उसे हड़प ली! 2

तब मेरी कलम युवा थी और उन्‍होंने उसे हड़प ली!

अविनाश ♦ एक दिन अचानक राजेंद्र सिंह ने मुझे अपने कमरे में बुलवाया। मैं गया तो मोहन श्रोत्रिय भी वहां बैठे थे। राजेंद्र सिंह ने मुझे कहा कि तुमने जो लिखा, वह हम छाप रहे हैं, लेकिन इन सभी किताबों पर नाम इनका (मोहन श्रोत्रिय का) छपेगा। मोहन श्रोत्रिय के सामने ही यह कहा गया था, जाहिर उनकी इसमें सहमति थी। मैं सन्न रह गया। ऐसा लगा जैसे मेरे कानों ने सिर्फ सन्नाटा सुना। यों भी सुनने, न सुनने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्‍योंकि मुझे पता था कि राजेंद्र सिंह अपने इरादों में अटल रहते हैं। मैं बिना कुछ कहे, बगैर कोई प्रतिवाद किए चुपचाप बाहर आ गया। लाचारी के दिन भी बहुत अजीब होते हैं। मैं कमरे में लौट कर लेट गया। बुखार-सा चढ़ आया था। उसी रात उम्‍मीद का एक अंतर्देशीय मैंने अनुपम जी को लिखा।

माधोगढ़ के बीहड़ में हम जब निर्भय गूजर से मिलने पहुंचे! 0

माधोगढ़ के बीहड़ में हम जब निर्भय गूजर से मिलने पहुंचे!

शंभुनाथ शुक्‍ल ♦ रास्ता और भी बीहड़ व खाई खंदक वाला होता जा रहा था। जरा सी भी आहट हमें चौंका देती। वहां डकैतों के साथ-साथ जंगली जानवरों का भी खतरा था। हम करीब आधा मील चले और एक ऊंचे कगार पर ठहर गये। वहां बबूल का एक घना जंगल था। यही निर्भय का डेरा है, पोरवाल ने हमें बताया। हम आगे बढ़े तो देखा कि जगह-जगह पर बबूल के कांटों की बाड़ लगाकर रास्ता रोक रखा गया है। पोरवाल ने हमें वहीं रोक दिया। उसने फुसफुसाते हुए कहा कि निर्भय यहीं है। निर्भय के वहीं होने की खबर से हम रोमांचित हो गये। सब दम साधे खड़े थे। किसी के मुंह से बोल नहीं फूट रहा था।

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लखनऊ में अब भी बचा है थोड़ा सा लखनऊ

उमेश पंत ♦ कैमरे की नजर से देखें तो यहां सबकुछ खूबसूरत है। उस खूबसूरत नजर को लेकर निकलो तो गांव बड़े अच्छे लगने लगते हैं। शहरों से कहीं ज्यादा सुंदर लगने लगते हैं और सच्चे भी। खबर के लिए भटकते हुए, हाइवे पे चलते हुए अचानक आपकी नजर उस मटर के ढेर पे जाती है जो आपके ठीक बायीं तरफ, बगल के खेत में तोड़े जा रहे हैं। आप बायें मुड़ते हैं और पगडंडी पकड़ लेते हैं, उतरते हैं, कैमरा निकालते हैं और चाची की उम्र की महिला से ऐसे बात करने लगते हैं, जैसे वो रिश्ते में आपकी चाची ही हों, आप फोटो खींचते खींचते अपना परिचय देने लगते हैं, पीछे मुड़ते हैं तो आपको एक लड़का दिखाई देता है, सर पे मटर का बोरा लिये, आप उसकी फोटो खींचते हैं, उसकी फोटो खींचते हुए दूर कहीं फ्रेम में एक बिजूका नजर आता है, आप उस दूरी को तय कर लेते हैं, बिजूका को क्लिक करते हुए पीछे कई औरतें दिखती हैं…

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बाप रे, ये रामनौमी तो डराने वाला है भाई!

♦ पुंज प्रकाश भारत विचित्रताओं से भरा देश है, इसलिए भारतीय संस्कृति का व्यावहारिक अध्ययन करना एक जरूरी अंग बन जाता है। किताबों में बातें जितनी कोमल और सुंदर लगती हैं किंतु ऐसा हो...

When North East Came Calling! 1

When North East Came Calling!

♦ Dr Shah Alam Khan When I got an invite to speak at a Conference in Imphal, I was excited. I had never been to the North East (India) and therefore saw this as...