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Articles in the व्याख्यान Category

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[2 Dec 2009 | 5 Comments | ]
मीडिया वर्कशॉप में आज विनीत कुमार का व्‍याख्‍यान

डेस्‍क ♦ टेलीविज़न का कोई सचमुच एक्टिव ऑडिएंस हो सकता है? दिल्ली विश्वविद्यालय से टेलीविजन की भाषिक संस्कृति पर शोध कर रहे विनीत कुमार सफर और सीएसडीएस सराय के संयुक्त प्रयास से हो रहे वैकल्पिक मीडिया वर्कशॉप (दिसंबर 01-03) में इन्हीं सवालों के आसपास अपनी बात रखेंगे। Watching Television : From Passive Consumption Of Sounds And Images To An Active Prosumer/Audience? विषय के तहत बातचीत के जरिये वो उन संभावनाओं की तरफ इशारा करेंगे जहां एक ऑडिएंस की हैसियत से टेलीविजन में भागीदारी की जा सके। इससे पहले इस वर्कशॉप में अभय कुमार दुबे, शिवम विज, दिलीप मंडल अपनी बात रख चुके हैं।

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[18 Nov 2009 | 3 Comments | ]
मीडिया बिक गया, संपादक दो कौड़ी के हो गये!

डेस्‍क ♦ एक आदमी है, जो पिछले कई महीनों से सच बोल रहा है – जब, जहां मौक़ा मिल रहा है। वह बोल रहा है कि मीडिया बिक चुका है और अब उसकी कोई विश्‍वसनीयता नहीं है। वह बोल रहा है कि मीडिया की चिंता में देश और समाज नहीं, सिर्फ बिजनेस और बिजनेस है – लेकिन कोई उसे सुन नहीं रहा। उस आदमी का नाम है जस्टिस जी एन रे। प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष जस्टिस जी एन रे। सोमवार को चेन्‍नई में एक बार फिर उन्‍होंने कहा कि मीडिया आज एक वस्‍तु (कमॉडिटी) से अधिक कुछ नहीं है। चौथे खंभे की अपनी ज़‍िम्‍मेदारी वह पूरी तरह भूल चुका है और अपनी उस भूमिका से वह बहुत दूर जा चुका है।

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[3 Nov 2009 | 6 Comments | ]
कंपनियों को खजाना और जनता को मौत बांटती सरकार

अरुंधती रॉय ♦ माओवादी विद्रोही इन दिनों चर्चा का विषय हैं। चमकते हुए अमीर से लेकर सबसे अधिक बिकने वाले अख़बार के सनकी संपादक तक – हर कोई अचानक यह मानने को तैयार हो गया है कि दशकों से हो रहा अन्याय ही इस समस्या की जड़ है। लेकिन उस समस्या को समझने की जगह, जिसका मतलब होगा 21वीं सदी की इस सुनहरी दौड़ का थम जाना, वो इस बहस को एक नया मोड़ देने में जुटे हैं। माओवादी “आतंकवाद” के ख़िलाफ़ भावनात्मक गुस्से का इज़हार करते हुए … चीखते-चिल्लाते हुए। लेकिन वो सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रहे हैं।

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[8 Oct 2009 | 2 Comments | ]
सत्‍य का खोजी अं‍तर्विरोधों में जीता है : प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी ♦ जेपी लोकतंत्र विरोधी नहीं थे। लोकतंत्र की पहली ही शर्त है कि विरोधी पक्ष को भी सुना जाए। उसके साथ संवाद किया जाए। यदि लोकतंत्र की प्रक्रिया में विचार से किसी व्‍यक्ति को बदल कर अपने साथ लेने का सामर्थ्‍य नहीं है, तो वह लोकतंत्र झूठा है। प्रभाष जी ने जेपी के जीवन से जुड़ी हुई कुछ घटनाओं का उदाहरण देते हुए इस बात की पुष्टि की और कहा कि अहिंसा के बिना सत्‍य की तलाश नहीं हो सकती। अहिंसा की प्रक्रिया लोकतंत्र के मूल में है क्‍योंकि वह विचारों से चलती है। जो जीवन सत्‍य की जितनी ईमानदारी से तलाश के लिए जीया जाता है, उसमें उतने ही अंतर्विरोध हो सकते हैं। गांधीजी के बाद इस तरह के अंतर्विरोध जेपी के जीवन में भी थे।

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[26 Sep 2009 | 14 Comments | ]
“नामवरों की साज़‍िश से दलित विमर्श हाशिये पर”

विनीत कुमार ♦ शिमला में चल रही कार्यशाला में लगभग रोज विमल थोरात की ओर से नामवर सिंह के दलित विरोधी रवैयों को पुख्ता प्रमाण के तौर पर रखा जाता है। बहरहाल, नामवर सिंह बकौल विमल थोरात दलित साहित्य को इग्नू के पाठ्यक्रम में न आने देने के लिए एड़ी-चोटी एक कर देते हैं, इसे अपरिपक्व करार देते हैं, साहित्य के नाम पर ‘जूठन’ का नाम सुनते ही मैनेजर पांडेय जैसे आलोचक बौखलाहट में कुर्सी से गिर पड़ते हैं, निर्मला जैन जैसी तथाकथित प्रबुद्ध और वरिष्ठ आलोचक दलित विमर्श के साथ ही स्त्री विमर्श को बेमतलब करार देती हैं।

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[18 Sep 2009 | 2 Comments | ]
प्रोफेसर पचौरी का लैक्‍चर : जो भाषा अड़ गयी, वो सड़ गयी

विनीत कुमार ♦ लाइफबॉय के विज्ञापन पर अगर करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं तो उसके साथ रोज दस लाख साबुन की बट्टियां बेचने का टार्गेट होता है। अगर हिंदी की ये दो लाइन के विज्ञापन को देखकर कन्ज्यूमर उससे जुड़ नहीं पाता तो करोड़ों का नुकसान होगा। इसलिए हिंदी भाषा के जरिये सिर्फ संप्रेषण का काम नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे एक भारी इन्वेस्टमेंट और बिजनेस का रिस्क जुड़ा हुआ है। हिंदी को लेकर जिस भाषा विस्तार और भौगोलिक क्षेत्र की बात करते हैं प्रोफेसर पचौरी ने उसे कन्ज्यूमर रिच यानी उपभोक्ता की पहुंच के तौर पर विश्लेषित किया।

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[17 Sep 2009 | 4 Comments | ]
पॉपुलर कल्‍चर पर सुधीश पचौरी का लेक्‍चर सुनने आइए

डेस्‍क ♦ पॉपुलर संस्कृति के बीच पैदा होनेवाली तमाम बहसों पर अपनी बात रखने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय ने पॉपुलर लेक्चर सीरीज़ के तहत मीडिया विशेषज्ञ और हिंदी विभाग (डीयू) के अध्यक्ष प्रो सुधीश पचौरी को आमंत्रित किया है। विश्वविद्यालय प्रत्येक 15 दिनों के अंतराल में अकादमिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और समसामयिक मसलों से जुड़े विषयों पर विशेष व्याख्यान का आयोजन करता है। प्रो सुधीश पचौरी को इसी योजना के तहत आमंत्रित किया गया है। प्रो पचौरी विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में पॉपुलर संस्कृति और मास मीडिया पर न केवल लगातार लेख लिखते रहे हैं बल्कि पॉपुलर संस्कृति पर स्वतंत्र रूप से किताब भी लिखी है। उनका लेक्‍चर 17 सितंबर को रखा गया है।

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[12 Sep 2009 | No Comment | ]
टीवी चैनलों की कार्य संस्‍कृति‍ और नया माहौल

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ चैनल संस्कृति ने तर्क के मुहावरे, भाषा का मर्म और बाजार के विकास के नियम बदल दिये हैं। बौद्धिकों में भ्रम पैदा किया है। बोगस, खोखले, सतही और कृत्रिम को महत्ता दिलायी है। आदर्श बनाया है। चैनलों में सब ग्लोबल और इकसार नहीं है, बल्कि प्रतिरोधी और क्षेत्रीय भी है। चैनल संस्कृति वस्तुत: अस्मिता संस्कृति है। चैनलों के प्रसार ने स्वतंत्र राष्ट्रों की संप्रभुता, क्षेत्रीय एकजुटता को मज़बूत बनाया है। चैनलों के माध्यम से साझा भाषा और सभ्यता का निर्माण हो रहा है। जहां-जहां चैनल संस्कृति अपने पैर पसार रही है वहां पर जनता में संपर्क, एकजुटता और करीबीपन बढ़ा है। यह स्थिति आज से दस बरस पहले नहीं थी।

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[11 Sep 2009 | 7 Comments | ]
जेएनयू में “भाषा, विचार और लोकतंत्र” विषय पर गोष्‍ठी

गंगासहाय मीणा ♦ जेएनयू के स्‍कूल ऑफ लैंग्‍वेज में 9 सितंबर की शाम “सबलोग” पत्रिका के सितंबर अंक का लोकार्पण और “भाषा, विचार और लोकतंत्र” विषय पर विचार-गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। बीज वक्‍तव्‍य देते हुए नीलाभ ने कहा कि हमें इस सवाल पर गहराई से विचार करने की आवश्‍यकता है कि आखिर हिंदी को खतरा किससे है। चूंकि हिंदी वंचितों और शोषितों की भाषा रही है और जिस हिंदी में हमें अपने विचार व्‍यक्‍त करने हैं, वह “राजभाषा” हिंदी नहीं है। मीडिया और बाजार द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिंदी मीडिया और बाज़ार के ही लाभ के लिए होती है। ऐसे परिवेश में हमारी पत्रिकाओं का रुख क्‍या हो, इस पर भी हमें सोचना चाहिए।

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[5 Sep 2009 | One Comment | ]
“जिस लाहौर नहीं वेख्या” राजनीतिक नाटक नहीं है : असग़र वजाहत

दीप्ति कुमार ♦ नाटक के इतिहास को समेटने वाली पुस्तक – टू डिकेड्स ऑफ़ ए प्ले (वाणी प्रकाशन) का लोकार्पण करते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, “असग़र वजाहत ने जिस लाहौर नहीं वेख्या… को सिर्फ़ मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि दोनों समुदायों की सोच को समझने का प्रयास किया है। नाटक हमें यह बताता है कि दोनों समुदायों के बीच ऐसा क्या हुआ जिससे सांस्कृतिक एकता, मोहल्लेदारी, प्रेम, विश्वास, भाईचारा सब ख़तम हो गये थे। लेखक ने यह दिखाया है कि समाज विरोधी तत्व किस तरह से मज़हब का फायदा उठाते हैं। पात्रों का चित्रण तार्किक है तथा नाटक में पंजाब और लखनऊ की संस्कृति की मानवीय स्तर पर तुलना बहुत संवेदनशील है।”