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Articles in the व्याख्यान Category

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[19 Jul 2010 | 9 Comments | ]
आज भी सिर्फ दस जातियां राज करती हैं…

श्रीकांत ♦ बीस साल में क्या बदला? 10 जातियां केवल हैं, जो स्टेट पावर पर काबिज होती हैं। जो राज करती हैं। आप किसी भी पार्टी में उठा कर देख लीजिए। अभी वीरेंद्र यादव ने 243 विधायकों की जाति की सूची निकाली है। सिर्फ 10 जातियां! पिछले 50 सालों में इस स्टेट में यही राज कर रही हैं। गरीबों की हालत है कि वे जहां पहले थे, वहीं आज भी हैं। सिर्फ ‘टेन परसेंट’ लोगों का, जो 10 प्रतिशत रिच क्लास है, उनके पास धन-संपत्ति बढ़ती जा रही है। आपको आश्‍चर्य होगा कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 278 रुपये आमदनी मासिक पर लोग गुजारा करते हैं। आप शहर में रह के 5-10 हजार की बात करते हैं, आप कल्पना कीजिए कि वो आदमी कैसे गुजारा करेगा?

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[21 Jun 2010 | 54 Comments | ]
प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है, अनुराग!

दिलीप मंडल ♦ प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है। अमर्त्य सेन को बचपन में पलामू या मिर्जापुर या कूचबिहार के किसी गांव के स्कूल में पढ़ते हुए सोचिए। प्रतिभा के बारे में सारे भ्रम दूर हो जाएंगे। जब भारत के हर समुदाय और तबके से प्रतिभाएं सामने आएंगी, तभी यह देश आगे बढ़ सकता है। चंद समुदायों और व्यक्तियों का संसाधनों और प्रतिभा पर जब तक एकाधिकार बना रहेगा, जब तक इस देश में सबसे ज्यादा अंधे रहेंगे, सबसे ज्यादा अशिक्षित रहेंगे, सबसे ज्यादा कुपोषित होंगे और आपकी सोने की चिड़िया का यूएन के वर्ल्ड ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में स्थान 134वां या ऐसा ही कुछ बना रहेगा। प्रश्न सिर्फ इस बात का है कि क्या एक सचेत व्यक्ति के तौर पर हम यह सब होते देख पा रहे हैं।

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[20 Jun 2010 | 4 Comments | ]
त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहस तलब 2 की उपलब्धि रही

ब्रजेश कुमार झा ♦ कुछ अटकाव के बावजूद बहसतलब-दो कायदे का रहा। बड़ी सहजता से नाटक की दुनिया से जुड़ीं त्रिपुरारी शर्मा ने इसे समझाया भी। सवाल हुए तो बड़े उदात्त भाव से कहा, “बहस कहां हो रही है, मेरे लिए यह सवाल महत्व का नहीं है। महत्व की बात तो इतनी भर है कि आम आदमी के लिए बहस जारी है।” दरअसल यही वह बिंदु है, जो बहसतलब में जान डालती है। उसके मतलब को बताती है। साथ ही उसे आगाह भी करती है। कुल मिलाकर त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहसतलब की उपलब्धियां रहीं। वहां न कोई आक्रामकता थी, न दंभ। न ही अपने खास होने का बोध। दरअसल आज वही तो है आम आदमी।

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[20 Jun 2010 | No Comment | ]
अब ऑडियो सुनें, बहसतलब दो में किसने क्‍या कहा…

विनीत कुमार ♦ 18 जून को मोहल्ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स की साझा पेशकश के दौरान अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी में जिस बहस की शुरुआत हुई, उसके कई संस्करण अब वर्चुअल स्पेस की दुनिया में पसर रहे हैं। इस बहस में जो भी लोग शामिल हुए, वो वक्ताओं से या तो असहमत हैं या उनकी बातों को सिरे से खारिज करते हैं या फिर उन्हें लग रहा है कि इस तरह के आयोजन आम आदमी के सवाल को ईमानदारी से उठाने में बहुत मददगार साबित होंगे, इसे लेकर पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। तमाम वक्ताओं को लेकर लगातार असहमति और बहस जारी रहे, अच्छा रहेगा। लेकिन उन्होंने दरअसल कहा क्या, उससे हम हूबहू सुनकर लगातार टकरा सकें, अपनी बात के बीच उनकी बात को उसी शक्ल में रख सकें, फिलहाल उस नीयत से उनकी बात ऑडियो की शक्ल में सुनिए…

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[19 Jun 2010 | 7 Comments | ]
बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं…

हिमानी दीवान ♦ भीड़ भरे भारत देश की तरह हैबिटैट सेंटर के इस हॉल में भी कुछ लोग जगह न मिलने की वजह से खड़े थे और कुछ लोग आम आदमी की इस खास बहस को सुनने के लिए जमीन पर ही बैठ गये थे। नजारा यकीनन अदभुत था लेकिन नजरें फिर भी न जाने क्यों आम आदमी की बहस में आम आदमी को ढूंढ़ रही थी। तमाम तीखे, फीके और चटपटे जायके वाले सवाल पूछे गये। लाजवाब, जवाब भी दिये गये लेकिन ऐसा लगा कि सब अपने आप में कहीं न कहीं मजबूर से हैं। बात बात पर पैसे की मजबूरी। जब उनकी मशहूरी सुनी थी तब लगा कि वो लोग खास हैं, और जब मजबूरी सुनी तब जाना कि कितने आम इंसान हैं।

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[19 Jun 2010 | 14 Comments | ]
बहसतलब ‘दो’ में अचानक पहुंचे अनुराग, सवालों से घिरे

डेस्‍क ♦ मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स के आयोजन बहसतलब दो अचानक पहुंच कर फिल्‍म निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने सबको चौंका दिया। बात उन्‍हीं से शुरू हुई। अनुराग ने कहा कि सिनेमा एक खर्चीला माध्‍यम है, इसलिए ये बाजार की कैद में है। जिस सिनेमा में आम आदमी की चिंता की जाती है, वह हॉल तक पहुंच ही नहीं पाता। समांतर सिनेमा को सरकार का सपोर्ट था। एनएफडीसी को फिर से खड़ा करने की बात चल रही है, उसके बाद कुछ फिल्‍मों में आम आदमी दिख सकता है। लेकिन अगर इस बार भी दर्शकों ने परदे पर आम आदमी को खारिज कर दिया, तो सिनेमा जैसे माध्‍यमों में आम आदमी की बात बेमानी हो जाएगी।

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[19 Jun 2010 | 12 Comments | ]
आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी एक भी नहीं!

आशीष कुमार ‘अंशु’ ♦ यदि आप आगे से बहसतलब में कम से कम तैंतीस प्रतिशत दलित और आदिवासी समाज के श्रोताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करें तो क्या इससे बहसतलब का रंग और नहीं निखरेगा? सक्षम आयोजकों के लिए यह अधिक मुश्किल भी नहीं होगा। क्या आपको ‘अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी’ के ऊपर अपनी बात रखने के लिए एक भी अच्छा आदिवासी या दलित समाज का प्रतिनिधि नहीं मिला। कैजुरिना में आयोजक, मॉडरेटर से लेकर सभी के सभी वक्ता तक सवर्ण ही थे। ऐसा क्यों भाई, क्या आपको आदिवासी और दलित समाज से एक भी चेहरा ऐसा नहीं मिला, जो मुकम्मल तरिके से अपना पक्ष रखता।

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[17 Jun 2010 | 4 Comments | ]
बहसतलब की दूसरी कड़ी का आयोजन आज, सवाल पूछें

डेस्‍क ♦ बहसतलब की दूसरी कड़ी का आयोजन आज, शुक्रवार, 18 जून को इंडिया हैबिटैट सेंटर के कैजुरिना हॉल में हो रहा है। विषय है, अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी। हमारे तमाम अभिव्‍यक्ति माध्‍यम आज शहरी बाजार की कठपुतलियों जैसा बर्ताव कर रहे हैं। इसी बाजार के किस्‍से, इसी बाजार के कंसर्न से उन्‍हें मतलब रह गया है। वो आम आदमी कहीं नहीं दिखता, जिसकी बुनियाद पर इस देश के लोकतंत्र की इमारत की खड़ी है। एक हास्‍यास्‍पद मुहावरे की तरह ये दो शब्‍द कितने निरीह लगते हैं, इसकी कल्‍पना नहीं की जा सकती। यानी ये मान लिया जाना चाहिए कि आम आदमी अब अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों की सरहद से हमेशा के लिए बाहर हो चुका है और अब उसकी वापसी की गुंजाइश नहीं है?

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[14 Jun 2010 | 5 Comments | ]
साहित्‍यकार मीडिया में गुमनाम क्‍यों हैं?

रवीश कुमार ♦ दो ही बातें हो सकती हैं। मीडिया इतनी बड़ी हो गयी है कि साहित्यकारों की हैसियत तय करना चाहती है या फिर साहित्यकार इतने कमतर हो गये हैं कि मीडिया से उद्धार चाहते हैं। माध्यम की ठसक देखिए। पर ऐसा क्या है जहां आकर हमारे साहित्यकार मीडिया को रचनात्मकता से भर देंगे। हू हा.. हुंकार की बोली युग में मैं किसी केदारनाथ सिंह जी को स्टुडियो में भयभीत बैठे देखने की कल्पना नहीं कर सकता। मुझे नहीं लगता कि जो आज की मीडिया है उसमें साहित्यकारों की कोई जगह और ज़रूरत है। मैं जहां है जैसा है के आधार पर बोल रहा हूं। एक कारण यह है कि अब पत्रकार रघुवीर सहाय या अज्ञेय होने की ख्वाहिश लेकर नहीं आता है।

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[8 May 2010 | One Comment | ]
बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा है : धीरुभाई शेठ

जितेंद्र कुमार यादव ♦ बुद्धिजीवी और श्रमजीवी के रूप में लोगों का विभाजन जातिवादी फ्रेम के तहत हुआ। इस तरह बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा ठहरती है। यह बात सीएसडीएस के पूर्व निदेशक और वरिष्‍ठ राजनीतिक समाजशास्‍त्री धीरूभाई शेठ ने डॉ राममनोहर लोहिया के जन्‍मशताब्‍दी वर्ष के अवसर पर जेएनयू में ‘सामाजिक चुनौतियां और बुद्धिजीवियों का दायित्‍व’ विषय पर आयोजित एक विचार गोष्‍ठी में कही। उन्‍होंने कहा कि इस देश में दो सत्ताएं हैं – व्‍याख्‍या सत्ता और राजसत्ता। व्‍याख्‍या सत्ता राजसत्ता को नियंत्रित करती रही है। बुद्धिजीवी वर्ग की ताकत को ऐतिहासिक रूप में समझने की जरूरत है।