Category: व्याख्यान

आज मंच ज़्यादा हैं और बोलने वाले कम हैं। यहां हम उन्‍हें सुनते हैं, जो हमें समाज की सच्‍चाइयों से परिचय कराते हैं।

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साइबर बुलींग प्रताड़ना का नया कल्‍चर है

♦ मोनिका लेंविस्‍की आपके सामने एक ऐसी औरत खड़ी है, जो सार्वजनिक तौर पर दस साल से ख़ामोश रही। ज़ाहिर है, वो ख़ामोशी टूट रही है, और ये हाल में ही शुरू हुआ है।...

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मैंने मलाला को उड़ने दिया, पर नहीं काटे

♦ जियाउद्दीन युसुफजई पितृसत्तात्मक समाजों और आदिवासी समाजों में आमतौर पर पिता को बेटों से जाना जाता है। लेकिन मैं उन कुछ पिताओं में से हूं, जो अपनी बेटी से जाने जाते हैं और...

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एक छिपी हुई कहानी तक पहुंचने की कहानी

एमन मोहम्‍मद ♦ मेरे तीन सहकर्मी मुझे जंग के खुले मैदान में जितनी दूर हो सके, लेकर गये। हवा में धूल उड़ रही थी और मेरे नीचे की जमीन झूले की तरह हिल रही थी। मैंने देखा मेरे तीनों सहकर्मी बख्तरबंद जीप में बैठ कर मेरी ओर हाथ हिलाकर, मुस्कुराते हुए वापिस चले गये।

राज, समाज और पानी पर IHC में बोलेंगे अनुपम मिश्र 0

राज, समाज और पानी पर IHC में बोलेंगे अनुपम मिश्र

डेस्‍क ♦ इंडिया हैबिटैट सेंटर की स्थापना के 15 साल अगस्त 2014 में पूरे हो रहे हैं। इस मौके से सेंटर की तरफ से कुछ विशेष आयोजन किये जा रहे हैं, जिनमें देश के जानेमाने पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का व्याख्यान भी शामिल है। विषय है – राज, समाज और पानी। विषय के बारे में श्री मिश्र का कहना है कि “पानी न बरसे तो मुश्किल, ठीक से बरस जाए तो मुश्किल”। इस दोतरफा मुश्किल के बीच फंसा है मनुष्य। ऐसे में राज और समाज की भूमिका क्या बनती है, पानी को लेकर भविष्य की चुनौतियां क्या हैं, इसी बारे में नये संदर्भों में अनुपम जी अपना व्याख्यान देंगे। अनुपम मिश्र गांधीवादी पर्यावरणविद् हैं। उन्‍होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास से संबंधित महत्वपूर्ण काम किया है।

कामों का बोझा बढ़ाने से बेहतर है एक ही चीज साधें 0

कामों का बोझा बढ़ाने से बेहतर है एक ही चीज साधें

पओलो कार्डिनी ♦ आप कभी वेनिस गये हो? छोटी गलियों में खुद को खोना कितना खूबसूरत है उस द्वीप पर। लेकिन हमारी मल्टीटास्किंग दुनिया कुछ अलग है। हजारों सूचनाओं से भरी। ऐसे में कैसा रहेगा फिर से अपनी साहस की किशोर भावना को पाना? मैं जानता हूं कि मोनो-टास्किंग के बारे में बात करना अजीब है, जब हमारे पास इतने सारे विकल्प हैं। लेकिन मैं फिर आपको कहता हूं केवल एक काम पर ध्यान दो या अपनी डिजिटल भावनाओं को बंद ही कर दो। ताकि आजकल, सब अपनी मोनो चीज बना सकें। क्यूं नहीं? तो अपनी मोनोटास्क वाली जगह ढूंढ लो… इस मल्टीटास्किंग दुनिया में।

मल्‍टीनेशनल गिरोह से कुछ ऐसे निकला सैनेटरी नैपकिन! 4

मल्‍टीनेशनल गिरोह से कुछ ऐसे निकला सैनेटरी नैपकिन!

अरुणाचलम मुरुगनाथम ♦ अगर कोई पैसे के पीछे ही भागता रहे, तो जीवन में कोई सुंदरता नहीं बचेगी। जिंदगी बड़ी उबाऊ होगी। बहुत से लोग ढेर सारा पैसा बनाते हैं, करोड़ों, अरबों रुपये जमा करते हैं। इस सबके बाद वो आखिर में समाजसेवा करने आते हैं, क्यों? पहले पैसों का ढेर बनाकर फिर समाजसेवा करने आने का क्या मतलब है? क्यों न पहले दिन से ही समाज के बारे में सोचें? इसीलिए, मैं ये मशीन केवल ग्रामीण भारत में, ग्रामीण महिलाओं को दे रहा हूं। क्योंकि भारत में, आपको जानकर आश्चर्य होगा, केवल दो प्रतिशत महिलाएं सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करती हैं। बाकी सभी, फटे-पुराने, पोछे-नुमा कपड़े, पत्ते, भूसा, लकड़ी का बुरादा – इसी सब से काम चलाती हैं – सैनेटरी नैपकिन नहीं। इस 21वीं सदी में भी ये हाल है।

लेखक वस्‍तुत: अपनी भाषा का आदिवासी होता है 2

लेखक वस्‍तुत: अपनी भाषा का आदिवासी होता है

उदय प्रकाश ♦ एक प्रश्न हमेशा मेरे सामने आ खड़ा होता है। वह यह कि जिस धरती पर मैं भौतिक रूप से रहता हूं, जिस शहर, समाज या राज्य में, उसका मालिक आखिर कौन है? किसका आधिपत्य उस पर है? किसी नागरिक, प्रजा या मनुष्य के रूप में उस मालिक ने मुझे कितनी स्वतंत्रता दे रखी है? उसकी हदबंदियां और ज़ंजीरें कहां-कहां हैं? और ठीक इसी से जुड़ा हुआ, इसी प्रश्न के साथ, इसी प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी सामने आ जाता है कि जिस भाषा में मैं लिखता हूं, उस भाषा का मालिक कौन है? वह कौन सी सत्ता है, जिसके अधीन यह भाषा है? जैसा मैंने अभी कहा, लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है।

अलविदा शावेज, मानवता की साम्राज्यवाद विरोधी भावनाओं में  तुम जिन्दा रहोगे 3

अलविदा शावेज, मानवता की साम्राज्यवाद विरोधी भावनाओं में तुम जिन्दा रहोगे

ह्यूगो शावेज की असामयिक मृत्यु ने आज दुनियाभर में न्याय और समता के सपने को साकार करने में लगे करोड़ों लोगों को शोकसंतप्त कर दिया है। साम्रज्यवाद विरोधी दल के कमांडर कहे जाने वाले...

हमारी सरकार सबसे अच्‍छी है, हमारी सरकार सबसे सच्‍ची है 5

हमारी सरकार सबसे अच्‍छी है, हमारी सरकार सबसे सच्‍ची है

मनमोहन सिंह ♦ हमारी सरकार मानती है कि भारत के सामने जो कठिन समस्याएं हैं, उनका मुकाबला हम आम आदमी के सहयोग से ही कर सकते हैं। हमारी कोशिश होगी कि आने वाले वक्त में और बड़ी संख्या में लोग गरीबी, अशिक्षा और असमानता दूर करने जैसे कामों में हमारी सहायता करें। भाइयो और बहनो, मेरा मानना है कि दुनिया की कोई भी ताकत हमारे महान देश को विकास और तरक्की की नई ऊँचाइयां पाने से नहीं रोक सकती। ज़रूरत सिर्फ इस बात की है कि हम सब मिलजुलकर और एक होकर अपने देश की कामयाबी के लिए काम करें। आइए, एक बार फिर यह प्रण करें कि हम सब एक प्रगतिशील, आधुनिक और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए लगातार काम करते रहेंगे।

मैं सफीना हुसैन हूं! मुझे सुनिए, क्‍योंकि मैं टीम बालिका हूं!! 3

मैं सफीना हुसैन हूं! मुझे सुनिए, क्‍योंकि मैं टीम बालिका हूं!!

सफीना हुसैन ♦ सरकारी स्‍कूल असफल साबित हो रहे हैं क्‍योंकि उनका कोई मालिक नहीं है! एक प्राइवेट स्‍कूल क्‍यों सफल होता है? क्‍योंकि अभिभावक पैसा देते हैं और वे परिणाम देखना चाहते हैं, क्‍योंकि वहां एक संचालक मंडल हाता है, निदेशक बोर्ड के ट्रस्‍टी होते हैं। स्‍वामित्‍व या शासन और जवाबदेही के कई स्‍तर होते हैं। वहीं दूसरी ओर पब्लिक स्‍कूलों में शिक्षकों को केंद्रीय स्‍तर पर बुलाया जाता है और गांवों में उनका स्‍थानांतरण कर दिया जाता है। माता-पिता अनपढ़ होते हैं और वे कोई भी राय जाहिर करने में असमर्थ होते हैं। तो आप स्‍वामित्‍व का हस्‍तांतरण माता-पिता और समुदाय तक कैसे करेंगे और जरूरी बदलाव कैसे लायेंगे? सबसे पहले हम माता-पिता को सशक्‍त करते हैं और अभिभावक मंडल को प्रशिक्षित करते हैं।