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Articles in the खेल खेल में Category

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[7 May 2010 | No Comment | ]
एक छोटे से तथ्य के बदलने ने मैचों का रंग बदल दिया

मिहिर पंड्या ♦ तकरीबन एक महीने से ऊपर चले आईपीएल के तमाशे के बाद वेस्टइंडीज के एक छोटे से टापू-देश सेंट लूशिया का वो ये चौड़ा क्रिकेट मैदान… भरा-पूरा। सच, सेंट लूशिया के इस बीस हजार से कुछ ही ज्यादा आबादी वाले – समंदर किनारे बसे उस छोटे से, सुंदर से नाम वाले शहर ’ग्रॉस आइसलेट’ में बने क्रिकेट स्टेडियम में क्रिकेट का जीवंत मैच देखना एक सुखद आश्चर्य है। सिर्फ एक छोटे से तथ्य के बदलने ने मैचों का रंग ही बदल दिया है। अचानक मुझे याद आया कि हमने अपने इस प्यारे खेल में आखिर क्या खो दिया था। आखिर वो क्या था जिसे मैं इतने दिनों से, इतनी शिद्दत से मिस कर रहा था।

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[30 Mar 2010 | 14 Comments | ]
हिंदी विवि में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने का रेट तय

मॉडरेटर ♦ वर्धा विश्वविद्यालय से जुड़ी बहुत सारी खबरें मोहल्ला लाइव के पास आती रहती हैं। उन खबरों के साथ मुश्किल ये है कि तथ्यों को लेकर वे बड़ी बेपरवाह होती हैं। हमारे पास इतने संसाधन नहीं हैं कि हम उन तथ्यों की तस्दीक कर सकें। एक बात और कि ज्यादातर खबरें व्यक्तियों को निशाने पर लेकर लिखी-भेजी जाती हैं। आग्रह है कि वहीं खबरें भेजें जो विश्वविद्यालय के माहौल को बेहतर बनाने में मददगार हो।

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[29 Mar 2010 | 18 Comments | ]
वर्धा में शैक्षणिक पदों के लिए लग रही हैं बोलियां

विनोद ♦ भाषा प्रौद्योगिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए होने वाला साक्षात्कार वैसे तो रोस्टर के हिसाब से अवैध है, परंतु इस पद पर भी विश्वविद्यालय में ही पढ़ा रहे दो व्याखाता अनिल पांडे या अनिल दुबे की नियुक्ति तय है। अनिल पांडे की पैरवी विश्वविद्यालय का ही एक कथाकार कर रहा है। जिसके बदले में श्री पांडे दारू की बोतलों की कमी नहीं होने दे रहे हैं। उधर दूसरे उम्मेदवार श्री दुबे के लिए विभागाध्यक्ष ने आश्वासन दे रखा है। इन दोनों ही उम्मीदवारों की व्याख्याता पद पर नियुक्ति को राष्ट्रपति ने मान्यता नहीं दी है तथा प्रसिद्ध इतिहासकार विपिन चंद्रा ने इन्‍हें शिक्षक होने के काबिल नहीं पाया था। वैसे पिछली बार चयन समिति ने इसी पद के लिए नानसुटेबल घोषित किया था।

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[25 Feb 2010 | 17 Comments | ]
ममता ने ऐसा क्‍या किया कि टीवी पर उसे दिखाया जाए

विनीत कुमार ♦ इंडिया टीवी के रहते ये भला कैसे पिचकता? इंडिया टीवी की स्पेशल स्टोरी रही – 200 का देवता। इस चैनल ने सचिन को देवता करार देने के साथ ही 200 संख्या को भी स्टैब्लिश करने की कोशिश की। न्यूज चैनलों में तारीखों और संख्या को स्टैब्लिश करने की बहुत मारामारी मची रहती है। ये भी 9/11 से उधार लिया पैटर्न है। हेडर में बार-बार आता है – 5 मिनट, 5 इंच का देवता। पीछे से जोधा-अखबर का गाना, अजीबो शान शहंशाह… इस चैनल की छवि है कि ये दुनिया की किसी भी खबर में देवी-देवता, रहस्यमयी शक्तियों को तलाश लेती है।

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[24 Feb 2010 | 11 Comments | ]
इतिहास में पहली बार… उत्तेजना में चार लाइनें…!

संदीप पांडेय ♦ मैं कहता हूं, नहीं यार, एक रन चाहिए। ये धोनी का बच्चा स्ट्राइक ही नहीं दे रहा। वो कहता है मैं फोन पर रहूंगा। मुझे महसूस करना है सचिन का दोहरा शतक। आखिरी ओवर की तीसरी गेंद। सचिन का दोहरा शतक पूरा। दिल धड़ाके मार रहा है। तालियों की गड़गड़ाहट। शोर में मैं संज्ञा शून्य हो गया हूं। आंख भर आयी है। प्रभाष जी कहां हो आप… देख रहे हो न अपने लाडले का कमाल! सोच रहा हूं कल का जनसत्ता कैसा होगा? पढ़ भी पाऊंगा या नहीं। एक बार एक साथी ने कहा था, प्रभाष जी की मौत को क्रिकेट से जोड़ कर तुम उनके योगदान का अपमान कर रहे हो। मैं उससे क्या कहता… कि क्रिकेट और सचिन को लेकर उनकी आस्था और मोह सारे तर्कों से परे था।

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[24 Feb 2010 | 8 Comments | ]
हम सब इस युग में पैदा हुए, ईश्वर का धन्यवाद है जी!

ब्रजमोहन सिंह ♦ सचिन को क्या नाम दें? सचिन रनबीर तेंदुलकर। सचिन शतकबीर तेंदुलकर। सचिन महाबीर तेंदुलकर या और कुछ… क्या फर्क पड़ता है। नाम से क्या फर्क पड़ता है। सचिन ने वो कर दिया है, जो अभी तक कोई नहीं कर पाया। इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं। शायद आगे कब होगा, यह भी पता नहीं। मैं सचिन को 2011 के वर्ल्ड कप में खेलते हुए देख रहा हूं। मुझे ऐसा भी लग रहा है कि वो एक दिवसीय मैच और टेस्ट में 100 शतक भी बनाएंगे। लेकिन फिर भी उनकी दीवानगी कम नहीं होगी। सचिन के उम्र की बात होती रहती है। लोग कहते हैं 36 साल पुराने सचिन की हड्डी पुरानी हो गयी। अब वोह बात नहीं। लेकिन सचिन क्या हाड़-मांस के बने भी हैं, ऐसा नहीं लगता मुझे। सचिन के साथ एक अरब हिंदुस्तानी लोगों की दुआ साथ है।

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[18 Jan 2010 | 13 Comments | ]
हिंद को जिस पर नाज़ है, उसे हिंदी पर नाज़ क्यों नहीं?

ब्रज ♦ मैं धावक मिल्खा सिंह से मिलता रहता हूं। उनकी हिंदी और उर्दू से बेहद प्रभावित हूं। वो उस समय के हीरो हैं, जब टीवी चैनल नहीं थे। उन्होंने ओलिंपिक गोल्ड मेडल भी नहीं जीता लेकिन उनका वो अक्स सबके सामने रहता है… ट्रैक पर सपाट दौड़ते हुए। परगट सिंह से भी मिलकर मुझे ऐसा लगा कि हिंदी या हिंदुस्तानी बोलने पर उनके चेहरे पर वो खिंचाव नहीं आता। सवाल है कि हमारे यहां कितने लोग शूटिंग का खेल खेलते हैं… शायद 0.1 फीसदी लोग भी नहीं… कितने लोग अंग्रेजी बोलते हैं… पांच फीसदी भी नहीं। चीन के सारे एथलीट चीनी ही बोलते हैं। रशियन, गेर्मन, फ्रेंच सभी खिलाड़ी अपनी भाषा बोल लेते हैं। हिंदी बोलने में खुद का अपमान कैसा!

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[28 Dec 2009 | No Comment | ]
शर्म इनको मगर नहीं आती

राजीव किशोर ♦ ग़ालिब का ये शेर ख़ुद ग़ालिब के शहर दिल्ली पर एक दिन इतना सटीक बैठेगा, शायद ग़ालिब ने सोचा भी न हो। रविवार को दिल्ली के फ़िरोजशाह कोटला की पिच पर जो कुछ हुआ, उसने दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन की बेशर्मी को सरेआम जाहिर कर दिया। दुनिया के नक्शे पर दिल्ली का फिरोज़शाह कोटला एक ऐसा दाग़दार पिच बन कर उभर गया है, जिसे धोने में अब एक अर्सा लग सकता है। शर्म का ताल्लुक सिर्फ़ और सिर्फ़ डीसीए से ही नहीं, बल्कि ख़ुद बीसीसीआई से भी है। क्योंकि अगर बीसीसीआई धृतराष्ट्र है, तो दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन कौरवों की सेना है, जिसकी ग़लती धृतराष्ट्र को दिखाई नहीं देती या यूं कहें कि बीसीसीआई वो धृतराष्ट्र है जो कौरवों की ग़लती को देखना, उसे दुरुस्त करना मुनासिब नहीं समझता।

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[15 Nov 2009 | One Comment | ]
भारतीयों के दिल पर लिखी इबारत को हुक्मरान भी सुनें

मज़्कूर आलम ♦ वनडे के 17 हजारी सचिन, टेस्ट में 13 हजार की दहलीज पर खड़े सचिन और अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में श्रीलंका दौरा में 30 हजार पूरा करने जा रहे सचिन, शतकों के शतक से 13 शतक पीछे सचिन के दो दशक पूरा करने पर हमें नाज है और आइए हम 15 नवंबर 2009 को उनके क्रिकेटीय जीवन के दो दशक पूरा करने पर एक सच्चे खेल प्रेमी की तरह उनके लिए क्लैपिंग करें। और मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि जब तक सचिन भारतीय टीम में हैं, क्रिकेट की तमाम अनिश्चितताओं के बाद भी भारतीय क्रिकेट सुरक्षित हाथों में है। देश के एक-एक कोने से सचिन के दीवाने इस तरह की अहमकाना नफ़रत की दीवार गिरा कर सचिन का जोश बढ़ाते रहेंगे।

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[17 Oct 2009 | 9 Comments | ]
आलोक नंदन मानसिक रूप से दिवालिया हैं!

पुण्‍य प्रसून ♦ सवाल पत्रकारिता और पत्रकार का था और प्रतिक्रिया में मीडिया संस्थानों पर बात होने लगी। आलोक नंदन जी, आपसे यही आग्रह है कि एक बार पत्रकार हो जाइए तो समझ जाएंगे कि ख़बरों को पकड़ने की कुलबुलाहट क्या होती है? सवाल ममता बनर्जी का नहीं है। सवाल है उस सत्ता का, जिसे ममता चुनौती दे भी रही हैं और खुद भी उसी सत्ता सरीखा व्यवहार करने लगी हैं। यहां ममता के बदले कोई और होता तो भी किसी पत्रकार के लिए फर्क नहीं पड़ता। और जहां तक रेप शब्द में आपको फिल्मी तत्व दिख रहा है तो यह आपका मानसिक दिवालियापन है। आपको एक बार शोमा और कोमलिका से बात करनी चाहिए… कि हकीकत में और क्या-क्या कहा गया… और उन पर भरोसा करना तो सीखना ही होगा।