Category: संघर्ष

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“पीके” असरदार बा #SupportForPK

♦ नबीन कुमार ‘भोजपुरिया’ एह सिनेमा के बारे मे हम पिछिला एक साल से सुनत आ पढत बानी, कबो आमिर खान भोजपुरी बोलिहे त कबो भोजपुरी के ट्युसन करत बाडे, त कबो लंगटे वाला...

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देश के लिए राष्ट्रीय शर्म है असम की घटना

इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली असम की घटना भारत की केंद्र और राज्य सरकारों की उस संवैधानिक स्थिति पर सवाल खड़ा करती है, जो अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में पूरी तरह से...

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मैंने मलाला को उड़ने दिया, पर नहीं काटे

♦ जियाउद्दीन युसुफजई पितृसत्तात्मक समाजों और आदिवासी समाजों में आमतौर पर पिता को बेटों से जाना जाता है। लेकिन मैं उन कुछ पिताओं में से हूं, जो अपनी बेटी से जाने जाते हैं और...

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एक छिपी हुई कहानी तक पहुंचने की कहानी

एमन मोहम्‍मद ♦ मेरे तीन सहकर्मी मुझे जंग के खुले मैदान में जितनी दूर हो सके, लेकर गये। हवा में धूल उड़ रही थी और मेरे नीचे की जमीन झूले की तरह हिल रही थी। मैंने देखा मेरे तीनों सहकर्मी बख्तरबंद जीप में बैठ कर मेरी ओर हाथ हिलाकर, मुस्कुराते हुए वापिस चले गये।

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बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

प्रकाश के रे ♦ आज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न था। वह अकेली थी। वह गर्भवती थी। ‘द क्लाइड’ नाम के उस जहाज पर जो उसके हमसफर थे, उन्हें भी मंजिल का पता न था।

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पहले लड़की से, अब साहस से बलात्‍कार कर रहे हैं

अरुधंती रॉय ♦ तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास “गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स” को छापा था। मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है। मैं मीडिया के शोर-शराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं। एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है, उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है। लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है। अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिये घूमने लगे हैं। अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे।

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“इस व्‍यवस्‍था को एक दिन टूटना ही है”

अरुंधती रॉय ♦ जब पार्टियां बहुत छोटी होती हैं, जैसे कि सीपीआई (एमएल) और सीपीआई, तो आपके पास इंटिग्रिटी होती है। आप अच्छी पॉजिशंस और हाई मॉरल ग्राउंड (उच्च नैतिक आधार) ले सकते हैं। क्योंकि आप इतने छोटे होते हैं कि इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर आप सीपीएम जैसी बड़ी पार्टी हैं तो स्थिति दूसरी होती है। अगर हम केरल और बंगाल के संदर्भ में सीपीएम की बात करें तो दोनों जगह इसके अलग-अलग इतिहास रहे हैं। बंगाल में सीपीएम बिल्कुल दक्षिणपंथ की तरह हो गयी थी। वे हिंसा करने में, गलियों के नुक्कड़ों को कब्जाने में, सिगरेट वालों के खोमचे को कब्जाने में बिल्कुल दक्षिणपंथ जैसे थे। यह बहुत अच्छा हुआ कि जनता ने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका।

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जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे! #Shahid

अविनाश ♦ बेसब्र इंतजार के बाद कल शाहिद को देखना मेरे लिए बहुत ही मर्मांतक अनुभव था। सधे, सुलझे हुए तरीके से, गैर-लोकप्रिय सिनेमाई व्‍याकरण को गढ़ते हुए आपने शाहिद की कहानी कही। धुंध भरे जिंदगी के कैनवास पर एक उदास पेंटिंग की तरह पूरी फिल्‍म देह की शिराओं को सिहराती रही। मुस्लिम बस्‍ती में बाढ़ की तरह आये अचानक दंगे का विद्रूप जैसा आपने पहले ही दृश्‍य में दिखाया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। हम जब एक मरे हुए जानवर को सड़क पर आवारा पड़ा देखते हैं, तो उबकाई से भर जाते हैं। जिंदा जलते हुए किसी को देखना कितना दहशतनाक होता होगा – यह हमारी कल्‍पनाओं के बाहर का जीवनानुभव है। इस देश में अल्‍पसंख्‍यक नहीं होने की सुखद अनुभूति के साथ हम अपने मामूली संघर्षों से आरामदेह रोजमर्रा बटोरने वाले लोग हैं।

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तब उसने अंधा युग किया, अब पुलिस की अंधेरगर्दी देखी

जनसंस्‍कृति मंच ♦ हम इस तरह की संभावित साजिश का पुरजोर विरोध करते हैं और बिहार सरकार से यह मांग करते हैं कि वह तत्काल थाना प्रभारी की बर्खास्तगी की कार्रवाई करे, ताकि पुलिसकर्मियों को यह सबक मिले, कि अगर वे बेगुनाहों पर जुल्म करेंगे, तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई हो सकती है। प्रवीण कुमार गुंजन की बर्बर पिटाई ने एक बार फिर से पुलिस राज के खिलाफ मजबूत जन प्रतिवाद की जरूरत को सामने लाया है। उन पर किये गये हमले का सही जवाब यही होगा कि देश और बिहार के संस्कृतिकर्मी सख्त पुलिस राज की वकालत करने वाली और पुलिसिया बर्बरता को शह देने वाली राजनीतिक शक्तियों, सरकारों और विचारों का भी हरसंभव और हर मौके पर अपनी कलाओं के जरिये विरोध करें।

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दीप नारायण जी की कहानी में अब भी बचे हैं गांधी

आशीष रंजन ♦ गांधी की जन्म तिथि के मौके पर रामचंद्र गुहा ने एक साक्षात्कार में कहा कि वह देश की राजनीतिक स्थिति से बहुत निराश नहीं हैं। वह अलग अलग जगह हो रहे आंदोलनों को लेकर आशावान हैं और देश की परिस्थिति बदलने की राह उसमें देखते हैं। उन्होंने मेधा पाटकर और एडीआर के कामों की चर्चा की और इस तरह के आंदोलनों पर अपनी आस्था व्यक्त की। मुझे लगा कि मेरे मन में जो बातें थीं, उन्होंने कह डाली। मेधा पाटकर और उनके बहादुर साथियों के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन के संघर्ष को देखें या फिर मजदूर किसान शक्ति संगठन के अरुणा राय, निखिल डे और शंकर सिंह के नेतृत्व में चले पारदर्शिता और जवाबदेही का आंदोलन को लें या कुडाकुलम के संघर्ष को लें या फिर अर्थशास्त्री ज्‍यां द्रेज द्वारा लगातार गरीबों के पक्ष में चल रहे काम को लें, तो सचमुच यह एहसास होता है कि गांधी की विरासत देश में फैले छोटे-बड़े आंदोलनों में रच बस रही रही है।