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Articles in the नज़रिया Category

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[13 Mar 2010 | No Comment | ]
लिखने का मौका मिला, लिखा – आजमाते वक्‍त चूक गये

अंबेडकर स्‍टूडेंट्स फोरम ♦ आश्चर्य होता है कि हमारे कुलपति पुलिस के इतने बड़े अधिकारी रहे हैं! कुलपति जी बार-बार यह कह रहे हैं कि उन्होंने दलितों के लिए काफी लिखा है, बोला है। ठीक बात है। उन्हें जब दलितों पर बोलने और लिखने का अवसर मिला, उन्होंने लिखा और बोला। आज उन्हें दलितों के लिए कुछ करने का अवसर मिला है तो वे वही कर रहे हैं, जो उन्हें करना चाहिए। भारत के ज्यादातर सवर्ण कम्युनिस्ट ऐसे ही हैं। दलितों पर खूब लिखते हैं, बोलते हैं और जब कुछ करने की बारी आती है तो “विभूति नारायण राय” हो जाते हैं। बाकी अब हम और कुछ नहीं कहेंगे।

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[13 Mar 2010 | One Comment | ]
एफटीवी पर रोक सरकार की रूढ़ीवादी सोच की मिसाल है

आईबीएन में छंटनी

[12 March 2010 | Read Comments | ]

IBN Lokmat front

डेस्‍क ♦ कुछ ही महीने पहले आवाज के ढाई सौ कर्मियों को सड़क का रास्‍ता दिखाने के बाद टीवी 18 ग्रुप ने अब लोकमत के 70 कर्मियों को निकाल दिया है।

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चमेली पुरस्‍कार घोषित

[12 March 2010 | Read Comments | ]

Shoma Chaudhury front

डेस्‍क ♦ 2009 का चमेली देवी जैन पुरस्‍कार तहलका की कार्यकारी संपादक शोमा चौधुरी और नागालैंड पेज की संपादक मोनालिसा को देने का एलान किया गया है।

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डेस्‍क ♦ हम जानते हैं कि फैशन शो पहनावे की चल रही रवायत के हिसाब से नहीं होता। वह भविष्‍य में पहनावे की पटकथा होता है। लिहाजा हम मानते हैं कि फैशन टीवी पर बैन नहीं लगना चाहिए।

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[12 Mar 2010 | 16 Comments | ]
आरक्षण में आरक्षण से राबड़ीवाद दन्‍नाता : वैदिक

वेदप्रताप वैदिक ♦ आरक्षण में आरक्षण के बिना यह आरक्षण अधूरा है, क्योंकि लगभग सभी महिला सीटों पर ऊंची जातियों की महिलाओं का कब्जा हो जाएगा। यह तर्क तथ्यात्मक तो है, पर आरक्षण में यदि आरक्षण दे भी दिया गया होता, तो क्या होता? कठपुतलीवाद बढता, राबड़ीवाद दन्नाता। सर्वथा अयोग्य महिलाओं को पकड़ कर गद्दी पर बैठा दिया जाता। वे क्या खाक कानून बनातीं? वे अपने पार्टी-नेताओं के इशारों पर ही निर्णय लेतीं। यानी, संसद का मजाक बनता। अभी तो प्रयत्न यह होना चाहिए कि सक्षम महिलाओं को ही संसद में भेजा जाए, जो महिला उत्थान के बारे में खुद सोच सकें और जरूरत पडने पर पुरुषों को बराबरी की टक्कर दे सकें।

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[11 Mar 2010 | 4 Comments | ]
बज्‍ज की बालकनी में टंगी गम और खुशी की दो चादर

दिलीप मंडल ♦ अगर कहूंगा कि ये सभी महिलाएं (ऊपर की तस्वीर में दोनों – सुषमा और वृंदा जी और नीचे की तस्वीर में चारों – सुषमा, वृंदा, नजमा और माया जी) किस क्लास या कास्ट से हैं, तो आप कहेंगे कि जातिवाद फैला रहा हूं। इस शहर में कुछ है जो सड़ रहा है! भारत के ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में दुनिया में 134वें नंबर पर होने के कारणों की शिनाख्त करने की कोशिश कर रहा हूं।

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[11 Mar 2010 | 5 Comments | ]
रोड टू संगम : एक अच्‍छी फिल्‍म की अकाल मौत

मधुकर पांडेय ♦ इस फिल्म को सारे देश में मनोरंजन कर से मुक्त कर देना चाहिए था। लेकिन न तो यूपी में ऐसा हुआ और न ही गांधी को अपनी व्यक्तिगत विरासत मानने वाली कांग्रेस ने उसके द्वारा शासित किसी भी राज्य में इसे मनोरंजन कर मुक्ति की सुविधा प्रदान की। बेसिरपैर एवं वाहियात फिल्मों के दौर में इस फिल्म का विषय सोचना तथा इसका बनना एक बहुत बड़ी सुखद घटना है। अफ़सोस है कि लोग विदेशों में अपने को “खान” एवं अमेरिकी राष्ट्रभक्त नागरिक साबित करने वाली फिल्मों पर 80-90 करोड़ खर्च कर देते हैं लेकिन अपने ही देश में इस संवेदनशील फिल्म का वो शायद नाम भी नहीं जानते होंगे।

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[11 Mar 2010 | 2 Comments | ]
पूंजीवादी व्‍यवस्‍था में पूंजीवादी महिलाओं के लिए आरक्षण

संजय कुमार तिवारी ♦ ज्‍यादातर महिलाएं अब भी हाशिये पर हैं। अभिजात घरों में काम करने वाली महिलाओं पर बढ़ते अत्‍याचार की खबरें आये दिन हम पढ़ते-सुनते हैं। इन घरों की महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर सदियों से विकृत विषमता को संचालित करती आयी हैं – और आज ये चाहती हैं कि सत्ता में इनकी जगह सुनिश्चित हो जाए। यही पूंजीवादी महिलाएं समाज में उस जड़ को खाद-पानी देती रही हैं, जिससे विषमतावादी समाज का विकास होता रहा है। इसलिए नीचे तबके की महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए। न कि उनके लिए जो बढ़ती विषमता की जकड़न को मजबूत करती रही हैं और महिला जाति का ही शोषण करती रही हैं।

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[10 Mar 2010 | 13 Comments | ]
बज्‍ज पर महिला आरक्षण के बाजे में कुछ ‘कंकड़’ भी थे

अच्‍छी फिल्‍म, बुरे दर्शक

[11 March 2010 | Read Comments | ]

road-to-sangam-front

मधुकर पांडेय ♦ इस बेहतरीन फिल्‍म के साथ जैसा दुर्व्‍यवहार हो रहा है, वह अफसोसनाक है। मेरे हिसाब से इस फिल्‍म को पूरे देश में करमुक्‍त कर देना चाहिए।

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दून में शब्‍द मेला

[10 March 2010 | Read Comments | ]

Doon Readings front

डेस्‍क ♦ देहरादून में यात्रा, पेंग्विन और दून लाइब्रेरी मिल कर अप्रैल के पहले हफ्ते में एक साहित्‍य मेला लगाने जा रहा है, जिसमें शब्‍दजीवियों का जमघट लगेगा।

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दिलीप मंडल ♦ अगर महिला आरक्षण को सही मायने में विशेष अवसर का सिद्धांत साबित होना है, तो इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि वो अगड़ी महिला हैं, वो दलित महिला हैं और वो अल्पसंख्यक महिला हैं।

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[8 Mar 2010 | 4 Comments | ]
एक कोने में गुमसुम, रजिया सुल्‍तान का मजार

ब्रजेश कुमार झा ♦ चांदनी चौक के नजदीक तुर्कमान गेट से एक पतला रास्ता बुलबुली खान की तरफ जाता है। यही वह इलाका है जहां रजिया सुल्तान यानी इतिहास की पहली महिला सुल्तान को दफनाया गया था। आज इस कब्रगाह की हालत देखेंगे तो महिला दिवस का डंका बजाने वालों की हकीकत समझ में आएगी। देखिए, देश के सबसे बड़े ओहदे पर महिला है। सरकार के भी कान खींच-खींचकर फिलहाल उसे एक महिला ही चला रही है। उस पर से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का रुतबा देख लें। इनके राज में इल्तुतमिश की बेटी और एक जमाने की क्रांतिकारी महिला की कब्र उपेक्षित है। वह एक गौरवशाली इतिहास लिये लेटी है। अपनी कब्र पर एक छत को तरसती हुई।

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[8 Mar 2010 | 2 Comments | ]
“मीडिया महिलाओं के मसले मर्द के चश्‍मे से देखता है”

शीबा असलम फहमी ♦ आधुनिकता क्या केवल वस्त्रों में दिखनी चाहिए, या फिर वह हमारे भीतर विचारों के स्तर पर उतरने का पर्याय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिला दिवस का सौवां साल हमारे लिए महत्त्वपूर्ण होना चाहिए, लेकिन अगर दलित समाज की महिलाएं पच्चीस दिसंबर को अपना महिला दिवस अलग से मनाती हैं, तो क्या हमें उन तक नहीं पहुंचना चाहिए। बहुत आधुनिक हो चुके हमारे मीडिया में खासतौर पर अल्पसंख्यकों के मुद्दे को एक फैशन की तरह लिया जाता है।

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[8 Mar 2010 | 22 Comments | ]
सवर्णों के इस देश में महिला आरक्षण बिल

अजय यादव ♦ सभी को पता है कि मौजूदा महिला आरक्षण लागू हो जाने पर संसद में किस तबके और कौन से और धर्म की महिलाएं ज्यादा चुन कर आएंगी और वे महिला हितों की लड़ाई को कितना आगे ले जाएंगी। मनुवादियों का वर्गीय चरित्र महिलाओं को अपनी पार्टियों का माउथपीस बना देगा और वे भी सोच के मामले में उतनी ही अभिशप्त होंगी, जितनी कि ये पार्टियां हैं। यहां पर मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि इस आरक्षण व्यवस्था में दलित-पिछड़ी-आदिवासी-अल्पसंख्यक महिलाओं की हिस्सेदारी तय होने पर संसद में कोई सुर्खाब के पर लग जाएंगे। बात बस एक बड़े तबके की महिलाओं के वाजिब अधिकारों का गला घोंटने की है और ऐसा भारतीय ‘लोकतंत्र’ में खुलेआम हो रहा है।