Articles in the नज़रिया Category
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मृणाल वल्लरी ♦ क्यों किसी लडकी को अर्चना जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है? कहने को तो कॉलेज, विश्वविद्यालय के परिसर, सभा-गोष्ठियों में छात्र-छात्राएं पिछले दो दशकों से नारीवाद पर गंभीरतापूर्वक विचार करते नजर आएंगे। अपने साथ के पुरुष मित्रों को नारीवादी विषयों पर गंभीरतापूर्वक बातचीत करते देख लड़कियों के दिल में एक उम्मीद की किरण जगती है। उसे लगता है कि इन प्रगतिशील विचारों वाले लड़कों के साथ अपनी अस्मिता अपने विचारों के साथ समझौता नहीं करना पड़ेगा और जीवन सहज रूप से चलेगा। शायद ऐसा ही अर्चना ने भी सोचा होगा लेकिन यथार्थ कुछ और रूप में सामने आया। उसे भी इस तरह की शादी से एक दोयम दर्जे की जिंदगी ही नसीब हुई।
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पंकज झा ♦ खबर यह है कि एक फिल्म में केवल बाबा रामदेव का एक बार जिक्र आ जाने पर निर्माता को सेंसर बोर्ड ने यह आदेश दिया कि वे रामदेव से अनापत्ति प्रमाण पत्र लाएं। यह शर्त पूरी करने के बाद ही फिल्म को सेंसर ने पास किया। उसी खबर से यह भी पता चला कि क़ानूनन यह जरूरी है कि फिल्मों में संबंधित व्यक्ति की अनापत्ति के बाद ही आप किसी जीवित व्यक्ति का नाम ले सकते हैं। तो अगर फिल्म, जो विशुद्ध कथात्मक माध्यम है, वहां बिना अनुमति के किसी का नाम भी लेना निषिद्ध है, वहीं जबरदस्त आपत्ति के बावजूद किसी महिला के फोटो का उपयोग एक तथ्यात्मक माध्यम में करना कहां तक जायज है?
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ईपीडब्ल्यू ♦ उनका लेखन यौन संबंधों या स्त्री यौनिकता पर महिलाओं के परिप्रेक्ष्य को छूता है, तो उन्हें असहजता चुभने लगती है और वे उसे खारिज करने पर तुल जाते हैं। 1980 में, हिंदी साहित्य संसार मृदुला गर्ग के खिलाफ लगाये गये अश्लीलता के आरोपों से हिल गया था, जिनके उपन्यास चितकोबरा में एक नायिका है, जिसके लिए यौन-कार्य बहुत उबाऊ और मशीनी होता है, जिससे वो दूसरे मुद्दों की ओर अपना दिमाग घुमाती है। इस लेखन के लिए मृदुला गर्ग को यहां तक कि गिरफ्तार कर लिया गया था। दूसरी ओर कुछ लेखिकाओं ने चिंता और नाराजगी जतायी है कि कुछ प्रकाशन घरानों ने उन महिलाओं के लेखन को प्रकाशित करने से इनकार किया है, जिन्हें वे व्याख्यायित करते हैं कि वह “पर्याप्त साहसी नहीं” है।
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गिरिराज किराड़ू ♦ यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामले का पटाक्षेप हो गया है। अव्वल तो यही कि माननीय राष्ट्रपति महोदया से लेखकों की मुलाकात और ज्ञानपीठ न्यास की बैठक के नतीजे अभी आने बाकी हैं। और जैसा कि अपने विवादास्पद लेख में विष्णु खरे ने कहा है, यह संघर्ष सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह जाना चाहिए। उनके लेख की इस सबसे सार्थक बात का पाठ यह किया जाना चाहिए कि अगर बर्खास्तगी न हो तो आने वाले दिनों में साहित्य में ऐसी गुटबाजियां, मिलीभगत और गुपचुप कारगुजारियां नहीं चलने दी जाएं। अगर बर्खास्तगी की मांग का ‘वामपंथी’ तरीका कामयाब नहीं होता है तो वर्तमान कुलपति और निदेशक संपादक के बने रहने तक दोनों संस्थाओं से असंबद्धता का ‘गांधीवादी’ तरीका अपनाया जाना चाहिए।
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अजितकुमार ♦ इस नयी लहर की झोंक में पड़ कर किन्हीं लेखिकाओं ने अगर आत्मकथाओं में अपने पराक्रमों की सच्ची-झूठी गाथाएं लिख कर वाहवाही लूटी और इससे व्यथित होकर पुरानी चाल का कोई व्यक्ति इसे ‘छिनरपन’ समझ बैठा… तो उचित था कि उसकी दकियानूसी हंस कर बिसरा दी जाती। जरूरी न था कि तमाम लेखिकाएं – लेखक व्यग्र हो स्त्री की सीता-सावित्री-छवि बरकरार रखने में जुट जाएं। अभियान चलाने से वह छवि लौटने वाली नहीं – अगर वह होगी या रहेगी तो स्त्री-पुरुषों के और पूरे समाज के संयत-मर्यादित आचरण से ही… स्वेच्छाचार की नकारात्मकता के आंतरिक बोध से ही… इसका अभियान तो केवल कुंठित-प्रतिबंधित ही करेगा – सबसे अधिक उस स्वतंत्रचेता नारी समुदाय को ही…
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मनीषा ♦ सिर्फ बाजार को कोसने से काम नहीं चलने वाला, बाजार ने अगर हमको खरीदार बनाया है तो हमारे अपने ही इसको बेचकर मुनाफा भी तो कमा पा रहे हैं। यह क्यों नहीं याद रखा जाना चाहिए कि बड़े-बड़े मॉल्स में कितने अधकचरे शिक्षितों को दिहाड़ी या मासिक रोजगार मिला है। सडक़ के किनारे मामूली सा प्री-पेड कार्ड बेचने वाला अनपढ़ ग्रामीण भी दाल-रोटी भर का कमीशन निकाल ही लेता है। बिग बाजार के जरिये भारी मुनाफा कमाने वाले किशोर बियानी ने 71 शहरों/कस्बों में अपने स्टोर खोले हैं तो 65 ग्रामीण इलाकों में भी वे मौजूद हैं, जहां हजारों-हजारों अर्धशिक्षितों को रोजगार मिला हुआ है। गांव में रहने वाले वे सत्तर फीसदी लोग भी बड़ा बाजार बना रहे हैं।
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विश्वजीत सेन ♦ माओवादियों को संदेश भेजने के अलावा, ममता बनर्जी ने आजाद की मौत को ‘सुनियोजित साजिश’ की संज्ञा दी। ‘ग्रीन हंट’ को वापस लेने की मांग की। क्या यह वही ममता बनर्जी हैं, जो सिद्धार्थ शंकर राय के मुख्यमंत्रित्व काल में युवा कांग्रेस के हत्यारों का नेतृत्व किया करती थीं। वैसे हत्यारे भारत ने न कभी देखा है, न उसे देखना ही चाहिए – बंगाल के कितने घर उजड़ गये, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। उन घरों के बचे खुचे लोग ममता को सुन रहे हैं। खेद है कि उन लोगों के पास कोई मंच नहीं है। वरना, वे ममता को जवाब देते। ममता के साथ दो और लोग मंच पर थे – मेधा पाटकर तथा स्वामी अग्निवेश। आजकल इन लोगों के पास कोई मुद्दा नहीं है।
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विभूति नारायण राय ♦ राज्य अलोकतांत्रिक होता है। ये कल्पना करना कि राज्य इतना उदार होगा कि अपने अस्तित्व को ख़तरे में डाल कर हथियारबंद लोगों को खड़े होने की इजाजत देगा, भोलापन है। मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूं। लेकिन यहां कश्मीर का सवाल उठाया गया है। मुझे नहीं लगता कि आपमें से किसी ने वैसी हिंसा देखी है, जो हिंसा मैंने देखी है। मैं साफ तौर पर कह सकता हूं कि कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच मुकाबला है। और मैं हमेशा राज्य की हिंसा का समर्थन करुंगा। राज्य की हिंसा से हम मुक्त हो सकते हैं। इस्लामिक आतंकवाद से हम मुक्त नहीं हो सकते। वहां पर जो भी लोग उनसे असहमति रखते थे, उन सबको आतंकवादियों ने धीरे-धीरे मार दिया।
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जनहित अभियान ♦ केंद्र सरकार का यह फैसला बेतुका और निरर्थक है कि बायोमैट्रिक कार्ड बनवाने के लिए आने वालों से उनकी जाति पूछ ली जाएगी। यह बेहद भ्रामक प्रस्ताव है। इस तरह आंकड़ा जुटाने से जाति आधारित जनगणना से हासिल होने वाले ज्यादातर लक्ष्य पूरे नहीं हो पाएंगे। जनगणना के फॉर्म में व्यक्ति की सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को समझने वाले कॉलम होते हैं। इन सूचनाओं के बगैर यूनिक आईडेंटी कार्ड बनाते समय एक अलग फॉर्म में जाति पूछ लेने भर से जाति और उनकी आर्थिक सामाजिक तथा शैक्षणिक स्थिति के अंतर्संबंधों को नहीं समझा जा सकता है। इस तरह तो पूरी कवायद सिर्फ जाति की संख्या जानने तक सीमित हो जाएगी।
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कविता ♦ आखिर वे कौन से नीति नियामक सिद्धांत हैं, जो किसी पुरुष के ‘आधा दर्जन प्रेम’ को उसकी पहचान बना देते हैं लेकिन किसी स्त्री के जीवन की कुछ कारुणिक, भावनात्मक और तकलीफदेह सच्चाइयों की साहसिक अभिव्यक्ति, जो उसके संघर्ष का एक हिस्सा है, को गालियों से विभूषित करते हैं? हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा और रामधारी सिंह दिनकर ने भी अपनी डायरी में अपने विवाहेतर संबंधों का जिक्र किया है। स्त्री आत्मकथाओं को विशुद्ध पोर्नोग्राफी बताने वाले ‘भारतों’ और ‘विभूतियों’ से मैं पूछना चाहती हूं कि वे कौन से मानदंड हैं, जिनके आधार पर वे पुरुषों की आत्मकथाओं को पारदर्शिता का उदाहरण और स्त्रियों की आत्मकथाओं को चरित्रहीनता का प्रमाण पत्र मानते हैं?



