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	<title>Mohalla Live</title>
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		<title>नाराजगी दरअसल अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है!</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 20:31:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[मोहल्ला मुंबई]]></category>
		<category><![CDATA[mumbai diary]]></category>
		<category><![CDATA[umesh pant]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>उमेश पंत</strong> ♦ उसके चेहरे पर पहली ही मुलाकात में एक नवयुवती की मदद कर देने के बाद आने वाले गर्व के भाव ताजा-ताजा मुस्कुराने लगे। पत्नी ने भी अपने चेहरे पर एक ताजा मुस्कुराहट बिखेर कर दूरियों के गणित के सारे समीकरण एक पल में बदल दिये। फिर दोनों बच्चों की ओर देख कर उनकी बाल सुलभ हरकतों पर एक साथ मुस्कुराने लगे। बच्चों की हरकतों में अब कोई कोफ्त न बची थी। हवा शायद उतनी गर्म नहीं रह गयी थी। नजरें मिलाने में हो रही असहजता अब सिरे से गायब हो गयी थी। पुढ़े स्टेशन गोरेगांव कहती हुई उस मशीनी आवाज की ओर ध्यान जाते ही वो बच्चों को लेकर अपनी सीट से उठ खड़े हुए। दूरियों को पाटकर नजदीक आया एक परिवार अपनी मंजिल आ जाने की खबर पा चुका था।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 15px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 1px solid; WIDTH: 100px; LINE-HEIGHT: 135%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><span style="font-size: large;">मुंबई डायरी</span><br />
_____________<br />
<strong>उमेश पंत</strong><br />
<span style="color: #ffffff;">____</span><br />
<img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2010/01/Umesh-Pant.jpg" alt="Umesh Pant" title="Umesh Pant" width="100" height="100" class="alignnone size-full wp-image-9085" /></p>
<p>सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल मुंबई में हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।</p></div>
<p><strong>♦ उमेश पंत</strong></p>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">डों</span>गरी टु दुबई का बुक लांच था। बेंड्रा की कार्टर रोड में समुद्री किनारे के पास औलिव नाम का वो बार। और उस बार का एक छोटा सा अहाता, जिसकी फर्श पर नदियों के किनारे पाये जाने वाले, पानी से घिसे मुलायम से कंकड़ बिछाये गये थे। जो दिख अच्छे रहे थे, पर उन पर चलने में एक असहजता महसूस हो रही थी। उस अहाते के बीच में एक पेड़ का कंकाल था, जिससे पत्तियां नदारद थीं। उस सूखे नंगे पेड़ को सलेटी रंग से रंग कर उसकी डालियों में कुछ लालटेनें टांक दी गयी थीं। जैसे उस पेड़ से उसकी आत्मा छीन ली गयी हो और उससे कहा गया हो कि तुम अब भी उतने ही अच्छे दिखो, जितने तब दिखते थे, जब तुम हरे-भरे थे। उस अहाते में कुर्सियां बहुत कम थीं और लोग बहुत ज्यादा। इसलिए जो जल्दी आया, वो उन कुर्सियों पर हक जमाकर बैठ गया। किनारे एक 4-5 फीट ऊंची दीवार थी, जिसके एक कोने पर मैंने अपने लिए जगह बना ली। </p>
<p><strong>कार्यक्रम</strong> शुरू होने ही वाला था। मेरे बगल में एक 60-70 साल के बुजुर्ग आकर खड़े हुए। चश्मे के पीछे से झांकती, इधर-उधर तांकती उनकी आंखें कुछ तलाश रही थीं। तभी पूरे अहाते में जैसे एक हलचल सी हुई। सारे पत्रकार पीछे की दिशा में मुड़े। कैमरों के फ्लैश जगमगाने लगे। बिल्कुल वैसा ही दृश्य आंखों के सामने था, जैसा फिल्मों में दिखता है। जॉन अब्राहम की सभा में एंट्री हो रही थी। एक हीरो मंच की ओर बढ़ रहा था। एक आदमी अब भी खुद को तिरस्कृत महसूस कर रहा था। कार्यक्रम शुरू हो चुका था। स्टेज के संचालक, गीतकार नीलेश मिश्र डोंगरी टु दुबई के लेखक हुसैन जैदी से उनकी किताब के बारे में सवाल कर रहे थे। इस किताब पर आधारित अपकमिंग फिल्म शूटआउट एट वडाला के निर्देशक संजय गुप्ता भी मंच पर नीलेश के सवालों के जवाब दे रहे थे। मेरे बगल में खड़ा वो व्यक्ति बगलें झांकते हुए अब भी कुछ तलाश रहा था। कोई ऐसी अदृश्य चीज जो खो जाती है, तो फिर ढूंढे नहीं मिलती। थोड़ी देर में फिर एक हलचल हुई। फिर कैमरे मुड़े। फिर फ्लैश चमके। इस बार अनिल कपूर पार्श्‍व से आते दिखे। झक सफेद कमीज और छाती तक खुले बटन। अनिल मंच की ओर बढ़ रहे थे कि अचानक उनके कदम रुके। उस बूढ़े चेहरे पर उनकी नजर गयी। मुड़कर एक मुस्कुराहट उन्होंने उससे साझा की। उस आदमी से हाथ मिलाया। अपनी पहली मुलाकात का जि़क्र किया। मेरी दांयीं बांह से सटकर खड़ा वो आदमी मुस्कुराते हुए अनिल कपूर के सवालों के जवाब देता रहा और मेरी आखों के 6 इंच आगे अनिल कपूर का वो तेज भरा चेहरा आदर और सम्मान के भाव के साथ कुछ-कुछ बोलता रहा। अनिल कपूर स्टेज पर लौटे और उस आदमी को पूरे सम्मान के साथ स्टेज पे बुलाया। एक अतिरिक्त कुर्सी स्टेज पर लायी गयी। लोगों को पता चल चुका था कि वो आदमी वक्त के किसी हिस्से में जरूरी रहा होगा। और एक रिटायर्ड सीनियर पुलिस आफीसर के तौर पर शायद इस किताब में उसकी भी अहम भूमिका है। उस आदमी की तलाश शायद पूरी हो चुकी थी। वो अदृश्य चीज उसके सम्मान के रूप में उसे मिल चुकी थी। और मेरे लिए एक रील लाइफ हीरो, एक पुराने रीयल लाइफ हीरो को सम्मान देकर एक नया रीयल लाइफ हीरो बन चुका था। एक नायक जो बाकियों से अलग सम्मान देना भी जानता है।</p>
<p><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Dogri-to-Dubai-Launch.jpg" alt="" title="Dogri to Dubai Launch" width="580" height="388" class="alignnone size-full wp-image-29690" /></p>
<p><strong>मुंबई की ट्रेनें</strong> मुझे छोटे शहर से बड़े शहर आये एक आम भारतीय नागरिक का समाजशास्त्र समझने की किसी गतिशील युक्ति सी लगती हैं। वहां उनके जज्‍बे, उनकी जद्दोजहद, उम्मीदों, हताशाओं और यहां तक कि उनकी मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्थिति तक का एक सतही अध्ययन किया जा सकता है। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच जीवन की कई इकाइयां और उन इकाइयों के कई पहलू निरंतर गतिशील दिखाई देते हैं। वैस्टर्न, सेंट्रल और हार्बर लाइन से दिन रात गुजरती ये ट्रेनें न जाने कितनी भावनाओं के बहाव का एक जरिया बन गयी हैं। जैसे हर दिन इन पटरियों के इर्द गिर्द लाखों जीवनों के अंश एक दूसरे में घुलकर अनंत अदृश्य और अधूरी कहानियों का मिश्रण इन ट्रेनों में जमा कर रहे हों। तय है कि इनसे होकर गुजरे कई सफरनामों को लोग किसी न किसी वजह से याद रखेंगे। कई भावी लेखक, राजनेता, अभिनेत्रियां, बैंकर आंखों में उम्मीदें लिये आम आदमी की शक्ल में अपने अपने पुढ़े स्टेशन तक पहुंचेंगे। और कई बस रोज यूं ही, अपनी पूरी अधूरी यात्राएं करते आम आदमी की तरह शून्य में विलीन हो जाएंगे। जगजीत सिंह की गायी गजल की उन पंक्तियों को सार्थक सी करती&#8230; <em>उम्र जलवों में बसर हो, ये जरूरी तो नहीं। हरे शबे गम की सहर हो, ये जरूरी तो नहीं।</em> </p>
<p><strong>दादर से मलाड</strong> के बीच का वो सफर लगभग बीस मिनटों का था। और इन बीस मिनटों में एक छोटी सी फिल्म सा था वो एक छोटा सा वाकया। सरसराती ट्रेन में माहौल गर्म था और उस सीट पर हालात शायद नाजुक। पार्श्‍व में यात्रियों के मुखारविंदों से फिसल रही मां-बहन की गालियां मौसम में बह रही गर्माहट की पुष्‍टि कर रही थी। भरी हुई ट्रेन में जगह बहुत कम थी, लेकिन ट्रेन की एक पूरी सीट दो छोटे-छोटे बच्चों और उनके जन्मदाताओं के द्वारा घेर ली गयी थी। भौगोलिक रूप से पास बैठे उन दो वयस्कों के हाव-भाव उनके बीच पनप रही दूरियों को बयां कर रहे थे। किसी बात पर झगड़ कर आये थे शायद। दोनों एक दूसरे से मुंह फेर कर बैठे रहने के बीच कभी अपने बच्चों की हरकतों, तो कभी खिड़की के बाहर गुजरते वक्त में बदलती दुनिया को तिरछी निगाहों से निहारे जा रहे थे। ऐसे जैसे उस दुनिया की हर चीज से उन्हें भारी कोफ्त हो रही हो। बीच बीच में एक दूसरे से आंखें चुराकर एक दूसरे को देखते हुए वो ऐसे लग रहे थे, जैसे किसी चुंबक के दोनों ध्रुव अपनी टूटन के उस आखिरी क्षण का इंतजार कर रहे हों, जिसके बाद वो पलक झपकते ही या तो एक दूसरे से चिपक जाएंगे या फिर कभी पास ही नहीं आएंगे। दोनों बच्चों को उनकी बचकानी हरकतों पर बारी-बारी बेवजह डांटते हुए वो दोनों एक दूसरे के प्रति अपनी नाराजगी को शब्द दे रहे थे। तभी दोनों बच्चों में से एक के हाथ से पानी पीते हुए बोतल का ढक्कन सीट के नीचे गिरा। होंठों से गालों पर लुढ़क आयी पानी की बूंदों को पोंछता बच्चा खिड़की की ओर दुबक गया। पत्नी बोतल का ढक्कन उठाने के लिए सीट पर खिसकी और पति और पत्नी के बीच का रिक्त स्थान जाता रहा। पति ने झुक कर ढक्कन उठा लिया और पत्नी को देखकर ऐसे मुस्कुराया, जैसे वो किसी अजनबी लड़की से पहली बार कोई मुस्कुराहट साझा करना चाहता हो। उसके चेहरे पर पहली ही मुलाकात में एक नवयुवती की मदद कर देने के बाद आने वाले गर्व के भाव ताजा-ताजा मुस्कुराने लगे। पत्नी ने भी अपने चेहरे पर एक ताजा मुस्कुराहट बिखेर कर दूरियों के गणित के सारे समीकरण एक पल में बदल दिये। फिर दोनों बच्चों की ओर देख कर उनकी बाल सुलभ हरकतों पर एक साथ मुस्कुराने लगे। बच्चों की हरकतों में अब कोई कोफ्त न बची थी। हवा शायद उतनी गर्म नहीं रह गयी थी। नजरें मिलाने में हो रही असहजता अब सिरे से गायब हो गयी थी। पुढ़े स्टेशन गोरेगांव कहती हुई उस मशीनी आवाज की ओर ध्यान जाते ही वो बच्चों को लेकर अपनी सीट से उठ खड़े हुए। दूरियों को पाटकर नजदीक आया एक परिवार अपनी मंजिल आ जाने की खबर पा चुका था। और मुझे समझ आ रहा था कि नाराजगी कितनी अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है। एक ऐसी अनावश्यक झिल्ली, जिसका होना बस तब तक ही मतलब रखता है, जब तक उसके गैरजरूरी होने का एहसास न हो जाए।</p>
<p><strong>कल ही देर रात</strong> वर्सोवा के किनारे पत्‍थरों पर बैठकर दोस्तों के साथ फिल्मों पर कुछ बातें हो रही थीं। तभी गैंग्स ऑफ वासेपुर का जि़क्र आया। इतने में एक 30-32 साल के आदमी ने बगल में खड़े होकर पूछा&#8230; वासेपुर का ट्रेलर आ गया न? हमने हामी भरी और पूछा, आपने देखा? तो वो बोला मैंने तो पूरी फिल्म देख ली है। उसमें तिग्मांशु की जवानी का रोल मैंने ही तो किया है। फिर परिचय हुआ, तो महसूस हुआ कि रजत भगत नाम के उस शख्स की बातों में एक टीस थी कि वो पूरा रोल उन्हें नहीं मिल पाया। उसके लिए अब भी एक पहचान का संकट है और वो लगातार उस संकट से मुक्त होने के संघर्ष में जुटा है। एक स्ट्रगलिंग एक्टर, जिसे लोग तब जान पाते हैं, जब वो खुद लोगों को बताता है कि वो पहले सात साल दिल्ली से थिएटर करके आया और अब 10 साल से मुंबई में है। और स्टाइल से लेकर भिंडी बाजार तक लगभग सात फिल्मों में काम कर चुका है। ऐसे लोगों को देखकर हमें क्या महसूस होता है ये बिल्कुल गैरजरूरी है, जरूरी ये है कि उन्हें इस संघर्ष का हिस्सा होने में कितना मजा है। रात के अंधेरे में बहुत देर तक अकेले समंदर की लहरों को निहारते रजत भगत जब इस संघर्ष को मजेदार बताते हैं, तो मुझ जैसे नये लोगों का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है।</p>
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		<title>ये जगह किसी साम्राज्यवादी भेड़िये का ‘थूथन’ भर नहीं है!</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 19:39:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[फेसबुक से]]></category>
		<category><![CDATA[Momtaz Begum Hossain]]></category>
		<category><![CDATA[twitter]]></category>
		<category><![CDATA[uday prakash]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>उदय प्रकाश</strong> ♦ गहरी संवेदनाएं, मानवीय सहकारिता और हरसंभव सहायता की अलक्ष्य कोशिशें इस 'वर्चुअल-समाज' में भी हैं। उस समाज से कहीं, (कई बार) अधिक और भावुक कर देने वाला, जिसे हम असली बाहर का 'यथार्थ' वाला समाज कहते हैं, लेकिन जो मीडिया, राजनीति और पूंजी की ताकतों का अनैतिक गंठजोड़ बनकर एक अर्ध-मानव भीड़ या लालची हिंसक झुंड में तब्दील हो रहा है। उसकी चेतना को लुप्त और धो-पोंछ कर 'सफा' कर देने वाली ताकतें बहुत सारी हैं। इसीलिए फेसबुक या ट्विटर या ब्‍लॉग्स किसी 'साम्राज्यवादी भेड़िये का 'थूथन' या 'थोबड़ा' भर नहीं हैं। इस 'आभासी' (वर्चुअल) जगत में किसी संकट में घिरे अकेले निहत्थे मनुष्य की आवाजें भी सुनी जा सकती हैं। मुमताज बेगम का यह वाकया शायद यही कहता है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #808080;">संस्‍तुति</span> ♦ उदय प्रकाश</strong></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">ग</span>हरी संवेदनाएं, मानवीय सहकारिता और हरसंभव सहायता की अलक्ष्य कोशिशें इस &#8216;वर्चुअल-समाज&#8217; में भी हैं। उस समाज से कहीं, (कई बार) अधिक और भावुक कर देने वाला, जिसे हम असली बाहर का &#8216;यथार्थ&#8217; वाला समाज कहते हैं, लेकिन जो मीडिया, राजनीति और पूंजी की ताकतों का अनैतिक गंठजोड़ बनकर एक अर्ध-मानव भीड़ या लालची हिंसक झुंड में तब्दील हो रहा है। उसकी चेतना को लुप्त और धो-पोंछ कर &#8216;सफा&#8217; कर देने वाली ताकतें बहुत सारी हैं। इसीलिए फेसबुक या ट्विटर या ब्‍लॉग्स किसी &#8216;साम्राज्यवादी भेड़िये&#8217; का &#8216;थूथन&#8217; या &#8216;थोबड़ा&#8217; भर नहीं हैं। इस &#8216;आभासी&#8217; (वर्चुअल) जगत में किसी संकट में घिरे अकेले निहत्थे मनुष्य की आवाजें भी सुनी जा सकती हैं। मुमताज बेगम का यह वाकया शायद यही कहता है। वे लोग, जिसमें बड़े सरकारी अफसर, भ्रष्ट राजनीतिक नेता, जातिव्यवस्था के ऊंचे पायदानों या शिखर पर बैठे लोग जब ऐसे &#8216;सोशल-नेटवर्किंग&#8217; को सेंसर या समाप्त (प्रतिबंधित) करना चाहते हैं, तो शायद उन्हें &#8216;इजिप्ट&#8217; और &#8216;आक्युपाई वॉल स्ट्रीट&#8217; का डर सताता है। संकट में घेर दिये गये अकेले आदमी की आवाज यहां किसी भी &#8216;मास-मीडिया&#8217; से ज्यादा साफ सुनाई देती है।</p>
<p>एक गाना है, पुराना, शायद &#8216;जागृति&#8217; फिल्म का &#8216;साथी हाथ बढ़ाना&#8230; एक अकेला थक &#8230;&#8217; अगर किसी दोस्त के पास हो तो, उसे आज मिल कर सुनते हैं। लेकिन पहले मुमताज बेगम के साथ हुई इस घटना को जरूर पढ़ें &#8230;</p></div>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span><br />
<span style="font-size: large;">How the kindness of (virtual) strangers on Twitter saved my day</span></p>
<p><span style="color: #808080;"><strong>After Twitter followers helped me remove a BNP banner from my street on election day, it&#8217;s my first port of call from now on</strong></span></p>
<p><strong>♦ Momtaz Begum-Hossain</strong></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 400px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><img src="http://static.guim.co.uk/sys-images/Guardian/Pix/pictures/2011/3/16/1300303545967/Checking-Twitter-007.jpg" width="400" height="240" alt="Checking Twitter"  /><br />
<strong>&#8216;I&#8217;m sure there are an infinite number of people online each day, helping and assisting others.&#8217; Photograph: Sarah Lee for the Guardian</strong></div>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">I</span>&#8216;ve made a decision. From now on, if I need help, I&#8217;m heading straight to <a href="https://twitter.com/#!/thecraftcafe" title="">Twitter</a>. I&#8217;ve tweeted pleas before. I once posted that I needed a job and the same afternoon got commissioned to write an article. But a few weeks ago, I discovered the true benefits of the virtual world.</p>
<p>It was <a href="http://www.guardian.co.uk/politics/2012/may/03/london-mayor-and-local-elections-2012-live-polling-day-coverage" title="">election day</a> and on my way back from a lunchtime trip to the launderette I discovered a huge <a href="http://www.guardian.co.uk/politics/bnp" title="">BNP</a> banner had been tied to the lamp post outside my flat. My immediate reaction was to pull it down. The trouble was, I&#8217;m short and it was higher than my tallest chair could reach. <a href="https://twitter.com/#!/TheCraftCafe/statuses/198037451955126272" title="">So I sent out a tweet</a>. Could anyone help me tear down this monstrosity?</p>
<p>Within seconds my timeline was inundated with suggestions: from calling the council, hosing it down with water, to setting it alight. Minutes later, over 50 people had retweeted my predicament, but as I watched their avatars appear on my screen, I felt guilty that I wasn&#8217;t physically doing anything to get it down. I inspected the situation again. It was a definite scissors and ladder job. I had the snippers; but who had the steps?</p>
<p>I pondered the idea of knocking door-to-door until I found a ladder-owning resident, but it&#8217;s a busy main road where people are closely guarded and don&#8217;t stop and chat. Then I spotted my immediate neighbour who&#8217;s exceptionally tall. When I told him about the banner and the fact I needed help, he laughed and went indoors.</p>
<p>Which led me back to my computer. Over the next two hours I was immersed in a Twitterthon, tracking and responding to tweets. As word spread, the calibre of people interested in my plight increased. As well as discovering it had been posted on <a href="https://www.facebook.com/" title="">Facebook</a> walls, I was contacted by a local councillor and a member of another political party, who advised that I should deal with the issue legally. I tried, but my council&#8217;s environmental crime unit had me on hold for so long that I ran out of phone credit. The traditional methods were clearly not going to work.</p>
<p>Finally I got it. The tweet that saved the day. A message from a stranger to say assistance was on the way. Sure enough, two gentlemen promptly arrived with a ladder in tow. I tweeted a photo of them, and have since found out who they were, marking a satisfactory end to my tale.</p>
<p>It may sound like a small-scale success, but it&#8217;s evidence of a growing consciousness in virtual kindness – helping people we don&#8217;t know. After <a href="http://www.guardian.co.uk/sport/2012/apr/28/claire-squires-death-kindness?INTCMP=ILCNETTXT3487" title="">Claire Squires collapsed and died</a> while running the London Marathon last month her <a href="http://www.justgiving.com/Claire-Squires2" title="">Just Giving sponsorship page</a> rose from £500 to nearly £1m – donated by over 79,000 donators who never knew her, but felt touched by her story. In the US, <a href="http://hopemob.org/" title="">HopeMob</a> exists with the sole purpose of building a community of generous strangers who donate to causes that help everyday people, like paying for their hospital bills. The organisation has over 285,000 Twitter followers who can vote to boost the chances of individual stories, helping them get coverage on the website until their financial target it met. It&#8217;s a ground-level form of philanthropy where all the money goes directly to the cause, so donors know exactly where their cash is going. Similarly, it&#8217;s common practice in the UK to hear of small businesses and bands asking for crowd funding where supporters and fans can contribute to help someone buy equipment, or release an album.</p>
<p>Virtual kindness can&#8217;t be measured but I&#8217;m sure there are an infinite number of people online each day, anonymously helping and assisting others. They may not get recognition, but the positive consequences of their actions really do make a difference. Of course there&#8217;s also the unfriendly virtual types. The ones who have left nasty comments on my blog and the fascists who felt obliged to tweet me and tell me to leave the country, but that&#8217;s another story …</p>
<p><em>• This story was commissioned after a number of suggestions from Twitter users. Contact us on <a href="http://twitter.com/commentisfree" title="">@commentisfree</a> or visit our <a href="http://twitter.com/commentisfree" title="">You tell us</a> page if there&#8217;s a subject you&#8217;d like to see covered on Comment is free</em></p>
<p style="text-align: right;"><strong>Writers Link <a href="http://www.guardian.co.uk/profile/momtaz-begum-hossain" target="_blank">http://www.guardian.co.uk/profile/momtaz-begum-hossain</a></strong></p>
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		<title>उम्र का नहीं, बर्ताव का आदर करें! #SatyamevJayate</title>
		<link>http://mohallalive.com/2012/05/15/jai-kaushal-on-satyamev-jayate-second-episode/</link>
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		<pubDate>Tue, 15 May 2012 06:51:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख]]></category>
		<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[amir khan]]></category>
		<category><![CDATA[Child Sexual Abuse]]></category>
		<category><![CDATA[Jai Kaushal]]></category>
		<category><![CDATA[Satyamev Jayate]]></category>

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		<description><![CDATA[<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 2px solid; WIDTH: 365px; LINE-HEIGHT: 150%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><a href="http://mohallalive.com/2012/05/17/mumbai-diary-by-umesh-pant-10/"><span style="font-size: large;"><span style="color: #808080;">नाराजगी एक अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है!</span></span></a>
<div class="meta">[17 May 2012 &#124; <a href="http://mohallalive.com/2012/05/17/mumbai-diary-by-umesh-pant-10/" title="Comment on नाराजगी दरअसल अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है!">Read Comments</a> &#124; ]</div>

<a href="http://mohallalive.com/2012/05/17/mumbai-diary-by-umesh-pant-10/" title="नाराजगी दरअसल अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है!" target="_blank"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Dogri-to-Dubai-Launch-365x114.jpg" alt="" title="Dogri to Dubai Launch 365x114" width="365" height="114" class="alignnone size-full wp-image-29695" /></a>

<strong>उमेश पंत</strong> ♦ कल देर रात वर्सोवा के किनारे पत्‍थरों पर बैठकर दोस्तों के साथ बातें हो रही थीं। तभी गैंग्स ऑफ वासेपुर का जि़क्र आया। इतने में एक 30-32 साल के आदमी ने बगल में खड़े होकर पूछा… वासेपुर का ट्रेलर आ गया न?

<a href="http://mohallalive.com/2012/05/17/mumbai-diary-by-umesh-pant-10/">Read the full story »</a></div><div style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 0px solid; FONT-WEIGHT: normal; FONT-SIZE: 10pt; FLOAT: left; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 10px; WIDTH: 160px; LINE-HEIGHT: 125%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 2px solid; TEXT-ALIGN: left"><strong>जय कौशल</strong> ♦ अगर संदेह करना आधुनिकता का जरूरी लक्षण है, तो अब हमें रिश्तों के स्तर पर आधुनिक होने की सख्त जरूरत आन पड़ी है। खासकर जब हम खुद को एक जिम्मेदार अभिभावक मानते हों।</div>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ जय कौशल</strong></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 2px solid">
<p><iframe width="540" height="304" src="http://www.youtube.com/embed/JqW4BzuzQpw" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
</div>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span><br />
<span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">अ</span>गर संदेह करना आधुनिकता का जरूरी लक्षण है, तो अब हमें रिश्तों के स्तर पर आधुनिक होने की सख्त जरूरत आन पड़ी है। खासकर जब हम खुद को एक जिम्मेदार मां-बाप, परिजन अथवा अभिभावक मानते हों। 13 मई, 2012, रविवार को ‘बाल यौन शोषण’ पर आधारित ‘सत्यमेव जयते’ के दूसरे एपिसोड से यही स्पष्ट होता है। इस शो में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, नयी दिल्ली द्वारा 2007 में जारी रिपोर्ट के आंकड़ों का उपयोग भी किया गया, जिससे पता चलता है कि पूरी दुनिया के 19% बच्चे सिर्फ भारत में रहते हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार हमारे देश में कुल जनसंख्या का 42% हिस्सा अठारह वर्ष से कम उम्र का है, यानी प्रत्येक दस में से चार। भयावह तथ्य यह है कि देश में 53% बच्चे किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न का शिकार रहे हैं, अर्थात अठारह वर्ष की उम्र तक हर दूसरा बच्चा शारीरिक और मानसिक स्तर पर शोषण से गुजर चुका है। सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि लड़के और लड़कियां, दोनों इसमें बराबर के शिकार हुए हैं। जबकि आम धारणा में लड़कों को यौन शोषण से परे माना जाता है।</p>
<p><strong>आलेख के शुरू में</strong> नजदीकी रिश्तों पर संदेह जताने का आधार भी शो में इस मुद्दे पर हुए विश्लेषण के साथ मंत्रालय की उक्त रिपोर्ट भी है, जिसमें साफ बताया गया है कि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों मे अपराधी कोई न कोई जानकार अथवा रिश्तेदार होता है, जिसे आमतौर पर मां-बाप शक की निगाह से नहीं देखते और बच्चा आसानी से शिकार बन जाता है। यही कारण है कि ऐसे ज्यादातर मामले या तो संज्ञान में ही नहीं आते और अगर कोई बच्चा बताने की हिम्मत भी जुटाता है तो माता-पिता उस पर विश्वास नहीं करते और कर भी लें, तो उन्हें उजागर नहीं करते, पुलिस तक नहीं ले जाते। चूंकि अपराध करने वाला घर-परिवार का उम्रदराज और ‘इज्जतदार’ सदस्य होता है अथवा कोई नजदीकी जानने वाला, इसलिए अभिभावक प्राय: उससे सीधे कुछ नहीं कहते। समाज में अपनी तथाकथित ‘इज्जत’ की अवधारणा के चलते घर में ही दबा लेते हैं। यदि कोई परिजन इस मामले को आगे बढ़ाने की पहल भी करता है, तो अस्पताल से लेकर पुलिस, प्रशासन और कोर्ट तक का रवैया पीड़ित के प्रति सहयोगी का उतना नहीं, जितना पीड़क का बनता जाता है। ऐसे में पीड़ित परिवार चुप्पी लगाना अधिक ठीक समझता है।</p>
<p><strong>देश में बाल यौन अपराधों पर</strong> आज तक एक भी मजबूत कानून का न होना यह सिद्ध करता है कि हमने इस मुद्दे को महत्व कितना-सा दिया है? ऐसे अपराध अंतत: हमारे समाज में एक-दूसरे पर ‘भरोसे’ को लगातार कम कर रहे हैं। हमारे बीच ‘विश्वास’ या ‘भरोसा’ जैसे शब्दों का दायरा निरन्तर संकुचित होता जा रहा है। इसलिए ठीक ही कहा गया है कि हमें बड़ी उम्र का नहीं अच्छे व्यवहार का सम्मान करना चाहिए। हमारे पारंपरिक आदर्शवादी मन को यह सुनने और स्वीकारने में अटपटा लग सकता है, पर समय आ गया है कि हम अपने बच्चों को ‘अपने से बड़ी उम्र के हर व्यक्ति का आदर करना चाहिए’ नामक संस्कार देना छोड़ ही दें, बल्कि आपसी रिश्तों में भी विवेक के इस्तेमाल की सलाह दें।</p>
<p><strong>दूसरे, हमारी मानसिकता भी</strong> ऐसी हो चली है कि जब हमें किसी ऐसे व्यक्ति का पता चलता है, जो यौन उत्पीड़न का शिकार हुआ है, तब अव्वल तो हम उसे एकदम बेचारा मानने लगते हैं, उसका भाग्य कोसने लगते हैं, या फिर सारा आरोप उसी पर मढ़ देते हैं। बच्चों सहित लड़कियों पर यह सितम ज्यादा देखने में आता है। यों भी, बच्चों के शोषण से शुरू हुआ यह मुद्दा केवल उन्हीं तक नहीं रुक जाता। स्त्रियों तक भी चला आता है, क्योंकि आमतौर पर बच्चे और स्त्रियां अपराध के लिए सबसे आसान शिकार होते हैं और अपराधी प्राय: मनोरोगी पुरुष। चाहे ‘पीडोफीलिक’ मानसिकता के अपराधी हों अथवा किसी परिवार या समुदाय से कोई रंजिश चुकाने के आकांक्षी, शिकार मासूम बच्चे और महिलाएं ही बनाये जाते हैं। आपसी झगड़े तक में अक्‍सर मां-बहन से संबंधित गालियां देना इसी बात को पुष्ट करता है। भारत में उम्रदराज पुरुषों द्वारा बच्चों और स्त्रियों पर यौन-दुराचार के जितने मामले पाये जाते है, यौन मनोरोगी औरतों द्वारा बच्चों पर उत्पीड़न के मामले लगभग नहीं मिलते। यद्यपि, आजकल पश्चिम में इसे देखा जा रहा है।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 1px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 2px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 15px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 1px solid; WIDTH: 350px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 2px solid"><em><strong>एक हैं आशीष कुमार अंशु</strong>, जिन्‍होंने अपनी फेसबुक वॉल पर जिंदगी लाइव में आये हरीश अय्यर के संदर्भ को सामने रख कर सत्‍यमेव जयते जैसे शो की मंशा पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि हरीश अय्यर दोनों जगह अलग अलग बयान दे रहे हैं। एक में बाल यौन शोषण का खुद को शिकार बता रहे हैं और दूसरे में खुद को गे बता रहे हैं। उनकी बात यहां हूबहू पढ़ें, <a href="https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10151752097290157" target="_blank"><strong>आशीष कुमार अंशु फेसबुक लिंक</strong></a>। दोनों ही अलग बातें हैं। बाल यौन हिंसा का शिकार कोई भी आदमी अपनी आगे की सेक्‍सुअल लाइफ को लेकर व्‍यक्तिगत फैसले लेने के लिए स्‍वतंत्र है। लेकिन यहां दोनों बातों को सामने रखने के पीछे की मंशा किसी मुद्दे और शो को डिस्‍क्रेडिट करने की है। गनीमत है कि आशीष कुमार अंशु गलतबयानी कर रहे हैं, क्‍योंकि जिंदगी लाइव और सत्‍यमेव जयते, दोनों ही शो में वे बाल यौन शोषण के एक पीड़ित के रूप में मौजूद हैं। ऐसे पीड़ित समाज के सामने अपना दुख लेकर बहुत कम आ पाते हैं, इसलिए दोनों ही जगहों पर आने की वजह से हरीश अय्यर को जूनियर आर्टिस्‍ट कह कर माखौल उड़ाने वाले के मानसिक दिवालियेपन को समझा जा सकता है। यहां पेश है जिंदगी लाइव पर हरीश अय्यर का वीडियो&#8230;</em></p>
<p><iframe width="350" height="267" src="http://www.youtube.com/embed/GuSKa4IaxQA" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></div>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">र</span>विवार के शो में आपबीती सुनाने आये हरीश के बारे में कुछ विद्वान ‘खुलासा’ कर रहे हैं कि ‘ये वही हरीश अय्यर हैं, जिन्हें विगत 29 अप्रैल को आईबीएन सेवन पर प्रसारित ‘जिंदगी लाइव’ में देखा गया था और जहां वो गर्व के साथ कह रहे थे, मैं ‘गे’ हूं।’ ‘इनकी मां को भी इस बात का गर्व था कि ये समलैंगिक हैं।’ समझ में नहीं आता ऐसा कहकर आलोचक-गण क्या सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं! क्या ये, कि वास्तव में हरीश ‘गे’ है और बाल यौन शोषण का शिकार बताकर अपने ‘अपराध’ की सामजिक स्वीकृति एवं सहानुभूति ‘जस्टिफाई’ करना चाहता है! उसकी मां भी उसके ‘गे’ होने को बढ़ावा दे रही हैं। जाने क्यों, ऐसे ‘चिंतक’ हरीश की समस्या को ‘जेनुइन’ नहीं मानना चाहते हैं! न ही उसकी आज की स्थिति को (अगर वह ‘गे’ है भी) उसके बचपन के शोषण से जोड़कर देखना चाह रहे हैं? संभव है, किसी व्यक्ति के समलैंगिक होने के पीछे उसके शारीरिक, मानसिक अथवा अन्य कारण जिम्मेदार होते हों, पर इस मामले को आरोप के घेरे में लाने से पूर्व जरा सोच लेना जरूरी है।</p>
<p><strong>सच यह है कि</strong> शो में आये हरीश अय्यर सहित गणेश और सिंड्रैला, तीनों को देखकर बार-बार लग रहा था, मानो शारीरिक स्तर पर उन स्थितियों को पीछे छोड़ आने के बावजूद मानसिक स्तर पर वे आज भी अपने से लगातार जूझ रहे हैं। जैसे वे सब उम्र में तो बड़े हो गये हैं, पर मन से अभी भी उतने ही कच्चे और असहाय हैं। बचपन में तन पर मिले घाव तो शायद समय के साथ भर गये, किंतु मन के घाव आज भी न केवल हरे हैं, बल्कि बीच-बीच में रिसने तक लगते हैं।</p>
<p><strong>ऐसे बच्चों का</strong> न तो स्वस्थ मानसिक विकास हो पाता है, न ही उनमें आगामी जीवन के यथार्थ से लोहा लेने का आत्मविश्वास बन पाता है। शोचनीय है कि जब देश का प्रत्येक दूसरा बच्चा ऐसे अपराधों का शिकार हो रहा है और परिस्थितियों एवं कानून के बेहद ढीले रवैये के चलते ‘डिप्रेशन’ में जा रहा है, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि हम कैसा पंगु और मनोरोगी समाज बनने दे रहे हैं? हम सबकी गंभीर जिम्मेदारी है कि अपने समाज में और हरीश, गणेश तथा सिंड्रैला न बनने दें। अपने बच्चों को सुनें, उन्हें समझें, पर्याप्त समय दें और संभावित खतरों के प्रति सावधान करें। साथ ही, उनके दैनिक कार्य-व्यवहार का संज्ञान रखें। इस एपिसोड ने बच्चों को ‘सेक्स-एजुकेशन’ देने पर पिछले दिनों उठी बहस को पुन: एक सार्थक मोड़ दिया है कि ‘यौन शिक्षा’ हमारे बच्चों से लेकर परिवार, समाज और अंतत: देश को स्वस्थ और अपराध-मुक्त रखने के लिए कितनी जरूरी है। शो के अंत में आयोजित ‘वर्कशॉप’ के माध्यम से आमिर ने इस जरूरी शिक्षा का पहला पाठ बच्चों सहित हम सबको पढ़ा भी दिया है।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><strong>जुड़ी हुई पोस्‍ट ♦ <a href="http://mohallalive.com/2012/05/14/amir-khan-on-child-sexual-abuse/" target="_blank">बच्‍चों की सुनें, उनका विश्‍वास करें, उन्‍हें यातना से निकालें</a> #AmirKhan</strong></div>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span></p>
<p style="text-align: right;"><em><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Jai-Kaushal.jpg" alt="" title="Jai Kaushal" width="80" height="80" class="alignleft size-full wp-image-29519" />(<strong>जय कौशल</strong>। हिंदी के प्राध्‍यापक। त्रिपुरा युनिवर्सिटी के हिंदी डिपार्टमेंट में हिंदी के असिस्‍टेंट प्रोफेसर। जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से उच्‍च शिक्षा। उनसे jaikaushal81@gmail.com पर संपर्क करें।)</em></p>
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		</item>
		<item>
		<title>सुख शिक्षक और सम्राटों के भाग्य में नहीं होता!</title>
		<link>http://mohallalive.com/2012/05/14/10th-episode-of-upanishad-ganga/</link>
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		<pubDate>Mon, 14 May 2012 06:03:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[avinash]]></category>
		<category><![CDATA[chanakya]]></category>
		<category><![CDATA[Chandragupta]]></category>
		<category><![CDATA[Upanishad Ganga]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>अविनाश</strong> ♦ भारतीय ज्ञान परंपरा के इतिहास में चाणक्‍य एक ऐसे किरदार रहे हैं, जिनके शब्‍द जितने आ‍कर्षित करते हैं, उनकी जीवनचर्या भी उतना ही अचंभित करती है। एक मामूली हैसियत वाला आदमी मगध का तख्‍तापलट कैसे करता है और कैसे एक साम्राज्‍य को न्‍यायप्रिय छवि देने के लिए काल से होड़ लेता है। उपनिषद गंगा की दसवीं कड़ी में चाणक्‍य की कहानी है। नौवीं कड़ी में सत्‍य हरिश्‍चंद्र की कहानी के जरिये धर्म की महत्ता बतायी गयी थी। जाहिर है, यहां धर्म का मतलब हिंदू धर्म से नहीं है बल्कि उस धर्म से है, जिसकी जमीन पर आप जो बोलते हैं, उस पर खरे उतरते हैं या नहीं। ठीक उसी तरह चाणक्‍य की कहानी के जरिये उपनिषद गंगा में अर्थ का भावार्थ समझाया गया है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ अविनाश</strong></p>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">भा</span>रतीय ज्ञान परंपरा के इतिहास में चाणक्‍य एक ऐसे किरदार रहे हैं, जिनके शब्‍द जितने आ‍कर्षित करते हैं, उनकी जीवनचर्या भी उतना ही अचंभित करती है। एक मामूली हैसियत वाला आदमी मगध का तख्‍तापलट कैसे करता है और कैसे एक साम्राज्‍य को न्‍यायप्रिय छवि देने के लिए काल से होड़ लेता है। उपनिषद गंगा की दसवीं कड़ी में चाणक्‍य की कहानी है। नौवीं कड़ी में सत्‍य हरिश्‍चंद्र की कहानी के जरिये धर्म की महत्ता बतायी गयी थी। जाहिर है, यहां धर्म का मतलब हिंदू धर्म से नहीं है बल्कि उस धर्म से है, जिसकी जमीन पर आप जो बोलते हैं, उस पर खरे उतरते हैं या नहीं। ठीक उसी तरह चाणक्‍य की कहानी के जरिये उपनिषद गंगा में अर्थ का भावार्थ समझाया गया है।</p>
<p><strong>एक बड़ा</strong> दिलचस्‍प दृश्‍य है। मगध का एक बड़ा व्‍यापारी श्रेष्ठि सुदत्त अपनी सार्वजनिक हो गयी बेईमानी के संदर्भ में राहत पाने के लिए आचार्य विष्‍णुगुप्‍त (चाणक्‍य) से मिलने देर रात को आते हैं। आचार्य के सामने एक प्रस्‍ताव रखते हैं। आचार्य उनसे पूछते हैं कि प्रस्‍ताव व्‍यक्तिगत हित में है या सार्वजनिक हित में। सुदत्त का जवाब है कि स्‍वार्थ तो निजी ही होता है आचार्य। इस पर आचार्य विष्‍णुगुप्‍त पास में जल रहे दीये को फूंक मार कर बुझाते हुए कहते हैं कि तुम्‍हारे निजी स्‍वार्थ के लिए प्रजा की ओर से दिये जाने वाले तेल को मैं व्‍यर्थ में नहीं जला सकता।</p>
<p><strong>यह एक तरह का</strong> राजधर्म है, जो सरकार को जनता की ओर से मिलने वाले कर के उपयोग की सीमाएं बताता है। आज इन बातों का कोई महत्‍व नहीं रह गया है क्‍योंकि जन-धन पर अय्याशी करने वाले आज उंगलियों पर गिनने लायक नहीं रहे, वे बेशुमार हो गये हैं। तीसरी दुनिया के देशों की जो हालत है, उसके पीछे यही बेशुमार धनलोलुप नेताओं की कतार है, जिनका काला धन दूसरे अपने देश की कीमत पर दूसरे देशों की आर्थिक सेहत सुधारने में लगा है।</p>
<p><strong>राज्‍य को लेकर</strong> चाणक्‍य की कल्‍पना और उसे साकार करने के लिए उनके बनाये अनुशासन से अपने राज्‍याभिषेक की प्रतीक्षा कर रहे चंद्रगुप्‍त बौखला जाते हैं। आचार्य को अपने पास बुला कर उनके सामने फट पड़ते हैं, &#8216;ऐसे साम्राज्‍य का सम्राट होने का क्‍या लाभ, जहां मैं हर दिन कठपुतली की तरह नचाया जाऊं? अपनी इच्छा से उठ नहीं सकता, अपनी इच्छा से बैठ नहीं सकता। अपनी इच्छा से प्रेम नहीं कर सकता। अपनी इच्छा से विवाह नहीं कर सकता। मेरा विवाह भी आचार्य के लिए राजनीति है। जब से यहां आया हूं एक कमरे में नहीं सो सका हूं। कौन हूं मैं? सम्राट&#8230; या आचार्य विष्णुगप्त के इशारों पर नाचनेवाला एक दास। नहीं बनना मुझे सम्राट, नहीं चाहिए मुझे साम्राज्य। नहीं होगा ये राज्याभिषेक।&#8217;</p>
<p><strong>चंद्रगुप्‍त की</strong> घुटन भरी चीख अपने कथन का विस्‍तार करती है, &#8216;जब से यहां आया हूं, अपनी इच्छा से सांस तक नहीं ले सका हूं। आपने मुझे एक महान स्वप्न दिया था। चक्रवर्ती सम्राट का स्‍वप्‍न। एक महान साम्राज्य का स्वप्न। पर यहां आकर पता चला कि आचार्य विष्णुगप्त के लिए एक सम्राट वेतन लेने वाले नौकर से बढ़कर कुछ नहीं।&#8217;</p>
<p><strong>युवा चंद्रगुप्‍त</strong> के इस आक्रोश का जवाब चाणक्‍य ने भी अपने तीखे लहजे में दिया। मैं यहां दोनों के बीच हुए संवाद को रख रहा हूं&#8230;</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/UP-Chanakya-Chandragupta.jpg" alt="" title="UP Chanakya Chandragupta" width="540" height="360" class="alignnone size-full wp-image-29646" /></p>
<p><em><strong>आचार्य</strong> : ठीक ही समझा तुम ने चंद्रगुप्त। मेरे लिए सम्राट, समाज के नौकर से बढ़कर कुछ नहीं।<br />
<strong>चंद्रगुप्त</strong> : तो रखें अपना साम्राज्य। नहीं बनना मुझे सम्राट यदि यही सुख है सम्राट होने का।<br />
<strong>आचार्य</strong> : चंद्रगुप्त तुझे सुखी होना है?<br />
<strong>चंद्रगुप्त</strong> : क्या सम्राटों को सुखी नहीं होना चाहिए?<br />
<strong>आचार्य</strong> : मूर्ख, जब एक व्यक्ति भी तेरे साम्राज्य में भूखा है तो क्या तू सुखी हो पाएगा? सुख, शिक्षक और सम्राटों के भाग्य में नहीं होता। भूल गया तू, चंद्रगुप्त मैंने तूझे साम्राज्य देने का वचन दिया था, सुख देने का नहीं। राजा होना सुखी होने का मार्ग नहीं है। भूल गया तू कि, प्रजा के हित में राजा का हित है। भूल गया तू कि प्रजा के सुख में राजा का सुख है। सुख चाहता है तो पहले अपनी प्रजा को सुखी बना। तू ने साम्राज्य अर्जित किया है, सुख अर्जित करने का भी तेरे पास मार्ग खुला है।</em></div>
<p><strong>यह पूरा का पूरा</strong> संवाद आज के राजनीतिज्ञों को पढ़ना-सुनना और उससे सीखना चाहिए। जरूरी बिलों पर गैरजरूरी बहसों में उलझने और अपने सुख से जुड़े बिल पर एकमत होने वाली संसद के इस दौर में चाणक्‍य नीति का पाठ और उस पर अमल एक जरूरी काम होना चाहिए। चंद्रगुप्‍त ने इसी नीति पर चल कर मगध के साम्राज्‍य का विस्‍तार किया था।
<p style="text-align: right;"><em><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2011/10/Avinash-Image.jpg" alt="" title="Avinash Image" width="80" height="80" class="alignleft size-full wp-image-27128" />(<strong>अविनाश</strong>। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्‍था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)</em></p>
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		<title>तब भी तरक्‍कीपसंद कॉमरेड तुम्‍हारे खिलाफ थे, आज भी हैं!</title>
		<link>http://mohallalive.com/2012/05/14/a-letter-to-manto-by-prakash-k-ray/</link>
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		<pubDate>Mon, 14 May 2012 04:12:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[असहमति]]></category>
		<category><![CDATA[शब्‍द संगत]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍मृति]]></category>
		<category><![CDATA[Prakash K Rai]]></category>
		<category><![CDATA[Prakash K Ray]]></category>
		<category><![CDATA[Saadat Hasan Manto]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>प्रकाश के रे</strong> ♦ तुम्हें तो याद ही होगा कि किस तरह तुम्हारे खिलाफ 'तरक्कीपसंद' कॉमरेडों ने खेल रचा था। सज्जाद जहीर, अली सरदार जाफरी, अब्दुल अलीम आदि ने तुम्हारे और इस्मत आपा के खिलाफ 'अश्लील' होने का आरोप मढ़ा था और प्रोग्रेसिव राइटर्स की बैठक में इस बाबत प्रस्ताव पास कराने की कोशिश की थी। वे तो ऐसा नहीं कर पाये, लेकिन संसद में बैठे कॉमरेडों ने यह काम बखूबी अंजाम दिया और मरहूम शंकर के उस कार्टून के खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत से फतवा पारित करवा लिया। मंटो, तब से अब तक हिंदुस्तान के अफसाने में सिर्फ किरदार बदले हैं, कहानी का प्लॉट वही है।
<span style="color: #ffffff;">...</span>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2>प्रकाश के रे का खत सआदत हसन मंटो के नाम</h2>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span><br />
<strong>महबूब मंटो</strong>,<br />
सलाम,</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">मे</span>री तरफ से सौवें जन्मदिन की मुबारकबाद कबूल करो। हां, थोड़ी देर हो गयी। बात यह है मंटो, असल में मैं तुम्हें कोई मुबारकबाद भेजने वाला नहीं था। शायद मिट्टी के नीचे दबे तुम अब भी खुदा से बड़ा अफसानानिगार होने के अपने दावे या खुशफहमी से जिरह कर रहे होगे। ऐसे में तुम मेरा खत क्या पढ़ते! लेकिन बात कुछ ऐसी हुई कि बिना लिखे रहा न गया। बात पर आने से पहले यह साफ कर दूं कि मैं तुम्हें &#8216;तुम&#8217; कहकर क्यों लिख रहा हूं। क्या पता तुम्हारे नाम पर दुकान चलाने वाले इसी बात पर मेरे खिलाफ कोई फतवा जारी कर दें। इसका सीधा कारण यह है कि तुम &#8216;अकेला&#8217; रहते और अपने लिए &#8216;सही जगह&#8217; खोजते थक कर जिस दोपहर सो गये, तब तुम्हारी उम्र मुझसे बहुत अधिक न थी। मैं उसी मंटो को जानता हूं, इसी कारण तुम कहकर बुलाना तुम्हारे जैसे यारबाश के लिए सबसे सही तरीका हो सकता है। बहरहाल, अब उस बात पर आता हूं, जिसकी वजह से यह खत लिखना जरूरी समझा।</p>
<p><strong>मेरे मुल्क की सरकार ने</strong> तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ ऐसा जलसा किया, जिससे तुम्हारी शान दोबाला हो गयी। कसम से, अगर तुम होते तो झूम उठते। मेरे मुल्क से मेरा मतलब हिंदुस्तान से है, जिसके बारे में तुम कहते थे, &#8216;मेरा नाम सआदत हसन मंटो है और मैं एक ऐसी जगह पैदा हुआ था, जो अब हिंदुस्तान में है &#8211; मेरी मां वहां दफन है, मेरा बाप वहां दफन है, मेरा पहला बच्चा भी उसी जमीन में सो रहा है, जो अब मेरा वतन नहीं&#8230;&#8217;</p>
<p><strong>देखो</strong>, तुम बात पर ध्यान दो, मुल्क और उसके बंटवारे पर बाद में बहस कर लेना। हुआ यूं कि तुम्हारे जन्मदिन पर हमारी संसद ने आमराय से स्कूल में पढ़ायी जाने वाली एक किताब पर रोक लगा दी। कुछ लोगों को उस किताब के एक कार्टून से परेशानी थी। अब देखो तफसील में जाने की कोई जरूरत नहीं। मामला कुछ कुछ वैसा ही था, जैसे तुम्हारी कहानियों के साथ हुआ था। जिस बात का सारे फसाने में जिक्र न था, उसी का हवाला देकर उसे अपमानित करने वाला कह दिया गया और आनन-फानन में रोक लगा दी गयी।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 300px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><a href="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Nehru-Ambedkar-Cartoon-by-Shankar.jpg" target="_blank"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Nehru-Ambedkar-Cartoon-by-Shankar.jpg" alt="" title="Nehru Ambedkar Cartoon by Shankar" width="300" height="378" class="alignnone size-full wp-image-29626" /></a><br />
<strong>कार्टून बड़ी साइज में अलग पन्‍ने पर दिखेगा, अगर तस्‍वीर पर जाकर चटका लगाएंगे।</strong></div>
<p><strong>अब देखो</strong>, अगर हमारे नेता तुम्हारी तस्वीर पर फूल-माला चढ़ाते तो क्या तुम्हें अच्छा लगता! आगे सुनो, जिन मंत्री महोदय ने इस किताब और कार्टून के लिए माफी मांगी, उसे रोक देने का आदेश दिया और इसके लिए दोषी विद्वानों पर कारवाई की बात कही, वे तुम्हारी और से मुकदमा लड़ने वाले वकील हरिलाल सिब्बल के बेटे कपिल सिब्बल हैं। वे भी वकील हैं, लेकिन साथ में मंत्री भी हैं। उनकी मजबूरी समझी जा सकती है। इनके बेटे सिर्फ वकील हैं और उन्होंने देश छोड़ देने पर मजबूर कर दिये गये मकबूल फिदा हुसैन क मुकदमा लड़ा था और जीता था। अब यह और बात है कि अदालत का आदेश भी हुसैन को देश वापस लाने में कारगर नहीं हुआ। तुम्हें हुसैन तो याद होंगे, जिनके साथ तुम कभी-कभी इरानी चाय पिया करते थे! खैर, तुम्हारी तरह हुसैन भी उस मिट्टी में दफन न हो सके, जिसमें उनके मां-बाप दफन हैं। तुम पकिस्तान में &#8216;अपना&#8217; ठिकाना खोजते रहे, हुसैन परदेस में ठौर जोहते रहे।</p>
<p><strong>यह संयोग</strong> यहीं खत्म नहीं होता मंटो। आगे सुनो। तुम्हें तो याद ही होगा कि किस तरह तुम्हारे खिलाफ &#8216;तरक्कीपसंद&#8217; कॉमरेडों ने खेल रचा था। सज्जाद जहीर, अली सरदार जाफरी, अब्दुल अलीम आदि ने तुम्हारे और इस्मत आपा के खिलाफ &#8216;अश्लील&#8217; होने का आरोप मढ़ा था और प्रोग्रेसिव राइटर्स की बैठक में इस बाबत प्रस्ताव पास कराने की कोशिश की थी। वे तो ऐसा नहीं कर पाये, लेकिन संसद में बैठे कॉमरेडों ने यह काम बखूबी अंजाम दिया और मरहूम शंकर के उस कार्टून के खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत से फतवा पारित करवा लिया। मंटो, तब से अब तक हिंदुस्तान के अफसाने में सिर्फ किरदार बदले हैं, कहानी का प्लॉट वही है।</p>
<p><strong>अब इस्मत आपा की बात</strong> आयी तो यह बताने में अच्छा लग रहा है कि उनकी जिस कहानी &#8216;लिहाफ&#8217; के लिए समाज और अदालत ने कठघरे में खड़ा किया और बाद की कूढ़मगजी और नासमझी ने बस &#8216;लेस्बियन&#8217; कहानी कह कर पढ़ा और हम यह लगभग भूल से गये कि आज से सत्तर साल पहले आपा घर की चारदीवारियों में होने वाले बच्चों के यौन शोषण की और ध्यान दिला रही थीं, इस सवाल को हिंदुस्तानी सिनेमा के बड़े कलाकार आमिर खान ने टेलीविजन के जरिये घर-घर का सवाल बना दिया है। उम्मीद है कि लिहाफ का अधूरा काम अब काफी हद तक पूरा होगा।</p>
<p><strong>आखिर में</strong>, एक मजेदार बात और। मुझे पता है कि तुम्हें अपने कश्मीरी होने पर बड़ा गुमान था, लेकिन तुम कभी वहां नहीं जा सके। इधर, दिल्ली के एक लड़के अश्विन कुमार ने कश्मीर जा कर फिल्म बनायी है। जिस फिल्मी इतिहास के तुम महत्वपूर्ण हिस्सा रहे, यह साल उस तारीख का सौवां साल भी है। साल का आगाज करते हुए सरकार ने उस लड़के को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा लेकिन उसकी फिल्म को रोक दिया। तुम यह फिल्म देखते तो इसमें अपने अफसानों का रंग पाते। वैसे कश्मीर को आज मंटो की जरूरत है, जो वहां के दुःख-दर्द को दर्ज कर सके।</p>
<p><strong>और यह कि</strong>, वैसे तो यह तुमने पकिस्तान के लिए लिखा था, लेकिन हिंदुस्तान में भी &#8216;हमारी हुकूमत मुल्लाओं को भी खुश रखना चाहती है और शराबियों को भी&#8217;। और यह भी कि तुम्हारे अफसाने पढ़ने वाले &#8216;तंदुरुस्त और सेहतमंद&#8217; लोग भी कम नहीं हैं।</div>
<p>तुम्हारा<br />
<strong>प्रकाश के रे</strong></p>
<p style="text-align: right;"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2011/11/Prakash-K-Ray.jpg" alt="" title="Prakash K Ray" width="102.0689655172414" height="80" class="alignleft size-full wp-image-27443" /><em>(<strong>प्रकाश कुमार रे</strong>। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिलहाल जेएनयू से फिल्म पर रिसर्च। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)</em></p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>इच्‍छा मृत्‍यु के सामाजिक निहितार्थ भारत के लिए भयावह हैं</title>
		<link>http://mohallalive.com/2012/05/14/vijay-kumar-writeup-on-desire-death/</link>
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		<pubDate>Sun, 13 May 2012 21:55:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[Desire Death]]></category>
		<category><![CDATA[vijay kumar]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>विजय कुमार</strong> ♦ इच्‍छा-मृत्‍यु के सामाजिक निहितार्थ तो, खासकर तीसरी दुनिया के गरीब लोगों के लिए, और भी अधिक भयावह है। तीसरी दुनिया में जहां स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं आम आदमी के बस से बाहर हो चुकी हैं, जहां व्यक्ति के लिए रोटी-कपड़ा-मकान हासिल करना मुहाल है, वहां यदि इच्‍छा-मृत्‍यु को कानूनी रूप दे दिया जाए तो असहाय एवं गंभीर रोगियों की इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर हत्याओं की बाढ़ आ सकती है। पूंजीवादी समाज में जहां मानवीय सरोकार दिनों-दिन समाप्त होते जा रहे हैं, वहां पर इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर लाखों मरणासन्न लोगों को अनइच्छित मौत की तरफ धकेला जा सकता है।
<span style="color: #ffffff;">...</span>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: large;">इच्छा-मृत्यु की वैधता के निहितार्थ</span></p>
<p><strong>♦ विजय कुमार</strong></p>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">मा</span>र्च में ब्रिटेन के कानूनी इतिहास में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया। ब्रिटिश उच्च न्‍यायालय के एक न्‍यायाधीश ने इस दिन 57 वर्षीय निकिल्‍सन की इच्‍छा-मृत्‍यु यानी यूथनेसिया धारण करने की अपील स्वीकार कर ली। बीबीसी के अनुसार, निकिल्‍सन लाकड-इन-सिंड्रोम से ग्रस्‍त है। इस बीमारी में व्यक्ति का शरीर तो लकवा ग्रस्त हो जाता है, लेकिन उसका मस्तिष्क पूरी तरह काम करता रहता है। पीड़ित व्यक्ति केवल पलक झपका कर इशारे से ही अपनी बात कह पाता है। निकिल्‍सन ने जनवरी महीने में न्‍यायालय से यह आग्रह किया था कि वह उसे मृत्‍यु के चुनाव की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत स्वेच्छा से इच्‍छा-मृत्‍यु का वरण करने की अनुमति प्रदान करे। निकिल्‍सन के वकील ने &#8220;यूरोपीय मानवाधिकार समझौता, जिसके तहत प्रत्येक मनुष्‍य को व्यक्तिगत-स्‍वायत्तता के आधार पर अपनी मृत्‍यु के ढंग का चुनाव करने की स्वतंत्रता दी गयी है, का हवाला देते हुए यह दावा पेश किया कि ब्रिटेन का इच्‍छा-मृत्‍यु संबंधी मौजूदा कानून पीड़ित पक्ष के &#8216;व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन&#8217; के मूल अधिकार को बाधित करता है। अतः निकिल्‍सन को इच्‍छा-मृत्‍यु की अवैधता संबंधी कानून के विपरीत उसका वरण या चुनाव करने की अनुमति प्रदान की जाए। न्‍यायालय ने इस दलील को स्वीकार कर लिया।</p>
<p><strong>ब्रिटिश न्‍यायालय</strong> के इस फैसले ने जहां ब्रिटेन में इच्‍छा-मृत्‍यु को कानूनी दर्जा प्रदान किये जाने का रास्ता खोल दिया है, वहीं इस फैसले ने इच्‍छा-मृत्‍यु से जुड़े सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक और नैतिक प्रश्नों को भी चर्चा में ला दिया है। यदि अभियोग पक्ष की इस दलील को मान लिया जाए कि मृत्‍यु के ढंग के चुनाव की स्वतंत्रता का मामला व्यक्ति की निजी स्‍वायत्तता से जुड़ा हुआ है, तो तार्किक रूप से किसी भी प्रकार की आत्महत्या को गैर कानूनी नहीं ठहराया जा सकता है। अंततः आत्महत्या में भी व्यक्ति अपनी मृत्‍यु का वरण स्वयं ही करता है। दूसरे, यह देखा गया है कि लंबी एवं गंभीर बीमारी से ग्रस्‍त लोग अधिकांशतया अवसाद एवं ग्लानि के शिकार रहते हैं। अतः उनके निर्णय स्वतंत्र न होकर अवसाद-जनित होते हैं। इसीलिए ऐसे निर्णयों को स्वतंत्र और न्यायसंगत निर्णय नहीं माना जा सकता। इस प्रकार, इच्‍छा-मृत्‍यु को इस अर्थ में भी वैध नहीं ठहराया जा सकता। इच्‍छा-मृत्‍यु वास्तव में गंभीर रूप से बीमार, मरणासन्न, बूढ़े, अनुत्पादक एवं अवांछित व्यक्तियों को मारने का लाइसेंस है। इच्‍छा-मृत्‍यु को वैधता प्रदान करने का सबसे बुरा प्रभाव यह है कि यह पीड़ित व्यक्ति के परिवार, दोस्तों एवं स्वास्थ्य कर्मियों को संवेदनहीन और अमानवीय बना देता है। परिणामस्वरूप मानवीय अंगों की बिक्री से प्राप्त धन के लालच में इच्‍छा-मृत्‍यु की घटनाएं खासी तादाद में बढ़ सकती हैं।</p>
<p><strong>धार्मिक अर्थ में भी</strong> इच्‍छा-मृत्‍यु को उचित सिद्ध नहीं किया जा सकता। धार्मिक रूप से यह माना जाता है कि मानव जीवन ईश्वर की धरोहर है। व्यक्ति का यदि अपने जन्‍म पर कोई अधिकार नहीं है, तो उसका अपनी मृत्‍यु पर भी कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार, धार्मिक दृष्टि से इच्‍छा-मृत्‍यु को प्रकृति के विधान में हस्तक्षेप माना जाता है। भारतीय दर्शन के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान उसके विगत कृत्‍यों का परिणाम है। जीवन के कष्ट व्यक्ति के बुरे एवं अनैतिक कर्मों का फल है। यह उसके पापों का दंड है। अब यदि, व्यक्ति इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर आत्महत्या करता है, तो वह वास्तव में अपने कष्टों को समाप्त करने के बजाय अगले जन्म के लिए स्थगित कर रहा होता है। यानी एक तरह से वह ईश्‍वर के विधान में अड़ंगा डाल रहा होता है, जो कष्ट उसके वर्तमान जीवन के लिए निर्धारित थे, वह उन्हें भोगने के बजाय उनसे बचने का अनुचित रास्‍ता चाहता है।</p>
<p><strong>इच्‍छा-मृत्‍यु के</strong> सामाजिक निहितार्थ तो, खासकर तीसरी दुनिया के गरीब लोगों के लिए, और भी अधिक भयावह है। तीसरी दुनिया में जहां स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं आम आदमी के बस से बाहर हो चुकी हैं, जहां व्यक्ति के लिए रोटी-कपड़ा-मकान हासिल करना मुहाल है, वहां यदि इच्‍छा-मृत्‍यु को कानूनी रूप दे दिया जाए तो असहाय एवं गंभीर रोगियों की इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर हत्याओं की बाढ़ आ सकती है। पूंजीवादी समाज में जहां मानवीय सरोकार दिनों-दिन समाप्त होते जा रहे हैं, वहां पर इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर लाखों मरणासन्न लोगों को अनइच्छित मौत की तरफ धकेला जा सकता है। अतः गिरते मानवीय सरोकारों एवं सामाजिक जीवन में पसरती जा रही अनैतिकता को देखते हुए ऐसे किसी भी फैसले के भयावह पहलुओं का भी आकलन करना जरूरी है। इच्‍छा-मृत्‍यु को वैधानिक बनाने के इस कानूनी फैसले का पुरजोर ढंग से विरोध किया जाना चाहिए। क्‍योंकि जैसा कि हमने ऊपर देखा, इच्‍छा मृत्‍यु समाधान न होकर एक कठोर, अमानवीय और खुद ही अनैतिक कृत्‍य है।
<p style="text-align: right;"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Vijay-Kumar.jpg" alt="" title="Vijay Kumar" width="80" height="80" class="alignleft size-full wp-image-29589" /><em>(<strong>विजय कुमार</strong>। जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से दर्शन शास्‍त्र में पीएचडी। कौमी रफ्तार से जुड़ कर थोड़े दिनों पत्रकारिता की। फिलहाल इग्‍नू में कंसल्‍टेंट इन फिलॉसफी हैं। उनसे baliyanvijay@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)</em></p>
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		<title>मेरे शब्‍द उस दीये में तेल की जगह जलना चाहते हैं! #Pash</title>
		<link>http://mohallalive.com/2012/05/14/chandigarh-edition-of-jansatta-in-the-time-of-terrorism-in-punjab/</link>
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		<pubDate>Sun, 13 May 2012 18:38:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया मंडी]]></category>
		<category><![CDATA[संघर्ष]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍मृति]]></category>
		<category><![CDATA[Anantar]]></category>
		<category><![CDATA[chandigarh]]></category>
		<category><![CDATA[jansatta]]></category>
		<category><![CDATA[om thanvi]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>ओम थानवी</strong> ♦ कुछ अखबारों में आतंकवादियों की तरफ से मिलने वाली विज्ञप्तियां और आपत्तिजनक विज्ञापन प्रमुखता से छपने लगे। पंजाब सरकार ने अखबारों को एक धमकी भरी हिदायत जारी की। उसका असर पड़ा। इस पर आतंकवादियों ने नया दांव खेला। डॉ सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथक कमेटी (जो पांच प्रमुख आतंकवादी गुटों का समूह थी) ने पूरे मीडिया के लिए एक ‘आचार संहिता’ जारी की। आतंकवादियों को खबरों में आतंकवादी, उग्रवादी आदि की जगह ‘मिलिटैंट, खालिस्तानी सेनानी या खालिस्तानी मुजाहिद्दीन’ लिखने का निर्देश था। इसी तरह, भिंडरावाले के नाम से पहले संत लिखना जरूरी था। पंथिक कमेटी के साथ पाकिस्तान स्थित लिखने की मनाही थी।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: large;">फिर उस शहर में</span></p>
<p><strong>♦ ओम थानवी</strong></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 200%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 2px solid">
<blockquote><em>यह इस इतवार को जनसत्ता में छपा अनंतर है। पंजाब के बिगड़े और बदहवास हालात के दिनों में पत्रकारिता कितनी निरीह हो गयी थी लेकिन कुछ पत्रकारों ने कैसे साहस दिखाया और अपना ही नहीं अपनी बिरादरी का जमीर बचाया, ओम जी ने उसका थोड़ा वृत्तांत सुनाया है। सुनाया ही है, क्‍योंकि पढ़ते हुए ऐसा लगा कि कान में कुछ बज रहा है। जगह की सीमा के चलते अखबार में नहीं छप पाये कुछ अंश को यहां जोड़ दिया गया है, इसलिए जिन्‍होंने इसे अखबार में पढ़ा होगा, वे दुबारा यहां भी पढ़ सकते हैं : <strong>मॉडरेटर</strong></em></p></blockquote>
</div>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span><br />
<span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">ए</span>क अखबार के जीवन में पच्चीस बरस का वक्फा बड़ा नहीं होता। स्व प्रभाष जोशी ने हिंदी में एक आधुनिक दैनिक की कल्पना की। भाषा, शैली और तेवर की दकियानूसी परंपरा को तोड़ते हुए 17 नवंबर, 1983 को जनसत्ता पहले दिल्ली में निकला। फिर 1987 में चंडीगढ़ से। छह मई को चंडीगढ़ संस्करण की रजत जयंती मनायी गयी।</p>
<p><strong>आयोजन</strong> नितांत अनौपचारिक था। खास बात यह थी कि उसकी पहल उन मित्रों ने की, जो जनसत्ता से पहले कभी जुड़े रहे थे। वहां के संस्करण ने उतार-चढ़ाव देखे हैं। बीच में संस्करण जब कुछ समय के लिए स्थगित हो गया, तो कुछ सहयोगी दिल्ली आ गये, बाकी दूसरे अखबारों, टीवी चैनलों आदि में चले गये। कुछ पुराने सहयोगी दूसरे क्षेत्रों में भी गये। कोई एमएलए हुआ, कोई सूचना कमिश्नर तो कोई उच्च पुलिस अधिकारी।</p>
<p><strong>सबका आग्रह था</strong> कि उस इतवार की दोपहर मैं वहां जरूर रहूं। दरअसल, तेईस वर्ष पहले जनसत्ता से मैं चंडीगढ़ में ही जुड़ा। और पूरे दस वर्ष इन्हीं साथियों के साथ उस संस्करण के स्थानीय संपादक के बतौर काम किया। सो जाना चाहता था, पर पसोपेश यह थी कि स्वास्थ्य में मामूली विचलन के चलते थोपे हुए अवकाश पर था। बहरहाल, दिमाग पर ज्यादा जोर डाले बगैर सुबह की शताब्दी पकड़ी। पुराने सहकर्मियों, उनके परिजनों से मिलकर खुशी हुई। वे लोग भी बिछड़े साथियों से मिलकर प्रफुल्लित थे, जैसे स्कूल-कॉलेज के पुराने सहपाठियों में मेल-मिलाप के मौके पर होता है। पुराने दिन हमेशा अच्छे लगते हैं।</p>
<p><strong>इस अनौपचारिक कार्यक्रम में</strong> सहसा कुछ वक्तव्य होने लगे। अपनी तारीफ सुनना कभी अच्छा लगता है, कभी नहीं। उस रोज बेचैनी हुई। आखिर कहना पड़ा कि अपनी श्रद्धांजलि सभा में खुद आ बैठने जैसा लग रहा है। बहरहाल, अच्छा लगा जब कुछ ने आत्मीयता से कहा कि मैं निष्ठुर संपादक भी था। यह जोड़ते हुए कि फिर भी अच्छा था! अच्छा हुआ, बुरा न हुआ! एक बात सबने मानी कि वे आज जहां हैं, उसमें जनसत्ता की बड़ी भूमिका रही है। भारी प्रसार वाले रंग-बिरंगे अखबारों के सामने जनसत्ता की अपनी छाप है; उसका उल्लेख ही उनके लिए सबसे बड़ा प्रमाण-पत्र साबित हुआ।</p>
<p><strong>आयोजन के बाद</strong> शहर में कहीं नहीं गया। चंडीगढ़ के दिनों के मित्र और इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक विपिन पब्बी के साथ उनके घर जाकर चाय जरूर पी। फिर थोड़ी देर को लेट गया। नींद नहीं आयी, चंडीगढ़ में बिताये दशक की यादें आती-जाती रहीं, जिन्होंने शाम की गाड़ी में भी पीछा नहीं छोड़ा। अब तक सता रही हैं!</p>
<p><strong>चंडीगढ़ संस्करण</strong> के संपादन के लिए 1989 में प्रभाष जी ने जब प्रस्ताव किया, तब मैं राजस्थान पत्रिका के बीकानेर संस्करण का बगैर नाम वाला संपादक था। उससे पहले सात वर्ष जयपुर में उसी पत्र-समूह के साप्ताहिक इतवारी पत्रिका का संपादन (वह भी बेनामी) करता था, जिसके कारण दिल्ली के पत्रकार और लेखक थोड़ा जानते थे। 1985 में नवभारत टाइम्स का संस्करण जयपुर से निकालने का इरादा बना तो स्व राजेंद्र माथुर ने मुझे समाचार संपादक का जिम्मा संभालने को कहा। पहले दिल्ली बुलाया और स्वास्थ्य विहार में अपने घर ले गये। कंपनी की सफेद एम्बेसेडर कार वे खुद चला रहे थे। आज कुछ के गले न उतरे, पर मुझे अच्छी तरह याद है उन्होंने कहा था &#8211; जयपुर के नवभारत टाइम्स के लिए आप हमारा दिल्ली संस्करण न देखें, मैं जयपुर से ऐसा अखबार निकालना चाहता हूं जो जनसत्ता के करीब हो!</p>
<p><strong>जयपुर में</strong> नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार आदित्येंद्र चतुर्वेदी के घर अखबार के आसन्न संस्करण के संपादक दीनानाथ मिश्र के साथ बैठकी हुई। नियुक्ति की औपचारिक लिखा-पढ़ी के लिए मैं फिर दिल्ली आया। माथुर साहब ऊपर की मंजिल पर टाइम्स समूह के तत्कालीन कार्यकारी निदेशक जगदीश चंद्र से मिलाने ले गये। संक्षिप्त मुलाकात के बाद हम नीचे लौट आये। उसके बाद अंतिम कार्रवाई के लिए उन्होंने मुझे इमारत के मुख्य द्वार के नजदीक बैठने वाले एक प्रबंधक के पास भेज दिया। प्रबंधक ने बहुत मीठे स्वर में वेतन पर नये सिरे से बात शुरू की, जो माथुर साहब पहले ही तय कर चुके थे।</p>
<p><strong>बात दुबारा</strong> उन्होंने इस तरह उठायी कि राजस्थान पत्रिका छोटा अखबार है (उन्होंने ‘बनिये की दुकान’ कहा था) और टाइम्स समूह विराट साम्राज्य है, इसलिए यहां आने के महत्त्व को समझूं। ऐसी बातचीत में अपने आपको असहज अनुभव करते हुए मैं अचानक उठ खड़ा हुआ। इतना कहा, ‘बेशक टाइम्स के सामने पत्रिका छोटा अखबार है, पर राजस्थान में उसी का साम्राज्य है और नवभारत टाइम्स का फिलहाल वहां नाम तक नहीं है, उसे वहां हमारे भरोसे ही शुरू करने की कवायद हो रही है। पर मैं अब यहां काम नहीं करूंगा।’</p>
<p><strong>नमस्कार कर</strong> मैं चल दिया। भौचक प्रबंधक उठ खड़े हुए, समझाने-रुकने के कुछ शब्द वे बोल रहे थे। मैंने बाहर जाकर ऑटो पकड़ा और सीधे बीकानेर हाउस पहुंच कर जयपुर जाने (आने) वाली बस में बैठ गया। मुझे नहीं पता, प्रबंधक ने माथुर साहब को बाद में क्या कहा। पर जरूर कुछ ऐसा कहा होगा कि दोष मुझ पर आ पड़े। ऐसा इसलिए सोचता हूं कि माथुर साहब ने दुबारा मुझसे संपर्क नहीं किया, जबकि मूल प्रस्ताव उन्हीं की ओर से था!</p>
<p><strong>इसके उलट</strong> प्रभाष जी के तेवर देखे। गर्मियों के दिन थे, जब बीकानेर के निकट उदयरामसर के एक टीबे पर रेत में हमारी जीप धंस गयी। वहां यह आम बात है। शुभू पटवा सबको बाहर उतार गाड़ी आगे ठेले जाने की जुगत कर रहे थे, तभी प्रभाष जी ने मुझे पूछा, आप चंडीगढ़ जाएंगे? मैंने न सोचने के लिए वक्त मांगा, न उनको दुबारा सोचने का मौका दिया और कहा, जरूर। दोनों जानते थे कि पंजाब आतंकवाद से त्रस्त है, जोखिम भरा इलाका है। पर इस पर हमारी कोई बात नहीं हुई। बल्कि मुझमें इसे लेकर रोमांच ही था कि जहां रोज कुछ घटित होता है, वहां पत्रकारिता का अनुभव अपना होगा। जीवन में जोखिम तो सड़क पार करने के साथ शुरू हो जाती है।</p>
<p><strong>जून का महीना</strong> उतार पर था, जब चंडीगढ़ की राह पकड़ी। बीकानेर से सीधी गाड़ी थी, जिसमें अपनी यज्दी मोटरसाइकिल चढ़ा दी। खुद प्रभाष जी के निर्देश के मुताबिक पहले दिल्ली पहुंचा। दिल्ली से अपनी कार में साथ लेकर वे चंडीगढ़ चल पड़े। उषा भाभी भी साथ थीं। ड्राइवर रामसिंह कार क्या चलाते थे, हवा से बातें करते थे। प्रभाष जी ने बताया कि एक बार वे विश्वनाथ प्रताप सिंह को लेकर चंडीगढ़ गये तो तानसिंह (रामसिंह को वे इसी नाम से पुकारते थे) ने तीन घंटे में पहुंचा दिया। पर हमारी रफ्तार को जैसे नजर लगी और सोनीपत में कार खराब हो गयी। मुख्यमंत्री देवीलाल से प्रभाष जी का दोस्ताना था। बाजार से उनको फोन लगाया। मोबाइल क्या, तब पेजर भी नहीं आये थे। आये तब भी प्रभाष जी की हथेली से वे दूर रहे। पर इस बीच ड्राइवर रामसिंह ने कार खुद सुधार ली।</p>
<p><strong>रास्ते में</strong> मौका बहुत था, पर ज्यादा बात नहीं हुई। प्रभाष जी ‘तूतक-तूतक’ वाले मलकीत सिंह का गायन अपने वॉकमैन पर अकेले सुनते जाते थे। अंबाला पार हुए तब प्रभाष जी ने कान पर से हैडफोन उतारा। बोले, अब पंजाब शुरू होता है। फिर अकाली दल के इतिहास से लेकर आतंकवाद के पनपने तक की कहानी समझायी। लालड़ू में गाड़ी धीमे करवा कर बताया कि यहीं बस की तमाम सवारियों को एक कतार में खड़ा कर भून दिया गया था। जीरकपुर के बाद जनसत्ता दफ्तर की ओर मुड़े, तब उन्होंने बताया कि जनसत्ता के भीतर क्या हालात हैं, मुझसे वहां क्या अपेक्षा की जाती है।</p>
<p><strong>चंडीगढ़ पहुंचने के बाद</strong> पता चला कि एक्सप्रेस का परिवेश किस तरह अलग है। प्रबंध के लोग वहां संपादक के कक्ष में आते थे। अंग्रेजी और हिंदी अखबार पूरी तरह स्वायत्त थे, हालांकि न पढ़ने वाले जनसत्ता को एक्सप्रेस का अनुवाद समझने की भूल कर सकते थे। प्रभाष जी ने स्थानीय प्रबंधक को हिदायत दी कि मेरे लिए घर तलाश करें, ‘ये सरकारी मकान में नहीं रहेंगे।’ प्रभाष जी खुद जब इंडियन एक्सप्रेस, चंडीगढ़ के स्थानीय संपादक थे, तब किराये के घर में रहते थे। पर जब मैं पहुंचा, अर्जुन सिंह पत्रकारों की नीयत बिगाड़ कर जा चुके थे। वरिष्ठ पत्रकार बड़े-बड़े सरकारी बंगलों में रहते थे। सरकारी कोटे से प्लाट लेकर उन पर अपने घर बना लेने के बाद भी सरकारी घर उनसे छूटते नहीं थे।</p>
<p><strong>बात-बात में</strong> साफ हुआ कि संपादक के लिए गाड़ी और ड्राइवर का बंदोबस्त भी वहां है! सो बीकानेर से आयी मोटरसाइकिल जल्दी ही वापस भेज दी गयी। उसे रख सकता था। दोनों बच्चों को आगे-पीछे बिठाकर हम चारों ने उस पर थोड़ी सैर की भी। पर जल्दी ही एक पुलिस अधिकारी घर आये और इतनी हिदायतें दीं कि मोटरसाइकिल रेलगाड़ी पर लद गयी। पुलिस की हिदायतों में दफ्तर की गाड़ी में भी मुख्य मार्ग पर चलना, रोज अलग-अलग रास्तों से आना-जाना, रोके न रुकना आदि तरह-तरह की युक्तियां थीं। कुल मिलाकर यह एहसास उन्होंने दिलाया कि जान संभालो, सैर-सपाटे के लिए यह शहर नहीं है।</p>
<p><strong>भारत से अलग</strong> एक पंजाब खालिस्तान नाम से बनाने के मुगालते वाला आंदोलन तब चरम पर था। पंजाब सचिवालय में सरकार तब बरसों केंद्र के नुमाइंदे यानी राज्यपाल चलाते थे। हालांकि आम दिनचर्या में चंडीगढ़ और शहरों-सा ही लगता था। हिंसा पंजाब में हर जगह थी, पर चंडीगढ़ के भीतर नहीं पसरी थी। शहर के किनारे शिवालिक की तलहटी में बनी सुखना झील पर सुबह-शाम लोग सैर को जाते। संपन्न लोग वहां ज्यादा होते थे, उनमें भी अनेक सुरक्षाकर्मियों के साथ चलने वाले नेता, अधिकारी और न्यायाधीश आदि।</p>
<p><strong>एक बार</strong> बंबई से रामदयाल मामा आये हुए थे। हम अड़तीस सेक्टर से दफ्तर के लिए निकले। सैंतीस सेक्टर के भीतर की सड़क पर आठ लाशें पड़ी थीं। आतंकवादी हमला हुआ था। चालक बनवारी ने गाड़ी दूसरी तरफ से निकाल ली। इसके बाद तो शहर ने हिंसा की कई घटनाएं देखीं। आकाशवाणी के निदेशक आरके ‘तालिब’ को घर के बगीचे में चाय पीते मारा। मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को सचिवालय के ठीक बाहर।</p>
<p><strong>एक बार</strong> दफ्तर जाते वक्त आतंकवादियों के साथ पुलिस की असल मुठभेड़ देखी। पुलिस को आतंकवादियों के वहां छिपे होने की इत्तला मिली थी। देखते-देखते छिटपुट गोलीबारी शुरू हो गयी। दीवार के साथ दोनों हाथ से एक पिस्तौल को ताने जिस शख्स को हमने पहले आतंकवादी समझा, वह सादी वर्दी में पुलिस अधिकारी था। दरअसल, हरकत में न हों तो वहां सड़क चलते पहचान पाना मुश्किल होता कि कौन पुलिस वाला है, कौन आतंकवादी। शहर भर में बड़ी तादाद में सादी वर्दी वाले पुलिसकर्मी तैनात थे।</p>
<p><strong>चंडीगढ़ पहली बार में</strong> बड़ा नीरस शहर लगा। मशीनी गति की आमदरफ्त। चौड़ी मगर सूनी सड़कें। जरूरत से ज्यादा हरे सजावटी पेड़, जिन पर पक्षी बैठें तो किस उम्मीद से। सबसे ऊपर, ली कर्बूजिए के नाम और काम की बदौलत वास्तुकला से लगभग आक्रांत शहर। मंदिर, श्मशान और कचरा जमा करने वाले पक्के गड्ढे भी वास्तुकला की छाप लिये हुए! तब एक-आध चौराहे को छोड़ लाल-पीली बत्तियां नहीं थीं। चौराहों पर भीड़ हो तो यातायात गति बस धीमी हो जाती थी, थमती नहीं थी। कार चलाना मैंने वहीं सीखा।</p>
<p><strong>चंडीगढ़ शहर की अवस्थिति</strong> विकट है। वह दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) की राजधानी है। तीसरी राजधानी केंद्रशासित प्रदेश (यूटी) के मुख्यालय के नाते। शहर का प्रशासन और सुरक्षा का जिम्मा यूटी-पुलिस का। एक रोज एक पुलिस अधिकारी आये और अपने साथ आये एक सादी वर्दी वाले पुलिसकर्मी को वहीं छोड़ गये, ‘ये हरदम आपके साथ रहेंगे।’</p>
<p><strong>बड़े लोगों में</strong> सुरक्षाकर्मी रखने का खब्त तब भी था। कुछ जरूरत भी रहती होगी। पर एक-दो संपादकों ने अपनी रक्षा के लिए वहां केंद्रीय रिजर्व पुलिस (सीआरपीएफ) के अनेक सुरक्षाकर्मी लिये। वे अपनी जीप में संपादक की गाड़ी के पीछे चलते थे, जैसा मंत्रियों के साथ होता है। कुंवरपाल सिंह गिल जब सीआरपीएफ के महानिदेशक बने तो चंडीगढ़ और पंजाब के संपादकों पर उनका यह अनुग्रह हुआ। शहर में यों मुख्यत: पांच ही दैनिक थे, तीन ट्रिब्यून समूह के और दो हमारे एक्सप्रेस के। जो हो, मुझे सुरक्षा की गर्ज नहीं थी!</p>
<p><strong>पहले ही दिन से</strong> उस सुरक्षाकर्मी की उपस्थिति से मुझे बेचैनी हुई। दफ्तर जाऊं या किसी के घर या पान खाने जाऊं, तब भी साथ। फिर इस तरह के सुरक्षाकर्मी बदलते रहते हैं। इसका भी कोई कायदा काम करता होगा। मुझे एक बार इतना डरावना सुरक्षाकर्मी मिला कि पुलिस और अपराध की बीट देखने वाले सहकर्मी मुकेश भारद्वाज (अब चंडीगढ़ संस्करण के संपादक) को कहा कोई सुदर्शन व्यक्ति नहीं मिल सकता? किसी के घर जाएं तो वे डरें तो नहीं! मुकेश ने शायद महानिरीक्षक से बात की, जिसका उलटा असर हुआ। एक और भी बांका मुच्छड़ आ पहुंचा!</p>
<p><strong>एक सुरक्षाकर्मी</strong> सबसे अलग था। एक रोज उसका तमंचा उलट-पलट कर देख रहा था। उसने कहा, साहब लोग तो हाथ लगाते हुए डरते हैं। मैंने तमंचे की चरखी को खाली कर साफ किया। हैमर को खींचा, छोड़ा। गोलियां फिर चैंबर में फिट कीं और उसे प्रभावित करते हुए कहा कि यह तो पंद्रह साल पुराना मॉडल है।</p>
<p><strong>अगर आप</strong> पुलिस वालों के साथ उठते-बैठते रहे हों या उनके घर से हों तो इतनी जानकारी सामान्य होती है। पर इस तरह की खुराफात में मेरी दिलचस्पी पुरानी थी। एनसीसी के दिनों में बीकानेर में डूंगर कॉलेज के पीछे बनी चांदमारी को जाते तो सर्वाधिक सटीक निशाने बिठाकर आता था। चार वर्ष पहले मित्र अनुराग चतुर्वेदी और सांसद दिग्विजय सिंह के साथ जयपुर में था। दिग्विजय राष्ट्रीय राइफल एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। हम लोग नवनिर्मित जयपुर शूटिंग रेंज देखने गये। वहां एक निशाना दिग्विजय जी ने मारा और फिर बंदूक मुझे पकड़ा दी। मैंने कभी उनसे बीकानेर के दिनों का जिक्र किया था। पर उस बात को तो दशक हो चले थे। खैर, निशाना साधने में कुछ क्षण जरूर लगे और गोली जब निकली तो सीधे निशाने को भेद गयी।</p>
<p><strong>पर चंडीगढ़ में</strong> अपने सुरक्षाकर्मी के तमंचे से इस चुहल का नतीजा कुछ यों हुआ कि ‘वैपन’ (वह तमंचे के लिए हमेशा यही शब्द बरतता था) दिन में मेरे पास छोड़कर घर या अपने काम निपटाने जाने लगा। एक रोज प्रमुख संवाददाता महादेव चौहान (अब दिल्ली में) मेरे कमरे में अचानक आ गये। फुरसत में भावी सुरक्षा के लिए मैं तमंचे के चैंबर को चमका रहा था। शायद उन्हें मैंने अचानक कुछ सफाई पेश की! पर मजा तब हुआ जब एक रोज प्रभाष जी आये और कहा, लिखियों (शहर में उनका मित्र परिवार) के यहां चलते हैं। अब, सुरक्षाकर्मी तो लौटा नहीं था। मैंने उसका ‘वैपन’ उठाया तो प्रभाष जी ने पूछा यह क्या माजरा है। मैंने किस्सा बताया। उन्होंने कहा, ऐसी सुरक्षा किस काम की। उस वक्त तो हथियार ठूंस कर प्रभाष जी के ‘गनमैन’ की तरह छत्तीस सेक्टर को चल दिया। पर कुछ रोज बाद बाकायदा पत्र लिखकर उस सुरक्षाकर्मी से मैंने मुक्ति पा ली।</p>
<p><strong>अगली दफा</strong> प्रभाष जी आये तो बोले, मगर पंडित, कुछ सुरक्षा तो रखनी चाहिए। अगले रोज उन्होंने पंजाब के नये राज्यपाल जनरल ओमप्रकाश मल्होत्रा से मिलने का वक्त लिया, जो नियमानुसार चंडीगढ़ के प्रशासक भी थे। आजकल वे ‘शिक्षा’ और ‘चिकित्सा’ नामक दो स्वयंसेवी संस्थाओं के अध्यक्ष हैं। हम सचिवालय पहुंचे तो छूटते ही प्रभाष जी ने मांग रखी, हमारे संपादक को सुरक्षा नहीं, सुरक्षा के लिए रिवाल्वर चाहिए। ये जरूरत के वक्त उसका प्रयोग कर सकते हैं। क्या आपका प्रशासन मुहैया करवाएगा?</p>
<p><strong>जनरल मल्होत्रा ने कहा</strong>, हमें कोई दिक्कत नहीं, अगर एक औपचारिक पत्र इस आशय का दे दें। मुझे एक नयी आफत की कल्पना कर झुंझलाहट-सी हुई। अखबार निकालेंगे या चांदमारी जाकर निशाना साधेंगे! और सचमुच नौबत आ पड़ी तो एके-47 के सामने टिकेगा कौन? वह पत्र मैंने कभी नहीं दिया। बाद में एक ही बार प्रभाष जी ने इस बारे में पूछा तो मैंने कहा, हालात अब बेहतर हो रहे हैं।</p>
<p><strong>लेकिन हालात</strong> आगे और विकट हो गये। इसकी कुछ शुरुआत जनरल मल्होत्रा के आने से पहले ही चुकी थी। जनरल को शायद इसीलिए लाया गया कि उनसे पहले के राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा ढीले-ढाले थे। मुझे याद है, जालंधर में एक सलाहकार समिति की बैठक में चाय के कप में तीन चम्मच चीनी डालते हुए वर्मा ने कहा था, मैं गन्ना उगाने वाले इलाके से आता हूं जनाब। लेकिन पत्रकारों को वर्मा ने कड़वी झिड़की दी। छह-सात महीने में ही वर्मा को विदा कर हिमाचल भेज दिया गया।</p>
<p><strong>इस बीच</strong> कुछ अखबारों में आतंकवादियों की तरफ से मिलने वाली विज्ञप्तियां और आपत्तिजनक विज्ञापन प्रमुखता से छपने लगे। पंजाब सरकार ने अखबारों को एक धमकी भरी हिदायत जारी की। उसका असर पड़ा। इस पर आतंकवादियों ने नया दांव खेला। डॉ सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथक कमेटी (जो पांच प्रमुख आतंकवादी गुटों का समूह थी) ने पूरे मीडिया के लिए एक ‘आचार संहिता’ जारी की। आतंकवादियों को खबरों में आतंकवादी, उग्रवादी आदि की जगह ‘मिलिटैंट, खालिस्तानी सेनानी या खालिस्तानी मुजाहिद्दीन’ लिखने का निर्देश था। इसी तरह, भिंडरावाले के नाम से पहले संत लिखना जरूरी था। पंथिक कमेटी के साथ पाकिस्तान स्थित लिखने की मनाही थी। ऐसी ही कई हिदायतों के साथ पीटीआई-यूएनआई समाचार समितियों को अलग निर्देश था कि वे जब मिलिटैंट लिखें और कोई अखबार ये शब्द बदल दे तो उस अखबार के तार काट दिये जाएं। इस ‘आचार संहिता’ का पालन न करने वालों को सीधे मौत के घाट उतार देने का ऐलान था। साथ में यह ‘निर्देश’ भी कि ‘मौत की सजा’ के खिलाफ कोई पत्रकार अपील करना चाहे तो पंथक कमेटी को करेगा, सरकार को नहीं।</p>
<p><strong>इस विज्ञप्ति रूपी</strong> ‘आचार संहिता’ पर सोहन सिंह, वाधवा सिंह बब्बर, हरमिंदर सिंह सुल्तानविंड, महल सिंह बब्बर और सतिंदर सिंह के हस्ताक्षर थे। यह ‘आचार संहिता’ 1 दिसंबर, 1990 से ‘लागू’ होनी थी और ‘संपूर्ण विज्ञप्ति बगैर कोई शब्द काटे हुए’ हर अखबार को छापनी थी। विज्ञप्ति पढ़ते ही मैंने अपने वरिष्ठ सहयोगियों को बुलाया। जनसत्ता को तात्कालिक तौर पर कोई बड़ी चुनौती नहीं। आतंकवादियों के लिए हम स्थानीय शब्दावली में प्रचलित ‘खाड़कू’ शब्द प्रयोग करते थे। ‘संत’ भी लिख सकते थे। लेकिन पूरी विज्ञप्ति का प्रकाशन, जिसका अनुवाद अखबार का पूरा पन्ना भरने को काफी था!</p>
<p><strong>विज्ञप्ति के पीछे</strong> आतंकवादियों की एक मंशा यह लगी कि लोकतंत्र के बाकी खंभे पंजाब में लगभग चरमराये हुए थे, अब निशाने के लिए चौथा खंभा बचा था, जो अब तक उनके काबू से बाहर था। सहयोगियों से बातचीत में यह भी अनुभव किया गया कि सरकार की आचार संहिता पहले से लागू है, आतंकवादियों की नियमावली एक ऐसे बिंदु पर ले आयी है, जहां अखबार ‘न’ कहें, वरना बंद होने के रास्ते पर हैं। यानी चौथा खंभा भी ढहने के कगार पर। इस आशंका के पीछे मेरा एक तर्क यह था कि यह विज्ञप्ति पहला ‘टैस्ट फायर’ है; अगली दफा अगर आतंकवादियों ने यह हुक्म दिया कि पंजाब राज्य को सब अखबार खालिस्तान लिखेंगे, तब हम क्या करेंगे।</p>
<p><strong>इस विचार-विमर्श के बाद</strong> अगले ही रोज मैं दिल्ली पहुंचा। प्रभाष जी ने फौरन ट्रिब्यून समूह के प्रधान संपादक वीएन नारायणन को फोन मिलाया। वे जानना चाहते थे कि संपादकों को अंतत: क्या अब भी साफ रुख अख्तियार नहीं करना चाहिए। प्रभाष जी को उधर से जो जवाब मिला, उसे सुन अक्सर मस्ती में रहने वाले प्रभाष जी गुमसुम हो गये। नारायणन साहब ने कहा था, हमने तो ‘विज्ञप्ति’ आज ही छाप दी है, एक हफ्ता कौन जोखिम ले। बाद में पता चला कि हिंदी संस्करण में विज्ञप्ति कुछ कट कर छपी थी, जिसे अगले रोज हू-ब-हू दुबारा छाप दिया गया। आतंकवादियों को हिंदी अखबारों ने सर्वत्र &#8220;मिलिटेंटों&#8221; लिखा।</p>
<p><strong>प्रभाष जी ने</strong> मेरी ओर देखकर पूछा, फिर जनसत्ता? मैंने कहा, जोखिम जरूर है। फिलहाल कोई संकट सामने नहीं। पर यह ‘विज्ञप्ति’ हम नहीं छापेंगे। एक संदेश जाना चाहिए कि बीच का रास्ता हम तलाश रहे हैं। शायद यह गीदड़-भभकी ही हो। न हो तो आर, नहीं तो पार!</p>
<p><strong>‘मैं तुम्हारे साथ हूं</strong>। अपन वही’च करेंगे जो अपना जमीर बोला। गणेश! चांदनी चौक जाओ और हल्दीराम से लड्डू-समोसे लेकर लाओ!’ गणेश उनके सेवक का नाम था।</p>
<p><strong>और जनसत्ता</strong> चंडीगढ़ में अकेला अखबार रहा जिसने आतंकवादियों की ‘आचार संहिता’ प्रकाशित नहीं की। यह इतिहास है, जो वहां अखबार की फाइलों में दर्ज है। इसका स्मरण कर पुराने साथियों ने गये हफ्ते वहां गर्व अनुभव किया। गल्त कित्ता?</p>
<p style="text-align: right;"><strong><span style="color: #808080;">शीर्षक सौजन्‍य</span> : पाश की कविता ‘तुझे नहीं पता’ की एक पंक्ति</strong></p>
<p style="text-align: right;"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2010/01/Om-Thanvi-Image.jpg" alt="Om Thanvi Image" title="Om Thanvi Image" width="80" height="80" class="alignleft size-full wp-image-9282" /><em>(<strong>ओम थानवी</strong>। भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।)</em></p>
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		<title>बच्‍चों की सुनें, उनका विश्‍वास करें, उन्‍हें यातना से निकालें</title>
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		<pubDate>Sun, 13 May 2012 18:37:45 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[<strong>आमिर खान</strong> ♦ हम यह प्रार्थना ही कर सकते हैं कि किसी भी बच्चे को यौन शोषण की यातना न झेलनी पड़े, किंतु यदि यह होता है तो बच्चे में इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वह यह आपसे बता सके। बातचीत और संवाद के माध्यम से हममें अपनी खुशियां और भय साझा करने की क्षमता विकसित होती है। जब मां-बाप और बच्चों के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हो जाता है, तो यह अनेक मुद्दों के हल होने का प्रस्थान बिंदु बन जाता है। तब यदि आपके बच्चे के साथ कुछ गलत होता है, तो वह बेझिझक आपके पास आकर आपको पूरी बात बता देगा और तब आप उस समस्या को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। भरोसा खुली बातचीत का आधार होता है। हमारे बच्चे बड़े ध्यान से हमारा अवलोकन करते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ आमिर खान</strong></p>
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<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span><br />
<span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">ब</span>च्चों के यौन शोषण की घटनाओं पर शोध के दौरान मुझे एक बड़ी सीख तब मिली, जब मैंने अपनी विशेषज्ञ डॉ अनुजा गुप्ता से पूछा कि यौन शोषण का शिकार होने के बाद भी बच्चे अपने मां-बाप से उसके बारे में बताने में कठिनाई महसूस क्यों करते हैं? उनका जवाब था, &#8216;क्या हम बच्चों की सुनते हैं? क्या हम उनकी बात सुनने के लायक हैं?&#8217; और यह वास्तव में एक बड़ा सवाल है। मेरा अपने बच्चों के साथ क्या संबंध है? क्या मैं अपने बच्चों से उनकी परेशानियां पूछता हूं? क्या वास्तव में बच्चों की बात सुनता हूं? क्या मैं जानता हूं कि मेरे बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा है? क्या मैं उसके भय, सपनों, उम्मीदों के बारे में जानता हूं? क्या वास्तव में मैं यह सब जानना भी चाहता हूं। क्या मैं अपने बच्चों का दोस्त हूं?</p>
<p><strong>हालांकि पहली पीढ़ी</strong> की तुलना में हमारी पीढ़ी बच्चों के साथ अधिक बातचीत करती है। या कम से कम हम ऐसा मानना पसंद करते हैं&#8230; फिर भी हममें से कितने हैं जो अपने बच्चों के साथ मजबूती से जुड़े हैं? हममें से कितनों के पास एक स्वस्थ संबंध के लिए जरूरी समय और सोच है? सच्चाई यह है कि अगर आपका अपने बच्चों के साथ स्वस्थ संवाद, भरोसा और दोस्ती होगी, तभी आपके बच्चे निडर होकर और सहजता से आपके साथ अपनी हर तरह की भावनाएं साझा कर पाएंगे।</p>
<p><strong>स्पष्ट है कि</strong> हम यह प्रार्थना ही कर सकते हैं कि किसी भी बच्चे को यौन शोषण की यातना न झेलनी पड़े, किंतु यदि यह होता है तो बच्चे में इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वह यह आपसे बता सके। बातचीत और संवाद के माध्यम से हममें अपनी खुशियां और भय साझा करने की क्षमता विकसित होती है। जब मां-बाप और बच्चों के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हो जाता है, तो यह अनेक मुद्दों के हल होने का प्रस्थान बिंदु बन जाता है। तब यदि आपके बच्चे के साथ कुछ गलत होता है, तो वह बेझिझक आपके पास आकर आपको पूरी बात बता देगा और तब आप उस समस्या को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। भरोसा खुली बातचीत का आधार होता है। हमारे बच्चे बड़े ध्यान से हमारा अवलोकन करते हैं। उनके अंदर हमारी प्रतिक्रिया को ताड़ने की सहज प्रवृत्ति होती है। अगर हम चाहते हैं कि वे हमसे अपनी बात कहें तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें यह पता हो कि हम उन पर विश्वास करते हैं।</p>
<p><strong>जी हां</strong>, केवल सुनते ही नहीं, विश्वास भी करते हैं। बच्चे बहुत समझदार और संवेदनशील होते हैं। हमें उनमें यह आत्मविश्वास भरना होगा कि हम न केवल उनकी बात गंभीरता से सुनते हैं, बल्कि उन पर भरोसा भी करते हैं।</p>
<p><strong>एक और बड़ी सीख</strong> हरीश की मां पद्मा अय्यर से मिली। अगर कोई बच्चा यौन शोषण के बारे में बताता है, तो अकसर हमारे दिमाग में पहला विचार यही आता है कि हम अपने ही परिवार के सदस्य के खिलाफ कैसे कार्रवाई करेंगे? परिवार की इज्जत ही हमारी इज्जत है। यह मिट्टी में मिल जाएगी। लोग क्या कहेंगे। मेरे बच्चे के साथ ऐसा हुआ, तो इस बात को छिपाने में ही भलाई है। पद्मा की तरह पहले तो हम इस प्रकार की घटना को स्वीकार ही नहीं पाते। और तब हम इसे छिपाने की कोशिश करते हैं। चूंकि हम इसे छिपा लेते हैं, इसलिए इसके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाते।</p>
<p><strong>इस दौरान</strong> हम दूसरों के बारे में, समाज के बारे में सोचते रहते हैं, किंतु हम अपने खुद के बच्चे के बारे में भूल जाते हैं। चार, पांच या छह साल का अबोध बच्चा, जो सदमे के सबसे भयावह दौर से गुजरा है, जो हमारे पास इसलिए आया है कि हम उसके मां-बाप हैं और बच्चे के पास हमें अपना दुख सुनाने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है। ऐसे बच्चे की हमें चिंता नहीं होती।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 350px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Amir-Khan-Satyamev-Jayate.jpg" alt="" title="Amir Khan Satyamev Jayate" width="350" height="196" class="alignnone size-full wp-image-29617" /></div>
<p><strong>हमारा बच्चा ही</strong> हमारी चिंता का प्रमुख विषय होना चाहिए, शेष सब पहलू बाद में आते हैं। ऐसे समय हमें सोचना चाहिए कि बच्चे पर क्या गुजर रही है और हमें बच्चे के लिए क्या करने की जरूरत है। बस यही। उपचार की इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद बच्चा पहले से भी मजबूत बन जाता है और वह सदमे से उबर जाता है। हमें अपनी पूरी ताकत के साथ इसे संभव बनाना चाहिए। इसके अलावा, बच्चों के यौन शोषण को जघन्य अपराध के रूप में देखना शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि यह वास्तव में एक जघन्य अपराध है। जब आपके घर में चोरी हो जाती है, तो क्या आप हंगामा खड़ा नहीं कर देते, &#8216;बताइए! कोई मेरे घर में घुसकर सामान पर हाथ साफ कर गया। मेरे सारे जेवर चुरा ले गया। यह हो क्या रहा है? सिक्योरिटी कुछ कर क्यों नहीं रही है?&#8217; किंतु अगर हमारे घर में किसी बच्चे के साथ यौन शोषण हो जाता है, तो हम इस पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं। हम ऐसा क्यों करते हैं? क्या बच्चे ने कुछ गलत किया है? नहीं। बल्कि इसका उल्टा है। गलत बच्चे के साथ हुआ है। फिर आप इस पर पर्दा क्यों डालते हैं? आपको चिल्लाना चाहिए, &#8216;कोई हिम्मत कैसे कर सकता है कि मेरे घर में आकर बच्चे के साथ यह करे।&#8217; आपको हंगामा मचा देना चाहिए! उस आदमी को सीखचों के भीतर होना चाहिए। कानून के रखवालों को भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए। और सबसे बड़ी बात यह कि बच्चे को यह एहसास होना चाहिए कि उसकी सुरक्षा आपके लिए कितना मायने रखती है।</p>
<p><strong>मैं पहले ही</strong> &#8216;सत्यमेव जयते&#8217; में उल्लेख कर चुका हूं कि बाल यौन शोषण से संबंधित बिल पर संसद काम कर रही है और यौन शोषण से अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए हम एक मजबूत, प्रभावी और व्यावहारिक कानून की उम्मीद कर सकते हैं। यह कानून जल्द ही बनने की संभावना है। अंत में मैं आपको बताना चाहूंगा कि सेक्सुअलिटी पर हमारा दिमाग जितना कुंद या बंद होगा उतना ही अधिक वह कुंठित होगा और यह खुद को भद्दे तरीकों से अभिव्यक्त करेगा। मैं उम्मीद करता हूं कि एक समाज के रूप में हम जल्द ही ऐसी अवस्था में पहुंच जाएंगे, जहां अपनी सेक्सुअलिटी के लिए हममें भय नहीं होगा। बल्कि, हम इससे मर्यादित, खुले, जिम्मेदार और स्वस्थ तरीके से निबट सकेंगे।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: center; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 2px solid; WIDTH: 520px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 2px solid"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Amir-Khan-504x90.jpg" alt="" title="Amir Khan 504x90" width="504" height="90" class="alignnone size-full wp-image-29543" /></p>
<p><em><strong>आमिर खान</strong> बॉलीवुड एक्‍टर हैं। उन्‍होंने होली नाम की फिल्‍म से अपने कैरियर की शुरुआत की और कयामत से कयामत तक, रंगीला होते हुए फना और गजनी तक आते आते अपनी एक अलग तरह पहचान बनायी। वे हिंदी सिनेमा में नये विषय पर काम करने वाले निर्देशकों को प्रोत्‍साहित भी करते हैं। इसकी शुरुआत उन्‍होंने लगान से की और पीपली लाइव, धोबी घाट और डेल्‍ही बेली जैसी फिल्‍में प्रोड्यूस की। सामाजिक मुद्दों पर आधारित उनके रियलिटी शो सत्‍यमेव जयते की इन दिनों बहुत चर्चा है।</em></div>
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		<title>साठ साल की संसद पर हंसिए मत, उसे गंभीरता से लीजिए!</title>
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		<pubDate>Sun, 13 May 2012 07:59:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[संघर्ष]]></category>
		<category><![CDATA[Avyakt Shashi]]></category>
		<category><![CDATA[parliament]]></category>
		<category><![CDATA[Shashi Kumar Jha]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>शशि कुमार झा</strong> ♦ हम अपने प्रतिनिधियों को निरंतर डिफेंसिव और प्रतिक्रियावादी बनाते जा रहे हैं। संभवतः आज इसका असर उनके स्वयं के जीवन में इतना आ चुका है कि उनका अन्य नेताओं के साथ आपसी व्यवहार में भी यही आरोप-प्रत्यारोप, रक्षात्मकता, उदासीनता, प्रतिक्रियावाद, जुबानी हिंसा, चरित्र हनन, स्पष्टीकरण और अन्य दल या व्यवस्था की शिकायत करके बच निकलना इत्यादि पूरी तरह से शामिल हो गया है। हमें समझना होगा कि उनमें अपराधबोध पैदा कर और उनकी नजरों में उनकी स्वयं की नकारात्मक छवि बना कर हम उनका सशक्तिकरण और उत्प्रेरण नहीं कर सकते। ऐसे माहौल में अपनी वैधता बनाये रखने के लिए उनके समक्ष कोई अन्य रचनात्मक रास्ते की गुंजाईश कम से कमतर होती जाती है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: large;"><span style="color: #808080;">राजनीति में एक मानवीय वैमर्शिक वातावरण की दरकार</span></span></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 396px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Indian-Democracy.jpg" alt="" title="Indian Democracy" width="396" height="267" class="alignnone size-full wp-image-29566" /></div>
<p><strong>♦ शशि कुमार झा</strong></p>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">रा</span>जनीति की संकल्पनाओं, संस्थाओं और आदर्शों को विभिन्न दृष्टिकोणों या विचारधाराओं में बांट कर पढ़ने-पढ़ाने, समझने और विश्लेषण करने के हमारे प्रचलित तरीके को हम अपनी-अपनी प्रतिबद्धताओं से जोड़ते रहे हैं। राजनीतिक प्रश्नों पर उदारवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी, राष्ट्रवादी और सबल्टर्न जैसे परिप्रेक्ष्य में अपनी बात कहना हमें एक सुसंगत और सुरक्षित अभिव्यक्ति भी देता है। इसी तरह कई और समुदायपरक मूल्य और मापदंड हैं, जिसके आधार पर हम जाति, संप्रदाय, वर्ग, लिंग, भाषा और क्षेत्र जैसे स्थापित और सत्याभासी श्रेणियों नजरिये से अपने जटिल राजनीतिक प्रश्नों को भी आसानी से समझ लेने और उस पर अपनी राय कायम करने का प्रयास करते रहते हैं। एक लंबे समय से राजनीतिक ज्ञान और विश्लेषण की क्रिटिकल धाराओं में उपरोक्त दोनों ही गुण मौजूद रहे हैं। ऐसा नहीं है कि विश्लेषण के ये प्रचलित तरीके उपयोगी और अर्थपूर्ण नहीं हैं। किसी भी राजनीतिक परिघटना को तात्कालिक रूप से समझने के लिहाज से ये उपयोगी हो भी सकते हैं।</p>
<p><strong>लेकिन समस्या</strong> तब आती है जब हमारी ही राजनीतिक परिकल्पनाएं हमारे सामने तथ्य के रूप में प्रस्तुत होकर हमें भ्रमित करने लगती हैं। ऐसे ही कई बार कठोर लोकतांत्रिक आदर्शों को भी हम व्यावहारिक प्रक्रियाओं और सुप्राप्य समाधानों के रूप में अपनाने का जतन करने लग जाते हैं। भारतीय संसद के साठ साल जैसे विषय पर विचार करते हुए लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों वाले क्रियाशील नागरिकों को उपरोक्त दोनों ही फ्रेमवर्कों से आगे जाना होगा, भले ही हमारे पारंपरिक सहजज्ञान को नजर आने वाले सारे राजनीतिक घटनाक्रम, साक्ष्य, तथ्य और आंकड़े हमें घोर नकारात्मक और निराशाजनक लग रहे हों। इस कसौटी पर एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर लिखे गये अब तक के मेरे स्वयं के ज्यादातर लेख खरे नहीं उतरते हैं।</p>
<p><strong>इस देश में</strong> संसदीय व्यवस्था के राजनीतिक इतिहास और उसकी उपलब्धियों और खामियों पर सुविज्ञ जनों ने बहुत कुछ लिखा है। संसद आवश्यक रूप से एक सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था है इसलिए प्रतिनिधित्व की प्रचलित व्यवस्था और जन-प्रतिनिधियों का व्यक्तिगत रवैया दोनों ही इस बहस के केंद्र में हैं। भारत की मौजूदा राजनीति और यहां के राजनेता दोनों ही विश्वसनीयता के गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। राजनीतिक सुधारों की लंबे समय से चल रही चर्चाओं में धनबल-बाहुबल, व्यक्तिवाद-परिवारवाद, अपराधीकरण, कार्यान्वयन और निगरानी में प्रशासनिक निष्क्रियता, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, दलीय सुधार, चुनाव सुधार और लोकपाल जैसे कठोर भ्रष्टाचार निरोधी कानून इत्यादि मुद्दे हावी रहे हैं।</p>
<p><strong>इन सभी चर्चाओं</strong> की अग्रभूमि में हम एक आदर्श और वांछनीय राजनीति की तस्वीर अपने समक्ष रखते हैं, और फिर उसे हासिल करने के लिए कानूनी और दंडात्मक प्रावधानों को पहली प्राथमिकता दे देते हैं। ऐसा करते हुए जाने-अनजाने हम एक विशेष प्रकार की व्यक्तिगत नीतिपरायणता और सदाचारिता की अहंभावना का शिकार हुए रहते हैं। इसके मूल में ही प्रायः राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं के चोर, भ्रष्ट, अन्यायी, शोषणकारी और सत्तालोलुप इत्यादि होने की भावना कार्य करने लगती है। इस प्रकार चाहे वह कोई भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, मीडिया का मंच हो या न्यू मीडिया पर चल रही चर्चाएं हों, उसमें व्यक्तिगत आरोपों, चरित्र हनन की रचनात्मक अभिव्यक्तियों, विभिन्न श्रोतों से जुटाये गये नकारात्मक तथ्यों और साक्ष्यों की भरमार होती है।</p>
<p><strong>पिछले कुछ समय से</strong> राजनीति के प्रति मोहभंग अपने चरम पर है और लोगों के आपसी बातचीत और व्यापक वैमर्शिक वातावरण में भी निराशावाद और ‘कुछ नहीं हो सकता’ की स्वीकारोक्ति गुंजायमान होती रहती है। ऐसा लगता है मानो धीरे-धीरे हम एक पॉलिटिकल जेनोफोबिया या राजनीतिक अन्य-द्वेषिता की जद में आते जा रहे हैं। मानो रोजाना मनाये जा रहे एक लोक उत्सव में हमने सार्वजनिक जीवन को अपना चुके लोगों के पुतले पीटने का कार्यक्रम रखा है। इस उत्सव में हमें अपनी सारी समस्याओं के लिए इन्हें कोसने का मंत्र पढ़ते हुए इनपर ताबड़तोड़ प्रहार करना होता है। कठोर पुलिसिंग की सीमाओं और खतरों को नजरंदाज करते हुए हम जाने-अनजाने भावनात्मक रूप से हिंसक होते जा रहे हैं।</p>
<p><strong>इस दोषदर्शी वातावरण में</strong> हम विभिन्न मंचों पर सार्वजनिक व्यवस्था और नेताओं की केवल शिकायत कर रहे हैं। यह शिकायत किससे कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, इन शिकायतों के बाद हमारा आगे का कार्यक्रम क्या है, यह नकारवादी सामूहिक चेतना ही हमें कहां ले जा रही हैं और उससे आगे की हमारी रचनात्मक भूमिका क्या है; इन प्रश्नों पर सोचने की जिम्मेदारी से हम स्वयं को मुक्त समझने लगे हैं। इन तमाम शिकायती अभिव्यक्तियों में हम केवल किसी ‘अन्य’ से बदलने की अपेक्षा और मांग रखते जा रहे हैं। यह ‘अन्य’ कौन है, किसके बीच से है, वह यदि सार्वजनिक जीवन में है तो क्यों है, कब से है, उसकी प्रतिबद्धताएं और उपलब्धियां क्या हैं, उसके जीवन उद्देश्य और उसके सार्वजनिक कृत्यों का मानवीय पक्ष क्या है। निरंतर इनसे दूरियां बनाते और बढ़ाते जाना लोकतंत्र के लिए कितना फायदेमंद है? ये सारे प्रश्न हमारे जेहन में आने बंद से गये हैं। हम शायद भूलने लगे हैं कि लोकतंत्र किसी अन्य के द्वारा बने-बनाये रूप में प्रदत्त कोई व्यवस्था नहीं है। इसे हम सब को अपने-अपने स्तर पर रोज-रोज बनाना, सींचना और बनाये रखना होता है।</p>
<p><strong>जो भी तथ्य</strong> सामने आ रहे हैं यदि वे सच भी हैं तो भी हमें अपनी प्रतिक्रियाओं के बारे में सचेत होना पड़ेगा। उनमें परिवर्तन लाने का रचनात्मक रास्ता अपनाना होगा। हमें इनसे समूल निजात पाने की अपनी जिद को छोड़ना होगा। इन्हें बुरा-भला कह कर, इन्हें कोस कर, इनके प्रति घृणा फैलाकर, इनसे जुड़ीं व्यक्तिगत कहानियों के जरिए इनका चरित्र हनन कर हम इन्हें समाज से बहिष्कृत करने पर उतारू होना न तो मानवीय है न ही व्यावहारिक। हम इन सबको जेल में डाल कर हमारी राजनीति के लिए लाखों की संख्या में कुछ ‘अच्छे, गैर-राजनीतिक परिवार वाले, कम पैसे वाले, सच्चरित्र, ईमानदार, सादगीपसंद, और पढ़े-लिखे’ लोगों की जबरन भर्ती भी सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं। कठोर आदर्शों का दबाव और राजनीतिक नैतिकता की हमारी समझ सार्वजनिक जीवन में काम कर रहे ‘अन्य’ लोगों के जीवन पर ‘त्याग-बलिदान, निस्वार्थता, सादगी, गरीबी’ जैसे अव्यावहारिक मूल्य थोपने लगा है।</p>
<p><strong>ऐसा लग रहा है</strong> कि हम अपने प्रतिनिधियों को निरंतर डिफेंसिव और प्रतिक्रियावादी बनाते जा रहे हैं। संभवतः आज इसका असर उनके स्वयं के जीवन में इतना आ चुका है कि उनका अन्य नेताओं के साथ आपसी व्यवहार में भी यही आरोप-प्रत्यारोप, रक्षात्मकता, उदासीनता, प्रतिक्रियावाद, जुबानी हिंसा, चरित्र हनन, स्पष्टीकरण और अन्य दल या व्यवस्था की शिकायत करके बच निकलना इत्यादि पूरी तरह से शामिल हो गया है। हमें समझना होगा कि उनमें अपराधबोध पैदा कर और उनकी नजरों में उनकी स्वयं की नकारात्मक छवि बना कर हम उनका सशक्तिकरण और उत्प्रेरण नहीं कर सकते। ऐसे माहौल में अपनी वैधता बनाये रखने के लिए उनके समक्ष कोई अन्य रचनात्मक रास्ते की गुंजाईश कम से कमतर होती जाती है। हम जानते हैं कि हमारे विविधतापूर्ण समाज में कोई भी नीतिगत कदम परफेक्ट या अपने आदर्शों के बिल्कुल करीब और फूल प्रूफ नहीं हो सकता है। लेकिन इन आदर्शों को तत्काल प्राप्त कर लेने की चाह का दबाव भी हमारे प्रतिनिधियों के आत्मविश्वास को डिगा सकती है या उनकी निष्क्रियता को बढ़ा सकती है।</p>
<p><strong>सामाजिक तौर पर</strong> ही हमने महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक विषयों पर डिबेट यानि वाद-विवाद की शैली को अपनाया हुआ है। इस शैली के आधार पर हम केवल अपनी वह बात और अपना वह पक्ष रखने को उद्यत होते हैं जो हमने पहले से ही तय कर रखा है। ऐसे में प्रायः सुनने और समझने का धैर्य और सकारात्मक स्वीकार्यता का साहस क्षीण होने लगता है। इसलिए एक लोकतांत्रिक समाज के रूप में डायलॉग अथवा संवाद की अवस्था से हम निरंतर दूर होते जा रहे हैं।</p>
<p><strong>एक न्यायपूर्ण समाज के लिए</strong> किये जा रहे हमारे संघर्षों की भाषा ही देखें तो उसमें सदियों से पीड़ित होने का संदर्भ बार-बार आने लगता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह अपनी जगह बिल्कुल सही है लेकिन क्या प्रगतिशीलता के लिए हमें अपने अतीत की ओर बार-बार वापस जाने की भाषा और फ्रेमवर्क हमें सकारात्मक भविष्योन्मुखी संवाद के लिए प्रेरित करता है? शायद यही वजह है कि हमारा प्रतिरोध हमारे गुस्से, हमारे आक्रोश, परस्पर घृणा और जबानी हिंसा के रूप में ज्यादा व्यक्त हो रहा है। क्योंकि अतीत की राजनीतिक व्याख्या के जरिए भविष्य की सर्जना में रीकंसीलिएशन या सामंजस्य की बजाए सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक गतिरोध की संभावनाएं ज्यादा हो सकती हैं। विक्टिमहुड, शिकायत, संशयवाद और हर बात के पीछे षड्यंत्र देखने की मानसिकता हमें कमजोर और असहाय महसूस कराता है और इसकी अभिव्यक्ति अनायास ही हम करते रहने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। हर सार्वजनिक व्यक्तित्व और घटना के प्रति कटुता का प्रदर्शन हमारी इस असहाय स्थिति की ही अभिव्यक्ति होती है। इस दुष्चक्र में न केवल सामान्य जनता बल्कि सार्वजनिक कर्म अपनाने वाले लेखक, समाज सेवी, राजनीतिक कार्यकर्त्ता भी समान रूप से फंसते जा रहे हैं। यह हमें कुछ सकारात्मक कर पाने को प्रेरित करने की बजाए, हमारे द्वारा गढ़े गये इस ‘अन्य’ अज्ञात शत्रु को सर्वशक्तिमान और हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहरा देता है।</p>
<p><strong>आर्थिक और समाजी</strong> असमानताओं से भी हमें भौतिक से ज्यादा मानसिक स्तर पर निपटने की जरूरत हो सकती है। संसद ने एक विविधतापूर्ण मंच पर बराबरी का जो अवसर हमारे जनप्रतिनिधियों को दिया है उससे समाज के विभिन्न तबकों का मानसिक स्तर पर भी हीलिंग हुआ है। उनकी भाषा में बराबरी का आत्मविश्वास आ गया है। समानता को इसके भौतिक अर्थों में निरूपित कर देने की प्रवृत्ति ने कई समुदायों को राजनीतिक और सामाजिक बराबरी की भावना के फायदे से वंचित रखा है। क्योंकि गैरबराबरी प्रायः भाषा और व्यापक वैमर्शिक वातावरण में मानसिक स्तर ज्यादा मौजूद है। इस भाषा ने हमारे राजनीतिक सोच की धारा को भी प्रभावित किया है। तभी तो हम अपने प्रतिनिधियों को वोट देकर उन्हें पदस्थापित करते हैं और आगे की समस्त जिम्मेदारी उनके कंधे डाल देते हैं। यह भला बराबरी का संबंध कैसे हो सकता है? साझेदारी या भागीदारी की जगह हम उनसे लेन-देन वाला संबंध चाहते हैं। उनको सहयोग, समर्थन और सशक्तिकरण देने की बजाए हम उन्हें ऊपर बिठा कर उनसे कुलीन जैसा बना देते हैं। हम स्वयं को उनके समक्ष हम अपनी मांग रखते जाने का अधिकारी समझने लगते हैं। उनसे कठोर राजनीतिक इच्छाशक्ति वाले महामानव होने की अपेक्षा करने लगते हैं। उन्हें ‘स्व’ से अलग कर ‘अन्य’ बना देते हैं। उनसे घृणा करने लगते हैं और इसके लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि इस घृणा से सामने वाले में कोई सकारात्मक परिवर्तन संभव नहीं है, बल्कि उल्टे यह हमें भी घृणा ही वापस मिलेगा।</p>
<p><strong>संसद की साठवीं वर्षगांठ</strong> हमारे लिए एक मौका भी हो सकता है जब हम इन समस्याओं को एक भावनात्मक और मानवीय स्तर पर भी देखना शुरू करें। तात्कालिक रूप से हमारी मानसिक पृष्ठभूमि में चल रहे नकारात्मक और हिंसक विचाराभिव्यक्तियों का आनंद लेना बंद करें। मानवता की बुनियाद बिना शर्त्त प्रेम है। मानव समाज की उत्तरजीविता के लिए भी इससे अलग कोई अन्य तरीका नहीं है। लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रतिनिधियों को अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और मानवीय संबंधों से अलग कोई चीज मानने की भावना हमारे भीतर घर करती जा रही है जिसे हमें समय रहते समझना होगा। इस राजनीतिक समाज और विमर्श में एक बराबरी का हिस्सेदार होने की वजह से यह भी जानने-समझने का प्रयत्न करना होगा कि यही सारा घटनाक्रम उनकी जगह पर खड़े होकर उनकी नजरों से कैसा दिखाई देता है। बल्कि इससे भी आगे उनके करीब जाकर यह जानने का प्रयत्न करना होगा कि वे कौन सी चीजें हैं जो उनकी मूल प्रतिबद्धताओं और विजन तक पहुंचने या हमारी सामूहिक चेतना से जुड़ने से उन्हें रोक रहीं हैं। उन्हें इससे वापस जोड़ने की सकारात्मक और भावनात्मक पहलकदमी भी हमारी ओर से होनी होगी।</p>
<p><strong>क्या क्रिटिकल</strong>, पीआर और पेड के अतिरिक्त राजनीतिक विश्लेषण और विमर्श का कोई मानवीय नजरिया भी हो सकता है? क्या इससे सकारात्मक और साझी संभावनाओं से युक्त सशक्त संवादों और प्रयासों का माहौल बन सकता है? क्या हमारे बीच प्रेम, दया, सहयोग, सहानुभूति, करुणा, साझेदारी, भागीदारी, मानवीय स्तर पर छूने और प्रेरित करने वाला संवाद संभव है? क्या हम कोई ऐसा फ्रेमवर्क अपना सकते हैं जिसमें कोई ‘अन्य’ न हो, केवल ‘स्व’ का विस्तार हो?
<p style="text-align: right;"><em><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2011/03/Shashi-Kumar-Jha.jpg" alt="" title="Shashi Kumar Jha" width="80" height="80" class="alignleft size-full wp-image-21936" />(<strong>शशि कुमार झा</strong>। <a href="http://democracyconnect.org/" target="_blank"><strong>डेमोक्रेसी कनेक्ट</strong></a> में संवाद सूत्रधार। बीबीसी जैसी संस्‍थाओं से जुड़े रहे। इंटरनेट पर हिंदी को जमाने में भी बड़ा हाथ रहा। डीयू से आईआईएमसी तक राजनीति और पत्रकारिता की पढ़ाई की। वक्‍त मिले तो शशि के ब्‍लॉग <a href="http://railwaygumti.blogspot.com/" target="_blank"><strong>अष्‍टावक्र</strong></a> पर भी जाएं। उनसे avyaktashashi@gmail.com और shashi@democracyconnect.org पर संपर्क किया जा सकता है।)</em></p>
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		<title>पूर्ति की तरह आप भी उठिए, सिनेमा की खेती शुरू कर दीजिए</title>
		<link>http://mohallalive.com/2012/05/13/purti-sohani-shared-her-experiances-about-her-first-film-gps/</link>
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		<pubDate>Sat, 12 May 2012 20:30:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[ख़बर भी नज़र भी]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[Guess Pyar Se]]></category>
		<category><![CDATA[Purti Sohani]]></category>
		<category><![CDATA[Syed Ahmad Afzal]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>पूर्ति सोहनी</strong> ♦ मेरी लघु फिल्‍म तैयार थी। मैंने पहले कट को बार-बार देखा और यही सोचा कि इससे पहले मैंने फिल्‍म क्‍यों नहीं बनायी। फिल्‍ममेकिंग ऐसा अनुभव है, जो आपकी आत्‍मशक्ति को एक अलग मुकाम पर ले जाता है। मैंने और अफजाल ने यह फिल्‍म अपने दोस्‍तों को दिखायी। उन्‍होंने हमारी इस छोटी सी फिल्‍म को सराहा। मैंने तब यह महसूस किया कि मुझ जैसे अस्‍पाइरिंग फिल्‍ममेकर को एक सच्‍ची पहल करनी चाहिए। यह सोचे बिना कि अंजाम क्‍या होगा। फिल्‍म बनानी जरूरी है, दर्शक उसे छोटा या बड़ा बनाते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ पूर्ति सोहनी</strong></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 2px solid">सिनेमा सिर्फ तकनीक से नहीं बनता। न सिर्फ पैसे से। आपके पास एक कहानी हो, तब भी आप सिनेमा के जरिये उसे कह सकें, ये जरूरी नहीं। जरूरी है वो जिद, जिसकी ओढ़नी ओढ़ कर आप चल पड़ते हैं और जैसी भी हो, एक शुरुआत कर डालते हैं। पूर्ति सोहनी ने ऐसी ही एक शुरुआत की है और जिंदगी में पहली बार एक्‍शन बोलते हुए वह एक इतिहास में शामिल हो जाती हैं, जहां पहली बार किन्‍हीं दादा साहब फाल्‍के ने एक्‍शन बोला होगा, पहली बार किन्‍हीं शांताराम, गुरुदत्त, श्‍याम बेनेगल और अनुराग कश्‍यप ने एक्‍शन बोला होगा। अपनी छोटी सी फिल्‍म के बनने की कहानी वो हमारे आग्रह पर हमसे साझा कर रही हैं : <strong>मॉडरेटर</strong></div>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span></p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 350px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><a href="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/GPS-Poster-Full-Image.jpg" target="_blank"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/GPS-Poster.jpg" alt="" title="GPS Poster" width="350" height="541" class="alignnone size-full wp-image-29550" /></a><br />
<strong>जीपीएस उर्फ गेस प्‍यार से का पोस्‍टर। चटका लगा कर पोस्‍टर को बड़ी साइज में देखें।</strong></div>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">मे</span>री साढ़े चार पेज की स्क्रिप्‍ट तैयार थी। बहुत सोच के लिखी गयी थी। अफजाल के घर की चार दीवारी से बाहर नहीं जाना था, वरना बजट उलट पलट हो जाता और एक दिन में सब शूट करना था। री-टेक्‍स ज्‍यादा न हो और एक दिन में शूट पूरी हो जाए, यह ध्‍यान में रख कर मैंने अदाकारों की एक वर्कशॉप रखी। हमने वर्कशॉप में वो सब गलतियां की, जो शूट पर नहीं करनी थी। हमारे कैमरा मैन दीपक पांडे ने अदाकारों को वर्कशॉप के दौरान रेकॉर्ड किया, जो फुटेज शूट पर बहुत काम आया।</p>
<p><strong>शूट से एक दिन पहले</strong> मैंने, अफजाल और दीपक ने फैसला लिया कि हम इसे सिंक साउंड पर शूट करेंगे। सिंक साउंड पर शूट करने के फायदे और नुकसान, दोनों होते हैं। री-टेक्‍स ज्‍यादा होते हैं और शूटिंग लंबी खिंच सकती है। पर कहानी और अदाकार आम जिंदगी के करीब थे, इसलिए हमने फैसला लिया कि फिल्‍म को ऑन लोकेशन साउंड पर शूट करेंगे।</p>
<p><strong>शूट का दिन</strong> आया। मैं थोड़ी घबरायी हुई थी। अफजाल के घर के बेडरूम और ड्रॉइंग हॉल में हमें शूट करना था। मेरी प्रोडक्‍शन डिजाइनर और स्‍टाइलिस्‍ट सना ख़ान दोनों कमरों को संवारने में लग गयी। अदिति चौधरी और जीशान अय्यूब जो मेरी फिल्‍म के मुख्‍य पात्र हैं, सबसे पहले शूट पर पहुंचे। हमें उनकी कुछ तस्‍वीरें उतारनी थी। स्क्रिप्‍ट में दरकार थी। अदिति और जीशान इससे पहले नहीं मिले थे। फोटो सेशन के दौरान उन दोनों में भी जान-पहचान हो गयी।</p>
<p><strong>दीपक अपने कैमरा के साथ</strong> तैयार था। मैंने अपनी स्क्रिप्‍ट के अनुसार पहला शॉट दीपक को बताया। अदिति जो एक टूटे रिश्‍ते से गुजरती हुई सुनिधि का किरदार निभा रही थी, मुझे उसकी तकलीफ बहुत सरल भाव में दर्शानी थी। दीपक ने शॉट लगाया। साउंड मैन भी तैयार था, और फिर मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार &#8216;एक्‍शन&#8217; पुकारा। बाकी आठ घंटे कैसे बीते, मुझे खुद खबर नहीं हुई।</p>
<p><strong>हमारे पास</strong> कुल 40 मिनट की फुटेज इकट्ठा हुई थी, जिसको हम एडिटिंग स्‍टूडियो ले गये। इससे पहले मैंने सिर्फ सुना ही था बड़े बड़े फिल्‍ममेकर्स के मुंह से कि फिल्‍म असल में एडिटिंग टेबल पर बनती है। एडिटिंग का सबसे बड़ा अनुभव यह रहा कि जो गलतियां शूट पर हुई थीं, उन्‍हें काफी हद तक ठीक किया जा सकता है, पर इसका मतलब यह नहीं कि सेट पर आप रिलैक्‍स कर सकते हैं। हमारे एडिटर नदीम खान ने कुल चार घंटे के अंदर उस चालीस मिनट के फुटेज को साढ़े पांच मिनट की एक लघु फिल्‍म में तब्‍दील कर दिया।</p>
<p><strong>अब मेरी लघु फिल्‍म</strong> तैयार थी। मैंने पहले कट को बार-बार देखा और यही सोचा कि इससे पहले मैंने फिल्‍म क्‍यों नहीं बनायी। फिल्‍ममेकिंग ऐसा अनुभव है, जो आपकी आत्‍मशक्ति को एक अलग मुकाम पर ले जाता है। मैंने और अफजाल ने यह फिल्‍म अपने दोस्‍तों को दिखायी। उन्‍होंने हमारी इस छोटी सी फिल्‍म को सराहा। मैंने तब यह महसूस किया कि मुझ जैसे अस्‍पाइरिंग फिल्‍ममेकर को एक सच्‍ची पहल करनी चाहिए। यह सोचे बिना कि अंजाम क्‍या होगा। फिल्‍म बनानी जरूरी है, दर्शक उसे छोटा या बड़ा बनाते हैं।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 545px; LINE-HEIGHT: 180%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 2px solid">
<p><iframe width="540" height="304" src="http://www.youtube.com/embed/RYMVxSHLtpc" frameborder="0" allowfullscreen></iframe></p>
</div>
<p><span style="color: #ffffff;">&#8230;</span></p>
<p style="text-align: right;"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2012/05/Purti-Sohani.jpg" alt="" title="Purti Sohani" width="80" height="80" class="alignleft size-full wp-image-29557" /><em>(<strong>पूर्ति सोहनी</strong>। युवा फिल्‍मकार। जीपीएस (गेस प्‍यार से) पहली शॉर्ट फिल्‍म। विद्या भवन, पुणे और सिंबॉयसिस कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स से डिग्रियां। पिछले कुछ सालों से मुंबई में। उनसे http://facebook.com/purti.sohani पर संपर्क कर सकते हैं।)</em></p>
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