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10 Comments »

  • Indra Nath Mishra said:

    I want to be member

  • अवधेश said:

    वास्तव में बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छा पढने को मिला

  • बालकिशन said:

    मार्गदर्शक ब्लाग है

  • Ashutosh dubey said:

    Thank add me

  • Dharmender said:

    Nilakshi Singh
    क्या आपने इन बातोँ पर गौर किया है :

    1. आदिशक्ति दुर्गा किसी समय दुर्गा के रूप आती है या नहीं ?

    2. यहाँ रूप से क्या तात्पर्य है ? एक ही जन्म में ये विभिन्न रूप हैँ या ये विभिन्न जन्मों का रूप है ?

    3. यदि ये विभिन्न जन्म हैँ तो दूसरे जन्म में ब्रह्मचारिणी जो शंकर को पति रूप मेँ प्राप्त करने के लिए घोप तपस्या करती है (शादी हुई या नहीं पता नहीं) और अष्टम रूप महागौरी है जो पार्वती या गौरी है जो भगवान शंकर की पत्नी है. दूसरे जन्म से आठवे जन्म के बीच शंकर वैसे के वैसे रहे और गौरी इतनी बार जन्म ले चुकी. यदि रूप का मतलब जन्म नहीं है तो कहीँ दुर्गा ने शंकर को ही पाने के लिए विभिन्न रूप तो नहीँ बदला और अंत में गौरी के रूप में पाई ?
    कहीँ ऐसा तो नहीं कि शंकर ही महिषासुर है ?

    4. स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है. स्कंद (कुमार कार्तिकेय) के पिता कौन थे ?

    5. महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था. इसलिए वह कात्यायनी कहलाती है. कात्यायनी की माता का क्या नाम था या महर्षि ने स्वयं बच्चा जना ?

    6. आदिशक्ति दुर्गा का चतुर्थ रूप कूष्मांडा है. अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है. यदि अंड से ब्रह्मांड को उत्पन्न कर दिया तो शंकर के चक्कर में क्यों पड़ी रहीं ?

  • अमीना खान said:

    इस्लाम का संस्थापक मोहम्मद आपने दोस्त कि बेटी आयसा के साथ ( ८ वर्ष कि उम्र से)अपनी बीबी बनाकर संभोग करता रहा | अपने इस्लाम में आज भी औरतो से शादी नही कि जाती है बल्कि रूपये कि बोली लगाकर औरतों को ख़रीदा जाता है
    इस्लाम में औरतों को शादी के नाम पर खरीदने कि प्रथा————- —————————————————————————————————————————————————————————————————————————————————————————————————–

  • Maayank said:

    मेरे भीतर की बदसूरती
    एक दिन यूंही जब खुद को आइने में देखा
    मैं मुझे खुद ही बड़ा बदसूरत लगा
    क्योंकि चेहरे के साथ साथ
    मैं देख सकता था अपने भीतर भी,
    मेरे भीतर की बदसूरती…
    जिसे मैं दुनिया से छुपा ले जाता हूँ
    खुद से उसे कैसे छुपाऊँ
    मैं नहीं समझ पाता हूँ,
    लाख छुपाना चाहूं मगर –
    दिख ही जाती है मुझे भीतर की बदसूरती……….
    देख कर जिसे आईने में –
    मैं खुद से ही खुद डर सा जाता हूँ

    मेरे भीतर एक राम भी है
    एक रावण भी
    कभी सद्गुण मुझे राम बना देते हैं
    तो कभी दुर्गुण मुझे रावण,
    सद्गुणों और दुर्गणों के बीच का यह संघर्ष….
    मनुष्य के भीतर से होता हुआ ही समाज तक पहुँचता है
    यह युद्ध चिरकालीन है
    चिरकाल से चला आ रहा है और चिरकाल तक चलता रहेगा
    विजय राम की ही होगी
    किन्तु रावण कभी हार नहीं मानेगा
    कितनी ही बार क्यों न जला दें हम रावण
    पर वह कभी मरता नहीं
    वह शायद अजर है, अमर भी है
    जब तलक राम का अस्तित्व
    रावण का अस्तित्व भी रहेगा
    जब तलक मनुष्य का अस्तित्व है
    राम भी जीवित रहेंगे,
    रावण भी जीवित रहेगा……….

  • Maayank said:

    भ्रष्टाचार से निपटना के बहुत आसान होगा यदि हम इसकी शुरुआत अपने घरों से करें
    हम एक भ्रष्ट व्यवस्था की संताने हैं. और यह व्यवस्था हमारी रगों में अब खून के कतरों की तरह रही है. वैसे तो इस भ्रष्ट व्यवस्था की नींव अगंरेजों ने रखी थी, लेकिन आजादी के बाद भी वही व्यवस्था बदस्तूर जारी रही. अतः “भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े आज के इस भारत” को यह ग़लतफ़हमी कतई नहीं पाल लेनी चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मात्र खड़े होकर हमारे सारे पाप धुल जायेंगे ओंर भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा. सत्य तो यह है कि अब हमें अपने भीतर झांककर भी देखना होगा. मात्र नेताओं की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते रहकर कोई फायदा नहीं होनेवाला. हमें खुद ही आगे बढ़कर “ग्रास रूट लेवल” से इसके सफाए की शुरुआत करनी होगी. भ्रष्ट लोगों के समाज में बढ़ते रुतबे को नकारने के साथ, हमें इसकी शुरुआत अपने ही घरों से करनी पड़ेगी. अपनी बेटियों की शादी के लिए जाते समय दामाद की उपरी कमाई के प्रति हमारे नजरिये को बदलना होगा. एक ईमानदार आदमी की साख को पुनः हमारे घरों में स्थापित करना होगा .

    भ्रष्ट लोगों के प्रति हेयता की दृष्टि को पुनः समाज में स्थापित करना होगा. दरअसल ७० ओर ८० के दशक तक ईमानदारी, भ्रष्टता पर भारी पड़ती थी. शहर, मोहल्ले में किसी के घर पुलिस का आ धमकना शर्म की बात हुआ करती थी. लेकिन उदारीकरण के साथ लोगों का भ्रष्ट लोगों ओंर भ्रष्टाचार के प्रति नजरिया भी उदार होता चला गया. ओंर यही उदारता अब हमारे गले की फाँस बन गई है. हमारे भ्रष्टाचार के प्रति बदले नजरिये ने ही इस समस्या को विकराल कर दिया है. अब पुलिस, थाना, कोर्ट, कचहरी सब बड़मनियत की निशानी हो गयी हैं. हमरा लड़का जेल गया तो क्या ? राजा, कनिमोझी, कलमाड़ी, लालू, बलवा, सब बड़मनई लोग जेल जाते रहते हैं. जेल जाना अब कोई शर्म की बात नहीं रह गई है. “भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े भारत” को सर्वप्रथम समाज के इस बदले नजरिये को बदलना होगा, अन्यथा इन नेताओं के साथ हम चाहे कितना भी सिरफुटव्वल कर लें पर लोकपाल बिल लाने का उद्देश्य पूरा नहीं होगा. समकालीन घटनाएँ स्पष्ट रूप में इशारा कर रही हैं कि इस व्यवस्था के समाप्त होने की सम्भावना अब सामाजिक परिवर्तन के बिना संभव नहीं है. हमारे नेता लोग जब तक अपने घर, गली, मुहल्लों, शहर ओंर, संसदीय क्षेत्रों में हेयता की दृष्टि से नहीं देखे जायेंगे तब तक सही लोकपाल बिल के पास होने की उम्मीद करना ही बेमानी है.

    वर्तमान स्थिति तो ऐसी है कि “लोकपाल बिल” के साथ ही नेताओं के मुंह में पानी आने लगा है. कितनी नियुक्तियां, कितना बजट, “भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए अधिकार” के साथ ही बंदरबांट के नए अवसर उनकी जिह्वा को गीला किये जा रहे हैं. किसी भ्रष्ट समाज या राष्ट्र में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए खड़ी की गई मशीनरी भ्रष्ट व्यवस्था पर ही खड़ी होती है. अतः इस मशीनरी के सहारे भ्रष्टाचार के समाप्त होने की उम्मीद तो कम ही है, लेकिन भ्रष्टाचार के बढ़ने की गारंटी निश्चित है. देश के धन को कैसे “लिमिटेड” लोग मिलकर “अनलिमिटेड” ढंग से लूट सकें, इसी होड़ में देश आज इस कगार पर पहुच चुका है कि गरीबी की परिभाषा तक बदलती जा रही है. दिन के तीस चालीस रूपये कमाने वाला गरीब, गरीब नहीं माना जा सकता है, चाहे उसके बच्चे कुपोषण की वजह से ही क्यों न मरते हों. आयोगों के आंकड़े अक्सर चोंकाते रहते हैं ओंर हम सिर्फ चोंक कर ही रह जाते हैं क्योंकि वे आंकड़े हमारे परिवारों के नहीं होते हैं. ऐसी घटनाओं पर अब हमें दया भी नहीं आती है क्योंकि यह घटना हमसे नहीं गरीबों से सम्बंधित होती है, जो कि हम नहीं हैं. सच हम कितने निष्ठुर हो चले हैं गरीबों के प्रति. हमारा यही नजरिया देश की सुरक्षा को खतरा पहुंचाने लगता है, नक्सलवाद और आतंक बनकर, लेकिन हम फिर भी नहीं चेतते हैं. मात्र बातों से इन गरीबों का पेट नहीं भरता सरकार, गरीब के पेट को रोटी भी चाहिए.
    “वेलकम टू द वर्ल्ड ओफ करप्शन“ के मूक स्लोगन के साथ लोकपाल की सम्पूर्ण मशीनरी को समाजवादी रूप देने का प्रयास जारी है. सरकारी मशीनरी में आरक्षण के जरिये हर समाज को लूट की हिस्सेदारी मिलेगी. वोट बंटते रहेंगे और १५ से २०% वोट पाने वाले १००% देश पर राज करते रहेंगे. अन्ना बेचारे अकेले क्या कर पाएंगे, जब गन्ना चूसते राजनेता उन्हें २०१४ के बाद भी मुंह बिराएंगे. हम नहीं सुधरेंगे के मूक अहवाह्न के साथ राजनेता एक दुसरे से हाथ मिलांयेगे और टीम अन्ना अन्ना फिर किसी मैदान में झंडे लहरायेंगे.
    भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हमें राजधानी के रामलीला मैदान को छोड़ कर हर शहर के रामलीला में उतरना होगा. हर गली, हर मोहल्ले,हर शहर, हर गाँव को इन लहराते झंडों की जरूरत है. एक बात अब साफ़ साफ़ समझ लेनी होगी भ्रष्टाचार तब तक इस देश पर राज करेगा, जब तक वह हमारे घरों में रहेगा. जिस दिन हम इसे अपनी गली, मुहल्लों, शहर, समाज से बाहर कर देंगे उसी दिन इस देश से इस कोढ़ से निजात मिल जायेगी. जिस दिन भ्रष्ट व्यक्ति अपने घर, गली, मोहल्ले, शहर, समाज में जलील होगा या हेय दृष्टी से देखा जायेगा, उस दिन बिना किसी आन्दोलन के भी लोकपाल बिल पारित होकर रहेगा. अतः “भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े कामरेडों” सबसे पहले अपने घर, गली, मुहल्लों, शहर, समाज के चोरों को पकड़ना और बेनकाब करना शुरू कीजिये, ये नेता स्वमेव ही भाग खड़े होंगे.

  • Maayank said:

    मुंबई में बिहार दिवस – क्या नितीश कुमार जी खुद को गौरान्वित महसूस कर रहे हैं

    मुंबई में यूपी और बिहार दिवस की राजनीति फिर तूल पकड़ती दिख रही है. सच तो यह है कि यूपी और बिहार के आम लोगों का इन दिवसों कोई सरोकार ही नहीं है, न वे वहां इसे मानते हैं और न मुंबई में ही वे इन दिवसों को मनाने के लिए उत्सुक हैं. लेकिन राजनीति इन मुद्दों पर शांत होने को तैयार नहीं है. यूपी और बिहार के आम आदमी की कितनी अधिक उपेक्षा की गयी है यह सर्वविदित है. सभी राजनितिक दलों ने इन प्रदेशों पर राज किया और सभी ने इन प्रदेशों का हर तरह से दोहन भी किया. आजादी के बाद ऊपर की पायदान पर रहने वाले ये राज्य नीचे की पायदान तक पहुँच गए, लेकिन राजनीति इतने से भी संतुष्ट नहीं दिखती है. नितीश कुमार जी ने पहले पांच वर्षों में बिहार में जो सकारात्मकता दिखाई थी वे अब उसकी उगाही सी करने में जुटे हैं.

    महाराष्ट्र या मुंबई में बिहार दिवस की राजनीति छोडिये और वहां के लोगों को शांति बख्शिए. एक बिहारी रोजगार के लिए लन्दन यदि मात्र इसलिए गया हो क्योंकि बिहार में उसके पास रोजगार नहीं है, तो वह लन्दन में “बिहार दिवस” मनाकर कितना गौरान्वित महसूस करेगा इस प्रश्न का उत्तर भी बिहार के नेताओं को देना चाहिए.
    उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिये
    वे अपनी राह खुद ही बना लेंगे
    कम से कम रास्ते का पत्थर मत बनिए
    गरीबों की बददुआएं हमेशा ही ज़ाया नहीं जातीं……….

  • kavita vikas said:

    nice materials to read

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