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अब्राहम हिंदीवाला ♦ मोहल्ला पर अनुराग कश्यप के प्रशंसकों और आलोचकों के लिए एक खबर है कि उनकी अप्रदर्शित फिल्म ‘द गर्ल इन यलो बूट्स’ इस साल वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गयी है। बतौर निर्माता उनकी फिल्म ‘उड़ान’ इस साल जून में कान फिल्म फेस्टिवल में अधिकृत रूप से चुनी गयी थी। स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए यह प्रेरक खबर है, क्योंकि देश में बन रही सात-आठ सौ फिल्मों में से चंद फिल्में ही इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलों के लिए चुनी जाती हैं। आलोचक पूछ सकते हैं कि विदेशी तमगों से इन फिल्मों को क्या फायदा होगा? फायदा तो होता है। इंटरनेशनल पहचान से कृति और रचना का भाव बढ़ जाता है। हम भारतीय उसे नए नजरिए से देखने लगते हैं।
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आमिर खान ♦ पीपली लाइव एक काल्पनिक कहानी है दो भाइयों की, जो किसान हैं। फिल्म की शुरुआत में कर्ज न चुकाने की वजह से वे अपनी जमीन खोने वाले हैं। इसी दौरान उन्हें पता चलता है एक सरकारी योजना के बारे में, जो कहती है कि जो किसान कर्जे की वजह से आत्महत्या करता है, उसके परिवार को एक लाख रुपये दिये जाएंगे। यह सुन कर बड़ा भाई छोटे भाई को मनाता है कि वह आत्महत्या कर ले ताकि परिवार को एक लाख रुपये मिल जाएं। बड़ा भाई थोड़ा तेज है। छोटा भोला है, तो उस वक्त तो वह मान जाता है। उस समय इन दोनों को बिल्कुल अंदाजा नहीं है कि जो कदम वे उठाने जा रहे हैं, उससे उस गांव में क्या होने वाला है। यह फिल्म एक मजाकिया नजर है हमारे समाज पर।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ अफसोस नहीं होता। कोफ्त होती है। दोस्तों की हालत देख कर, जब एक टुच्ची खबर से उनकी नौकरी दावं पर लग जाती है। फिल्म पत्रकार हैं तो फिल्मों के अलावा सारी बातें करें। लाइफ स्टाइल और कपड़ों की बातें करे। स्टारों के अफेयर के बारे में रस लेकर बताएं। फिल्म की थीम और ट्रीटमेंट पर आप क्यों बात करते हैं… अरे भाई, रीडर नहीं चाहता कि आप गंभीर बातें करें। उसे तो सनसनी और उत्तेजना चाहिए। आप नहीं समझते तो नाहक यहां क्यों आ गये। मोहल्ला में दलित विमर्श चल रहा है। वंचितों की बात हो रही है। भाई मीडिया को भी वंचितों की परवाह नहीं है। वंचित अगर उनके संचित धन में इजाफा करता है, तो वह उपयोगी है। वर्ना लाइफ स्टाइल बेचो।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ हिंदी सिनेमा का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। बशर्ते हिंदी समाज यानी हिंदी प्रदेशों के दर्शक हिंदी फिल्मों में रुचि लें। वे सिनेमाघरों में फिल्में देखने जाएं। अपनी पसंद-नापसंद जाहिर करें। हिंदी प्रदेशों से निर्माता-निर्देशक आएं। वे अपने साथ हिंदी समाज की संवेदना और संस्कृति ला सकते हैं। ताजा उदाहरण है, ‘राजनीति’। फिल्में कलात्मक व्यवसाय हैं। एक प्रोडक्ट की तरह ही इनका निर्माण, वितरण और उपभोग होता है। हर निर्माता अपनी फिल्मों के ज्यादा से ज्यादा दर्शक चाहता है। बाजार में फिल्में एक ऐसा प्रोडक्ट है, जिसका एमआरपी सुनिश्चित नहीं है। मुंबई में आई हेट लव स्टोरीज के टिकट सप्ताहांत में 400 रुपये तक में बिकेंगे, जबकि यही फिल्म किसी छोटे शहर में 5 रुपये में देखी जाएगी।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ विक्रमादित्य मोटवाणी की ‘उड़ान’ कान फिल्म फेस्टिवल के ‘अनसर्टेन रिगार्ड’ खंड के लिए चुनी गयी थी। सात सालों के बाद किसी भारतीय फिल्म को यह अवसर मिला था। मजेदार तथ्य यह है कि उन दिनों कान में मौजूद हमारे स्टारों को इतनी फुर्सत भी नहीं मिली कि वे ‘उड़ान’ के शो में जाकर भारत के गौरव में शामिल हों। और मीडिया… उसकी आंखें तो कंगूरों (लंगूरों) से हटती ही नहीं… इसलिए ‘उड़ान’ की कोई खबर और फुटेज नहीं दिखी। निराश न हों अनुराग, संजय और विक्रमादित्य… आप अपने दर्शकों का नया समूह तैयार कर रहे हैं। (किसी भी मीडिया में पहली बार पेश है उड़ान की एक्सक्लूसिव तस्वीरें)
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ सभी अपनी जिद में मुंबई आते हैं। सपने सजाते हैं। संघर्ष करते हैं। कुछ हासिल करने की कोशिश में सबसे पहले वे दोस्त और रिश्ते गंवाते हैं। गलाकाट स्पर्धा में उन्हें पुराने मित्रों पर भी भरोसा नहीं रहता। कहीं न कहीं परिवार की इच्छा के विरुद्ध होने के कारण उन्हें फैमिली का इमोशनल सपोर्ट भी नहीं मिलता। वे शोहरत के सफर में तनहा होते जाते हैं और यह तनहाई की एक शाम इतनी भारी हो जाती है कि भविष्य के लिए अगला कदम भी उठाना मुश्किल हो जाता है। विवेका की मौत सबक है। मुंबई आये सभी ख्वाहिशमंदों से एक ही गुजारिश है कि कुछ पाने की उम्मीद में दोस्तों और रिश्तों को न खोएं। अपने पास कुछ दोस्तों और संबंधियों को रखें, जिनसे अपनी हार शेयर करने में शर्मिंदगी न हो।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ प्रकाश झा की ‘राजनीति’ ने हिंदी फिल्मों में एनआरआई और शहरी विषय-वस्तु के ट्रेंड को करारा जवाब दिया है। ‘राजनीति’ के पोस्टर और विज्ञापन में ‘करारा हिट’ लिखा जा रहा है। मैं तो चाहूंगा कि प्रकाश झा और सफल हों। उन्होंने ‘मृत्युदंड’ से अलग सिनेमाई भाषा गढ़ने की यात्रा आरंभ की थी। ‘राजनीति’ उसका एक माइलस्टोन है। सफर लंबा है और अन्य फिल्मकारों की जरूरत है। उम्मीद है कि प्रकाश झा के पांव नहीं उखड़ेंगे… उनका साथ देने और भी फिल्मकार आएंगे। मैं तो कहूंगा कि आप भी ‘राजनीति’ की कामयाबी के जश्न में शामिल हों। फिल्म देख ली है तो फिर से देखें। नहीं देखी हो तो जरूर देखें।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ प्रचार के बल पर आकाश में चढ़ी ‘काइट्स’ शुक्रवार को सिनेमाघरों में दिखी और फिर देखते ही देखते बल खाकर लहराती हुई गच्चा खा गयी। मैंने देखा कि राकेश रोशन और रितिक रोशन हाथ में लटाई और डोर लिये अपनी ‘काइट्स’ का गिरना देखते रहे। हवा में ही उसके चिथड़े उड़ गये, इसलिए कटी पतंग में किसी की रुचि नहीं दिखाई पड़ रही है। ऐसा लगता है कि ‘काइट्स’ के सैटेलाइट और डीवीडी राइट के भाव भी गिर जाएंगे। इस हैरानी और परेशानी में मुझे केवल अनुराग बसु ही हंसते दिख रहे हैं। वे ताली बजा रहे हैं और रोशन बाप-बेटे की तरफ इशारा कर जोर-जोर से हंस रहे हैं। उनके पास से गुजरे एक दर्शक ने सुना, ‘मैं कह रहा था दोनों से… फिल्म ऐसी न बनाओ… इस तरह से एडिट न करो।’
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ साजिद खान की ताजा फिल्म ‘हाउसफुल’ को अघाये व्यक्तियों की लतीफेबाजी के संदर्भ में देखने की जरूरत है। ‘हाउसफुल’ अघाये दर्शकों का सिनेमा है। वे हंस रहे हैं। बेचारे गरीब दर्शक को लगता है कि वे हंस रहे हैं तो हमें भी हंसना चाहिए, इसलिए वे भी हंस रहे हैं। पूछ लो कि क्यों हंस रहे हैं तो मुंह चियार कर अमीरों की तरफ सिर्फ इशारा कर देंगे और हो हो हो करने लगेंगे। ‘हाउसफुल’ के बारे में शोर किया जा रहा है कि जनवरी से बॉक्स आफिस पर फैले सन्नाटे को इस फिल्म ने खत्म कर दिया है। फिल्म चल रही है। चल तो रही है, लेकिन क्या सचमुच ‘हाउसफुल’ हाउसफुल है? नहीं जनाब… थिएटर खाली है और सोमवार से और भी ज्यादा सीट खाली मिलेंगी।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ 21वीं सदी के दसवें साल में कोई इतनी घटिया और बेसिर-पैर की फिल्म बनाने की हिमाकत कर सकता है और उसे नाना पाटेकर, सुशांत सिंह, शाहिद कपूर, आशया टाकिया का सहयोग मिल सकता है – यकीन नहीं होता। शर्म आ रही है सभी कलाकारों पर। क्या वे फिल्म की स्क्रिप्ट और डायरेक्टर के अप्रोच को नहीं समझ पाते या फिर उनके लिए अभिनय महज व्यवसाय है। जहां से चार पैसे मिल रहे हों, वहां चेहरा पोते कर खड़े हो जाओ। इस फिल्म को देखने आज जितने दर्शक सिनेमाघरों में जाएंगे, वे अपना धन और समय दोनों बर्बाद करेंगे। ताज्जुब है कि शाहिद कपूर इस फिल्म के प्रचार के लिए बचपन के स्कूल भी गये।



