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कलाओं पर ये कैसा पहरा…? 17

कलाओं पर ये कैसा पहरा…?

उत्तमा दीक्षित ♦ स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा फील नहीं कर रहे। हर सीखने वाले स्टूडेंट के साथ ऐसा ही होता होगा। न्यूड स्टडी करने के लिए किताबों का ही सहारा लेना पड़ता है चाहें वो मार्केट से ली जाएं या लाइब्रेरी से। स्टूडेंट को यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं। डर ऐसा होता है कि कोई क्राइम कर रहा हो। मॉडल न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। उसी तरह जैसे सामने कोई चीज़ रखी हो और उसका उसे चित्रांकन करना हो। जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने के दौरान जब मैंने श्रद्धा और मनु को कैनवास पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज़्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। ग्वालियर में इस सीरीज़ की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन पर मैंने खूब हंगामा झेला। स्त्री होकर भी एक स्त्री को मैंने इस रूप में क्यों बनाया, यह सवाल मुझसे पूछा गया। मैं परेशान और दुखी थी।

आप पागल हैं, तो दुनिया आपकी है! 3

आप पागल हैं, तो दुनिया आपकी है!

रवि प्रकाश ♦ जाने-माने लेखक शिव खेड़ा ने एक बार इलाहाबाद में कहा कि किसी भी कंपनी के सिर्फ पांच फीसदी लोग अपना अस्सी फीसदी एफर्ट लगाते हैं, तो वह कंपनी चलती है। मतलब यह कि सिर्फ पांच परसेंट लोग ऐसे हैं, जो भीड़ से अलग दिखना चाहते हैं। बाकी लोग नौकरी करते हैं और भीड़ में शामिल होकर अपनी जिंदगी काट देते हैं। दुनिया उन्हें याद नहीं रखती। अब भीड़ से अलग दिखना बड़ा आसान-सा काम है। अगर आपमें अपने काम के प्रति जरा-सा भी पागलपन है, तो आप भीड़ से अलग दिख सकते हैं। इसके लिए किसी खास प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। मतलब भीड़ से अलग दिखने के लिए आपका पागल होना जरूरी है।

उत्तमा की कामायनी : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग 69

उत्तमा की कामायनी : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग

उत्तमा दीक्षित ♦ प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम मुझे प्रेरक लगा। कल्पना की उस समय की। मैं जैसे खो सी गयी। मैंने तत्काल पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया और देखते ही देखते मनु का चित्र उतर आया। बेशक, अन्य कल्पनाओं की तरह यह कल्पना भी मुश्किल नहीं थी। पहले चित्र का स्केच मनमुताबिक आना शुरू हुआ तो उत्साह बढ़ा। हालांकि विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में बाद में खासी मेहनत करनी पड़ी। प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण है।

ढह रहा है एक संस्‍थान, बचा सकें तो बचाइए 3

ढह रहा है एक संस्‍थान, बचा सकें तो बचाइए

शंभुनाथ ♦ यह भी कम अमानुषिक नहीं है कि केंद्रीय हिंदी संस्थान में अनुबंध पर रखे गये बत्तीस लेक्चररों को बिना कारण बताये मार्च-अप्रैल, 2009 के महीनों में हटा दिया गया। किसी की अवधि बढ़ायी नहीं गयी, काम ठप हो तो हो। निश्चय ही संस्थान में पहले भी अनुबंध पर लेक्चरर रखे जाते थे। ये बत्तीस लेक्चरर विभिन्न केंद्रों और मुख्यालय से आयी मांगों के आधार पर ज़रूरत से और नियमों के अनुसार रखे जाते थे। मेरे कोलकाता लौटने के बाद, बड़े ही उद्देश्यपूर्ण ढंग से आतंक पैदा करने के लिए इन्हें हटवाया गया, जो संस्थान का एक काला अध्याय है।