Articles tagged with: alok mehta
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अनामदास ♦ काव्य संध्या में उपस्थित सभी श्रोताओं ने देखा कि किस तरह मंच पर उपस्थित गंभीर युवा कवियों को हिंदी अकादमी के विदूषक उपाध्यक्ष द्वारा लगातार अपमानित किया गया और लोकप्रियता को ही कविता की सफलता की शर्त बता कर उन्हें नसीहत दी गयी। इस हास्यास्पद तर्क का कोई क्या करे, जब हिंदी के वरिष्ठ कवि और ज्ञानपीठ विजेता कुंवरनारायण भी कार्यक्रम में पीछे की पंक्ति में बैठे थे। शायद वे अनजाने में या ज्ञानपीठ के लिहाज में वहां आ गये हों लेकिन जल्द ही कुंवर जी कार्यक्रम में असहज हो गये और उठकर चलते बने। यही नहीं, कवयित्री अनामिका के काव्यपाठ पर तो कन्हैयालाल नंदन कुछ इस तरह भड़के कि मंच पर उन्हें डांटने लगे।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ नेट पर हिंदी बड़ी कमज़ोर है। सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं। दूसरी बात यह कि नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी। नेट के विचार सिर्फ विचार हैं और वह भी बासी और मृत विचार हैं। उनमें स्वयं चलने की शक्ति नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांतिकारी किताब लिखकर और उसे करोड़ लोगों को पढ़ा कर दुनिया नहीं बदल सकते। नेट लेखन सिर्फ संचार है और संचार से ज़्यादा इसकी कोई अन्य भूमिका भी नहीं है।
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रमेश उपाध्याय ♦ इंटरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिंदी वाले स्वयं कर रहे हैं! नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए।
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डेस्क ♦ आलोक मेहता हमारे समय के महान पत्रकार हैं। इसलिए, क्योंकि उन्हें पद्म पुरस्कार मिला है। इसलिए, क्योंकि वे एडिटर्स गिल्ड के प्रेसीडेंट चुने गये। इसलिए, क्योंकि जहां कहीं संपादक की खोज होती है, सबसे पहले आलोक मेहता को लाने की बात चलती है। टिप्पणीकारों का कहना है कि इन्हीं सब वजहों से जल-भुन कर उन्हें कोसा जा रहा है। खैर, दिलचस्प ये है कि ये सारे टिप्पणीकार अलग-अलग नामों से एक ही आदमी की आत्मा में बैठे हुए हैं। इसकी तस्दीक़ करता है वो आईपी एड्रेस, जो सबका एक ही है। वो फ़र्जी़ ईमेल आईडीज़ भी, जो कमेंट करने के लिए इस्तेमाल किये गये हैं।
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शिरीष खरे ♦ कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि “आलोक मेहता” ने तो “अरुंधती राय” के साथ-साथ “अरुण शौरी” पर भी निशाना साधा था, लेकिन उनका तो जिक्र भी नहीं हो रहा है। दरअसल असली निशाना “अरुंधती राय” पर ही साधा गया था, भरोसे का रंग और जमाने के चक्कर में “अरुण शौरी” को वैसे ही लपेटे में ले लिया गया। लेकिन भाषा और तर्कों की सही मिलावट न होने से रंग बेहद भद्दा हो गया। इसलिए जानने में देर नहीं लगी कि असली प्रॉब्लम “अरुंधती राय” से ही है। वैसे भी “अरुण शौरी” विश्व बैंक में जॉब बजा चुके हैं, इसलिए शतरंज का जो खेल न्यूयॉर्क से चल रहा है, उसका एक इशारा मिलते ही आज नहीं तो कल “अलोक मेहता” को “अरुण शौरी” के बाजू वाले खाने में खड़ा होना पड़ेगा।
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अनिल ♦ हंस की वार्षिक संगोष्ठी में हिंदी के लगभग सभी बड़े-बुज़ुर्ग, प्रतिनिधि रचनाकारों के बीच प्रख्यात लेखिका अरुंधती रॉय ने जो कुछ कहा, वह अगर आप चाहें, तो आंख खोल देने वाली स्थिति थी। यह संभवतः पहली बार है कि हिंदी के इतने बड़े मंच से देश के भीतर राजसत्ता द्वारा अपनी जनता पर छेडे़ गये आंतरिक युद्ध के बारे में, अरुंधती की मार्फ़त, इतनी पुख़्ता और विश्वसनीय जानकारियां मिली हैं। अन्यथा, हिंदी शिक्षित समाज में जो हालात हैं, उनमें इन मुद्दों को लेकर सामान्यतः कोई व्यापक चिंता, बेचैनी और प्रतिरोध के स्वर नहीं मिलते। ऐसे में आलोक मेहता ने अरुंधती के बारे में जो गरिमाहीन और कुत्सित बातें की हैं उनका जवाब देने की दरकार इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसे ’आलोक मेहता’ राज्य द्वारा पोषित एवं संरक्षित प्रोपेगैंडा, ’सूचना उत्पादों’ को ही अपना नीति निदेशक तत्त्व मानते हैं।
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अजित सिंह ♦ राज्यसभा में 29 सदस्यों ने इस विधेयक के विरोध में अपना भाषण दिया लेकिन विडंबना यह है कि जनता के हितों के बारे में गंभीरता से विचार करने वाले इस सदन के एक भी सदस्य ने इस विधेयक के ख़िलाफ वोट देने का साहस नहीं जुटाया। इस विधेयक का नाम तो शिक्षा अधिकार विधेयक है, जिसके बारे में इसके पक्षधर कह रहे हैं कि यह 6-14 साल के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन वे बड़ी सफाई से इस बात को गोल कर देते हैं कि इस विधेयक के लागू होने के पहले तक सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले के आधार पर पहले से ही 0-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला हुआ है।
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माहे तलत ♦ अगर अरुंधती कहती हैं कि छत्तीसगढ़ के अखबारों में आदिवासी लोगों की खबरें नहीं लगती, तो इसमें आपको साजिश की बू नहीं नजर आती। वह चाहती हैं कि अखबारों को विज्ञापन नहीं मिलेगा, तो वह बंद हो जायेगा। अभिव्यक्ति का एक सशक्त मंच दम तोड़ देगा। और आदिवासियों के दुख-दर्द और गरीबी-भुखमरी पढक़र सुबह-सुबह क्यों चाय का जायका कोई खराब करना चाहेगा। इसलिए तो नहीं चलायी जाती हैं खबरें, लेकिन आप निष्पक्ष हों चाहे न हों, लेकिन निष्पक्ष दिखना ज़रूरी है, इसलिए मजबूरी है कि बीच-बीच में उनकी भी ख़बरें छापनी पड़ती है।
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श्रीराजेश ♦ आजकल आपकी चर्चा सरेआम है। सुना है आप राज्यसभा जा रहे हैं, चलिए मैं बहुत खुश हूं। किसी से यह भी सुना है कि कांग्रेस आपकी पार्टी के प्रति निष्ठा से प्रभावित है और यदि किसी कारणवश राज्यसभा न भेज सकी तो किसी राज्य का महामहिम बना देगी। सच बताऊं तो अब आपकी उम्र कलम घिसने के बजाय अब तक से गये कलम की स्याही की कीमत वसूलने की हो गयी है और आप सही दिशा में अग्रसर हैं। बधाई हो। लेकिन जब कुछ लोग कांग्रेस के प्रति आपकी निष्ठा को ले कर जुगाली करते हैं तो मुझे लगता है कि खुद तो वे कुछ कर नहीं सकते, लगते हैं उपदेश देने।
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अनुभव ♦ परम आदरणीय आलोक मेहता जी का आकलन करने में आप लोग थोड़ी ग़लती कर रहे हैं। दरअसल बात यह है कि आलोक जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) उर्फ़ कांग्रेस के सच्चे सिपाही है। निष्ठावान कार्यकर्ता हैं (यह बात अलग है कि उनके पास सदस्यता की रसीद न हो)। वे पूरी निष्ठा, लगन और ईमानदारी से कांग्रेस पार्टी की सेवा करते हैं। मैं उनको बहुत दिनों से तो नहीं जानता या पढ़ता रहा हूं लेकिन जब वे दैनिक हिंदुस्तान में थे, तबसे मैं उनको देख-सुन रहा हूं। हिंदुस्तान से वे भास्कर चले गये। वहां से आउटलुक के प्रधान संपादक बनकर गये और फिर नई दुनिया में लौट आये हैं। इतनी कूद-फांद करने के बाद भी उन्होंने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा में रत्ती भर भी कमी नहीं होने दी।


