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विनीत कुमार ♦ अभी तक हमने किसी भी पत्रकार को इस तरह सार्वजनिक रूप से बेआबरू होते नहीं देखा है। ऑडिएंस के वाजिब गुस्से से आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि सत्ता के गलियारों में चमकनेवाले सफल पत्रकार और होते हैं और जो लोगों के दिलों पर राज करते हैं, वो और ही पत्रकार होते हैं। ऐवाने गालिब जैसे भरे सभागार में हमें एक शख्स भी ऐसा नहीं मिला, जिसने ये कहा कि अरे बैठ जाइए, मेहता साहब को बोलने दीजिए। ये अलग बात है कि उसी सभागार में आलोक मेहता के कूल्हे के नीचे काम करनेवाले नई दुनिया के पत्रकार भी मौजूद थे और मीडिया की नामचीन हस्तियां भी। एक भी स्वर, एक भी हाथ आलोक मेहता के पक्ष में न सही, बोलने देने के आग्रह के लिए नहीं उठे।
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अभिषेक श्रीवास्तव ♦ स्वामी अग्निवेश ने हंस की गोष्ठी में एक संदर्भ का जिक्र किया था। जब हेमचंद्र पांडे की लाश को दिल्ली लाया गया, तो यह सवाल उठा कि आखिर उस लाश को रात भर रखेगा कौन। स्वामी अग्निवेश ने इस संदर्भ में बड़े मार्के की बात कही, जो जितनी सामान्य है, उतनी ही प्रासंगिक भी- तमाम लोगों ने शव को अपने यहां रखने से मना कर दिया। ‘ऐसे ही समय में लोगों की पहचान होती है।’ स्वामी जी ने भले ही शिष्टतावश उन लोगों के नाम नहीं गिनाये जिनकी ‘पहचान’ हेम पांडे के शव ने करा दी थी, लेकिन हंस की गोष्ठी में शनिवार को जो कुछ भी हुआ, उसने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में कुछ ‘शवों और शावकों की पहचान’ करा दी।
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डेस्क ♦ हंस की सालाना गोष्ठी हंगामेदार रही। पूर्व आईपीएस अधिकारी और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय और नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता चोर की तरह भागे। भाषण प्रक्रिया खत्म होने के बाद जब सवाल-जवाब का सिलसिला जैसे ही शुरू हुआ, विभूति नारायण राय मंच से उठ कर जाने लगे। जिसके बाद श्रोताओं ने उनसे रुकने की अपील की। मंच का संचालन कर रहे आनंद प्रधान ने भी उनसे रुकने की अपील की। लेकिन विभूति नहीं रुके। उनको तेजी से दरवाजे की तरफ़ बढ़ता देख श्रोताओं ने कहा कि हमने आपको इतनी देर तक सुना है, आपको हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए। मगर विभूति के कदम रुके नहीं, बल्कि उनकी रफ़्तार और तेज हो गयी…
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डेस्क ♦ विभूति नारायण राय ने कहा कि जो लोग कहते हैं कि देश में इन दिनों अघोषित आपातकाल है, वे अतिरंजना में जी रहे हैं। अगर ऐसा होता, तो संसद से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर हम इस तरह भारतीय राज्य को कोस नहीं रहे होते। विभूति नारायण राय ने कहा कि राज्य की अपनी निर्मिति ही अलोकतांत्रिक है। राज्य असहमति का अधिकार नहीं देता। उन्होंने कहा कि कोई राज्य इतना लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता कि वो अपने अस्तित्व के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष को इजाजत दे दे। विभूति नारायण राय ने कहा कि मैं हिंसा का समर्थक नहीं हूं – लेकिन अगर मुझे चुनना होगा तो मैं राज्य की हिंसा का समर्थन करूंगा। क्योंकि हम इससे तो मुक्त हो सकते हैं, माओवाद की हिंसा से कभी मुक्त नहीं हो सकते।
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डेस्क ♦ क्या आज आपातकाल जैसी स्थितियां नहीं हैं? ऐसा नहीं लगता कि बिना किसी के कुछ कहे हम सेंसर को लेकर कितने सतर्क हो गये हैं? क्या ऐसा नहीं है कि सरकार वो भरोसे की गली है, जहां हममें से हर कोई अपना सिर छुपाना चाहता है? ये कुछ सवाल थे, जो वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने दिल्ली के कांस्टीच्यूशन क्लब में पूछे, रखे। मौका था उदयन शर्मा के 62वें जन्मदिन पर आयोजित परिचर्चा का। विषय था, लॉबीइंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता। दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि हम सिस्टम से इस बारे में कोई कानून बनाने की बात क्यों करते हैं? कानून बनेगा, तो पेड न्यूज के रास्ते दूसरे हो जाएंगे। हमें किसी भी दूसरे से ज्यादा अपनी जमात पर भरोसा करना होगा।
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अनामदास ♦ काव्य संध्या में उपस्थित सभी श्रोताओं ने देखा कि किस तरह मंच पर उपस्थित गंभीर युवा कवियों को हिंदी अकादमी के विदूषक उपाध्यक्ष द्वारा लगातार अपमानित किया गया और लोकप्रियता को ही कविता की सफलता की शर्त बता कर उन्हें नसीहत दी गयी। इस हास्यास्पद तर्क का कोई क्या करे, जब हिंदी के वरिष्ठ कवि और ज्ञानपीठ विजेता कुंवरनारायण भी कार्यक्रम में पीछे की पंक्ति में बैठे थे। शायद वे अनजाने में या ज्ञानपीठ के लिहाज में वहां आ गये हों लेकिन जल्द ही कुंवर जी कार्यक्रम में असहज हो गये और उठकर चलते बने। यही नहीं, कवयित्री अनामिका के काव्यपाठ पर तो कन्हैयालाल नंदन कुछ इस तरह भड़के कि मंच पर उन्हें डांटने लगे।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ नेट पर हिंदी बड़ी कमज़ोर है। सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं। दूसरी बात यह कि नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी। नेट के विचार सिर्फ विचार हैं और वह भी बासी और मृत विचार हैं। उनमें स्वयं चलने की शक्ति नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांतिकारी किताब लिखकर और उसे करोड़ लोगों को पढ़ा कर दुनिया नहीं बदल सकते। नेट लेखन सिर्फ संचार है और संचार से ज़्यादा इसकी कोई अन्य भूमिका भी नहीं है।
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रमेश उपाध्याय ♦ इंटरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिंदी वाले स्वयं कर रहे हैं! नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए।
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डेस्क ♦ आलोक मेहता हमारे समय के महान पत्रकार हैं। इसलिए, क्योंकि उन्हें पद्म पुरस्कार मिला है। इसलिए, क्योंकि वे एडिटर्स गिल्ड के प्रेसीडेंट चुने गये। इसलिए, क्योंकि जहां कहीं संपादक की खोज होती है, सबसे पहले आलोक मेहता को लाने की बात चलती है। टिप्पणीकारों का कहना है कि इन्हीं सब वजहों से जल-भुन कर उन्हें कोसा जा रहा है। खैर, दिलचस्प ये है कि ये सारे टिप्पणीकार अलग-अलग नामों से एक ही आदमी की आत्मा में बैठे हुए हैं। इसकी तस्दीक़ करता है वो आईपी एड्रेस, जो सबका एक ही है। वो फ़र्जी़ ईमेल आईडीज़ भी, जो कमेंट करने के लिए इस्तेमाल किये गये हैं।
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शिरीष खरे ♦ कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि “आलोक मेहता” ने तो “अरुंधती राय” के साथ-साथ “अरुण शौरी” पर भी निशाना साधा था, लेकिन उनका तो जिक्र भी नहीं हो रहा है। दरअसल असली निशाना “अरुंधती राय” पर ही साधा गया था, भरोसे का रंग और जमाने के चक्कर में “अरुण शौरी” को वैसे ही लपेटे में ले लिया गया। लेकिन भाषा और तर्कों की सही मिलावट न होने से रंग बेहद भद्दा हो गया। इसलिए जानने में देर नहीं लगी कि असली प्रॉब्लम “अरुंधती राय” से ही है। वैसे भी “अरुण शौरी” विश्व बैंक में जॉब बजा चुके हैं, इसलिए शतरंज का जो खेल न्यूयॉर्क से चल रहा है, उसका एक इशारा मिलते ही आज नहीं तो कल “अलोक मेहता” को “अरुण शौरी” के बाजू वाले खाने में खड़ा होना पड़ेगा।



