Home » Archive

Articles tagged with: anil chamadia

नज़रिया »

[30 Apr 2011 | 2 Comments | ]

अनिल चमड़ि‍या ♦ राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान 1985 में शुरू किया था जबकि 1982 से ही गंगा मुक्ति आंदोलन चल रहा था। इस आंदोलन में बड़े पैमाने पर गंगा के किनारे रहने वाली विभिन्न पेशों वाली जातियां शामिल थीं। उनमें मछुआरे प्रमुख रहे हैं। आज उन मछुआरों को मछली नहीं मिलती है। प्रदूषण ने मछलियों को मार डाला। उनकी नावें नहीं दौड़ पाती हैं। मछुआरे कब चाहेंगे कि गंगा मैली हो और उनके सामने जीवन का संकट खड़ा हो जाए? उस बहस में एक एक्शन प्लान के लूटपाट में बदल जाने के संदर्भ में बार-बार ये बात दोहरायी जा रही थी कि गंगा से जन को जोड़ना जरूरी है। लेकिन अनिल प्रकाश ने जब ये कहा कि जन को जोड़ने नहीं बल्कि जन से जुड़ने की जरूरत है – यही सामाजिक दृष्टिकोण है जो गंगा को मुक्त कर सकती है। गंदगी और दूसरी जकड़नों से।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[18 Jan 2011 | No Comment | ]

अनिल चमड़ि‍या ♦ 1990 के बाद दिल्ली की बसों में एक वाक्य लिखा जाने लगा। पड़ोसी पर नजर रखें। यह पढ़कर हर व्यक्ति एक दूसरे को संदेह की निगाह से देखता था। जेब के प्रति सावधानी से पहले जेबकतरे से खतरे का बोध पैदा हो जाता है। मजेदार बात है कि हमारे यहां महात्माओं और विद्वानों का ये वाक्य ही जगह जगह चिपका मिलता है कि अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं। लेकिन हमारे समाज में घृणा का जो व्यािवहारिक पाठ तैयार हुआ है, वह अपराधी के खिलाफ है। बल्कि यूं कहा जाए कि अपराधी की ही एक छवि हमारे मन मस्तिष्क में बनी हुई है। इसीलिए उस छवि का अंश मात्र भी किसी के चेहरे पर दिखता है, तो वह अपराधी के रूप में शिनाख्त कर लिया जाता है।

असहमति, नज़रिया, मीडिया मंडी »

[25 Nov 2010 | 10 Comments | ]

अनिल चमड़िया ♦ इस समय टेलीविजन के कार्यक्रमों में समाज के कमजोर तबकों पर संवाद, वेशभूषा के जरिये हमले बढ़ रहे हैं। कमजोर वर्गों में महिलाएं भी हैं। जनसंचार माध्यमों द्वारा यह सांस्कृतिक हमला है। आपने अपने मंत्रालय के अधीन टेलीविजन चैनलों के कार्यक्रमों पर निगरानी रखने के लिए एक मॉनीटर सेल बनाया है। मैं समझता हूं कि उस मॉनीटर सेल द्वारा इस तरह के कार्यक्रमों में होने वाले कोड ऑफ कंडक्ट के उल्लंघन के मामलों की या तो रिपोर्ट नहीं की जाती होगी या फिर रिपोर्ट की जाती होगी तो संबंधित अधिकारियों द्वारा इनके विरुद्ध कार्रवाई करने के मामले में लापरवाही बरती जा रही है। अनुरोध है कि चैनलों के कार्यक्रमों के द्वारा सामाजिक उत्पीड़न के मामलों पर मंत्रालय को गंभीर होना चाहिए।

मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, समाचार »

[27 Jul 2010 | 3 Comments | ]

डेस्‍क ♦ दैनिक भास्कर समूह से जुड़े पत्रकार उर्मिलेश को राज्यसभा की मीडिया सलाहकार समिति का चेयरमैन मनोनीत किया गया है। यह पहली बार है, जब हिंदी के किसी पत्रकार को राज्‍यसभा की मीडिया सलाहकार समिति चेयरमैन बनाया गया है। उर्मिलेश अपनी तीखी राजनीति रपटों के लिए जाने जाते रहे हैं और उनकी कई किताबें भी आ चुकी हैं। इससे पहले अंग्रेजी के पत्रकार ही इस समिति का नेतृत्‍व करते थे। पंद्रह सदस्यीय मीडिया सलाहकर समिति में उर्मिलेश के अलावा एनडीटीवी के राहुल श्रीवास्तव को वाइस चेयरमैन, वार्ता (तेलुगु) के आर राजगोपालन को सचिव और द टेलीग्राफ की राधिका रामाशेषन को संयुक्त सचिव मनोनीत किया गया है। वरिष्‍ठ पत्रकार अनिल चमड़‍िया को भी सलाहकार समिति में जगह दी गयी है।

नज़रिया »

[23 Jun 2010 | 5 Comments | ]

अनिल चमड़‍िया ♦ अरुंधती के माओवादियों और आदिवासियों के रिश्तों पर लिखने की सबसे तीखी प्रतिक्रिया अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों ने की है। हिंदी में पिछले दिनों दो किताबें आयीं, जिनमें बहुत बारीकी और संवेदना के साथ आदिवासियों का दर्द उकेरा गया है। लेकिन इन पर प्रतिक्रिया बिरादराना राजनीतिक जमात में ही हुई। अभी हिंदी की जनपक्षधर चेतना इस समय को अंग्रेजी के सहारे अपने को व्यक्त करने के अवसर के रूप में देख रही है। इसीलिए अंग्रेजी में जो ऐसी बातें आती हैं, उसे हिंदी का बेचैन मन अपनी भाषा देने लगता है। सुना नहीं गया कि हिंदी की कोई जनपक्षधर सामग्री का अंग्रेजी मन अनुवाद करने के लिए बेचैन हो गया हो। अरुंधती अंग्रेजी में वही लिख रही हैं, जो हिंदी और पंजाबी की जमीनी चेतना महसूस कर रही है।

नज़रिया »

[3 Jun 2010 | 5 Comments | ]

अनिल चमड़‍िया ♦ आखिर जनगणना में जाति पूछने से क्या दिक्कत है। जाति यहां जन्म से ही निर्धारित हो जाती है। जाति बदली नहीं जा सकती। जाति क्या केवल संख्या-बल है? जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें लगता है कि अगर पिछड़ों की आबादी के ठोस तथ्य सामने आ जाएंगे तो उन्हें नौकरियों में जो सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है, उसे बढ़ाने की मांग उठ सकती है। पिछड़ों में एक विश्वास पैदा हो सकता है कि संसदीय व्यवस्था में वे अपने वोटों से अपने जाति-समूह की सत्ता बना लेंगे। पहली बात तो यह कि संसदीय राजनीति में जातियों की भूमिका को इस सपाट तरीके से देखना उनके विरोध को सुसंगत तर्क तैयार करने में बाधाएं खड़ी कर रहा है।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी, समाचार »

[24 Feb 2010 | 9 Comments | ]

डेस्‍क ♦ महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा की कार्य परिषद से साहित्‍यकार और पत्रकार मृणाल पांडे ने इस्‍तीफा दे दिया है। उन्‍होंने कल राष्‍ट्रपति को एक चिट्ठी लिख कार्यपरिषद से अलग होने की इच्‍छा जाहिर की है। हम मान सकते हैं कि अपनी तरफ से इस पूरे प्रकरण में जो तफसील मृणाल पांडे ने जुटायी, उसके मुताबिक उन्‍हें लगा कि अन‍िल चमड़ि‍या के मामले में विभूति नारायण राय ने पूरी चालाकी के साथ कार्यपरिषद का इस्‍तेमाल किया और इसी से दुखी होकर उन्‍होंने कार्यपरिषद से अलग होने का फैसला लिया है।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, बात मुलाक़ात »

[21 Feb 2010 | 25 Comments | ]

विभूति नारायण राय ♦ उस दिन जो जुलूस निकला, उसमें जातिवादी नारे लगाये गये। हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है, वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारा से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गये? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाये जाएं, तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[18 Feb 2010 | 13 Comments | ]

दिलीप ♦ मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया। तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख्तर आलम की शिकायत पर फैसला लिया है। फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूं बल्कि यह ‘चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है, जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है। विश्‍वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूं कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूं कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[18 Feb 2010 | 20 Comments | ]

डेस्‍क ♦ महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में बेशर्मी की नयी हद ये है कि एक असहमत छात्र को वीसी ने दूसरे बहानों से छह महीने के लिए कैंपस से बाहर निकाल दिया है। अनिल ने प्रोफेसर चमड़ि‍या प्रकरण और कई दूसरी वजहों से क्षुब्‍ध होकर अपनी पीएचडी की डिग्री छोड़ने का फ़ैसला लिया था और इस आशय का एक निजी पत्र वीसी को मेल किया था। जब हफ्ते भर बाद भी उनका कोई जवाब नहीं आया, तो अनिल ने उस मेल को सार्वजनिक कर दिया। तमतमाये वीसी ने कुछ पुराने मामूली मामले निकलवाये और कुलानुशासक के जरिये कार्रवाई कर दी।