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Articles tagged with: anil chamadia

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[24 Feb 2010 | 9 Comments | ]
मृणाल पांडे ने वर्धा के छात्रों का मान रखा, इस्‍तीफा दिया

डेस्‍क ♦ महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा की कार्य परिषद से साहित्‍यकार और पत्रकार मृणाल पांडे ने इस्‍तीफा दे दिया है। उन्‍होंने कल राष्‍ट्रपति को एक चिट्ठी लिख कार्यपरिषद से अलग होने की इच्‍छा जाहिर की है। हम मान सकते हैं कि अपनी तरफ से इस पूरे प्रकरण में जो तफसील मृणाल पांडे ने जुटायी, उसके मुताबिक उन्‍हें लगा कि अन‍िल चमड़ि‍या के मामले में विभूति नारायण राय ने पूरी चालाकी के साथ कार्यपरिषद का इस्‍तेमाल किया और इसी से दुखी होकर उन्‍होंने कार्यपरिषद से अलग होने का फैसला लिया है।

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[21 Feb 2010 | 21 Comments | ]
कारुण्‍यकारा ने ब्राह्मणों को गाली दी : विभूति

विभूति नारायण राय ♦ उस दिन जो जुलूस निकला, उसमें जातिवादी नारे लगाये गये। हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है, वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारा से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गये? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाये जाएं, तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।

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[18 Feb 2010 | 13 Comments | ]
“मुझे निष्कासित नहीं करने का कारण बताये प्रशासन”

दिलीप ♦ मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया। तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख्तर आलम की शिकायत पर फैसला लिया है। फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूं बल्कि यह ‘चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है, जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है। विश्‍वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूं कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूं कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले।

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[18 Feb 2010 | 20 Comments | ]
दारोगा वीसी का दमनचक्र : छात्र को छह महीने की सज़ा

डेस्‍क ♦ महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में बेशर्मी की नयी हद ये है कि एक असहमत छात्र को वीसी ने दूसरे बहानों से छह महीने के लिए कैंपस से बाहर निकाल दिया है। अनिल ने प्रोफेसर चमड़ि‍या प्रकरण और कई दूसरी वजहों से क्षुब्‍ध होकर अपनी पीएचडी की डिग्री छोड़ने का फ़ैसला लिया था और इस आशय का एक निजी पत्र वीसी को मेल किया था। जब हफ्ते भर बाद भी उनका कोई जवाब नहीं आया, तो अनिल ने उस मेल को सार्वजनिक कर दिया। तमतमाये वीसी ने कुछ पुराने मामूली मामले निकलवाये और कुलानुशासक के जरिये कार्रवाई कर दी।

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[17 Feb 2010 | 9 Comments | ]
निरंकुश कुलपति की इंसाफपसंदों ने भर्त्‍सना की

रतन लाल ♦ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के बाद बिना कोई कारण बताये उनकी सेवा समाप्त करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाये जाने की जरूरत है। आईएएस और आईपीएस पृष्ठभूमि के कुलपतियों के कार्यकाल में कई तरह की मानमानी किये जाने की शिकायतें मिलती रही हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के प्रोफेसर अनिल चमड़िया को सात महीने के बाद जिस तरह से विश्वविद्यालय से बाहर किये जाने का मामला सामने आया है, वह एक नयी तरह की प्रवृत्ति को सामने लाता है।

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[16 Feb 2010 | 22 Comments | ]
सवाल पात्रता का नहीं, दुराग्रह का है

चंद्रिका ♦ विश्वविद्यालय ने छह माह पूर्व 12 नियुक्तियां की थी। मीडिया विभाग में अनिल चमड़िया, कृपाशंकर चौबे और अनिल राय अंकित के साथ अख्तर आलम की। अनिल अंकित चोरी करके किताबें लिखने के कारण ख्याति पा चुके हैं तो अनिल चमड़िया अपनी पत्रकारिता के कारण लोगों में जाने जाते हैं। ऐसे में कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाविदों के होते हुए, जो यह मानते हैं कि शिक्षा सामाजिक विकास का पीढ़ीगत हस्तांतरण है, भी अनिल चमड़िया का निष्कासन और चोर गुरु के नाम से कुख्यात अनिल अंकित को लिया जाना विश्वविद्यालय के ईसी सदस्यों पर ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षा में व्याप्त भ्रष्‍टाचार और इन बुद्धिजीवियों द्वारा उस भ्रष्‍टाचार की पुष्टि अफसोसजनक है और सवाल खड़ा करती है।

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[16 Feb 2010 | 10 Comments | ]
वर्धा : मीडिया के छात्र कक्षा का बहिष्‍कार कर रहे हैं

छात्र-छात्राएं ♦ यह कदम कुलपति विभूति नारायण राय के मनमानेपन और नियम कानून को ताक पर रख काम करने के उनके रवैये की ही एक कड़ी है। इस निर्णय से न सिर्फ विश्‍वविद्यालय, उसके अधिनियम और न्‍याय की भावना के साथ खिलवाड़ हुआ है बल्कि न्‍यायालय के निर्णय से पहले ही स्‍वघोषित, मनमाना निर्णय सुनाया है, जिससे प्राकृतिक न्‍याय के सिद्धांत का भी घोर उल्‍लंघन किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में, इक्जिक्‍यूटिव कौंसिल को मामले की आधी-अधूरी जानकारी देते हुए उसे एक कवर के रूप में इस्‍तेमाल किया गया है। हम कुलपति के इस निरंकुश निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित हैं और इसके खिलाफ अनिश्‍िचतकालीन बहिष्‍कार की घोषणा करते हैं।

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[14 Feb 2010 | One Comment | ]
सबसे अहम मौके पर तुम हार गये हो “विभूति”

एक छात्र ♦ क्या किताबें अब सिरहाने की तकिया हो गयी हैं “विभूति नारायण”
जिसका इस्‍तेमाल वही करते हैं
जो सोने की तैयारी में हैं
अपनी कमसिन उम्र में मैंने चाहा था
और मैं खुश हूं कि
मेरी चाहत अब भी बची हुई है
कि किताबें जूता बन जाएं
चलने के पहले हर आदमी के पैर कसने का
आदमी के बदलने से
आदमीयत से भरोसा अभी भी नहीं उठा “विभूति नारायण”
कई लोगों के जीने की वजह बहुत मामूली होती है
जबकि मामूली चीजें कई पीढियों तक हल नहीं होतीं

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[14 Feb 2010 | 11 Comments | ]
वर्धा में छात्रों ने ड्रामा किया, वीसी पर फिकरे कसे

वर्धा मेल ♦ “हिंदी विश्वविद्यालय में मोहल्ला गली नहीं जानते? मोहल्ला! अरे जहां आज-कल विश्‍वविद्यालय बसता है।” हिंदी विवि के नवागंतुक स्वागत समारोह में ‘मोहल्ला’ के अभियान और निवर्तमान मुद्दे पर नाटक विभाग के कुछ छात्रों द्वारा प्रस्तुत नाटक के डायलॉग का यह बानगी है। “यह दलित उत्पीड़न का मामला नहीं है और न ही किसी प्रोफेसर को यहां से निष्कासित किये जाने का मामला है। हम सिर्फ़ मूत्रालय बनाने की मांग कर रहे हैं।” नाटक में मूत्रालय के रूपक के जरिये विश्वविद्यालयीय समस्याओं पर जोरदार प्रहार किया गया। मंच से जनसंचार विभाग के छात्र के तरफ से यह आवाज भी गूंजी कि यह विवि में खुशी और स्वागत का समय नहीं है। और ऐसे प्रत्येक वाक्य पर दर्शक दीर्घा में तालियों की जोरदार बारिश होती रही।

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[13 Feb 2010 | 9 Comments | ]
अनिल चमड़िया मामले में निष्पक्ष नहीं थीं मृणाल जी

दिलीप मंडल ♦ खतरनाक अनिल चमड़िया को, जो पत्रकारिता और समाज के अनकहे पक्ष को सामने लाता है, सत्य के संधान में उन पथों पर चलता है, जिससे होकर लोग नहीं गुजरते, उसे कैसे किसी विश्‍वविद्यालय में टिकने, काम करने और शोध कराने दिया जा सकता है? उसे हटाने के लिए कुलपति से लेकर मृणाल पांडे और गंगा प्रसाद विमल तक का एकजुट हो जाना ही तो स्वाभाविक है। इसलिए एक्‍जीक्‍यूटिव कौंसिल में ये फैसला आम राय से हुआ। किसी ने विरोध नहीं किया। किसी ने नहीं कहा कि एक बार अनिल चमड़िया से भी उसका पक्ष जान लेते हैं या किसी ने ऐसा सुझाव भी नहीं दिया कि वीसी जो कह रहे हैं, उसकी जांच करा ली जाए।