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डेस्क ♦ दैनिक भास्कर समूह से जुड़े पत्रकार उर्मिलेश को राज्यसभा की मीडिया सलाहकार समिति का चेयरमैन मनोनीत किया गया है। यह पहली बार है, जब हिंदी के किसी पत्रकार को राज्यसभा की मीडिया सलाहकार समिति चेयरमैन बनाया गया है। उर्मिलेश अपनी तीखी राजनीति रपटों के लिए जाने जाते रहे हैं और उनकी कई किताबें भी आ चुकी हैं। इससे पहले अंग्रेजी के पत्रकार ही इस समिति का नेतृत्व करते थे। पंद्रह सदस्यीय मीडिया सलाहकर समिति में उर्मिलेश के अलावा एनडीटीवी के राहुल श्रीवास्तव को वाइस चेयरमैन, वार्ता (तेलुगु) के आर राजगोपालन को सचिव और द टेलीग्राफ की राधिका रामाशेषन को संयुक्त सचिव मनोनीत किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया को भी सलाहकार समिति में जगह दी गयी है।
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अनिल चमड़िया ♦ अरुंधती के माओवादियों और आदिवासियों के रिश्तों पर लिखने की सबसे तीखी प्रतिक्रिया अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों ने की है। हिंदी में पिछले दिनों दो किताबें आयीं, जिनमें बहुत बारीकी और संवेदना के साथ आदिवासियों का दर्द उकेरा गया है। लेकिन इन पर प्रतिक्रिया बिरादराना राजनीतिक जमात में ही हुई। अभी हिंदी की जनपक्षधर चेतना इस समय को अंग्रेजी के सहारे अपने को व्यक्त करने के अवसर के रूप में देख रही है। इसीलिए अंग्रेजी में जो ऐसी बातें आती हैं, उसे हिंदी का बेचैन मन अपनी भाषा देने लगता है। सुना नहीं गया कि हिंदी की कोई जनपक्षधर सामग्री का अंग्रेजी मन अनुवाद करने के लिए बेचैन हो गया हो। अरुंधती अंग्रेजी में वही लिख रही हैं, जो हिंदी और पंजाबी की जमीनी चेतना महसूस कर रही है।
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अनिल चमड़िया ♦ आखिर जनगणना में जाति पूछने से क्या दिक्कत है। जाति यहां जन्म से ही निर्धारित हो जाती है। जाति बदली नहीं जा सकती। जाति क्या केवल संख्या-बल है? जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें लगता है कि अगर पिछड़ों की आबादी के ठोस तथ्य सामने आ जाएंगे तो उन्हें नौकरियों में जो सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है, उसे बढ़ाने की मांग उठ सकती है। पिछड़ों में एक विश्वास पैदा हो सकता है कि संसदीय व्यवस्था में वे अपने वोटों से अपने जाति-समूह की सत्ता बना लेंगे। पहली बात तो यह कि संसदीय राजनीति में जातियों की भूमिका को इस सपाट तरीके से देखना उनके विरोध को सुसंगत तर्क तैयार करने में बाधाएं खड़ी कर रहा है।
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डेस्क ♦ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कार्य परिषद से साहित्यकार और पत्रकार मृणाल पांडे ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कल राष्ट्रपति को एक चिट्ठी लिख कार्यपरिषद से अलग होने की इच्छा जाहिर की है। हम मान सकते हैं कि अपनी तरफ से इस पूरे प्रकरण में जो तफसील मृणाल पांडे ने जुटायी, उसके मुताबिक उन्हें लगा कि अनिल चमड़िया के मामले में विभूति नारायण राय ने पूरी चालाकी के साथ कार्यपरिषद का इस्तेमाल किया और इसी से दुखी होकर उन्होंने कार्यपरिषद से अलग होने का फैसला लिया है।
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विभूति नारायण राय ♦ उस दिन जो जुलूस निकला, उसमें जातिवादी नारे लगाये गये। हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है, वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारा से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गये? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाये जाएं, तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।
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दिलीप ♦ मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया। तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख्तर आलम की शिकायत पर फैसला लिया है। फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूं बल्कि यह ‘चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है, जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है। विश्वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूं कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूं कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले।
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डेस्क ♦ महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में बेशर्मी की नयी हद ये है कि एक असहमत छात्र को वीसी ने दूसरे बहानों से छह महीने के लिए कैंपस से बाहर निकाल दिया है। अनिल ने प्रोफेसर चमड़िया प्रकरण और कई दूसरी वजहों से क्षुब्ध होकर अपनी पीएचडी की डिग्री छोड़ने का फ़ैसला लिया था और इस आशय का एक निजी पत्र वीसी को मेल किया था। जब हफ्ते भर बाद भी उनका कोई जवाब नहीं आया, तो अनिल ने उस मेल को सार्वजनिक कर दिया। तमतमाये वीसी ने कुछ पुराने मामूली मामले निकलवाये और कुलानुशासक के जरिये कार्रवाई कर दी।
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रतन लाल ♦ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के बाद बिना कोई कारण बताये उनकी सेवा समाप्त करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाये जाने की जरूरत है। आईएएस और आईपीएस पृष्ठभूमि के कुलपतियों के कार्यकाल में कई तरह की मानमानी किये जाने की शिकायतें मिलती रही हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के प्रोफेसर अनिल चमड़िया को सात महीने के बाद जिस तरह से विश्वविद्यालय से बाहर किये जाने का मामला सामने आया है, वह एक नयी तरह की प्रवृत्ति को सामने लाता है।
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चंद्रिका ♦ विश्वविद्यालय ने छह माह पूर्व 12 नियुक्तियां की थी। मीडिया विभाग में अनिल चमड़िया, कृपाशंकर चौबे और अनिल राय अंकित के साथ अख्तर आलम की। अनिल अंकित चोरी करके किताबें लिखने के कारण ख्याति पा चुके हैं तो अनिल चमड़िया अपनी पत्रकारिता के कारण लोगों में जाने जाते हैं। ऐसे में कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाविदों के होते हुए, जो यह मानते हैं कि शिक्षा सामाजिक विकास का पीढ़ीगत हस्तांतरण है, भी अनिल चमड़िया का निष्कासन और चोर गुरु के नाम से कुख्यात अनिल अंकित को लिया जाना विश्वविद्यालय के ईसी सदस्यों पर ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार और इन बुद्धिजीवियों द्वारा उस भ्रष्टाचार की पुष्टि अफसोसजनक है और सवाल खड़ा करती है।
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छात्र-छात्राएं ♦ यह कदम कुलपति विभूति नारायण राय के मनमानेपन और नियम कानून को ताक पर रख काम करने के उनके रवैये की ही एक कड़ी है। इस निर्णय से न सिर्फ विश्वविद्यालय, उसके अधिनियम और न्याय की भावना के साथ खिलवाड़ हुआ है बल्कि न्यायालय के निर्णय से पहले ही स्वघोषित, मनमाना निर्णय सुनाया है, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी घोर उल्लंघन किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में, इक्जिक्यूटिव कौंसिल को मामले की आधी-अधूरी जानकारी देते हुए उसे एक कवर के रूप में इस्तेमाल किया गया है। हम कुलपति के इस निरंकुश निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित हैं और इसके खिलाफ अनिश्िचतकालीन बहिष्कार की घोषणा करते हैं।



