Articles tagged with: anil chamadia
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एक छात्र ♦ क्या किताबें अब सिरहाने की तकिया हो गयी हैं “विभूति नारायण”
जिसका इस्तेमाल वही करते हैं
जो सोने की तैयारी में हैं
अपनी कमसिन उम्र में मैंने चाहा था
और मैं खुश हूं कि
मेरी चाहत अब भी बची हुई है
कि किताबें जूता बन जाएं
चलने के पहले हर आदमी के पैर कसने का
आदमी के बदलने से
आदमीयत से भरोसा अभी भी नहीं उठा “विभूति नारायण”
कई लोगों के जीने की वजह बहुत मामूली होती है
जबकि मामूली चीजें कई पीढियों तक हल नहीं होतीं
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वर्धा मेल ♦ “हिंदी विश्वविद्यालय में मोहल्ला गली नहीं जानते? मोहल्ला! अरे जहां आज-कल विश्वविद्यालय बसता है।” हिंदी विवि के नवागंतुक स्वागत समारोह में ‘मोहल्ला’ के अभियान और निवर्तमान मुद्दे पर नाटक विभाग के कुछ छात्रों द्वारा प्रस्तुत नाटक के डायलॉग का यह बानगी है। “यह दलित उत्पीड़न का मामला नहीं है और न ही किसी प्रोफेसर को यहां से निष्कासित किये जाने का मामला है। हम सिर्फ़ मूत्रालय बनाने की मांग कर रहे हैं।” नाटक में मूत्रालय के रूपक के जरिये विश्वविद्यालयीय समस्याओं पर जोरदार प्रहार किया गया। मंच से जनसंचार विभाग के छात्र के तरफ से यह आवाज भी गूंजी कि यह विवि में खुशी और स्वागत का समय नहीं है। और ऐसे प्रत्येक वाक्य पर दर्शक दीर्घा में तालियों की जोरदार बारिश होती रही।
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दिलीप मंडल ♦ खतरनाक अनिल चमड़िया को, जो पत्रकारिता और समाज के अनकहे पक्ष को सामने लाता है, सत्य के संधान में उन पथों पर चलता है, जिससे होकर लोग नहीं गुजरते, उसे कैसे किसी विश्वविद्यालय में टिकने, काम करने और शोध कराने दिया जा सकता है? उसे हटाने के लिए कुलपति से लेकर मृणाल पांडे और गंगा प्रसाद विमल तक का एकजुट हो जाना ही तो स्वाभाविक है। इसलिए एक्जीक्यूटिव कौंसिल में ये फैसला आम राय से हुआ। किसी ने विरोध नहीं किया। किसी ने नहीं कहा कि एक बार अनिल चमड़िया से भी उसका पक्ष जान लेते हैं या किसी ने ऐसा सुझाव भी नहीं दिया कि वीसी जो कह रहे हैं, उसकी जांच करा ली जाए।
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अनुज शुक्ल ♦ उन्होंने हम लोगों से कहा कि आप लोग क्या सोचते हैं – पसंद-नापसंद या आप पत्रकारिता क्यों करना चाहते हैं – इसे नोट करके मिलें। हमने वैसा ही किया। यह हमारे लिए बिल्कुल नया अनुभव था, जब पूरे शैक्षणिक जीवन में किसी टीचर ने हमारी पसंद-नापसंद का खयाल किया। एक-एक लड़कों पर उनका काम करने का मन था। वे हमारी कमजोरियों पर मेहनत करते थे। डांटते भी थे, जब हम उनकी क्लास कभी छोड़ देते। आज हम सोचते हैं कि उनके इस डांटने पर हमें गुस्सा क्यों नहीं आता था, जबकि कोई दूसरा टीचर डांटता तो हम आग-बबूला हो जाते। हम उनके डांटने के ममत्व से परिचित थे। हमें पता था कि वे हमारी बेहतरी के लिए ही हमें डांटते थे। अच्छा लगता था।
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अनिल ♦ जबकि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को अकूत मुनाफे का सौदा बना दिया गया है, सारे विश्वविद्यालय परिसरों में लोकतंत्र को कुचलकर ‘दमनतंत्र’ की स्थापना की जा चुकी है, ऐसे में इस विश्वविद्यालय में अपने आगमन से बनी गतिशील और चेतना-संपन्न संस्कृति के विकास की बची-खुची उम्मीद को आपने स्वयं ख़ारिज कर दिया है। जब तक आप इन तथ्यों की सच्चाई से इनकार करते रहेंगे और विभाग में अनिल कुमार राय अंकित की बहाली बरकरार रखेंगे, मैं अपने पीएचडी पाठ्यक्रम को त्यागने की घोषणा कर रहा हूं। अगर इस पर आप मुझ पर ‘विश्वविद्यालय विरोधी’ का ठप्पा लगाने की सोच रहे हैं, तो आपको यह बताना मैं अपना फर्ज समझता हूं कि कई छात्र-छात्राएं ऐसी घोषणा करने को तैयार हैं।
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आवेश तिवारी ♦ चोर गुरु उर्फ अनिल कुमार राय उर्फ अंकित। वर्धा विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के इस विभागाध्यक्ष के कई चेहरे हैं। वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का यह सिपहसालार न सिर्फ अनिल चमड़िया के खिलाफ साजिश का सूत्रधार है बल्कि इसके खिलाफ शैक्षणिक अपराध के भी कई मामले बनते हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने जहां पिछले सप्ताह इसके द्वारा फर्जी तरीके से नियुक्त किये गये रिसर्च फेलो की नियुक्ति को रद्द करते हुए जांच बैठा दी है और इसकी किताबों को पूरे देश में प्रतिबंधित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है, वहीं रीवां विश्वविद्यालय ने पठन सामग्री की चोरी को लेकर इसे पुनः नोटिस जारी की है।
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दिलीप कुमार ♦ आपको यह कैसे पता चला कि वो क्लास नहीं लेते थे? जाहिर है, विभागाध्यक्ष अनिल राय अंकित ने आपको बताया होगा क्योंकि मुझे नहीं लगता कि किसी विद्यार्थी से पूछने की आपने जहमत उठायी होगी। अगर आपने विद्यार्थियों से पूछा होता, तो आपका यह उत्तर शर्तिया नहीं होता। हमारे सेमेस्टर में जिस एकमात्र प्रश्नपत्र की पढ़ाई सिलेबस समाप्त होने के बाद भी चलती रही, उसे अनिल चमड़िया पढ़ाते थे। विकास पत्रकारिता। हमारे बैच के किसी भी विद्यार्थी से आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं। अब जरा अंकित जी से पूछिए कि उन्होंने कितने क्लास लिये हैं? क्लास में तो मेरे ख़्याल से एक सप्ताह से ज़्यादा आये, लेकिन पढ़ाया कितने दिन?
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सुभाष गाताडे ♦ इसे इत्तेफाक ही समझें कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अपने स्थापना के समय से ही विवादों के घेरे में रहा है। चाहे जनाब अशोक वाजपेयी का कुलपति का दौर रहा हों या उसके बाद पदासीन हुए जनाब गोपीनाथन का कालखंड रहा हो, विवादों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है। मेरी दिली ख्वाहिश है कि साढ़े तीन साल बाद जब आप पदभार से मुक्त हों, तो आपका भी नाम इस फेहरिस्त में न जुड़े। मैं पुरयकीं हूं कि आप मेरी इन चिंताओं पर गौर करेंगे और उचित कदम उठाएंगे।
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विभूति नारायण राय ♦ आपको यह तथ्य नहीं मालूम है कि नागपुर में हाईकोर्ट में अनिल चमड़िया के ख़िलाफ़ एक रिट है। एक सज्जन जो कि… आशुतोष मिश्रा नाम के एक सज्जन हैं, जो उसी इंटरव्यू में आये थे, जिनका सलेक्शन नहीं हुआ था। तो आशुतोष मिश्रा ने एक रिट कर रखी है हाईकोर्ट में। उन्होंने कहा है कि भाई साहब 2002 या फिर 2001… अब आप कह रहे हैं कि 2000 तो यूजीसी की 2000 वाली गाइडलाइंस का यूनिवर्सिटी ने उल्लंघन किया है। यह विश्वविद्यालय को अधिकार नहीं था। यह ईसी के बैठक से पहले की बात है। हफ़्ते-दस दिन पहले की बात। जब हमने अपना पक्ष रखा, तो हमने स्वीकार कर लिया था कि हमसे ग़लती हो गयी थी। और हम इस ग़लती को सुधार कर आपके पास आएंगे।




