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नज़रिया, पुस्तक मेला, मीडिया मंडी, संघर्ष »
दिनेश अग्रहरि ♦ आशुतोष आंदोलन में जुटी भीड़ को देखकर पूरी तरह भावनाओं में बह जाते हैं क्योंकि यह भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए चलने वाला दूसरी आजादी का आंदोलन है। लेकिन खुद आशुतोष ने यह लिखा है कि आपातकाल के दौरान जेपी के आंदोलन को लेकर भाव प्रवण रिपोर्टिंग की गयी थी, लेकिन बाद में उसके बारे में आकलन काफी बदल गया था। हमने यह देखा है कि वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान किस तरह से देश के युवाओं ने उन्हें ‘राजा नहीं फकीर है’ के नारे के साथ सिर आंखों पर बिठा लिया था और बाद में इस आंदोलन का क्या हश्र हुआ? पत्रकार को किसी आंदोलन की धारा में न बहते हुए उसकी जमीनी हकीकत से रूबरू कराना चाहिए
असहमति, नज़रिया, संघर्ष »

अनीश ♦ जो भीड़ से आह्लादित होते हैं, वही भीड़ नहीं होने पर निराश भी होते हैं। अन्ना और उनकी टीम को इससे बचना चाहिए। यदि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम के प्रति संजीदा हैं। लोकपाल पर अपनी सारी ऊर्जा केंद्रित कर उन्होंने व्यवस्था को अपने खिलाफ एक अस्त्र दे दिया। राजनीतिक अपरिपक्वता ने उन्हें पीछे धकेल दिया।
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भूपेन सिंह ♦ अन्ना हजारे और इंडिया अगेंस्ट करप्शन को इस बात का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बनाया है लेकिन उनकी जिद और एकांगी सोच की वजह से वे इस मर्ज की असली वजह पर कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं हैं।
असहमति, मोहल्ला पटना, संघर्ष »

प्रतिवाद पत्र ♦ हिंदुस्तान, 1 नवंबर, 2011 के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख ‘लोगों के गुस्से से डरना जरूरी’ (आशुतोष) में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि में जेपी और जेपी आंदोलन पर भ्रामक व निराधर टिप्पणी की गयी है। यहां तक कहा गया कि ‘जेपी आंदोलन अपनी मूल आत्मा में हिंसक था…’
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आशुतोष ♦ जिस तरह से अन्ना के आंदोलन को कमजोर करने की साजिश सरकार के इशारे पर हो रही है, वह खतरनाक है। क्योंकि लोग भ्रष्टाचार से काफी गुस्से में हैं और अभी गुस्से को नियंत्रित करने के लिए अन्ना हैं। यह शख्स नहीं रहा, तो फिर इस गुस्से को सरकार कैसे रोकेगी?
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अरविंद केजरीवाल ♦ कहा जा रहा है कि अन्ना का आंदोलन अचानक राजनीतिक रंग पकड़ने लगा है। यह भी एकदम गलत है। यह आंदोलन तो हमेशा ही राजनीतिक था। यह पार्टीवादी अथवा चुनावी नहीं है। यह लोगों की राज नीति का आंदोलन है। राज्य की नीति के लिए खड़ा हुआ आंदोलन है। अत: राजनीतिक तो है ही।
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विष्णु राजगढ़िया ♦ प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के एक हिस्से ने अन्ना लोकपाल आंदोलन की अनदेखी करके ऐतिहासिक भूल की है। अन्ना के समर्थन में तिरंगा लेकर वंदे मातरम बोलने पर पूरे आंदोलन को आरएसएस या भाजपा प्रायोजित करार देना ऐसे ही पूर्वाग्रह का नतीजा है। बेहतर समाज के लिए आंदोलित जनमानस को एक धारा विशेष की राजनीतिक पूंजी में तब्दील होने के लिए लावारिस छोड़ देने का भला क्या औचित्य?
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राजेश रंजन पप्पू यादव ♦ हम खतरनाक दौर में प्रवेश करते जा रहे है। हमें यह आजादी कई बलिदानों के बाद मिली है, इसकी इज्जत करना चाहिए। हम गरीबी दर्द और दूसरे सामाजिक मसले से तोबा करना कहते हैं, क्यों? हमें अमन की बात करनी चाहिए जंग की नही। जंग हमें तोड़ देगी और ऐसे करने वालों को इतिहास कभी माफ नही करेगा।
नज़रिया, संघर्ष »

कौशल किशोर ♦ क्या वजह है कि प्रकाश करात से लेकर अरुंधती राय तक मात्र आलोचना से आगे नहीं बढ़ पाते? क्या इससे यह नहीं लगता कि आज आत्मालोचन इनके राजनीतिक व्यवहार की वस्तु नहीं रह गया है? यही कारण है कि आलोचना करते हुए ये कोई विकल्प नहीं पेश कर पा रहे हैं। इसीलिए यह मात्र ‘आलोचना के लिए आलोचना’ है।
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राजेश रंजन पप्पू यादव ♦ बच्चे भगवान के रूप होते हैं। इनकी मासूमियत किसी भी जाति, धर्म या संप्रदाय से परे होती है। इस मासूमियत को उन्होंने अपने लिए इस्तेमाल किया। आप बच्चे से उपवास तुड़वाते तो यह ठीक था, लेकिन यह किस सभ्यता ने आपको इजाजत दी कि मुस्लिम और दलित के बच्चे से आपने अनशन तुड़वाया?


