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Articles tagged with: anurag kashyap

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[4 May 2012 | 5 Comments | ]
“गैंग्‍स ऑफ वासेपुर” के ‘पोस्‍टर’ और ‘प्रोमो’ से पर्दा हटा

अविनाश ♦ अगले महीने की 22 तारीख को रीलीज होने वाली अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म गैंग्‍स ऑफ वासेपुर का पोस्‍टर और ट्रेलर लोकार्पित कर दिया गया है। दो भागों में बनी इस फिल्‍म का शुरुआती बड़ा वर्जन मैंने तब देखा था, जब ढेर सारे तकनीकी और रचनात्‍मक करेक्‍शन बाकी थे। यह लगभग छह-सात महीने पुरानी बात हो चली है। अदहन से निकाल कर चावल का एक दाना देख कर उसके सीझने का अंदाजा लगाने की तरह मुझे लग गया था कि पुराने जालिम कस्‍बों से निकाल कर अनुराग ने एक अच्‍छी कहानी पेश की है। अपनी फिल्‍म से जुड़े हर पहलू को लेकर अनुराग एक नया माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। गैंग्‍स ऑफ वासेपुर के पोस्‍टर में कॉमिक्‍स टच है। कहानी में किरदार, रहस्‍य, लड़ाइयों के तरीके किसी कॉमिक्‍स की तरह मौजूद हैं।

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[12 Apr 2012 | 6 Comments | ]
मैं सिनेमा में कॉमर्स ढूंढने की कोशिश करूंगा! [ANURAG]

रघुवेंद्र सिंह ♦ अभिनव कश्‍यप कभी अपने भाई पर बोझ नहीं बने, बल्कि उन्होंने हमेशा उनके लिए मुश्किलें आसान कीं। अभिनव के मुंबई आने से पूर्व अनुराग कश्‍यप का संघर्ष बहुत मुश्किल था। अनुराग के मुताबिक, ‘1993-94 तक बहुत कड़की थी। अभिनव के आने के बाद कड़की चली गयी। ये सीरियल वगैरह से पैसे कमाते थे और मैं अपना स्ट्रगल करता रहा।’ अभिनव हंसते हुए कहते हैं, ‘मेरा काम था घर चलाना। मैं दस साल तक टीवी से जुड़ा रहा। उस दौरान मेरी एजुकेशन हो रही थी। सत्या के बाद अनुराग विदेश में फिल्म फेस्टिवल में जाने लगे। दुनिया बहुत घूमी इन्होंने। उस दौरान इनका इंट्रैक्शन जिन लोगों के साथ हुआ, उस हिसाब से इनका ओरिएंटेशन हुआ। मेरी जिंदगी इंडिया में रही। मेरा पहला वर्ल्‍ड ट्रिप दबंग फिल्म के दौरान हुआ। एक गीत की शूटिंग के लिए हम दुबई गये थे।’

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[24 Nov 2011 | 12 Comments | ]

अनीश ♦ मुझे मालूम नहीं है कि इम्तियाज ने कितना पढ़ा है, जिनके बारे में मैं बात कर रहा हूं लेकिन बड़ी सफाई से उसने कलाकार के दिल को पकड़ा है। सच कहूं तो इम्तियाज ने कहीं न कहीं जॉर्डन को अपने भीतर से खुरच कर निकाला है। इसीलिए उसकी कही हुई बात याद आती है कि फिल्‍म ने दुबला कर दिया सर। जॉर्डन जब जर्नलिस्‍ट के साथ अपने मेकअप वैन में होता है, तो ‘मछली मरी हुई’ के नायक की बेबसी अचानक से याद आ जाती है। हिंदी फिल्‍मों के नायक आमतौर पर बेबस नहीं होते, हीरो होते हैं, अतिमानव।

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[10 Jul 2011 | 2 Comments | ]

डेस्क ♦ बेदब्रत पैन की फिल्‍म चिटगांव का पहला प्रोमो आ गया है। यानी फिल्‍म तैयार है और रीलीज की तारीख तय होनी बाकी है। ये वही फिल्‍म है, जिसे देखने का सुझाव दिसंबर में अनुराग कश्‍यप ने दिया था। दिसंबर में ही इसी विषय पर आशुतोष गोवारिकर की फिल्‍म खेलें हम जी जान से रीलीज हुई थी, जिसमें क्रांतिकारी सूर्या का किरदार अभिषेक बच्‍चन ने निभाया था। चिटगांव में मनोज वाजपेयी सूर्या बने हैं।

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[7 Jul 2011 | No Comment | ]

डेस्क ♦ मणि कौल अब जीवित नहीं हैं। लेकिन अपने जीवन में जो रोशनी उन्‍होंने हिंदी सिनेमा को दी, वह हमें नये प्रयोगों के लिए हमेशा उत्‍साहित करेगी। वे नहीं होते, तो भारतीय सिनेमा अब भी झूठ के धागे से बुना जा रहा होता। नया सिनेमा ने भारत की जिस सच्‍चाई को दिखाने का जोखिम उठाया, मणि कौल उसके अगुवा थे। उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा और इडियट उनकी सर्वाधिक चर्चित फिल्‍में हैं। कल उनका निधन हो गया।

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[26 May 2011 | 13 Comments | ]

मयंक सक्‍सेना ♦ ये पुरस्कार पूरे सरकारी तंत्र के दोषपूर्ण क्रियान्वयन के एक और उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं, जहां हर काम केवल जनता को लुभाने के लिए तो हो सकता है, पर उसे जगाने के लिए नहीं। ये प्रवृत्ति हमारे समाज के हर हिस्से में पायी जाती है। हमारे यहां लोकप्रिय शिक्षा केवल नौकरी पाने के लिए है, कानून केवल सजा देने के लिए, लोकप्रिय सरकारें केवल बने रहने के लिए और ऐसे ही लोकप्रिय फिल्में केवल सस्ता मनोरंजन देने के लिए।

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[15 May 2011 | One Comment | ]

गौरव सोलंकी ♦ तिग्मांशु की अच्छी बात यही है कि कहानी फिल्माने का उनका एक मौलिक स्वर है। लेकिन ‘शागिर्द’ वहां बिखरती है, जहां उसके सामने सवाल आता है कि सेट तैयार है और मूड भी, लेकिन अब अपनी कहानी कहो। तब तिग्मांशु जैसे अस्सी या नब्बे के दशक की उन कहानियों की तरफ जाते हैं, जिनमें एक मंत्री या नेता को राजनीति का प्रतिनिधि दिखाया जाता था, एक पुलिस अफसर को पुलिस का और उनकी यारी या दुश्मनी की कहानी कही जाती थी। इसीलिए तिग्मांशु के पास मजेदार जमीनी डायलॉग तो हैं लेकिन कहानी उनकी अपनी नहीं लगती।

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[14 May 2011 | 2 Comments | ]

डेस्‍क ♦ फिल्‍मकार अनुराग कश्यप ने कान फिल्म फेस्टिवल के लिए रवाना होने से पहले मुंबई में अपने एक नये प्रोजेक्ट पांच का ऐलान किया। अनुराग कश्यप का ये नया कदम उन युवाओं को अपना हमसफर बनाने के लिए है, जिन्होंने सिनेमा की मंजिल की तरफ अभी बस बढ़ना शुरू ही किया है। अनुराग की बतौर लेखक-निर्देशक पहली फीचर फिल्म का नाम भी पांच ही है, और अपने उन्हीं दिनों को याद करते हुए अनुराग अब देश-विदेश के सिनेमा प्रेमी युवाओं को पांच शॉर्ट फिल्में अपने साथ बनाने का मौका देने जा रहे हैं।

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[11 Apr 2011 | 8 Comments | ]

अनुराग कश्‍यप ♦ प्रमोद भाई, आपको पता है, गुलजार हैं न, ओ जो गाना लिखते हैं… हां… उन्होंने मेरे नाम का क्या-क्या नहीं किया है। मेरे नाम की रोटी बनायी, पलंग बनाया, चादर बनायी, कटोरी भी बनायी… तो बात है न। लेकिन वह तो मुझे जानते भी नहीं हैं। हो सकता है करण अर्जुन की मां ने बताया हो। वह गुलजार को जानती है। हम मिले थे। मैं उनकी गाड़ी साफ करता था। सिग्नल पर लकी रेस्टोरेंट है न, बांद्रा में, उसके सामने। वह हर बार मुझे दो रुपया देती थी।

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[11 Dec 2010 | 20 Comments | ]

अनुराग कश्‍यप ♦ चिटगांव देखना। वो खेलें हम जी जान से की तुलना में बहुत बेहतरीन फिल्म है। उसकी लागत से 1/8 वें हिस्से में बनी फिल्म। चिटगांव में कहीं बेहतर कलाकार हैं और वो गहरे लगाव से बनायी गयी है। उसके निर्माता चुपचाप बैठ गए क्योंकि किसी ने उन्हें एक फोन किया था। क्योंकि कोई अपने बेटे का करियर बचाने के लिए बदहवास तरीके से प्रयास कर रहा था। बॉलीवुड में आपका स्वागत है। यहां मेहनत, जुनून, क्षमता और प्रतिभा पर ये सच भारी पड़ता है कि आप किसके बेटे हैं। “खेले हम जी जान से” आयी और चली गयी। अब क्या?