Tagged: anurag kashyap

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हमारे महानगरों की आत्‍मकथा है #Ugly

♦ अनुज शुक्ला अनुराग कश्यप की ‘अगली’ महानगरीय विस्तार में उपजी मध्यवर्गीय परिवारों की अपनी विडंबना है। यह एक ऐसा सच है, जिसमें रिश्तों का बिखरना है, उससे उपजे नये मूल्यों की देन –...

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#Ugly वासेपुर का महानगरीय विस्‍तार है

♦ अविनाश अगली मैंने 9 जून, 2013 को देखी थी। उसी दिन यह नोट लिया था। आज, यानी 26 दिसंबर को यह रीलीज हो रही है, तो इस नोट को मोहल्‍ला लाइव पर साझा...

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बेशरम में तर्क मत खोजिए, मजा खोजिए, मजा आएगा!

अविनाश ♦ बेशरम वैसी ही फिल्‍म है, जैसी दबंग थी। इतिहास के साथ पंगे लेने वाली एक बात ये थी कि पहली कोई फिल्‍म देखी, जिसमें क्‍लाइमेक्‍स ऐसा था, जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों के पास कंचे यानी गोलियां खत्‍म हो जाती हैं। वे बाजुओं और जादू-करिश्‍मा से एक दूसरे से लड़ते हैं। दो अक्‍टूबर को फिल्‍म रीलीज करने का आग्रह यही था कि नायक को मार-धाड़ से नहीं, प्‍यार से काम करना आता है। हां, ऋषि कपूर जैसी थुलथुल शख्‍सीयत में सन्‍नी देओल की आत्‍मा प्रत्‍यारोपित करके कहानी को इस कदर मजेदार बनाने की कोशिश की गयी है, जैसे आप डोरेमोन की कहानी देख रहे हों। किसी को भी अनुभव सिंह कश्‍यप से जितनी उम्‍मीद हो सकती है, उससे न कम न ज्‍यादा मिल ही जाएगा बेशरम में।

“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता” 0

“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता”

राही मासूम रजा ♦ बड़े-बूढ़ों ने कई बार कहा कि गालियां न लिखो, जो ‘आधा गांव’ में इतनी गालियां न होतीं तो तुम्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता, परंतु मैं यह सोचता हूं कि क्या मैं उपन्यास इसीलिए लिखता हूं कि मुझे साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिले? पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं, फायदा ही है। परंतु मैं साहित्यकार हूं। मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूंगा। और वह गालियां बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियां भी लिखूंगा। मैं कोई नाजी साहित्यकार नहीं हूं कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊं और हर पात्र को एक शब्दकोश थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा। कोई बड़ा-बूढ़ा यह बताये कि जहां मेरे पात्र गाली बकते हैं, वहां मैं गालियां हटाकर क्या लिखूं?

“सिनेमा यथार्थवादी होगा, तो उसमें गालियां भी होंगी” 1

“सिनेमा यथार्थवादी होगा, तो उसमें गालियां भी होंगी”

अनुराग कश्‍यप ♦ क्या आपको लगता है कि मैंने अपनी फिल्मों के लिए गालियों को ईजाद किया? क्या आप, हम या कोई भी आम इंसान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गुस्से में या प्यार से गालियों का उपयोग नहीं करता है? तमाम ऐसी गंदी गालियां हैं, जिन्हें हर इंसान अपने दोस्तों के साथ बातचीत के दौरान बोलता है। इसी वजह से हर फिल्म में गाली का इस्तेमाल होता आया है। हमने हर फिल्म में फिल्म की बैकग्राउंड के अनुरूप ही सारे संवाद रखे हैं। सभी गालियां समाज से ही ली गयी हैं। सिनेमा में समाज का कुछ न कुछ हिस्सा रहता है। राह चलते, ट्रेन में, बस में, यहां तक कि ऑफिस के अंदर भी गालियां सुनाई पड़ती हैं। आप सिनेमा को जिंदगी से अलग-थलग नहीं कर सकते। जब यथार्थवादी सिनेमा बनेगा, तो जीवन की बोलचाल के शब्द भी होंगे ही होंगे।

स्त्रियां स्‍त्री-विमर्श से आगे का आकाश नापें, तो बात बने! 0

स्त्रियां स्‍त्री-विमर्श से आगे का आकाश नापें, तो बात बने!

दिल्‍ली का अंतर्राष्‍ट्रीय पुस्‍तक मेला बीत गया। बारह नंबर हॉल में बनी चौपाल में रोज कई साहित्यिक सेशन थे। एक दिन हिंदी की कई स्‍त्री कवियों (कवयित्रियों) ने अपनी कविताएं पढ़ीं। पहला खटका तो...

“नया सिनेमा छोटे-छोटे गांव-मोहल्‍लों से आएगा” 6

“नया सिनेमा छोटे-छोटे गांव-मोहल्‍लों से आएगा”

फिल्‍मकार अनुराग कश्‍यप से अविनाश से बातचीत अनुराग कश्‍यप ऐसे फिल्‍मकार हैं, जो अपनी फिल्‍मों और अपने विचारों के चलते हमेशा उग्र समर्थन और उग्र विरोध के बीच खड़े मिलते हैं। हिंसा-अश्‍लीलता जैसे संदर्भों...

क्‍या अनुराग कश्‍यप स्‍वतंत्र फिल्‍मकारों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं? 1

क्‍या अनुराग कश्‍यप स्‍वतंत्र फिल्‍मकारों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं?

12 | 12 | 12 पर आधारित एक लघु फिल्‍म परियोजना के लिए अनुराग कश्‍यप ने 12 फिल्‍मकारों का चयन किया, लेकिन Shilpa Munikempanna की फिल्‍म नहीं चुनी गयी। दुखी शिल्‍पा ने एक खुला...

दिल्‍ली में 1 अक्‍टूबर से शुरू होगा सिंगापुर फिल्‍म फेस्टिवल 0

दिल्‍ली में 1 अक्‍टूबर से शुरू होगा सिंगापुर फिल्‍म फेस्टिवल

डेस्‍क ♦ तीन दिनों का सिंगापुर फिल्‍म फेस्टिवल एक अक्‍टूबर से इंडिया हैबिटैट सेंटर (नयी दिल्‍ली) में शुरू हो रहा है। फेस्टिवल में सिंगापुर की चार बेहतरीन फिल्‍में दिखायी जाएंगी, जिन फिल्‍मों ने अपनी पहचान अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बनायी है। शुरुआत एक तारीख को 2007 में बनी रॉयस्‍टॉन टैन की फिल्‍म 881 से होगी। 881 दो दोस्‍तों की कहानी है, जिनकी असीम सांगीतिक महत्‍वाकांक्षाएं हैं। हैबिटैट के स्‍टेन ऑडिटोरियम में शाम सात बजे से इस फिल्‍म की स्‍क्रीनिंग होगी। साथ ही फिल्‍म के निर्देशक रॉयस्‍टॉन टैन से हिंदी सिनेमा के नये चितेरे अनुराग कश्‍यप का एक संवाद भी होगा, जिसमें ऑडिएंस भी हिस्‍सा ले पाएगी। पर इस फेस्टिवल की इंट्री पास के साथ होगी, जो आपको सिंगापुर हाई कमीशन के ऑफिस से कलेक्‍ट करना होगा। आप चाहें तो सहूलियत के लिए सुचित्रा सिंह को suchitra_singh@sgmfa.gov.sg पर इस बाबत मेल कर सकते हैं।

अमिताभों-अभिषेकों के बॉलीवुड में चिटगांव एक प्रतिरोध है! 8

अमिताभों-अभिषेकों के बॉलीवुड में चिटगांव एक प्रतिरोध है!

अनुराग कश्‍यप ♦ चिटगांव देखना। वो खेलें हम जी जान से की तुलना में बहुत बेहतरीन फिल्म है। उसकी लागत से 1/8 वें हिस्से में बनी फिल्म। चिटगांव में कहीं बेहतर कलाकार हैं और वो गहरे लगाव से बनायी गयी है। उसके निर्माता चुपचाप बैठ गए क्योंकि किसी ने उन्हें एक फोन किया था। क्योंकि कोई अपने बेटे का करियर बचाने के लिए बदहवास तरीके से प्रयास कर रहा था। बॉलीवुड में आपका स्वागत है। यहां मेहनत, जुनून, क्षमता और प्रतिभा पर ये सच भारी पड़ता है कि आप किसके बेटे हैं। “खेले हम जी जान से” आयी और चली गयी। अब क्या?