Articles tagged with: arundhati roy
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साजिद रशीद ♦ कैसी विडंबना है कि भावनाओं के आहत होने के प्रश्न पर कट्टरपंथी मुसलमानों और फासीवादी हिंदुओं के साथ मार्क्सवादी भी खड़े नजर आते हैं। खैर, यहां मार्क्सवादियों पर बहस इसलिए नहीं करना चाहूंगा कि वे अब कांग्रेसियों का एक शिष्ट रूप धारण कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में तसलीमा नसरीन के साथ उन्होंने जो सलूक किया, उसके बाद तो उनके चेहरे से सारे नकाब उतर गये हैं। दरअसल, उन्हें भी सत्ता की राजनीति का खेल रास आ गया है और अब वे सिद्धांतों और राजनीतिक मूल्यों की बहस में पड़ना नहीं चाहते हैं।
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डेस्क ♦ बार-बार पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि बाकी तो ठीक है लेकिन इसमें विभूति नारायण राय की भर्त्सना वाली बात क्यों है। अगर इसे हटा दिया जाए, तो ये ठीक रहेगा। कई लोगों की उपस्थिति में उन्होंने इसे फिर से ड्राफ्ट करने की सलाह भी दे डाली। जब उनसे ये कहा गया कि तटस्थ होना तो अपराध है, तो उन्होंने कहा कि ऐसा आपका सोचना है। इसके कुछ समय ही बाद वो एक और स्टॉल पर दिखे। आपको जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वह स्टॉल हरियाणा पुलिस अकादमी का था, जहां शहर में कर्फ्यू समेत राय साहब की किताबें प्रमुखता से सजी हैं। वहीं अरुंधती रॉय और उदित राज ने अपने विरोध हस्ताक्षर हमें दिये।
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अरुंधती रॉय ♦ माओवादी विद्रोही इन दिनों चर्चा का विषय हैं। चमकते हुए अमीर से लेकर सबसे अधिक बिकने वाले अख़बार के सनकी संपादक तक – हर कोई अचानक यह मानने को तैयार हो गया है कि दशकों से हो रहा अन्याय ही इस समस्या की जड़ है। लेकिन उस समस्या को समझने की जगह, जिसका मतलब होगा 21वीं सदी की इस सुनहरी दौड़ का थम जाना, वो इस बहस को एक नया मोड़ देने में जुटे हैं। माओवादी “आतंकवाद” के ख़िलाफ़ भावनात्मक गुस्से का इज़हार करते हुए … चीखते-चिल्लाते हुए। लेकिन वो सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रहे हैं।
नज़रिया »
माओवाद पर सरकारी नज़रिये की धज्जियां उड़ाते अरुंधती के इस लेख के अनुवाद की प्रतीक्षा कीजिए
मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ हम आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल राज्यों के आदिवासी आबादीवाले इलाकों में भारत सरकार द्वारा सेना और अर्धसैनिक बलों के साथ एक अभूतपूर्व सैनिक हमला शुरू करने की योजनाओं को लेकर बेहद चिंतित हैं। इस हमले का घोषित लक्ष्य इन इलाकों को माओवादी विद्रोहियों के प्रभाव से मुक्त कराना है, लेकिन ऐसा सैन्य अभियान इन इलाकों में रह रहे लाखों निर्धनतम लोगों के जीवन और घर-बार को तबाह कर देगा तथा इसका नतीजा आम नागरिकों का भारी विस्थापन, बरबादी और मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। विद्रोह को नियंत्रित करने की कोशिश के नाम पर भारतीय नागरिकों में से निर्धनतम लोगों का संहार प्रति-उत्पादक और नृशंस दोनों है।
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शिरीष खरे ♦ कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि “आलोक मेहता” ने तो “अरुंधती राय” के साथ-साथ “अरुण शौरी” पर भी निशाना साधा था, लेकिन उनका तो जिक्र भी नहीं हो रहा है। दरअसल असली निशाना “अरुंधती राय” पर ही साधा गया था, भरोसे का रंग और जमाने के चक्कर में “अरुण शौरी” को वैसे ही लपेटे में ले लिया गया। लेकिन भाषा और तर्कों की सही मिलावट न होने से रंग बेहद भद्दा हो गया। इसलिए जानने में देर नहीं लगी कि असली प्रॉब्लम “अरुंधती राय” से ही है। वैसे भी “अरुण शौरी” विश्व बैंक में जॉब बजा चुके हैं, इसलिए शतरंज का जो खेल न्यूयॉर्क से चल रहा है, उसका एक इशारा मिलते ही आज नहीं तो कल “अलोक मेहता” को “अरुण शौरी” के बाजू वाले खाने में खड़ा होना पड़ेगा।
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अनिल ♦ हंस की वार्षिक संगोष्ठी में हिंदी के लगभग सभी बड़े-बुज़ुर्ग, प्रतिनिधि रचनाकारों के बीच प्रख्यात लेखिका अरुंधती रॉय ने जो कुछ कहा, वह अगर आप चाहें, तो आंख खोल देने वाली स्थिति थी। यह संभवतः पहली बार है कि हिंदी के इतने बड़े मंच से देश के भीतर राजसत्ता द्वारा अपनी जनता पर छेडे़ गये आंतरिक युद्ध के बारे में, अरुंधती की मार्फ़त, इतनी पुख़्ता और विश्वसनीय जानकारियां मिली हैं। अन्यथा, हिंदी शिक्षित समाज में जो हालात हैं, उनमें इन मुद्दों को लेकर सामान्यतः कोई व्यापक चिंता, बेचैनी और प्रतिरोध के स्वर नहीं मिलते। ऐसे में आलोक मेहता ने अरुंधती के बारे में जो गरिमाहीन और कुत्सित बातें की हैं उनका जवाब देने की दरकार इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसे ’आलोक मेहता’ राज्य द्वारा पोषित एवं संरक्षित प्रोपेगैंडा, ’सूचना उत्पादों’ को ही अपना नीति निदेशक तत्त्व मानते हैं।
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अजित सिंह ♦ राज्यसभा में 29 सदस्यों ने इस विधेयक के विरोध में अपना भाषण दिया लेकिन विडंबना यह है कि जनता के हितों के बारे में गंभीरता से विचार करने वाले इस सदन के एक भी सदस्य ने इस विधेयक के ख़िलाफ वोट देने का साहस नहीं जुटाया। इस विधेयक का नाम तो शिक्षा अधिकार विधेयक है, जिसके बारे में इसके पक्षधर कह रहे हैं कि यह 6-14 साल के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन वे बड़ी सफाई से इस बात को गोल कर देते हैं कि इस विधेयक के लागू होने के पहले तक सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले के आधार पर पहले से ही 0-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला हुआ है।
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माहे तलत ♦ अगर अरुंधती कहती हैं कि छत्तीसगढ़ के अखबारों में आदिवासी लोगों की खबरें नहीं लगती, तो इसमें आपको साजिश की बू नहीं नजर आती। वह चाहती हैं कि अखबारों को विज्ञापन नहीं मिलेगा, तो वह बंद हो जायेगा। अभिव्यक्ति का एक सशक्त मंच दम तोड़ देगा। और आदिवासियों के दुख-दर्द और गरीबी-भुखमरी पढक़र सुबह-सुबह क्यों चाय का जायका कोई खराब करना चाहेगा। इसलिए तो नहीं चलायी जाती हैं खबरें, लेकिन आप निष्पक्ष हों चाहे न हों, लेकिन निष्पक्ष दिखना ज़रूरी है, इसलिए मजबूरी है कि बीच-बीच में उनकी भी ख़बरें छापनी पड़ती है।
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श्रीराजेश ♦ आजकल आपकी चर्चा सरेआम है। सुना है आप राज्यसभा जा रहे हैं, चलिए मैं बहुत खुश हूं। किसी से यह भी सुना है कि कांग्रेस आपकी पार्टी के प्रति निष्ठा से प्रभावित है और यदि किसी कारणवश राज्यसभा न भेज सकी तो किसी राज्य का महामहिम बना देगी। सच बताऊं तो अब आपकी उम्र कलम घिसने के बजाय अब तक से गये कलम की स्याही की कीमत वसूलने की हो गयी है और आप सही दिशा में अग्रसर हैं। बधाई हो। लेकिन जब कुछ लोग कांग्रेस के प्रति आपकी निष्ठा को ले कर जुगाली करते हैं तो मुझे लगता है कि खुद तो वे कुछ कर नहीं सकते, लगते हैं उपदेश देने।


