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असहमति, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
राजेंद्र यादव ♦ बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब किसान हजारों की संख्या में आत्महत्याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है।
नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
परिवर्तनकामी टोली ♦ अरुंधती ने ‘हंस’ के जलसे में न जाने का फैसला सार्वजनिक करने से पहले राजेंद्र यादव से किसी तरह की पुष्टि नहीं की। अगर उन्होंने ये फैसला करने से पहले राजेंद्र यादव से एक बार बात कर ली होती या यह पता लगा लिया होता कि क्या विश्वरंजन को भी बुलाया गया है, तो उनका भ्रम तभी दूर हो जाता। इस संवादहीनता ने दो जनपक्षधर व्यक्तित्वों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की। अरुंधती और राजेंद्र यादव की जनपक्षधरता असंदिग्ध रही है। भ्रम की ये स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। अरुंधति राय का जो कद है और जो विश्वसनीयता है, उसमें उन्हें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर इस तरह का कोई फैसला सार्वजनिक करने से बचना चाहिए। राजेंद्र यादव का कहना है कि वे अब भी चाहते हैं कि अरुंधती इस कार्यक्रम में शामिल हों।
नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »
समरेंद्र ♦ राजेंद्र यादव पर आरोप लगाने वाले नीलाभ जैसे लोगों की यही सीमा है। वो इससे ऊपर सोच ही नहीं सकते कि किस कार्यक्रम में किसने किसके साथ मंच साझा किया? और कौन कहां बुलाने पर भी नहीं पहुंचा? यही वजह है कि वो हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहते हैं कि उनकी छवि खराब नहीं हो। उनकी सारी की सारी कवायद सामाजिक छवि को सहेजने में लगी रहती है। शायद उनकी सियासत और दुकानदारी इसी से चलती है! नीलाभ जैसों की कुत्सित और संकीर्ण मानसिकता के कारण ही आज वामपंथ का इतना बुरा हाल है। आज वामपंथी दलों में जितनी गुटबाजी है और जितने धड़े हैं, उतने किसी भी विचारधारा में नहीं है।
नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »
अविनाश ♦ कहीं जाकर या नहीं जाकर, किसी को सुन कर या नहीं सुन कर हम अपनी प्रतिबद्धताएं, अपने आचरण की शुद्धता साबित कर सकते हैं – लेकिन इस सबूत से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी इस बात पर कायम हूं कि अरुंधती मान जाएं और विश्वरंजन छत्तीसगढ़ से चल कर हंस की गोष्ठी में आ जाएं तो पूरे आंदोलनी हिलोर का एक नया संदेश प्रसारित किया जा सकता है। विश्वरंजन को घेर कर, उनको सामने खड़ा करके हत्यारा बता कर, उनके सामने उनका पुतला जला कर, उन्हें जूतों की माला पहना कर। और ऐसा करते हुए अगर उस वक्त तमाम बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी हो जाती है – तो इस भारतीय स्टेट को एक्सपोज करने का कितना आसान अवसर आपके पास है, ये आप ही तय कीजिए।
नज़रिया, मोहल्ला रायपुर, समाचार »
डेस्क ♦ यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।
नज़रिया »
राजकिशोर ♦ अरुंधती राय के बारे में मेरी व्यक्तिगत राय जो भी हो, पर उनके प्रशंसकों में एक मैं भी हूं। इसीलिए यह सवाल मुझे परेशान करता रहता है कि हमारी अपनी भाषा हिंदी में अरुंधती राय क्यों नहीं है। हिंदी में मुलायम सिंह, लालू प्रसाद और मायावती हैं, जिनके बयान हम रोज पढ़ते रहते हैं। पर कोई ऐसा बुद्धिजीवी नहीं है, जिसके विचारों या बयानों को सार्वजनिक माध्यमों में सम्मानपूर्ण स्थान मिलता हो। क्या हिंदी में ऐसे बुद्धिजीवियों का नितांत अभाव है? क्या उनके विचारों में कोई दम नहीं है? क्या हिंदी समाज में ही कुछ कमी है कि सार्वजनिक बुद्धिजीवी पनप नहीं पाते? यह प्रश्न इसलिए विचारणीय है कि हिंदी में सार्वजनिक बहसों को सार्वजनिक बनाया जा सके और प्रभावशाली जनमत तैयार किया जा सके।
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अनिल चमड़िया ♦ अरुंधती के माओवादियों और आदिवासियों के रिश्तों पर लिखने की सबसे तीखी प्रतिक्रिया अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों ने की है। हिंदी में पिछले दिनों दो किताबें आयीं, जिनमें बहुत बारीकी और संवेदना के साथ आदिवासियों का दर्द उकेरा गया है। लेकिन इन पर प्रतिक्रिया बिरादराना राजनीतिक जमात में ही हुई। अभी हिंदी की जनपक्षधर चेतना इस समय को अंग्रेजी के सहारे अपने को व्यक्त करने के अवसर के रूप में देख रही है। इसीलिए अंग्रेजी में जो ऐसी बातें आती हैं, उसे हिंदी का बेचैन मन अपनी भाषा देने लगता है। सुना नहीं गया कि हिंदी की कोई जनपक्षधर सामग्री का अंग्रेजी मन अनुवाद करने के लिए बेचैन हो गया हो। अरुंधती अंग्रेजी में वही लिख रही हैं, जो हिंदी और पंजाबी की जमीनी चेतना महसूस कर रही है।
नज़रिया »
आनंद स्वरूप वर्मा ♦ ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की पत्रकार अनोहिता मजुमदार ने एक दिसंबर 2001 को नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अध्यक्ष प्रचंड (पुष्प कमल दहाल) से बातचीत की, जिसका विवरण इस अखबार के दो दिसंबर के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। बातचीत के दौरान इस प्रतिनिधि ने सवाल किया कि माओवादी योद्धाओं और आतंकवादियों में क्या फर्क है? इस सवाल का जवाब देते हुए कामरेड प्रचंड ने कहा कि ‘दोनों की किसी भी तरह से तुलना ही नहीं की जा सकती। आतंकवादी लोग निरीह और निहत्थी जनता के खिलाफ विवेकशून्य और आत्मघाती हमले करते हैं।
असहमति, नज़रिया »
विश्वदीपक ♦ साजिद रशीद की विवेकहीनता का आलम ये है कि वो ‘आंतकवाद’ और ‘माओवाद’ को एक ही तराजू पर तौल रहे हैं। उन्हें आतंकवाद और माओवाद में फर्क भी समझ में नहीं आ रहा? क्या रशीद की बातों में, अमेरिका और कांग्रेस की दलीलों में कोई फर्क नजर आ रहा है? रशीद कहते कि माओवादी ‘सत्ता में परिवर्तन’ के ख्वाहिशमंद है। अब जबकि भारतीय राज्य अपनी वैधानिकता की सबसे खरतनाक जद्दोजहद कर रहा है राशिद जैसे लोगों को डर क्यों लग रहा है? क्या महज इसीलिए कि वर्तमान सत्ता संरचना में उनकी जो हिस्सेदारी है, सुविधाएं हैं, सहूलियतें है वो छिन जाएंगी?
असहमति, नज़रिया »
साजिद रशीद ♦ नक्सलवादियों के पक्ष में इस समय सबसे निडर और बुलंद आवाज अरुंधती राय की है। अगरचे वे अपने उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ में कॉमरेड नंबूदरीपाद जैसे मार्क्सवादी नेता की आलोचना करके कम्युनिस्टों में ‘शापित’ हो चुकी हैं। अरुंधती ने साप्ताहिक ‘आउटलुक’ में प्रकाशित अपने लंबे लेख में नक्सलवादियों की हिंसा को दुरुस्त ठहराने के लिए जो रोशनाई खर्च की थी, उसमें अब ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के उन डेढ़ सौ यात्रियों का लहू भी शामिल हो गया है, जिन्होंने अपनी आखिरी सांसें लेते हुए यह जरूर सोचा होगा कि उनके किस दुश्मन ने उन्हें यह दर्दनाक मृत्यु दी है? याद रहे, पिछले पांच वर्षों में नक्सलवादियों के हमलों में मरने वाले नागरिकों की संख्या लगभग पंद्रह सौ है।



