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नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ क्या आज आपातकाल जैसी स्थितियां नहीं हैं? ऐसा नहीं लगता कि बिना किसी के कुछ कहे हम सेंसर को लेकर कितने सतर्क हो गये हैं? क्या ऐसा नहीं है कि सरकार वो भरोसे की गली है, जहां हममें से हर कोई अपना सिर छुपाना चाहता है? ये कुछ सवाल थे, जो वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने दिल्ली के कांस्टीच्यूशन क्लब में पूछे, रखे। मौका था उदयन शर्मा के 62वें जन्मदिन पर आयोजित परिचर्चा का। विषय था, लॉबीइंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता। दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि हम सिस्टम से इस बारे में कोई कानून बनाने की बात क्यों करते हैं? कानून बनेगा, तो पेड न्यूज के रास्ते दूसरे हो जाएंगे। हमें किसी भी दूसरे से ज्यादा अपनी जमात पर भरोसा करना होगा।
खेल खेल में, मीडिया मंडी »
विनीत कुमार ♦ इंडिया टीवी के रहते ये भला कैसे पिचकता? इंडिया टीवी की स्पेशल स्टोरी रही – 200 का देवता। इस चैनल ने सचिन को देवता करार देने के साथ ही 200 संख्या को भी स्टैब्लिश करने की कोशिश की। न्यूज चैनलों में तारीखों और संख्या को स्टैब्लिश करने की बहुत मारामारी मची रहती है। ये भी 9/11 से उधार लिया पैटर्न है। हेडर में बार-बार आता है – 5 मिनट, 5 इंच का देवता। पीछे से जोधा-अखबर का गाना, अजीबो शान शहंशाह… इस चैनल की छवि है कि ये दुनिया की किसी भी खबर में देवी-देवता, रहस्यमयी शक्तियों को तलाश लेती है।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
आशुतोष ♦ आडवाणी और जोशी को तो सभी कट्टर हिंदूवादी मानते हैं और इन दोनों ने इसे कभी छिपाने की कोशिश भी नहीं की, लेकिन वाजपेयी ने हमेशा ये जताया कि वो कभी भी अयोध्या आंदोलन के पक्ष में नहीं थे और न ही बाबरी मस्जिद ढहाने को उन्होंने कभी सही माना। यह वाजपेयी का वो चेहरा है, जिसे कुछ बीजेपी विरोधी भी संदेह का लाभ दे नेहरूवादी परंपरा में डालने की गुस्ताखी करते हैं। लेकिन ऐसा करने वाले ये भूल जाते हैं कि वाजपेयी दिल और दिमाग दोनों से ही संघी थे और उन्होंने ये कभी भी नहीं छिपाया कि वो स्वयंसेवक नहीं थे। मुझे याद पड़ता है 1999 में न्यूयार्क में प्रधानमंत्री के तौर पर दिया उनका भाषण। उन्होंने कहा था वो पहले स्वयंसेवक हैं। बाद में जब हंगामा मचा तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने सफाई दी।
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हेमेंद्र मिश्र ♦ अभी अभी बीते आम चुनाव में खबरों को जब बाजार की सुनहली पालकी में झुला कर उपभोक्ता के सामने रखा गया, तो खूब हाय-तौबा मची। चारों ओर से यह आवाज उठने लगी कि पत्रकारीय मूल्य में गिरावट आ गयी है और ख़बरों को अर्थ के आधार पर तय किया जाने लगा है। आप कुछ भी छापें हमें फर्क नहीं पड़ता… और खबरों से खेलना ही आपकी पत्रकारिता है… जैसे जुमले प्रयोग होने लगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि ख़बरों को मसाले की छौंक मारकर परोसने का धंधा हाल ही में शुरू हुआ है। बल्कि इस तथाकथित मज़बूत स्तंभ पर आर्थिक या यूं कहे मिलावट की पुताई आज़ादी के बाद से ही शुरु हो गयी थी।
नज़रिया »
ख़बरों में मिलावट को रोकने के लिए कानून बना पाना संभव होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। अमूमन सभी मीडिया संस्थान किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। हर जगह ख़बरों के साथ घालमेल किया जाता है और सबसे बड़ी बात अगर कभी मीडिया को क्रॉसचेक करने के लिए कानून बनाने की बात की जाती है, तो हम सब यानी पूरा मीडिया ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर अंकुश लगाने के आधार पर ऐसे किसी कानून का विरोध करने लगेंगे। निकट भविष्य में यह जरूर संभव हो सकता है कि मीडिया के लिए कोई गाइडलाइन बनायी जाए और उन गाइडलाइंस का पालन न करने वालों पर जुर्माना लगाया जाए। पर, ऐसी कोई गाइडलाइन तैयार कर पाना भी आसान काम नहीं होगा।
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घूम फिरकर आपकी शिक़ायत उस मीडिया से है, जो बाज़ार के हाथों गिरवी हो गया है। मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि जिस मीडिया को आप बाजार की रखैल साबित करने पर तुले हैं, उसकी परिभाषा के दायरे में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया क्यों है। आपके पूरे लेख में जिस तरह के सवाल खड़े किये गये हैं, उनकी जद में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया ही क्यों है? क्या आप ये मानकर चल रहे हैं कि अख़बारों में ख़बरों के साथ खिलवाड़ नहीं होता? या ख़बरों का सेलेक्शन करते हुए इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि कौन सी ख़बर पाठकों की लारग्रंथियों में हलचल मचाएगी? कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते कि ख़बर को सनसनीखेज़ करने, न्यूडिटी का छौंका लगाने से लेकर उसे मसालेदार बनाकर परोसने तक का काम केवल न्यूज चैनल करते हैं?
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मीडिया में सेंटिंग-गेटिंग का खेल बहुत पुराना है – लेकिन अभी यह अपने शबाब पर है। जिसे पसंद नहीं करते हो, मंदी के बहाने उसे निकालो। अपने लोगो को भर लो। क्या ये सच नहीं? ऐसे ही किसी सेमिनार में एक सीनियर ने कहा था, हमारे मीडिया के हैडलाइंस विदेशों से तय होते हैं। हम उनके हाथों की कठपुतलियां बन कर रह गये हैं। नव-साम्राज्यवाद का एक पूंजीवादी चेहरा ये भी है। जहां तक दलाली का सवाल है, चर्चा थी कि एक नये-नवेले चैनल के मालिक ने अपने पत्रकारों (पढ़ें – नौकरों) से कहा कि रोज़ाना 5 हज़ार लेकर आओ, तो नौकरी बचेगी। क्या यह सच नहीं है?
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ख़बर में मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ कानून बनाने का जो शिगूफा “आउटलुक” के सम्पादक नीलाभ ने छोड़ा है, वह बेमतलब की बहस के अलावा कुछ नहीं है। इस देश में किसी भी चीज़ में मिलावट के लिए कानून हैं। क्या मिलावट रुकी? ख़बर में मिलावट करने वाले ही तो अन्य चीजों में मिलावट के ख़िलाफ़ दिन रात चीख़ते रहते हैं। लेकिन उनकी सुनता कौन है? सुनें भी क्यों जब वह ख़ुद मिलावटखोर हैं। कपिल सिब्बल ने शायद ग़लत नहीं कहा था कि मीडिया के छापने या नहीं छापने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वाकई अब ख़बरों के छपने से आसमान नहीं टूट पड़ता।
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मौजूदा पत्रकारिता पर शोक मनाने के इसी दौर में वैसी पौध भी पल-बढ़ और पसर रही है जिसे चांदी की थाली में खाने का शौक नहीं है। उसे इस दुनिया का सबसे महंगा राजमहल जैसा घर, चार मोटरगाड़ियां, कम से कम एक हवाई जहाज और पांच लाख रुपए महीने की आमदनी की जरूरत नहीं है, जिसके लिए स्विट्जरलैंड के बैंकों की शरण लेनी पड़ती है। इस पौध को पता है कि इतना सब कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले अपनी रीढ़ को बाजार के शहंशाहों के पास गिरवी रखना पड़ता है।
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प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार जेम्स कैरी ने कहा था कि हमलोगों ने ऐसी पत्रकारिता विकसित कर ली है, जिसमें हम हर चीज को जनता के नाम पर सही ठहराते हैं। पर इस पत्रकारिता में जनता की कोई भूमिका नहीं होती सिवाय दर्शक, श्रोता या पाठक बनने के। जेम्स कैरी की बातों को विस्तार दिया जाए तो यह स्पष्ट है कि मीडिया जो कुछ भी परोसती है, उसे तय करने में जनता की कोई भूमिका नहीं होती है। हर मीडिया संस्थान में मोटी पगार पाने वाले बड़े ओहदों पर बैठे लोग ही यह तय कर लेते हैं कि क्या दिखाना है या प्रकाशित करना है और क्या नहीं दिखाना है या नहीं प्रकाशित करना है। या यों कहें कि कितनी मिलावट करनी है। वे स्वार्थ साधने के वास्ते लिये गये निर्णयों को जनता की इच्छा कह कर सही ठहरा दिया जाता है।



