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[20 Aug 2010 | 3 Comments | ]

डेस्‍क ♦ दिनकर कुमार हिंदी के उन कुछ नामों में से हैं, जो गैर हिंदी भाषी इलाके में रहते हुए लंबे अरसे से अभिव्‍यक्ति का अहम मोर्चा संभाले हुए हैं। वे नॉर्थ ईस्‍ट में रहते हैं। दैनिक सेंटीनल नाम के एक हिंदी अखबार के संपादक हैं। पिछले महीने मोहल्‍ला लाइव पर हिंदी सिनेमा में आम आदमी खोज करते हुए जब एक बहस चली, तो फिल्‍मकार अनुराग कश्‍यप ने सुझाव दिया कि इस वर्चुअल मंच पर कहानी पाठ किया जाए। उन पर बात हो। बात जमे, तो उस पर फिल्‍म बनाने के बारे में सोचा जाए। संसाधन के स्‍तर पर जो भी सरंजाम होगा, अनुराग उसको डील करेंगे। कुछ शुरुआती कहानियों में दिनकर जी की कहानी रेडियो राघोपुर हमारे पास आयी थी। तब उन्‍होंने कहानी की स्‍कैन कॉपी हमारे पास भेजी थी।

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[27 Jul 2010 | 11 Comments | ]

चंद्र प्रकाश द्विवेदी ♦ हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्य के लिए सही नहीं है। यहां के निर्माता-निर्देशक मुनाफे और व्यवसाय की लीक पर चलते हैं। वे स्टारों पर आश्रित रहते हैं। अगर हिंदी प्रदेशों में सिनेमा विकसित होगा तो मुंबई का एकाधिकार टूटेगा और एकरसता भी खतम होगी। मुझे लगता है, तब भी हमारे समाज की कहानियां फिल्मों में आ पाएंगी। मुंबई के निर्माता-निर्देशकों ने अपने ऊपर यह बोझ ले लिया है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को संतुष्ट करना है। उसकी वजह से ही स्टार सिस्टम बढ़ा है। अभी भोजपुरी सिनेमा का विकास दिख रहा है लेकिन वह भटकाव का शिकार है। अधिकांश भोजपुरी फिल्में हिंदी फिल्मों की भोंडी नकल हैं।

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[26 Jul 2010 | 13 Comments | ]

कैलाश चंद चौहान ♦ “बताता हूं। शहर में एक लड़का काम करता था। उसे किसी ने बताया कि यहां एक बना बनाया प्लाट बिकाऊ है। इसमें तीन कमरे बने हुए थे। मालिक अपने लड़के को अमेरिका पढ़ाई के लिए भेजना चाहता था। मौका अच्छा था, मैं क्यों चूकता! कुछ जमीन गांव में घर के साथ वाली बेची, तीन बीघा खेत की जमीन थी, वह भी बेच दी। कुछ पैसा मैंने शहर में काम करके इकट्ठा किया हुआ था। शहर में हमारे कुछ रिश्ते थे, उन्होंने भी मेरी सहायता की। प्‍लॉट बेचने वाले भी सज्जन थे। वह भी कुछ पैसा किस्‍तों में लेने को तैयार हो गये। कहते हैं न जहां चाह, वहां राह।”

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[20 Jul 2010 | 5 Comments | ]

शेखर मल्लिक ♦ ऐसे देश में जहां भगतसिंह और मार्क्स को पढ़ना अनपढ़ या अल्पपढ़ सत्ता की आंखों में अपराध है, खूंखार नक्सली साहित्य रखने और नक्सलियों को गुपचुप मदद करने जैसी संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के पर्याप्त सबूत पुलिस उसके ठिकाने से उगाह चुकी थी। वह पुस्तिका भी, जिसके जलते हर्फे थे, “… की रात लांगो गांव मौत की काली चादर ओढ़े थी… बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया था जनता की वीर संतान … का। कुछ अक्षरों में उन वीर शहीदों की जीवन गाथा समाप्त नहीं हो सकती। सिद्दो-कान्हू-बिरसा-तिलका की परंपरा से अनुप्राणित ये योद्धा शोषणमुक्त समाज तैयार करने के लक्ष्य में अपनी जिंदगी के अंत तक काम करते रहे…

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[17 Jul 2010 | 9 Comments | ]

आमिर खान ♦ पीपली लाइव एक काल्‍पनिक कहानी है दो भाइयों की, जो किसान हैं। फिल्‍म की शुरुआत में कर्ज न चुकाने की वजह से वे अपनी जमीन खोने वाले हैं। इसी दौरान उन्‍हें पता चलता है एक सरकारी योजना के बारे में, जो कहती है कि जो किसान कर्जे की वजह से आत्‍महत्‍या करता है, उसके परिवार को एक लाख रुपये दिये जाएंगे। यह सुन कर बड़ा भाई छोटे भाई को मनाता है कि वह आत्‍महत्‍या कर ले ताकि परिवार को एक लाख रुपये मिल जाएं। बड़ा भाई थोड़ा तेज है। छोटा भोला है, तो उस वक्‍त तो वह मान जाता है। उस समय इन दोनों को बिल्‍कुल अंदाजा नहीं है कि जो कदम वे उठाने जा रहे हैं, उससे उस गांव में क्‍या होने वाला है। यह फिल्‍म एक मजाकिया नजर है हमारे समाज पर।

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[12 Jul 2010 | 3 Comments | ]

डॉ योगेंद्र ♦ सच तो यह है कि सिनेमा ने साहित्य की किसी भी रचनात्मक विधा से ज्यादा असर समाज पर डाला है। हालात यह है कि उसके असर से समाज का रॉल मॉडल बदल गया। बहुसंख्यक युवाओं के रॉल मॉडल न मार्क्स हैं, न गांधी, न भगत सिंह, न बुद्ध। वे इन लोगों की कहानियां पाठ्यक्रमों में दवाब से पढ़ लेते हैं, लेकिन जब भी उन्हें फुर्सत होती है, तब हीरो-हिरोइनों की दुनिया में खो जाते हैं। वे अपनी समस्याओं का हल भी सिनेमाई अंदाज से करना चाहते हैं। कभी गांधी टोपी और जयप्रकाश कट कुरता हुआ करता था, मगर अब तो कहीं सलमान है तो कहीं शाहरूख। सिनेमा ने समाज के सोचने-समझने के तरीके बदल दिये हैं।

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[12 Jul 2010 | 9 Comments | ]

डेस्‍क ♦ जैसा कि लेखक ने हमें बताया है कि यह दलित कथा नहीं है और फिल्म बनाने के वास्ते भी नहीं है। झिंझोड़ने का मुगालता भी नहीं है। पैसे और तकनीक से सहज सुलभ उन्मादों और कुंठाओं के आनंद से इतराते इस समय में इतने हाई परफार्मेंस वाले “शाक एब्जार्वर” आ चुके हैं कि कोई भी झटका पर्याप्त कंपन पैदा नहीं कर पाता। दलितों के अलावा और भी लोग हैं, जो खामोशी से अपने-अपने नरक जी रहे हैं। यह कहानी कथाक्रम पत्रिका के जुलाई-सितंबर 2003 अंक में छपी और अब मोहल्‍ला लाइव में छपने के लिए आयी है।

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[9 Jul 2010 | 2 Comments | ]

विश्‍वदीपक ♦ फिल्म गुलाल में जिस बदहवास से चेहरे को गोली मारी जाती है, उसका नाम है पृथ्वी बना और दुनिया के रंगमंच पर जिस खूबसूरत शख्स की हत्या की जाती है उसका नाम है हेमचंद्र पांडेय। पृथ्वी बना का चरित्र पियूष मिश्रा ने निभाया था और अखबारों में हेमचंद्र पांडेय हेमू के नाम से जाना जाता था। इन दोनों ने एक कॉमन गलती की थी। कॉरपोरेट-डेमोक्रेसी की संचरना पर सवाल उठाया था। ‘द रियल डेमोक्रेसी’ की त्रासदी और उसकी विडंबना पर तंज कसा था। जाहिर है, लोकतंत्र के नाम पर लूट और बर्बरता का साम्राज्य खड़ा करने वालों को ये मंजूर कैसे होता?

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[8 Jul 2010 | 17 Comments | ]

अनीश ♦ सामाजिक बदलाव का ठेका फिल्‍मकारों, पत्रकारों या विभिन्‍न कला को अपनी जीविका बनाने वाले लोगों ने नहीं ले रखा है। समाज के हर आदमी की ये जिम्‍मेदारी है कि वो इसमें अपनी भूमिका निर्धारित करे। और उस पर अग्रसर हो। दूसरों को कठघरे में खड़ा करने के पहले खुद को कठघरे में खड़ा करके देखे और विचार करे। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि वो हमको कठघरे में खड़ा नहीं करे। दूसरा सवाल ये है कि जिस बदलाव या क्रांति की हम बात कर रहे हैं, उसका परिप्रेक्ष्‍य क्‍या है… अलग अलग लोगों के लिए इसके मायने अलग अलग हो सकते हैं। वो कौन सी विश्‍वदृष्टि है, जो सामाजिक बदलाव की दिशा तय करेगी।

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[7 Jul 2010 | 13 Comments | ]

अनुराग कश्‍यप ♦ हमारे यहां वो नहीं हो सकता, जो यूरोप और अन्‍य देशों में हुआ है। हमारे देश में डेमोक्रेसी के मायने अलग हैं। हमारे यहां पिक्‍चरों में मोची, चमार, बार्बर, तेली जैसे शब्‍द काट दिये जाते हैं, क्‍योंकि उनके जो पॉलिटिकल रिप्रजेंटेटिव हैं, वो आई और बी मिनिस्‍ट्री पे चढ़ बैठते हैं, जो सेंसर बोर्ड पे चढ़ बैठता है। गुलाल में से सिर्फ दो शब्‍द सेंसर किये गये, जब पृथ्‍वी बना कहता है, सारे गोल चश्‍मे वाले ऐसे ही होते हैं, गांधी अंबेदकर। उनके चश्‍मे गोल थे, अंडरस्‍टैंडिंग भी गोल थी। गांधी और अंबेडकर काट दिया गया। वाक्‍य का मतलब क्‍या रहा? आपका आइडियलिज्‍म जो है, यहां के यथार्थ में रह कर इस्‍तेमाल करिए।