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हवाओं को मनाता हूं, परिंदे रूठ जाते हैं…

दुष्यंत ♦ हिंदी सिनेमा के सरसों वाले पंजाब के दौर “तुझे देखा तो ये जाना सनम” के बाद गानों में बाढ़ का दौर हमने देखा है, और कई बार झेला भी है। झेलना तब होता है, जब बिनामतलब बिना तर्क कोई पंजाबी गीत सुनाई दिखाई देता है। साहब बीवी और गैंगस्टर के पहले पार्ट को याद कीजिए, जुगनी लोकप्रिय पंजाबी लोकगीत है, हीर और जुगनी प्राय: पंजाबी गायक गाते हैं। यानी सब गाते हैं। पर मेरी छोटी बुद्धि में नहीं आता कि कहानी में कहीं कोई संदर्भ न हो, तो पूरा पंजाबी गीत कैसे बजवाया जा सकता है। नायक की प्रेमिका पंजाबन हो, लोकेल पंजाबी हो, नायक पंजाब में हो, कोई तो तर्क हो यार।

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“जिनको डर नहीं है, वो बनाएं पॉलिटिकल सिनेमा!”

राजकुमार गुप्ता ♦ मुझे लगता है सब कुछ में पॉलिटिक्स है। मैंने आमिर और नो वन किल्ड जेसिका पॉलिटिकल सोचकर नहीं बनायी। मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। हम सबसे बड़े डेमोक्रेटिक कंट्री हैं और मजे की बात है कि सबसे कम राजनीतिक फिल्में यहीं बनी हैं। विनीत कुमार के कथन पर मुझे जेसिका में एनडीटीवी की भूमिका पर नाराजगी है। स्थिति पहले प्रेडिक्ट की गयी थी और टूजी घोटाला बाद में आया। हमें एक ऐसे चैनल की जरूरत थी, जिसका बजट कम हो सो हमने एनडीटीवी को लिया। पॉलिटिकल फिल्म को लेकर फिल्ममेकर में एक डर है कि उसकी फिल्में रिलीज नहीं होंगी। सेंसर बोर्ड के बाद भी इतने सारे डायनामिक्स हैं कि दिक्कत आ ही जाती है। सेंसरशिप का मुद्दा अहम है।

द्वंद्व कंटेंट और कलेक्शन में नहीं, कंटेंट और दर्शकों के बीच है 0

द्वंद्व कंटेंट और कलेक्शन में नहीं, कंटेंट और दर्शकों के बीच है

अनुभव सिन्हा ♦ सिनेमा एक टीम एक्टिविटी है। सिनेमा में पैसा इन्वॉल्व होने की वजह से वैसे लोग भी शामिल होते हैं, जिनका कला से प्यार नहीं होता। बतौर निर्देशक आपकी जवाबदेही भी उनके प्रति हो जाती है। मनोरंजन ही सिनेमा का मूल आधार है। सिनेमा के मनोरंजन के स्तर अलग हो सकते है। कंटेंट के हिसाब से सिनेमाई ट्रेंड की बात करें, तो ट्रेंड को भी समझ नहीं आया कि ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्म हिट कैसे हो गयी। पिछले पांच-सात सालों में प्रयोगधर्मी सिनेमा ने अच्छा कमाया है। द लंच बॉक्स का कलेक्शन लागत के हिसाब से शानदार है। मुझे द्वंद्व कंटेंट और कलेक्शन में न दिखकर, कंटेंट और दर्शकों के बीच दिखता है।

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“फिल्‍म बनाना, फिल्‍मों पर बात करना एक ही बात है”

प्रकाश के रे ♦ सिनेमा के आगमन के साथ अठ्ठारहवीं सदी के प्रसिद्ध स्कॉटिश कवि रॉबर्ट बर्न्स की वह प्रार्थना पूरी हो गयी थी, जिसमें उन्होंने खुद को वैसे ही देख पाने की तमन्ना की थी, जैसा दूसरे लोग देख सकते हैं। लेकिन इसी के साथ देखने-दिखाने की इस तकनीक ने इस प्रक्रिया के विविध आयामों को लेकर एक अंतहीन बहस की शुरुआत भी कर दी, जो आज कई दशकों के बाद भी बदस्तूर जारी है। गोदार ने तो यहां तक कह दिया है कि फिल्में बनाना और फिल्मों पर बात करना एक ही बात है। ये दोनों चीजें भले ही एक न हों, लेकिन फिल्मों पर बतकही एक महत्वपूर्ण गतिविधि तो है। सितंबर के तीसरे सप्ताहांत में मोहल्ला लाइव द्वारा दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय गोष्ठी – सिने बहसतलब 2013 – के दौरान हिंदी सिनेमा के वर्तमान पर कई विषयों के संदर्भ में गहन चर्चा में अनेक निर्देशकों, कलाकारों, गीतकारों, लेखकों, समीक्षकों सहित बड़ी संख्या में सुधी दर्शकों की भागीदारी इस महत्त्व को रेखांकित करती है।

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मनोरंजन के साथ ही जिम्‍मेदारियों को समझे सिनेमा

डॉ विभावरी ♦ ‘राजनीतिक सिनेमा के रोड़े’ विषय पर बोलते हुए अरविंद गौड़ ने एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया कि बनने के क्रम में अक्सर सिनेमा से जिंदगी गायब और मार्केट हावी क्यों हो जाता है? फिल्मकारों का इस पर सीधा जवाब हो सकता है कि फिल्में बनाना व्यवसाय है इसलिए! इसके अलावा सिनेमा एक कलेक्टिव आर्ट है। इसके हर पक्ष को समायोजित करके बेहतर फिल्म बनाना ही अपने आप में मुश्किलों भरा काम है। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि कलाओं पर न सिर्फ अपने समाज और परिवेश के यथार्थपरक अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी होती है बल्कि पाठकों और दर्शकों की रुचियों के परिष्कार की भी। प्रियदर्शन ने इस सेशन में ‘गर्म हवा’ का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया कि यथार्थ को ज्यों का त्यों रख देना ही महत्त्वपूर्ण नहीं है।

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आज व्‍यवसाय तय कर रहा है गीतों की जबान

इरशाद कामिल ♦ आज के समय में दबाव बहुत ज्यादा है, हर किसी पर दबाव है। आज का गीतकार अपने गीत को बचा रहा है। अगर गीत का पहला ड्राफ्ट देख लिया जाए या वही पास हो जाया करे तो बड़ी बात है, पर बिजनेस के इस समय में बहुत दबाव है। गीत के पहले ड्राफ्ट को बचाना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। भाषा हमेशा बदली है, उसी तरह समाज के साथ-साथ गीत भी बदले हैं। आज की भाषा असल में कबीर की सधुक्कड़ी भाषा है। आज का गीतकार बंदिशों के बावजूद लिखता है। हां, आज के गीत की भाषा व्यवसाय पर निर्भर है – जैसे डाउनलोड, रिंगटोन।

मेनस्ट्रीम सिनेमा अपनी खामियों के बावजूद ताकतवर है 0

मेनस्ट्रीम सिनेमा अपनी खामियों के बावजूद ताकतवर है

अजय ब्रह्मात्‍मज ♦ बदलाव में ऐसा कोई बॉर्डर लाइन नहीं है। आप इंडस्ट्री में आये नये लोगों को सोच कर देखिए तो पाएंगे कि उनका बॉलीवुड से कोई पुश्तैनी नाता नहीं है, यह एक बदलाव है। शुक्रवार को रिलीज दो फिल्में ‘द लंच बॉक्स’ और ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ बदलाव के उदाहरण के रूप मे हैं। काफी वैक्यूम आया है पिछले समय में, भोजपुरी सिनेमा ने यह वैक्यूम काफी हद तक भरा है। बदलाव तो अब यहां तक है कि जो विदेशी रोमांस था, वह अब शुद्ध देसी रोमांस हो गया है।

हमारे खिलाफ आरोप-पत्र है राजकुमार गुप्ता का डर 0

हमारे खिलाफ आरोप-पत्र है राजकुमार गुप्ता का डर

♦ प्रकाश के रे बायें से राजकुमार गुप्‍ता, सुभाष कपूर और आनंद एल राय भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां सिनेमा मनोरंजन का एक समृद्ध और सम्मानित कला-साधन है, कोई फिल्मकार अगर यह कहता...

सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह उतनी नयी नहीं है 0

सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह उतनी नयी नहीं है

सिने बहसतलब : पहला सत्र : हिंदी सिनेमा में स्त्रियों की नयी जगह वक्‍ता : स्‍वरा भास्‍कर, शिल्पा शुक्ला, उषा जाधव, विशाखा सिंह मॉडरेटर : विभावरी ♦ स्वरा भास्कर मेरी बातें मेरी सीमित समझ...

क्‍या सरोकार से लद कर ही आगे बढ़ सकता है सिनेमा? 0

क्‍या सरोकार से लद कर ही आगे बढ़ सकता है सिनेमा?

♦ विनीत कुमार बायें से विनीत कुमार, अनुभव सिन्‍हा, आनंद एल राय, उदय प्रकाश, रघुवेंद्र सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज सिनेमा आपको बिल्कुल एक दूसरी दुनिया में ले जा रहा होता है, तभी बीच में...