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राष्ट्रीय सहारा ♦ हिंदी सिनेमा में हिंदी पट्टी की धड़कनें नहीं सुनाई पड़ती हैं। वि बाजार में पांव जमाने के चक्कर में बॉलीवुड स्थानीय सच्चाइयों की लगातार अनदेखी कर रहा है। सवाल यह है कि क्या दर्शक भी उन्हीं फिल्मों को सिर आंखों पर नहीं ले रहे जिनमें बाजारवादी अपसंस्कृति की चटखारेदार प्रस्तुति की जा रही है। दर्शक कहता है कि जनाब जब फिल्म बनाने वालों की पहली चिंता यह है कि वह कितना पैसा बटोर लाती है तो दर्शक भी तो अपनी गाढ़ी कमाई का पाई-पाई वसूल लेना चाहेगा। यह तथ्य रविवार को ‘हिंदी सिनेमा की क्षेत्रीय चुनौतियां’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में उभरकर आया।
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मनोज वाजपेयी ♦ लोकल ग्लोबल तभी हो सकता है, जब वह अपनी मिट्टी से जुड़ा हो। इरान में बहुत बाधाएं हैं, फिर भी वहां की बन रही फिल्में विश्व भर में संदेश दे रही हैं। अपने यहां कई तरह की बाधाएं हैं। सेंसर भी एक बड़ी बाधा है। सिनेमा से मैं भी बहुत इंस्पायर्ड हुआ। मैं मानता हूं कि मुंबई का केंद्रीकरण टूटना चाहिए। जब तक हमारे ही लोग अपनी कहानी को नहीं ढूंढेंगे, अपने समाज को पर्दे पर लाने की नहीं सोचेंगे, तो दूसरे से यह आशा करना बेकार है। जरूरी है कि हम फिल्में देखें तकनीक सीखने के लिए, कहने की कला सीखने के लिए।
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मोहल्ला लाइव ♦ हिंदी का मुख्यधारा सिनेमा बॉलीवुड में कैद है। उसकी मेकिंग इस तरह से केंद्रित (centralised) हो गयी है कि हिंदुस्तान का क्षेत्रीय और भाषाई रंग उसमें लगभग नजर नहीं आता। हालांकि कुछ फिल्मकार कंटेट और भूगोल के स्तर पर हिंदी सिनेमा को अपनी तरह से समझने की कोशिश करते रहते हैं। जैसे इन दिनों गिना जाए, तो कुछ नाम लिये जा सकते हैं, अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, इम्तियाज अली, अनुषा रिजवी, महमूद फारूकी, डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी। कुछ और नाम हैं, पर बार-बार हिंदी सिनेमा करन जौहर और शाहरुख खान प्रोडक्शन की फॉर्मूला गली में ही लौट जाता है, क्योंकि वहां दर्शकों को मैन्युपुलेट करने की ताकत ज्यादा है, जाहिर है मुनाफा भी।
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कार्तिक कृष्णन ♦ पहले तो यह एक भ्रम है कि अच्छे निर्माता होंगे तो सिनेमा अच्छा बन जाएगा। अच्छे निर्माता के बगैर भी “स्वतंत्र सिनेमा” है। सवाल है कि लेकिन देखता कौन है? और उसे देखने के क्या माध्यम हैं? DVD ? या निजी प्रदर्शन? अब वो पैसा चाहे पांच लाख हो या एक लाख या पचास हजार, वापस कैसे आएगा? हमारी फिल्म में डी संतोष और स्वरा भास्कर दोनों हैं, जो जाने-माने कलाकार हैं। लेकिन कौन उसे रिलीज करेगा?
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डेस्क ♦ सिनेमा एक ऐसी सार्वजनिक दिलचस्पी और हसरत से जुड़ा सृजन है, जिसको लेकर हिंदी में साझा विमर्श कम दिखता है। मोहल्ला लाइव ने पिछले कुछ सालों से कोशिश की है कि ऐसा हो और शास्त्रीय अंदाज में न हो – लोकप्रिय अंदाज में हो, ताकि इस विमर्श में हिस्सा लेने में किसी को हिचक न हो। कुछ समानधर्मा समूहों के साथ हमने पिछले साल एक विमर्श आयोजित किया था, जिसमें हिंदी सिनेमा से जुड़े कुछ जरूरी नामों के साथ बड़ी तादाद में सक्रिय दर्शकों ने आपस में बातचीत की थी। 23 सितंबर 2011 को, मोहल्ला लाइव जागरण फिल्म फेस्टिवल के साथ मिल कर सिने विमर्श आयोजित कर रहा है। थीम है, Hindi Cinema Beyond Bollywood… बॉलीवुडीय छायाओं से बाहर हिंदी सिनेमा।
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डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ♦ क्षेत्रीयता से हिंदी को जोड़कर हम सार्थक निकस पर नहीं पहुंच सकते। सुनील दत्त की रेशमा और शेरा और अमोल पालेकर की पहेली क्या हिंदी सिनेमा नहीं है? क्या इसका परिवेश किसी प्रांत विशेष का होने की वजह से हम इसे किसी भाषा विशेष की फिल्म बना देंगे? हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है। चिंतन, मनीषा और संघर्ष जिस भाषा में व्यक्त होना चाहिए, वह अगर इसके माध्यम से संभव हो पा रहा है, तो हम इसको लेकर इतने हैरान क्यों हैं? कहीं भाषा को लेकर हम अपनी निजी पहचान तो हिंदी में हासिल करना नहीं चाह रहे?
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डेस्क ♦ पटना बहसतलब का विषय है, हिंदी सिनेमा में कितना है हिंदी समाज। दरअसल जिस बॉलीवुड की बुनियाद हिंदी समाज के सांस्कृतिक प्रतीक रहे हैं, उस बॉलीवुड का पूरा कारोबार आज अंग्रेजी मानसिकता से संचालित होता है। यहां तक कि हिंदी सिनेमा का विषय हिंदी समाज से लगातार छिटकता रहा है। हालांकि कुछ लोग हिंदी सिनेमा में हिंदी समाज को गंभीरता के साथ रेखांकित करने की कोशिश भी कर रहे हैं।
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विनीत कुमार ♦ बौद्धिक संपदा कानून पर कल बहसतलब में इस उम्मीद से गया था कि लेखकों के हक और लिखकर रोजी-रोटी जुटानेवालों के पक्ष में बातचीत होगी। लेकिन कल बहसतलब का शिल्प बहुत ही शांत और स्थिरचित्त था। पैसे और अधिकार के मामले में हिंदी समाज के दूसरे सेमिनारों की तरह वो भी अध्यात्म के दरवाजे में चला गया।
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प्रकाश के रे ♦ कॉपीराइट की निर्धारित समयावधि को लगातार बढ़ाये जाने को चिंताजनक बताया और पूछा कि इसकी क्या जरूरत है? उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस संदर्भ में विकसित राष्ट्रों के नियम हमें ज्यों के त्यों अपनाने चाहिए? उन्होंने फिल्मों में कुछ लोकगीतों को लिये जाने का हवाला देते हुए कहा कि जब आपको लेना होता है तो आप ले लेते हैं, लेकिन जब हमें लेना होता है तो हमारे हाथ बांध दिये जाते हैं।
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रिचर्ड स्टॉलमैन ♦ लेखकों के साथ प्रकाशकों का व्यवहार अच्छा नहीं है। लेखक के फायदे के नाम पर वे ज्यादा से ज्यादा अधिकार अपने पास रखना चाहते हैं। कुछ नामी-गिरामी लेखकों के साथ वे अच्छा बर्ताव करते हैं, लेकिन बाकियों का शोषण ही करते हैं। संगीत उद्योग में तो और भी बुरा हाल है। कर्टनी लव ने तो रिकॉर्ड कंपनियों को ही पाइरेट कहा है। मेरे विचार में किताबों के लिए दस साल की सीमा सही है लेकिन यह हर तरह के काम पर लागू नहीं किया जा सकता।



