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नज़रिया, मोहल्ला पटना »
प्रमोद रंजन ♦ नीतीश कुमार पिछड़ी जाति से आते हैं। यह तथ्य, उस मासूम उम्मीद की मुख्य वजह बना था कि वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में काम करेंगे। समान स्कूल प्रणाली आयोग तथा भूमि सुधार आयोग के हश्र तथा अति पिछड़ा वर्ग आयोग व महादलित आयोग के प्रहसन को देखने के बाद यह उम्मीद हवा हो चुकी है। इसके विपरीत नीतीश कुमार बिहार में पिछड़ा राजनीति या कहें गैरकांग्रेस की राजनीति की जड़ों में मट्ठा डालने वाले मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। 2005 में राश्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार भारी बहुमत से चुनाव जीत कर आये थे। उसके बाद से जिस रफ्तार से उनकी लोकप्रियता गिरी है, उसी गति से कांग्रेस का उठान हुआ है।
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संजय कुमार ♦ बिहार से प्रकाशित सभी अखबारों ने पहले पेज पर जगह दी। लेकिन बिहार के मीडिया का चेहरा एक बार फिर साफ हो गया कि आखिर उसकी सोच क्या है? यानी किसका मीडिया, कैसा मीडिया और किसके लिए? प्रश्न सामने आ ही गया। लोग भी चौंके। क्विंस बैटन रिले खबर तो बनी। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू समाचार पत्रों ने क्विंस बैटन रिले की खबर तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर तस्वीर के साथ प्रकाशित की। लेकिन बैटन के साथ कोई खिलाड़ी नजर नहीं आया। नजर आयी जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री नीतू चंद्रा। राज्यपाल के साथ बैटन थामे नीतू की तस्वीर ने मीडिया की सोच को सामने ला दिया।
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आवेश तिवारी ♦ सोना उगाने वाली सोन अब अभिशापित हो चुकी है। विकास की मौजूदा होड़ ने नदी के स्वरूप को छिन्न भिन्न करके, नदी के जल पर निर्भर किसानों-खेतिहरों के लिए मुश्किल की स्थिति पैदा कर दी है। बिहार के भोजपुर, अलवर, जहानाबाद, पाटलिपुत्र आदि जनपदों में जल संकट की वर्तमान परिस्थितयों से रबी की फसल में भारी नुकसान की संभावनाएं हैं। पूर्व में इंद्रपुरी बेराज द्वारा पूर्वी और पश्चिमी सोन कैनाल के माध्यम से इन इलाकों में 2410 क्यूसेक पानी छोड़ गया था, लेकिन ये पानी पूरी तरह से अपर्याप्त साबित हुआ है।
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डेस्क ♦ नवभारत टाइम्स, पटना के पूर्व संपादक अरुण रंजन ने कहा कि मीडिया में बिहार की दो छवियां हैं – एक प्रगट है तो दूसरी अप्रगट। इन दोनों के बीच अंदर ही अंदर टकराहट चलती रहती है। जेपी आंदोलन के समय और आपातकाल के बाद बिहार में एक नयी पत्रकारिता का उदय हुआ, जिसने भूमि संघर्ष, बूथ कैप्चरिंग, अवैध हथियार के बारे में खुल कर लिखा। सामाजिक मान्यता प्राप्त अपराधियों के खिलाफ भी लिखा गया। इससे बिहार की खून खराबे वाली तस्वीर तो बनी, बदनामी भी हुई लेकिन उससे बड़ी एक और छवि बनी वह थी प्रतिरोध करने के जुझारूपन की। इसी जुझारूपन से राज्य और देश में बड़े बदलाव का रास्ता तैयार हुआ। नेगेटिव इमेज के डर से बड़े मकसद को छोड़ा नहीं जा सकता है।
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डेस्क ♦ बिहार और बिहारियों के बीच ये सवाल अकसर उठता रहा है कि क्या मीडिया बिहार की वास्तविक तस्वीर दिखाता है या फिर कहीं वह पहले से बनी बनाई स्टीरियोटाइप इमेज को ध्यान में रखकर चीज़ों को पेश तो नहीं करता रहता? बिहार के लोग तो ये भी शिकायत करते मिल जाएंगे कि मीडिया ने बिहार की एक नकारात्मक छवि गढ़ी है जिससे ग़ैर बिहारियों की नज़र में वे दीन-हीन बन जाते हैं। उनका कहना है कि बिहार के बारे में मीडिया अपराध, जातिवाद, बाढ़, सूखा, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अराजकता, हिंसा और पलायन आदि की ख़बरें ही प्रमुखता से प्रकाशित करता है जबकि राज्य में सब कुछ बुरा ही हो रहा हो ऐसा नहीं है।
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जनसत्ता ♦ पुणे के सतीश शेट्टी के बाद बिहार में बेगूसराय के शशिधर मिश्र ऐसे दूसरे शख्स थे, जिन्हें सिर्फ इसलिए जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों का पर्दाफाश करने के लिए सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल किया था। यों बिहार से लगातार ऐसी खबरें आती रही हैं कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई का इस्तेमाल करने वाले लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है या फिर झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें तबाह करने की कोशिश की जा रही है। एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या यह बताती है कि बदलाव और विकास के शोर के पीछे बिहार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
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सुशांत झा ♦ नीतीश के मीडिया मैनेंजमेंट का एक बेहतरीन नमूना हाल ही में आयी बिहार के पीएजी (मुख्य लेखाकार) की रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2007 में कोसी में तटबंध के टूटने से आयी भीषण बाढ़ के पीछे बिहार सरकार की लापरवाही जिम्मेदार है। लेकिन हमारे मीडिया ने इस खबर को कोई तवज्जो नहीं दी। दरअसल मीडिया अपने द्वारा बनाये गये ‘पोपुलर सेंटीमेंट’ को कसैला नहीं बनाना चाहती। लेकिन आप याद कीजिए, 2007 में आयी उस भीषण बाढ़ को, जिसके बाद नीतीश सरकार ने सारा का सारा ठीकरा केंद्र के सर फोड़ दिया था कि नेपाल में हुई इस घटना के लिए वो कैसे जिम्मेदार हो सकती है।
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हेमंत कुमार ♦ नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषियोग्य भूमि रखनेवाले किसानों में छोटे व सीमांत किसान 96.5 फ़ीसदी हैं। इनके पास ज़मीन 66 फ़ीसदी ही है। मध्यम व बड़े किसान केवल 3.5 प्रतिशत हैं, पर वे 33 फ़ीसदी जमीन के मालिक हैं। बड़े किसान केवल 0.1 प्रतिशत हैं। पर ज़मीन उनके पास 4.63 फ़ीसदी (19.76 लाख एकड़) है। यह कृषि संबंध विकास के रास्ते में सबसे बड़ा बाधक है। भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें इसी संबंध को बदलने के नेक इरादे से तैयार की गयी थी। बंद्योपाध्याय को पढ़ते हुए आप चर्चित माले नेता विनोद मिश्र को याद कर सकते हैं, जिन्होंने बहुत पहले बिहार के विकास को जटिल सवाल बताते हुए एक बड़े आपरेशन की ज़रूरत बतायी थी।
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अरविंद शेष ♦ ‘अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार’ के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसके कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4,415 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1,028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के थे। इसके अलावा पिछले छह महीने में 1,571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी।
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प्रमोद रंजन ♦ बिहार में बड़ी जोतों के मालिक द्विजों के अलावा दबंग पिछड़ी जातियां यादव और अवधिया कुर्मी में भी हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने यह बयान द्विज जातियों के दबाव में दिया है। वस्तुत: उनकी पिछड़ा राजनीति शुरू से ही द्विज वर्चस्व का शिकार रही है। इसी कारण वे महिलाओं को आरक्षण देने के अलावा कोई परिवर्तनकारी कदम नहीं उठा सके। उन्होंने उन सभी अवसरों को गंवा दिया, जिसके लिए बिहार के वंचित तबकों ने उन्हें सत्ता सौंपी थी। समानता के आग्रही लोगों के लिए चिंता का विषय यह है कि बिहार के दो अन्य राजनेता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान भी इस मामले में ज़मींदारों के पक्ष में खड़े रहे हैं।



