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जनसत्ता ♦ पुणे के सतीश शेट्टी के बाद बिहार में बेगूसराय के शशिधर मिश्र ऐसे दूसरे शख्स थे, जिन्हें सिर्फ इसलिए जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों का पर्दाफाश करने के लिए सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल किया था। यों बिहार से लगातार ऐसी खबरें आती रही हैं कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई का इस्तेमाल करने वाले लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है या फिर झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें तबाह करने की कोशिश की जा रही है। एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या यह बताती है कि बदलाव और विकास के शोर के पीछे बिहार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
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सुशांत झा ♦ नीतीश के मीडिया मैनेंजमेंट का एक बेहतरीन नमूना हाल ही में आयी बिहार के पीएजी (मुख्य लेखाकार) की रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2007 में कोसी में तटबंध के टूटने से आयी भीषण बाढ़ के पीछे बिहार सरकार की लापरवाही जिम्मेदार है। लेकिन हमारे मीडिया ने इस खबर को कोई तवज्जो नहीं दी। दरअसल मीडिया अपने द्वारा बनाये गये ‘पोपुलर सेंटीमेंट’ को कसैला नहीं बनाना चाहती। लेकिन आप याद कीजिए, 2007 में आयी उस भीषण बाढ़ को, जिसके बाद नीतीश सरकार ने सारा का सारा ठीकरा केंद्र के सर फोड़ दिया था कि नेपाल में हुई इस घटना के लिए वो कैसे जिम्मेदार हो सकती है।
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हेमंत कुमार ♦ नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषियोग्य भूमि रखनेवाले किसानों में छोटे व सीमांत किसान 96.5 फ़ीसदी हैं। इनके पास ज़मीन 66 फ़ीसदी ही है। मध्यम व बड़े किसान केवल 3.5 प्रतिशत हैं, पर वे 33 फ़ीसदी जमीन के मालिक हैं। बड़े किसान केवल 0.1 प्रतिशत हैं। पर ज़मीन उनके पास 4.63 फ़ीसदी (19.76 लाख एकड़) है। यह कृषि संबंध विकास के रास्ते में सबसे बड़ा बाधक है। भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें इसी संबंध को बदलने के नेक इरादे से तैयार की गयी थी। बंद्योपाध्याय को पढ़ते हुए आप चर्चित माले नेता विनोद मिश्र को याद कर सकते हैं, जिन्होंने बहुत पहले बिहार के विकास को जटिल सवाल बताते हुए एक बड़े आपरेशन की ज़रूरत बतायी थी।
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अरविंद शेष ♦ ‘अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार’ के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसके कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4,415 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1,028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के थे। इसके अलावा पिछले छह महीने में 1,571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी।
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प्रमोद रंजन ♦ बिहार में बड़ी जोतों के मालिक द्विजों के अलावा दबंग पिछड़ी जातियां यादव और अवधिया कुर्मी में भी हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने यह बयान द्विज जातियों के दबाव में दिया है। वस्तुत: उनकी पिछड़ा राजनीति शुरू से ही द्विज वर्चस्व का शिकार रही है। इसी कारण वे महिलाओं को आरक्षण देने के अलावा कोई परिवर्तनकारी कदम नहीं उठा सके। उन्होंने उन सभी अवसरों को गंवा दिया, जिसके लिए बिहार के वंचित तबकों ने उन्हें सत्ता सौंपी थी। समानता के आग्रही लोगों के लिए चिंता का विषय यह है कि बिहार के दो अन्य राजनेता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान भी इस मामले में ज़मींदारों के पक्ष में खड़े रहे हैं।
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प्रमोद रंजन ♦ इस तथ्य को कैसे अनदेखा किया जा सकता है कि बिहार जैसे बड़े राज्य के हिंदी-अंग्रेजी मीडिया संस्थानों में ‘फैसला लेने वाले पदों’ पर न कोई आदिवासी है, न दलित, न पिछड़ा, न ही कोई महिला। कुछ कागजी अपवादों को छोड़ दें तो एक लाख वर्ग किलोमीटर में गंगा, फल्गु, सोन, कोसी, गंडक, बागमती, कमला, महानंदा, कर्मनाशा आदि नदियों के बीच फैली 9 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी की सामाजिक, सांस्कृतिक विवधिता का कोई संकेत यहां मौजूद नहीं है। सब के सब हिंदू, सबके सब द्विज और सबके सब पुरुष!
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शाश्वती ♦ हर साल बाढ़ की आशंका, बांध की मरम्मत और नदी और नहर से जुड़ी कई बातों ने इस क्षेत्र में एक और चीज़ को बढ़ावा दिया है और वह है, भ्रष्टाचार। यह भ्रष्टाचार अब बांध और उसकी मरम्मत से जुड़े सामानों, रिलीफ मेटीरियल और पुनर्वास के लिए दी जाने वाली राशि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऐसा लगता है, जैसे लोग आवाज़ उठाना ही भूल चुके हैं। आम मानसिकता यह है कि कम-से-कम इतना तो मिल रहा है। वो उसी में संतुष्ट हैं। उन्हें दी जा रही सुविधाओं को वो अपना हक नहीं, बल्कि सरकार की मेहरबानी मान रहे हैं।
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शाश्वती ♦ बस में तकरीबन 10-15 लड़कियां और महिलाएं उस बस में चढ़ीं। खास यह था कि वे सब नवहट्टा और उसके आसपास के इलाके के स्कूलों में टीचर हैं और हर दिन महानगर की कामकाजी लड़कियों और महिलाओं की तरह 50-60 किलोमीटर की ट्रैवलिंग करती हैं। कुछ अपने साथ अपने छोटे बच्चों को भी स्कूल लेकर जाती हैं। शिक्षा मित्र के तहत नीतीश कुमार ने हजारों शिक्षित बेरोज़गारों को नौकरी दी। ये बात तो पुरानी हो चुकी है। उन महिलाओं की बातचीत सुनकर समझ में आया कि वे सब कस्तूरबा में टीचर हैं और उनकी भरती प्रॉपर टेस्ट और इंटरव्यू के बाद हुई है। सैलरी है चार हजार रुपये प्रतिमाह।
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पटना, 8 जुलाई। पिछले वर्ष कोसी नदी की विभिषिका का ख्याल जेहन में आते ही कोसी प्रभावित लोगों के जख्म हरे हो जा रहे हैं। पिछले 18 अगस्त को आई बाढ़ से प्रभावित लोग अभी से ही मन ही मन ऊंचे स्थानों की तलाश शुरू कर चुके हैं या फिर परिजनों को अन्य रिश्तेदारों के यहां भेजने लगे हैं। ज्ञात हो कि अभी पूरी तरह बरसात नहीं हुई है परंतु कोसी ने कई तटबंधों तथा बैराज पर अपना दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया है। हालांकि प्रशासन इस बार अपनी तैयारी से संतुष्ट है।
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पूरे देश में अकाल के आसन्न संकट को देखते हुए बिहार के गया ज़िले में 7 जुलाई को पानी पर एक बड़ी पंचायत का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें मध्यप्रदेश के समाजवादी नेता रघु ठाकुर और पूर्व बीजेपी नेता गोविंदाचार्य शिरकत करेंगे। पानी पंचायत गया के एक ब्लॉक वज़ीरगंज के किसान भवन में होगी। पानी पंचायत में राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। लेकिन श्रोता की हैसियत से। प्रभात कुमार शांडिल्य मोहल्ला live के जरिये साइबर पाठकों से पंचायत में भाग लेने की अपील कर रहे हैं


