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[16 Sep 2009 | 10 Comments | ]
बिहार की पत्रकारिता में जाति की सड़ांध पर सर्वे

प्रमोद रंजन ♦ इस तथ्य को कैसे अनदेखा किया जा सकता है कि बिहार जैसे बड़े राज्य के हिंदी-अंग्रेजी मीडिया संस्थानों में ‘फैसला लेने वाले पदों’ पर न कोई आदिवासी है, न दलित, न पिछड़ा, न ही कोई महिला। कुछ कागजी अपवादों को छोड़ दें तो एक लाख वर्ग किलोमीटर में गंगा, फल्गु, सोन, कोसी, गंडक, बागमती, कमला, महानंदा, कर्मनाशा आदि नदियों के बीच फैली 9 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी की सामाजिक, सांस्कृतिक विवधिता का कोई संकेत यहां मौजूद नहीं है। सब के सब हिंदू, सबके सब द्विज और सबके सब पुरुष!

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[2 Sep 2009 | 5 Comments | ]
भ्रष्‍टाचार की कोसी में नागरिकों का नियति-स्‍नान

शाश्‍वती ♦ हर साल बाढ़ की आशंका, बांध की मरम्मत और नदी और नहर से जुड़ी कई बातों ने इस क्षेत्र में एक और चीज़ को बढ़ावा दिया है और वह है, भ्रष्टाचार। यह भ्रष्टाचार अब बांध और उसकी मरम्मत से जुड़े सामानों, रिलीफ मेटीरियल और पुनर्वास के लिए दी जाने वाली राशि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऐसा लगता है, जैसे लोग आवाज़ उठाना ही भूल चुके हैं। आम मानसिकता यह है कि कम-से-कम इतना तो मिल रहा है। वो उसी में संतुष्ट हैं। उन्हें दी जा रही सुविधाओं को वो अपना हक नहीं, बल्कि सरकार की मेहरबानी मान रहे हैं।

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[28 Aug 2009 | 9 Comments | ]
गांव गयी थी, उसे खुश देखा, बिहार में काम हो रहा है

शाश्‍वती ♦ बस में तकरीबन 10-15 लड़कियां और महिलाएं उस बस में चढ़ीं। खास यह था कि वे सब नवहट्टा और उसके आसपास के इलाके के स्कूलों में टीचर हैं और हर दिन महानगर की कामकाजी लड़कियों और महिलाओं की तरह 50-60 किलोमीटर की ट्रैवलिंग करती हैं। कुछ अपने साथ अपने छोटे बच्चों को भी स्कूल लेकर जाती हैं। शिक्षा मित्र के तहत नीतीश कुमार ने हजारों शिक्षित बेरोज़गारों को नौकरी दी। ये बात तो पुरानी हो चुकी है। उन महिलाओं की बातचीत सुनकर समझ में आया कि वे सब कस्‍तूरबा में टीचर हैं और उनकी भरती प्रॉपर टेस्ट और इंटरव्यू के बाद हुई है। सैलरी है चार हजार रुपये प्रतिमाह।

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[9 Jul 2009 | No Comment | ]
फिर डर रहे हैं कोसी की बाढ़ से प्रभावित लोग

पटना, 8 जुलाई। पिछले वर्ष कोसी नदी की विभिषिका का ख्याल जेहन में आते ही कोसी प्रभावित लोगों के जख्म हरे हो जा रहे हैं। पिछले 18 अगस्त को आई बाढ़ से प्रभावित लोग अभी से ही मन ही मन ऊंचे स्थानों की तलाश शुरू कर चुके हैं या फिर परिजनों को अन्य रिश्तेदारों के यहां भेजने लगे हैं। ज्ञात हो कि अभी पूरी तरह बरसात नहीं हुई है परंतु कोसी ने कई तटबंधों तथा बैराज पर अपना दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया है। हालांकि प्रशासन इस बार अपनी तैयारी से संतुष्ट है।

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[5 Jul 2009 | One Comment | ]
सारे काम रोक कर पहले पानी का इंतज़ाम करो

पूरे देश में अकाल के आसन्‍न संकट को देखते हुए बिहार के गया ज़‍िले में 7 जुलाई को पानी पर एक बड़ी पंचायत का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें मध्‍यप्रदेश के समाजवादी नेता रघु ठाकुर और पूर्व बीजेपी नेता गोविंदाचार्य शिरकत करेंगे। पानी पंचायत गया के एक ब्‍लॉक वज़ीरगंज के किसान भवन में होगी। पानी पंचायत में राज्‍य के प्रशासनिक अध‍िकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। लेकिन श्रोता की हैसियत से। प्रभात कुमार शांडिल्‍य मोहल्‍ला live के जरिये साइबर पाठकों से पंचायत में भाग लेने की अपील कर रहे हैं

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[4 Jul 2009 | 8 Comments | ]
बदला-बदला सा ये बिहार नज़र आता है!

चुनाव में जब पूरे देश में कांग्रेस की आंधी चली, बिहार में इस आंधी का ज़ोर नहीं चला। कहा गया कि पहली बार बिहार में विकास चुनाव के एजेंडे में आया है। विकासी विरोधी लालू अब लगभग अतीत हो जाएंगे। ऐसे में पत्रकार अनुराग कश्‍यप ने पूरे बिहार का दौरा करके ये देखने की कोशिश की है क्‍या सचमुच बिहार बदल रहा है।

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[3 Jul 2009 | One Comment | ]
बिहार में फिर बाढ़ की दस्‍तक, असम में भी तबाही

पटना/गुवाहाटी, 3 जुलाई। बिहार में इस बार भी कोसी ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये हैं। कोसी के कैचमेंट एरिया के ज़‍िले सुपौल और मधेपुरा में एक बार फिर लोग का भय सतह पर आ गया है। उधर असम में मूसलाधार बारिश से लगभग 200,000 लोग बेघर हो गए हैं।

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[11 Jun 2009 | 2 Comments | ]
नीतीश नाम सत्‍य है, बाक़ी नाम झूठ

नीतीश कुमार आलोचना से परे हैं। इतिहासकार, राजनीतिशास्त्री, समाजवैज्ञानिक या पत्रकार, अभी सब नीतीशजी के गुणगान में व्यस्त हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं हुआ जब जेपी आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री ने पेंशन की घोषणा की, तो कहीं से आलोचना का कोई स्वर नहीं सुनाई पड़ा। एक जनसत्ता की सम्पादकीय टिप्पणी को छोड़कर। खबरों में यह बताया गया था कि कांग्रेस विरोधी उस आंदोलन में जो जेल गये या घायल हुए, उन्हें पेंशन दी जाएगी। जनसत्ता ने ठीक ही यह प्रश्न किया कि क्या जयप्रकाश के नेतृत्व वाले उस आंदोलन को भारत के स्वाधीनता आंदोलन के समतुल्य माना जा सकता है? यह सवाल भी अपनी जगह ठीक था कि अगर बिहार अर्थ-संकट से जूझ रहा है, तो इस बेतुकी योजना के लिए पैसे कहां से निकल आए!

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[8 Jun 2009 | No Comment | ]
बड़ी चुनौती कोसी से सिल्ट निकालने की है

कुसहा के बाएं तटबंध पर खड़े होकर हिमालय की ओर नजर डालें तो 16वें स्पर पर बीच कोसी में किनारे से ढाई से तीन किलोमीटर दूर एक टापू दिखता है। यह टापू पानी की सतह से कम से कम 5 से 7 फुट ऊपर तो होगा ही। जनकार बताते हैं कि इस टापू का क्षेत्रफल कम से कम 600 से 700 वर्गमीटर है। जितना यह पानी की वर्तमान सतह के ऊपर दिखता है उससे अनुमान लगाना सहज है कि पानी के नीचे यह कम से कम 30 से 35 फिट गहरा तो होगा ही। यह टापू रातों-रात नहीं बना। यह कोसी के सिल्ट जमने का नतीज है और सिल्टेशन की जो वज्ञानिक गति मानी गई है उसके अनुसार यह कम से कम 40 से 50 वर्षों का परिणाम है।

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[8 Jun 2009 | One Comment | ]
अलार्म बजा रहे हैं जंगल में गुम हो गए स्पर

भीमनगर के भंटाबारी बाजर से गुजरकर कुसहा तक पहुंचना आज काफी उत्साहवर्धक लगता है लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर कई सवाल जेहन में कौंधने लगते हैं। पूर्वी एफलक्स बांध के बाईं ओर ‘ठहरी हुई’ कोसी बह रही है। उसे देखकर नहीं लगता कि इसने कभी इतना रौद्र रूप भी लिया होगा। आर्मी टावर से आगे जोगसर और चतरा की ओर बढ़ने पर कोसी निगाह से ओङाल होने लगती है। निगाह और कोसी के बीच अचानक घने जंगल आ जते हैं। दरअसल पिछली बाढ़ के बाद जब कुसहा में काम शुरू हुआ था तब पूरे प्रभावित इलाके में जंगल काटे गए थे। लेकिन यह सब एक सीमित क्षेत्र से ही हुआ था।