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मनीषा पांडेय ♦ उस दिन जब आपने सच्चाई का खुलासा किया, तो मैंने कहा था, सॉरी, आई गेस, कोई कनफ्यूजन हो गया है। ये बात सिर्फ आपके और मेरे बीच हुई। मैंने सॉरी कहा था, लेकिन कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। लेकिन मेरे मुंह से ये शब्द जरूर निकले थे। कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। आपको खुद को बड़ा या छोटा कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है। आप अच्छा लिखती हैं। अखबार में क्या छपेगा, ये तय करना मेरा काम नहीं है। ये घटना कतई इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाती कि मेरी सोच ऐसी है, जो बड़े ब्रांड वालों को बड़ा लेखक मानती है। इससे ज्यादा सफाई देने की कोई जरूरत नहीं। कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी।
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मृणाल वल्लरी ♦ मनीषा जी ने फोन ऐसे काटा जैसे किसी बहुत ही घृणित व्यक्ति से बात कर ली हो। यक़ीन नहीं हुआ कि ये वही महिला हैं, जो पहले इतना मीठा बोल रही थीं। अगर मनीषा जी के पास सही जानकारी नहीं थी, तो अपमान मैं क्यों झेलूं। क्या एक फीचर संपादक का यही व्यवहार होता है कि उसे एक साधारण महिला से सॉरी बोलने में शर्म महसूस हुई। उन्होंने यह बताने की ज़रूरत भी नहीं समझी कि उन्होंने मुझे मृणाल पांडे क्यों समझा। समझ नहीं आ रहा कि मनीषा के व्यवहार पर दुखी होऊं या अपने नाम के साथ मृणाल जुड़ा होने के कारण।
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डेस्क ♦ खबर एक है, इंट्रेस्ट अलग-अलग। उसकी व्याख्याएं अलग-अलग। दिलचस्प है कि आईआरएस (इंडियन रीडरशिप सर्वे) 2009 की दूसरी छमाही की रिपोर्ट को आज लगभग सभी अख़बारों ने छापा है – और छापते हुए लगभग सभी अख़बारों ने खुद को तीसमारखां बताया है।क्या ये अख़बार ऐसा दूसरी ख़बरों के साथ भी करते हैं? अगर करते हैं, तो पाठक क्या समझे? चलिए, हम इस पचड़े में नहीं पड़ते हैं और देखते हैं कि किसने क्या छापा!
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डेस्क ♦ दैनिक भास्कर भोपाल के क्राइम रिपोर्टर विहंग सालगट को नयी ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है। वे अब सिटी भास्कर के भोपाल प्रभारी होंगे। विहंग सालगट भास्कर के टेबलॉयड अख़बार डीबी स्टार की युवा टीम के सदस्य रहे हैं और उन्होंने कई सारी एक्सक्लूसिव स्टोरी ब्रेक की है। नई दुनिया से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले विहंग अभी अंडर थर्टी जर्नलिस्ट हैं। कम समय में उन्होंने अपनी जगह बनायी है। उधर रवींद्र कैलासिया को सिटी चीफ बनाया गया है। वे भोपाल की स्थानीय रिपोर्टिंग टीम को लीड करेंगे। डीबी स्टार की शुरुआती टीम में रवींद्र कैलासिया भी रहे हैं।
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भोपाल डेस्क ♦ भोपाल में डीबी स्टार के मुख्य संवाददाता श्याम सिंह तोमर और फोटोग्राफर ज़ाहिर मीर पर ज़िला मलेरिया विभाग ने झूठी ख़बरें छापने का आरोप लगाया है। डीबी स्टार भोपाल में एक तरह के विपक्ष की भूमिका निभा रहा है। भ्रष्टाचार और शासन की अराजकता से जुड़ी हर ख़बरों पर इस टेबलॉयड अख़बार की नज़र रहती है। सिस्टम को एक्सपोज़ करता ये अख़बार हर विभाग की आंख की किरकिरी बन चुका है। अख़बार की इस धार को बनाये रखने में डीबी स्टार की पूरी टीम पूरे लगन से काम करती है और रोज़ नये भंडाफोड़ करती रहती है। ऐसे में इस तरह के नोटिस का इससे अधिक कोई मतलब नहीं है कि सिस्टम चाहता है कि ये लोग मुक़दमेबाज़ी में उलझें और अपना काम ठीक से न कर पाएं।
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अपने तीस साल के राजनीतिक जीवन में मैंने मीडिया का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था। मीडिया के प्रतिनिधि लोकसभा चुनावों के दौरान खुलकर प्रत्याशियों से पैसे मांग रहे थे। राजनीतिक दल मजबूर होकर पैसे देते रहे। दलों की छोड़िए, निर्दलीय प्रत्याशी भी इनके शिकार हुए। पैसे मांगने के लिए उन्होंने बहुत ही संभ्रांत शब्द का इस्तेमाल किया- पैकेज।
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दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण के डिप्टी एडिटर अनिल शर्मा को जब प्रोमोट करके कोटा संस्करण का स्थानीय संपादक बनाया गया, तो उनकी जगह के लिए भोपाल में कई दावेदार ज़ोर-आज़माइश कर रहे थे। दावेदारों में भगवान उपाध्याय, गणेश साकल्ले और अजित वडनेरकर की चर्चा चारों ओर थी। लेकिन सबके अरमान धरे के धरे रह गये और कॉरपोरेट एडिटोरियल से मणिकांत सोनी को आगे करके अनिल शर्मा की खाली जगह भर दी गयी।
मणिकांत सोनी एक काबिल पत्रकार हैं – लेकिन पिछले कई सालों से मेहनत करके भास्कर को भोपाल में …
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भोपाल में जर्जर सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन के लिजलिजेपन को बताने के लिए दैनिक भास्कर, भोपाल के एडिटर अभिलाष खांडेकर ने भोपाल को बिहार होने से बचाएं जैसे वाक्य का प्रयोग किया। लिजलिजे प्रशासन औऱ गुंडागर्दी जैसे शब्दों के प्रयोग के बदले खांडेकर साहब ने बिहार को एक मुहावरा या फिर मेटाफर के तौर पर इस्तेमाल किया। देश के किसी भी हिस्से को लेकर इस तरह की क्षेत्रवादी मानसिकता, व्यवहार के स्तर पर कोई नयी बात नहीं है, खासकर राजनीति में इसे रुटीन लाइफ की तरह शामिल कर लिया गया है। लेकिन लिखने-पढ़ने के स्तर पर इस तरह का प्रयोग वाकई भीतर से हिला देनेवाला है।
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अभिलाष खांडेकर को आप क्या कहना चाहते हैं? एक पत्रकार? एक इंसान? भोपाल का हितचिंतक? या फिर एक ऐसा मराठी, जो भोपाल की कमाई खाकर मराठा कर्त्तव्य निबाह रहा है? मुंबई की उस युवती के साथ बलात्कार की ख़बर पर किसी भी शख्स को संवेदनाओं की आख़िरी हद तक विचलित होना चाहिए। न कि दुकानदारी का इंतज़ाम करने में लग जाना चाहिए। अभिलाष खांडेकर ‘सूचना’ देते हैं कि जनवरी से मई तक पिछले महज पांच महीने की अवधि में केवल भोपाल में 55 युवतियां बलात्कार की शिकार हुईं। देश भर के आंकड़ों को छोड़ दें, तो इन 55 महिलाओं की त्रासदी का अभिलाष खांडेकर जैसे लोग क्या मज़ा लेते रहे? क्या अभिलाष खांडेकर जैसे लोगों के विचलित होने के लिए बलात्कार की शिकार किसी युवती का महाराष्ट्र का होना ज़रूरी है?
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संपादकीय पढ़कर लगता है कि खांडेकर के मन में रस्टिक किस्म के बिहारी ही आतंक मचा रहे हैं। खांडेकर इतने व्यथित हैं कि वे भोपाल की तुलना पटना या बिहार के किसी घटिया, जाहिल, अराजक और पिछड़े शहर से करने की हद तक चले जाते हैं। मध्यप्रदेश ने अपनी शांतिप्रियता और सौहार्द के बल पर तरक्की की है और हिंदी पट्टी के बीमारु प्रदेशों की लिस्ट से अपना नाम हटाया है। यह प्रदेश सही मायने में हिंन्दुस्तान का हृदय प्रदेश है जिसने खुले दिल से पूरे देश के लोगों का स्वागत किया है। लेकिन खांडेकर का यह लेख इसकी उलटी तस्वीर पेश करने की घृणित साजिश लगता है। ये वाकई एक कुंठित, संकुचित, नस्लीय और संकीर्ण मानसिकता के इंसान की आवाज़ है…


