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[8 Mar 2010 | 22 Comments | ]
सवर्णों के इस देश में महिला आरक्षण बिल

अजय यादव ♦ सभी को पता है कि मौजूदा महिला आरक्षण लागू हो जाने पर संसद में किस तबके और कौन से और धर्म की महिलाएं ज्यादा चुन कर आएंगी और वे महिला हितों की लड़ाई को कितना आगे ले जाएंगी। मनुवादियों का वर्गीय चरित्र महिलाओं को अपनी पार्टियों का माउथपीस बना देगा और वे भी सोच के मामले में उतनी ही अभिशप्त होंगी, जितनी कि ये पार्टियां हैं। यहां पर मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि इस आरक्षण व्यवस्था में दलित-पिछड़ी-आदिवासी-अल्पसंख्यक महिलाओं की हिस्सेदारी तय होने पर संसद में कोई सुर्खाब के पर लग जाएंगे। बात बस एक बड़े तबके की महिलाओं के वाजिब अधिकारों का गला घोंटने की है और ऐसा भारतीय ‘लोकतंत्र’ में खुलेआम हो रहा है।

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[20 Feb 2010 | 11 Comments | ]
कैमरे में कैद कुछ तस्‍वीरें, जो लोकतंत्र का हाल बताती हैं!

डेस्‍क ♦ यह अमेठी की घटना है। यहां से राहुल गांधी सांसद हैं। यहां एक आदमी का क़त्‍ल हुआ। पुलिस वालों ने इस मामले में पूछताछ के लिए उसी बीवी को थाने बुलाया। पूछताछ इस अंदाज़ में की कि बताओ तुम्‍हारे आदमी की हत्‍या किसने की? क्‍या तुमने की? महिला सफाई देती रही, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। पुलिस ने महिला को पीटना शुरू कर दिया। वहीं एक महिला कांस्‍टेबल भी खड़ी थी। महिला दलित जाति से आती है। इस घटना को उजागर करने वाले स्वतंत्र पत्रकार ने कहा कि वह पुलिस वाले की करतूत को कैमरे में कैद कर रहा था ताकि उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सके। इस वजह से वह ऐन वक्त पर महिला की मदद नहीं कर सका। दरअसल उस टेप की वजह से ही कैलाश द्विवेदी नाम के इस पुलिस वाले को बर्खास्त किया गया है।

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[4 Feb 2010 | 3 Comments | ]
वर्धा से बनारस तक बेबस दलित छात्र

आवेश तिवारी ♦ यही हाल कानपुर विश्विद्यालय का है, जहां शोध के तमाम छात्र अपनी बिरादरी की वजह से सालों-सालों से अपने गाइड की चरण वंदना कर रहे हैं लेकिन शोध है कि पूरा नहीं होता। वहां के एक छात्र कहते हैं – हम लाख मेहनत कर लें, उन्हें हमारे काम में कमी ही नजर आती है। गाजियाबाद स्थित एक प्रबंध संस्थान ने तो सारी हदें पार करते हुए एक दलित छात्र प्रेम नारायण को न सिर्फ प्रवेश देने से इनकार कर दिया बल्कि उसे अन्य छात्रों के सामने संस्थान के प्रिंसिपल द्वारा भद्दी-भद्दी गालियां भी दी गयीं। कसूर सिर्फ ये था कि उसके पास डोनेशन के लिए दिये जाने वाले 45 हजार रुपए मौजूद नहीं थे। हालांकि बाद में इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली गयी।

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[25 Jan 2010 | 9 Comments | ]
कोई देवता नहीं, कोई सबका कॉमरेड नहीं

दिलीप मंडल ♦ ज्योति बसु पर बात करने वालों की नीयत पर संदेह करने से कोई फायदा नहीं होगा। सीपीएम के हितैषियों के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण कार्यभार है कि वो बताएं कि ज्योति बसु की पहली (1977) और दूसरी (1982) कैबिनेट में कोई दलित या आदिवासी मंत्री शामिल था। सोचकर देखिए। एक कैबिनेट बनायी जाती है, वो भी कैबिनेट उन पार्टियों की, जो देश को बेहतर देश बनाना चाहते हैं और पूरी कैबिनेट में एक भी दलित या आदिवासी मंत्री नहीं। जबकि पश्चिम बंगाल में लगभग 30 फीसदी आबादी दलितों और आदिवासियों की है। अगर ये संयोग है, तो बेहद दुखद और शर्मनाक संयोग है।

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[23 Dec 2009 | 6 Comments | ]
हिंदी विवि प्रशासन के ख़‍िलाफ़ दलित चार्जशीट

वर्धा मेल ♦ देश भर में धर्मनिरपेक्ष प्रशासक की छवि निर्मित करने वाले पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने के बाद दलितों का उत्पीड़न तेजी के साथ बढ़ा है। सवाल उठता है कि क्या कोई धर्मनिरपेक्षवादी जातिवादी नहीं हो सकता है? वर्धा विश्‍वविद्यालय में विभूति बाबू के आने के बाद दलित उत्पीड़न की घटनाएं एक नयी बहस खड़ी करती है। दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र की बिल्डिंग के शिलान्यास पत्थर को गिरा दिया गया। इसका शिलान्यास विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोराट ने 22 फरवरी 2007 को किया था।

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[17 Dec 2009 | 7 Comments | ]
वर्धा में दलित छात्रों का अनशन नौंवे दिन भी जारी

वर्धा मेल ♦ प्रशासन के इशारे पर राहुल के प्रोफेसर पिता को वर्धा बुलाया गया और उनसे कहा गया कि वे अनशन ख़त्म करने के लिए राहुल पर दबाव डालें क्योंकि राहुल यहां राजनीति कर रहा है। इस पर राहुल के पिता ने कहा, ‘न्यायपूर्ण उद्देश्य के लिए किया जाने वाला यह आंदोलन जायज़ है और मैं भी इसका समर्थन करता हूं। हज़ारों सालों से शोषित-दलित जब अपनी जायज़ मांगों को मांगते हैं, तो लोग ऐसे ही राजनीति कहकर इसे खारिज़ करते हैं।’ इस बीच आमरण अनशन पर बैठे दो छात्र राहुल कांबले और ओमप्रकाश बैरागी को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस बीच पीएचडी अनुवाद के शोधार्थी मिलिंद पाटील शृंखला अनशन जारी रखे हुए हैं।

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[16 Dec 2009 | 3 Comments | ]
दलित कांबले अस्‍पताल में, सवर्ण छात्राएं विवि में दाखिल

वर्धा मेल ♦ जब रोम जल रहा है, नीरो मिट्टी का तेल डाल रहा है। जहां धुंआ उठ रहा है, वहां हवा कर रहा है। बची हुई नमी को सुखा कर रहा है और जलाने पर पूरा-पूरा आमादा है। इतिहास की घटना का मुहावरा पंचटीला की पहाड़ियों पर उतर रहा है। गांधी के नाम पर बने विश्‍वविद्यालय में गांधी का रास्ता चुक रहा है, दम तोड़ रहा है। कुछ ऐसी ही स्थिति है महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की, जहां पिछले आठ दिनों से छात्र आमरण अनशन पर हैं, जिनमें छात्र राहुल कांबले, ओम प्रकाश वैरागी हास्पिटल में भर्ती कराये जा चुके हैं। इस बीच लाखों रुपये खर्च करके किया जाने वाला आडंबरपूर्ण दीक्षांत समारोह ख़त्म हो चुका है और कुलपति इस स्थिति को ऐसा ही छोड़ विवि से बाहर चले गये हैं।

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[15 Dec 2009 | No Comment | ]
छात्रों की हालत बिगड़ी, लेकिन हड़ताल पर असर नहीं

वर्धा मेल ♦ पिछले सात दिनों से छात्र आमरण अनशन पर हैं। आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक होता जा रहा है। कुलपति द्वारा आंदोलन को कुचलने के अलोकतांत्रिक हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। वीएन राय अपने पूर्व पुलिसिया अनुभवों और संपर्क सूत्रों का इस्तेमाल कर तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। वर्धा में ट्रेनी पुलिस अधिक्षक के पद पर तैनात अविनाश कुमार हिंदी विश्वविद्यालय के परिसर में आ धमकते हैं, जहां वे पुलिसिया गुंडई से महौल बिगाड़ने और आंदोलन समाप्त करने का अमानवीय कार्य कर रहे हैं। न्याय के लिए संघर्ष कर रहे राहुल कांबले और अन्य साथियों की हालत नाजुक होने के कारण अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। इन छात्रों के स्थान पर आंदोलन को दूसरे साथी आगे बढ़ा रहे हैं।

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[14 Dec 2009 | 4 Comments | ]
वर्धा में भूख हड़ताल जारी, कुलपति वीएन राय बेफिक्र

वर्धा मेल ♦ हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय कोई भी बात समझने को तैयार नहीं। आंदोलन को पुलिसिया तरीके से हैंडल करना चाहते हैं। कुछ दिनों पहले विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में कहा था कि दमन सत्ता का मूल चरित्र है, कहीं-कहीं यह थोडा़-बहुत जायज़ होता है। पिछले चार दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों से मिलना उन्‍हें गवारा नहीं। सूत्रों से पता चला है कि वे किसी भी कीमत पर आंदोलनकारियों की बात नही मानेंगे। वर्धा अंडर ट्रेनिंग पुलिस अधीक्षक अविनाश कुमार वीएन राय के मित्र हैं। आंदोलन को कुचलने के लिए ग्‍यारह दिसंबर को दल-बल के साथ विश्वविद्यालय परिसर में आ धमकते हैं। आंदोलनकारी छात्रों को आंदोलन समाप्त करने के लिए डराते-धमकाते हैं। पूरे मामले के प्रति कुलपति की उदासीनता उनके मूल व्यक्तित्व को उजागर करती है।

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[14 Dec 2009 | 4 Comments | ]
दलित था, डराया गया, छोड़ दी मीडिया की नौकरी

कृष्‍णकांत ♦ वह लखनऊ गया। बॉस ने पूछा, सीवी लाये हो? उसने हां कहते हुए सीवी उन्हें पकड़ा दी। बॉस ने नाम पढ़ते ही उसे घूरते हुए पूछा, अच्छा मौर्या हो? बड़े होशियार लगते हो! तुमने पहले नहीं बताया कि तुम मौर्या हो? उसने कहा, सर बताया तो था पूरा नाम, आपने ध्यान न दिया होगा। बॉस के चेहरे की शिकन देख कर उसे भी समझ नहीं आया कि ऐसी क्या बात है, जो इन्‍हें इतना परेशान कर रही है? वह थोड़ी देर तक सर झुकाये बैठा रहा, फिर सीवी अपने बगल में बैठे जूनियर को पकड़ा दिया और कहा, ठीक है। तुम्हारा मामला ये देखेंगे… और उठकर जाने लगा। जूनियर ने कहा, अरे सर, मैं क्या देखूंगा, आप यहां के हेड हैं। आप ही देखिए। उसने अनसुना कर दिया और चला गया।