Articles tagged with: dalit
मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
मिथिलेश कुमार ♦ हमारे देश में दो तरह की संस्कृति है। एक सत्ता संस्कृति और दूसरी शोषित संस्कृति। सत्ता संस्कृति में देश के नेता और नौकरशाह हैं जबकि शोषित संस्कृति में देश के किसान, मजदूर, कामगार हैं। अगर बारीकी से चीजों को समझें तो वास्तव में देश को शोषित संस्कृति ने ही बचाया है क्योंकि वह अनाज उगाता है, कारखानों में काम करता है, मैला साफ करता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संस्थान में आयोजित एक परिचर्चा में दलित चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ये विचार व्यक्त किये। वे सूरज बड़त्या की शोध पुस्तक “सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र” के लोकार्पण अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा, जीवन का सरोकार ही दलित कविताओं का केंद्रीय भाव है।
मोहल्ला पटना, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
राकेश साह ♦ विभूति नारायण राय प्रकरण की जो आंधी चली है, उसकी नींव में कई लोगों की सहभागिता नजर आ रही है। यह प्रसंग बहुत सारी जनवादी और प्रगतिशील सवर्ण शक्तियों के नैक्सस को भी सामने ला रही है। सचमुच यह घोर अवसरपरस्त समय हो चला है, जहां लंपटता को ग्लैमराइज किया जा रहा है। कभी किसी ने कल्पना नही की होगी कि ज्ञानपीठ जैसा संगठन इस तरह की तुच्छताओं और क्षुद्रताओं के महिमांडन का मंच बनेगा। लेकिन यह सब धड़ल्ले से हो रहा है और पूरा हिंदी समाज विभूति और कालिया जैसे लंपटों की लंपटगीरी को सिर-आंखों पर बिठाये हुए है। अपने बिहार की बात कहूं तो पटना में जन संस्कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ की कुंठाएं जगजाहिर हैं।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
अनिता भारती ♦ क्या दलितों के पास इतनी ताकत है कि वे किसी मुद्दे को भटका सकें? अगर वे इतने ताकतवर होते, तो क्या पिछले डेढ़-दो साल से लगातार वर्धा विश्वविद्यालय में दलित छात्रों को निशाना बनाने वाले वीसी वीएन राय को बर्खास्त न करा चुके होते? डेढ़-दो साल से लगातार धरना-प्रदर्शन करके, सिर मुंडवा कर इच्छा मृत्यु की मांग करके भी वे वीएन राय का बाल बांका न कर पाये। और तो और, अब महिलाओं को बेइज्जत करने वाले प्रसंग में विरोध अभियान में सबसे आगे रहने के माद्दे के साथ लेखिकाओं के प्रतिनिधिमंडल में जाकर और आज ज्ञानपीठ के सामने धरना-प्रदर्शन में शामिल होकर भी ज्ञापन में वे वर्तमान वीसी वीएन राय के स्त्री विरोधी विशेषणों में, मात्र एक शब्द “जातिवादी” तक नहीं जुड़वा पाये।
असहमति, नज़रिया, मीडिया मंडी »
दिलीप मंडल ♦ शाहूजी महाराज के कार्यों और उपलब्धियों के बारे में स्कूल में पढ़ायी जाने वाली किताबें में कितना कुछ लिखा है, यह शोध का विषय है। अगर स्कूलों में शाहूजी महाराज के बारे में पढ़ाया जाता है, तो इंग्लिश के अखबारों और वेबसाइट के पत्रकारों ने जो किया है, वह अक्षम्य है। और यदि स्कूल की किताबों में शाहूजी महाराज के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है या नाम मात्र का लिखा है, तो इतिहास की किताबों के पुनर्लेखन की जरूरत है। देश के सबसे प्रतिष्ठित और नामी अखबार और उनकी साइट अगर शिवाजी के वंशज को दलित नेता या दलित प्रतीक (dalit icon) कहें तो इसे मामूली भूल कैसे कहा जा सकता है। वैसे भी भारत में किसी दलित के महाराजा होने की कल्पना कर पाने के लिए ढेर सारी कल्पनाशीलता की जरूरत होगी।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
नवीन कु रणवीर ♦ रवीश कुमार जवाब दें? एनडीटीवी इंडिया में शुक्रवार 25 जून 2010 को रात 9:30 बजे रवीश की रिपोर्ट में जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल को लेकर डिस्क्लेमर भी दिखाया था, परंतु उसके बावजूद भी देश के हर राज्य का वो वर्ग इतना सक्षम नहीं है कि सवर्ण समाज के द्वारा दी गयी इस घृणा पर गर्व कर सके। पंजाब में दलितों की आर्थिक स्थित अच्छी है। कैसे है, ये भी आप जानते हैं। उन्होंने समाज के उस वर्ग का ही बहिष्कार किया, जिसने उनसे घृणा की। पंजाब में डेरा संप्रदाय हमेशा से एक ताकत और पहचान का प्रतीक रहा है। आपकी रिपोर्ट का असर ये पड़ेगा कि जिन राज्यों का हमने जिक्र किया, वहां के सवर्ण अब खुले तौर पर लोगों को इन जाति-सूचक शब्दों के उच्चारण से बुलाएंगे, गाने गाकर चिढ़ाएंगे।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
विनीत कुमार ♦ रवीश ने अपनी रिपोर्ट में जिन माध्यमों के जरिये दलितों की नयी पहचान बनने की बात की है, उन माध्यमों के विश्लेषण से दलित विमर्श के भीतर एक नये किस्म की बहस और विश्लेषण की पूरी-पूरी गुंजाइश बनती है। जिन माध्यमों को कूड़ा और अपसंस्कृति फैलानेवाला करार दिया जाता रहा है, वही किसी जाति के स्वाभिमान की तलाश में कितने मददगार साबित हो सकते हैं, इस पर गंभीरता से काम किया जाना अभी बाकी है। इलीटिसिज्म के प्रभाव में मशीन औऱ मनोरंजन के बीच पैदा होनेवाली संस्कृति पर पॉपुलर संस्कृति का लेबल चस्पां कर उसे भ्रष्ट करार देने की जो कोशिशें विमर्श और अकादमिक दुनिया में चल रही हैं, उसके पीछ कोई साजिश तो जरूर लगती है।
नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला पटना »
संजय कुमार ♦ देश में सवर्ण पत्रकारिता या यों कहें कि हिंदू पत्रकारिता की दिशा व दशा दोनों तो दिखती है, लेकिन दलित पत्रकारिता की नहीं? दलित पत्रकारिता की दशा और दिशा को लेकर सवाल उठते रहते हैं। इन दिनों दलित पत्रकारिता को लेकर काफी विमर्श सुनने को मिलता है। हिंदूवादी पत्रकारिता ने जो पकड़ बनायी है, उसके समांनातर दलित पत्रकारिता नहीं के बराबर है। ऐसा नहीं कि दलित पत्रों का प्रकाशन नहीं होता। बड़े पैमाने पर दलित पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन देश भर में हो रहा है। लेकिन उनमें एकाध नाम भी नहीं मिलते, जो राष्ट्रीय पटल पर छपने वाली सवर्ण पत्र-पत्रिकाओं के समानांतर खड़े हों। महाराष्ट्र की दलित पत्रकारिता को छोड़ दें, तो इसमें हिंदी पत्रकारिता कोई खास मुकाम नहीं तय कर पायी है।
समाचार »
डेस्क ♦ जिले के गांव गांजबड़ में एक युवक को अगवाकर जीभ काटने के मामले में बुधवार को सिविल अस्पताल में बोर्ड के बीच मेडिकल करवाया गया है। पुलिस ने रिपोर्ट के बाद मामले की पूरी तरह जांच किये जाने की बात कही है। ज्ञात रहे कि सतबीर निवासी गांजबड़ और उसके परिजनों ने पुलिस को दी लिखित शिकायत में कहा है कि गांव के ही कुछ लोगों के साथ जमीन को लेकर झगड़ा चल रहा था। कुछ दिन पहले सतबीर घर से गायब हो गया और मेरठ के एक अस्पताल में भर्ती मिला। सतबीर की जीभ कटी हुई थी और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोटें आयी थीं। परिजनों का कहना है कि उन्हें गांव के कुछ युवकों पर सतबीर को अगवाकर उसकी जीभ काटने और चोट पहुंचाने का शक है।
नज़रिया »
अरविंद शेष ♦ सुव्यवस्थित विकास की दिख सकने वाली तस्वीरों के बीच इस स्थिति की कल्पना भी शायद मुमकिन नहीं कि अपने जलते घरों और खुद को बचाने की कोशिश करते पुरुषों और महिलाओं के सामने हमलावर निर्वस्त्र होकर नाचने लगें! यह किसी भी तरह के विकास के तमाम दावों को खारिज करने के लिए काफी है। यह हजारों साल की ‘महान’ सांस्कृतिक परंपराओं पर शर्म करने के लिए काफी है। यह एक ऐसे कबीले की कल्पना लगती है जिसे अपनी सड़ांधों पर गर्व करना सुहाता है और वह इसी में जीना चाहता है। नहीं तो क्या कारण है कि अपनी प्रकृति में समान गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर कांड शृंखला की कड़ियों की तरह आगे बढ़ते जा रहे हैं।
नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला पटना »
संजय कुमार ♦ बिहार की राजधानी पटना में काम कर रहे मीडिया हाउसों में 87 प्रतिशत सवर्ण जाति के हैं। इसमें ब्राह्यण 34, राजपूत 23, भूमिहार 14 एवं कायस्थ 16 प्रतिशत है। हिंदू पिछड़ी-अति पिछड़ी जाति, अशराफ मुसलमान और दलित समाज से आने वाले मात्र 13 प्रतिशत पत्रकार हैं। इसमें सबसे कम प्रतिशत दलितों की है। लगभग एक प्रतिशत ही दलित पत्रकार बिहार के मीडिया से जुड़े हैं। वह भी कोई ऊंचे पद पर नहीं हैं। महिला सशक्तीकरण के इस युग में दलित महिला पत्रकार को ढूंढना होगा। बिहार के किसी मीडिया हाउस में दलित महिला पत्रकार नहीं के बराबर है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि दलित महिला पत्रकारों का प्रतिशत शून्य है।



