Articles tagged with: dilip mandal
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
वेदप्रताप वैदिक ♦ आरक्षण में आरक्षण के बिना यह आरक्षण अधूरा है, क्योंकि लगभग सभी महिला सीटों पर ऊंची जातियों की महिलाओं का कब्जा हो जाएगा। यह तर्क तथ्यात्मक तो है, पर आरक्षण में यदि आरक्षण दे भी दिया गया होता, तो क्या होता? कठपुतलीवाद बढता, राबड़ीवाद दन्नाता। सर्वथा अयोग्य महिलाओं को पकड़ कर गद्दी पर बैठा दिया जाता। वे क्या खाक कानून बनातीं? वे अपने पार्टी-नेताओं के इशारों पर ही निर्णय लेतीं। यानी, संसद का मजाक बनता। अभी तो प्रयत्न यह होना चाहिए कि सक्षम महिलाओं को ही संसद में भेजा जाए, जो महिला उत्थान के बारे में खुद सोच सकें और जरूरत पडने पर पुरुषों को बराबरी की टक्कर दे सकें।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
दिलीप मंडल ♦ अगर कहूंगा कि ये सभी महिलाएं (ऊपर की तस्वीर में दोनों – सुषमा और वृंदा जी और नीचे की तस्वीर में चारों – सुषमा, वृंदा, नजमा और माया जी) किस क्लास या कास्ट से हैं, तो आप कहेंगे कि जातिवाद फैला रहा हूं। इस शहर में कुछ है जो सड़ रहा है! भारत के ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में दुनिया में 134वें नंबर पर होने के कारणों की शिनाख्त करने की कोशिश कर रहा हूं।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
अच्छी फिल्म, बुरे दर्शक
मधुकर पांडेय ♦ इस बेहतरीन फिल्म के साथ जैसा दुर्व्यवहार हो रहा है, वह अफसोसनाक है। मेरे हिसाब से इस फिल्म को पूरे देश में करमुक्त कर देना चाहिए।
दून में शब्द मेला
डेस्क ♦ देहरादून में यात्रा, पेंग्विन और दून लाइब्रेरी मिल कर अप्रैल के पहले हफ्ते में एक साहित्य मेला लगाने जा रहा है, जिसमें शब्दजीवियों का जमघट लगेगा।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, बात मुलाक़ात »
विभूति नारायण राय ♦ उस दिन जो जुलूस निकला, उसमें जातिवादी नारे लगाये गये। हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है, वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारा से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गये? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाये जाएं, तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, बात मुलाक़ात, मीडिया मंडी »
विभूति नारायण राय ♦ आपको यह तथ्य नहीं मालूम है कि नागपुर में हाईकोर्ट में अनिल चमड़िया के ख़िलाफ़ एक रिट है। एक सज्जन जो कि… आशुतोष मिश्रा नाम के एक सज्जन हैं, जो उसी इंटरव्यू में आये थे, जिनका सलेक्शन नहीं हुआ था। तो आशुतोष मिश्रा ने एक रिट कर रखी है हाईकोर्ट में। उन्होंने कहा है कि भाई साहब 2002 या फिर 2001… अब आप कह रहे हैं कि 2000 तो यूजीसी की 2000 वाली गाइडलाइंस का यूनिवर्सिटी ने उल्लंघन किया है। यह विश्वविद्यालय को अधिकार नहीं था। यह ईसी के बैठक से पहले की बात है। हफ़्ते-दस दिन पहले की बात। जब हमने अपना पक्ष रखा, तो हमने स्वीकार कर लिया था कि हमसे ग़लती हो गयी थी। और हम इस ग़लती को सुधार कर आपके पास आएंगे।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, समाचार »
दिलीप मंडल ♦ जब वर्धा में प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया जा रहा था, लगभग उन्हीं दिनों दूर दक्षिण में मैंगलोर यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही एक फैसला हो रहा था। एक यूनिवर्सिटी केंद्र सरकार की है और दूसरी यूनिवर्सिटी एक ऐसे राज्य में चल रही है, जहां बीजेपी का शासन है। एक यूनिवर्सिटी को तथाकथित प्रगतिशील का गौरवशाली नेतृत्व हासिल है तो दूसरे पर संघ की ध्वजा लहरा रही है। लेकिन जब लोकतांत्रिक आचरण की धज्जियां उड़ाने की बात हो तो दोनों विश्वविद्यालयों में अदभुत समानताएं दिखती हैं।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्मृति »
दिलीप मंडल ♦ ज्योति बसु पर बात करने वालों की नीयत पर संदेह करने से कोई फायदा नहीं होगा। सीपीएम के हितैषियों के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण कार्यभार है कि वो बताएं कि ज्योति बसु की पहली (1977) और दूसरी (1982) कैबिनेट में कोई दलित या आदिवासी मंत्री शामिल था। सोचकर देखिए। एक कैबिनेट बनायी जाती है, वो भी कैबिनेट उन पार्टियों की, जो देश को बेहतर देश बनाना चाहते हैं और पूरी कैबिनेट में एक भी दलित या आदिवासी मंत्री नहीं। जबकि पश्चिम बंगाल में लगभग 30 फीसदी आबादी दलितों और आदिवासियों की है। अगर ये संयोग है, तो बेहद दुखद और शर्मनाक संयोग है।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्मृति »
दिलीप मंडल ♦ पश्चिम बंगाल में मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं, ड्रॉपआउट रेट राष्ट्रीय औसत से बहुत ज्यादा है, सरकारी नौकरियां उन्हें अमूमन मिलती नहीं हैं, राज्य में ओबीसी आरक्षण इतना कम है कि उन्हें उसमें हिस्सा मुश्किल से मिलता है और निजी रोजगार करने के लिए बैंक लोन मिलना आसान नहीं है। इसे किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जा सकता? आश्चर्य इस बात का कि ये सब उस शासन में हुआ और हो रहा है, जो निहायत ही “सेकुलर” है! ऐसे सेकुलरवाद से देश के हर वंचित समुदाय को खतरा है।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्मृति »
अजीत कुमार ♦ बड़ी बेबसी में हूं। न तो आपकी बातों को पूरी तरह से नकार सकता हूं और न पूरी तरह से स्वीकार कर सकता हूं। जहां तक मरने के बाद विभिन्न नेताओं और उद्योगपतियों की तरफ से आये निर्दोष बयान का मामला है। यह तो हमारे यहां परिपाटी बन चुकी है कि देहांत के तुरंत बाद उस व्यक्ति की आलोचना से एक हद तक बचा जाए। भाजपा के नेताओं की तरफ से भी आलोचना के स्वर न आने के पीछे भी सिर्फ एक परिपाटी का चलन ही है। इसी परिपाटी के चलते ही और भी नेताओं, संगठनों व सम्मानित जनों द्वारा आलोचना से गुरेज किया गया है। खैर इस मौके पर भी आपकी आलोचना से मैं असहमत नहीं हूं। यह तो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह परिपाटी का मान या सम्मान करे।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्मृति »
दिलीप मंडल ♦ क्या आपको ये बात चौंकाती है कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम के तमाम बड़े नेता इलाज के लिए किसी सरकारी अस्पताल में नहीं, बल्कि निजी अस्पताल और नर्सिंग होम की शरण में जाते हैं। पश्चिम बंगाल और यहां तक कि राजधानी कोलकाता में कोई भी मेडिकल कॉलेज या सरकारी अस्पताल इस लायक नहीं रह गया है कि कोई सीपीएम नेता वहां अपना इलाज कराये। इसे सिर्फ संयोग नहीं कह सकते कि हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल सीपीएम के सेक्रेटरी अनिल विस्वास, सीटू के नेता चित्तब्रत मजुमदार और अब ज्योति बसु, तीनों का इलाज प्राइवेट नर्सिंग होम में हुआ और वहीं उनकी मौत हुई। ये बात राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सेवा का हाल बयां करती है।




