Articles tagged with: dilip mandal
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दिलीप मंडल ♦ आमिर खान ने शहरी-इलीट-उच्च वर्ण की एक गंभीर समस्या की ओर उन लोगों का ध्यान खींचा है। इन समूहों को समाज सुधार की सख्त जरूरत है। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि आदिवासियों और दलितों का भ्रूण हत्या नाम की समस्या से साक्षात्कार कम ही हुआ है। ओबीसी के आंकड़े नहीं हैं क्योंकि सरकार उन्हें गिनती ही नहीं है। इसी तरह सती प्रथा भी उच्च वर्णीय समस्या थी, जिसके खिलाफ राममोहन राय ने अभियान चलाया था। भ्रूण हत्या और कन्या शिशु हत्या, गंभीर रूप में, शहरी-इलीट-हिंदू-सवर्ण समस्या है। आदिवासियों और मुसलमानों का इस समस्या से कोई लेना देना नहीं है, उनका जेंडर रेशियो ठीक है। दलितों में यह समस्या कम है, किसी भय की वजह से ओबीसी के आंकड़े सरकार नहीं जुटाती हैं।
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पलाश विश्वास ♦ मूल्यबोध की बात करें तों जनसत्ता, देशबंधु और लोकमत समाचार जैसे दो चार अखबारों को छोड़कर तमाम पोर्टल पर नंगे चित्रों की भरमार है। बाकायदा पोर्नोग्राफी के सहारे नेट पर रीडरशिप और विज्ञापन बटोरने की होड़ है। तब क्या इन सभी मीडियासमूह के पत्रकारों को मूल्यबोध और प्रतिबद्धता की दुहाई देकर अपनी अपनी नौकरियां छोड़ देनी चाहिए। बहस की शुरुआत की है अजित अंजुम ने, जो एक टीवी चैनल के मैनेजिंग एडीटर है। चैनलों में टीआरपी के लिए क्या क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते, उनसे बेहतर क्या जानेंगे हम? तो क्या वे प्रतिबद्ध मूल्यबोध वाले पत्रकारों को दागी चैनलों की नौकरियां छोड़ने के लिए कहेंगे?
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प्रमोद रंजन ♦ फेसबुक पर चली बहस देख रहा था। कई प्रबुद्ध लोगों ने इस बहस में भाग लिया है। अधिकांश ने बहुजन समाज से आने वाले पत्रकार मित्र दिलीप मंडल की लानत-मानत की है। अश्लीलता को लेकर मेरा नजरिया अलग रहा है। जरा, गाव-तकिया लगाकर अपनी कोठी की ड्योढ़ी पर नाच देख रहे सामंत के नौकर-नौकरानियों की नजर से भी इसे देखें। देखिए, वे पान पहुंचाने आते है, शराब की बोतल मालिक के सामने रखते हैं और कनखियों से नाच को देखते हैं। कोठी की नौकरानियां छुप-छुप कर देखने की कोशिश कर रही हैं। ये वे भाग्यशाली लोग हैं, जो कनखियों से भी देख पाते हैं। वरना, गांव के अन्य लोग तो बस उस गाड़ी को ही देखकर संतोष कर लेते हैं, जिसके पर्दे के भीतर लाल पान की बेगम गुजरती है।
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अजीत अंजुम ♦ हमारे एक पत्रकार साथी हैं – दिलीप मंडल। सरोकारी पत्रकारिता के बड़े पक्षधर और कॉरपोरेट पत्रकारिता के भयंकर विरोधी। विचारों से काफी क्रांतिकारी किस्म के हैं। इन दिनों इंडिया टुडे (हिंदी) के संपादक हैं। दिलीप जी के हिंदी इंडिया टुडे के कवर पर दुनिया भर की महिलाओं और पुरुषों के सरोकार से जुड़ी एक कवर स्टोरी है। शीर्षक है, उभार की सनक। कवर पर एक तस्वीर है, जिसके नीचे लिखा है – महिलाओं को चाहिए तराशे हुए वक्ष और मर्दों को चुस्त की चाहत। दिलीप जी को बधाई। ऐसी कवर स्टोरी के लिए। वैसे ये अंग्रेजी इंडिया टुडे का अनुवाद है। आप सब लोग भी चाहें, तो दिलीप मंडल जी को इतना शानदार अंक निकालने के लिए और जन सरोकार वाली पत्रकारिता करने के लिए बधाई दे सकते हैं।
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दिलीप मंडल ♦ [लंपट] अरविंद केजरीवाल को किसने हक दिया कि वह सरकार के साथ मिलकर कानून ड्राफ्ट करे। खासकर तब जबकि अण्णा कह चुके हैं कि कोर कमेटी में कमजोर तबकों को नयी कोरकमेटी में प्रतिनिधित्व देंगे। अप्रतिनिधि संस्था को सरकार ने क्यों बुलाया ड्राफ्टिंग के लिए।
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मनोज वाजपेयी ♦ जेएनयू में मुझे बहुत मजा आया। इसलिए नहीं कि लोग ऑटोग्राफ ले रहे थे बल्कि इसलिए कि उन सब सवालों का उत्तर देने में मजा आया, जो अमूमन कोई पत्रकार आपसे पूछता नहीं है। और मुझे याद ही नहीं पड़ता कि हमने ‘लंका’ के बारे में कितनी बार बात की। खैर, मैं अपने आपको एक प्रजातांत्रिक व्यक्ति समझता हूं और ये समझता हूं कि आपको अधिकार है बेवजह संदेह करने का और गाली देने का। इसके बाद भी अगर आप संतुष्ट नहीं हैं तो आपकी जो इच्छा हो, जैसे भी हो, आप लिखते रहें – मैं चूं तक नहीं करूंगा। लेकिन कृपया करके मेरी नीयत को बख्श दीजिए।
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दिलीप मंडल ♦ फेसबुक में लिखने के कारण किसी सरकारी कर्मचारी (डॉक्टर मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण) के निलंबन की देश में पहली और एकमात्र घटना के ठीक 30 दिन के अंदर 16 अक्टूबर, 2011 को पटना में 112 पेज की किताब “बिहार में मीडिया कंट्रोल : बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला” का लोकार्पण संपन्न हुआ।
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हिमांशु पंड्या ♦ यौनेच्छा की अभिव्यक्ति को दबाया जाना जरूरी था। सो मीरा की एक अनन्य भक्त की छवि निर्मित की गयी। कबीर, तुलसी के सही गलत जैसे भी हों, सामाजिक संदर्भ हैं, पर मीरा सिर्फ भक्त हैं। यह लोक मानस में बनी छवि है, जिसे एक बुद्धिजीवी आसानी से स्वीकार कर लेता है। मिथकों के पुनर्पाठ को समकालीन राजनीति का अनिवार्य हिस्सा मानने वाला चिंतक वहां मिथक को आसानी से स्वीकार लेता है, जहां वह गलत ओर खड़ा है। अविनाश का स्लिप ऑफ टंग इसलिए अक्षम्य है क्योंकि वह ‘गलत इरादा’ नहीं एक सवर्ण का अवचेतन है।
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दिलीप मंडल ♦ दक्षिण दिल्ली के एक प्रसिद्ध शॉपिंग मॉल – JNU (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) में मनोज बाजपेयी और टिया बाजपेयी की 9 दिसंबर, 2011 को रिलीज हो रही फिल्म LANKA का प्रमोशन हुआ। बच्चों को मनोज बाजपेयी को करीब से देखने, छूने और ऑटोग्राफ लेने का मौका मिला।
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विनीत कुमार ♦ मैं लिखने को जरूरी मानता हूं इसलिए न तो रिपोर्ट लिखने को लेकर कोई आपत्ति है और न ही दिलीप मंडल की मीरा की भक्ति-भावना कहकर उपहास ही उड़ाना जरूरी समझता हूं। बस ये कि आप प्लीज ऐसा करके पीआर एजैंसियों को एक कमाऊ फार्मूला न थमा दें, जिस पर कि कल को आपका ही नियंत्रण न रह सके। ऐसे कार्यक्रम इससे सौ गुनी ताकत के साथ शुरू होने लग जाएं और कलाकारों के प्रति सदिच्छा का भाव मार्केटिंग स्ट्रैटजी में तब्दील हो जाएं। बाकी आप सब ये कहने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं कि ओबीसी की राजनीति को लेकर दिलीप मंडल इन सबसे अलग क्या कर रहे हैं?


