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#FB पर खुदाई में पुराना जंबूद्वीप मिला

इस गोले के लोग अपनी तरह से साम्राज्‍यों की बाल की खाल निकालते हैं। आमतौर पर सामाजिक रूप से इस विधा को तंज कहते हैं, साहित्‍य में व्‍यंग्‍य कहा जाता है। हिंदी साहित्‍य की...

कार्टून से बौखलाये आसाराम के भक्‍त, बदतमीजी पर उतरे 9

कार्टून से बौखलाये आसाराम के भक्‍त, बदतमीजी पर उतरे

आसाराम अभी जोधपुर जेल में हैं। उन पर नाबालिग लड़की के यौन शोषण का आरोप है। मामला संगीन है और सबूत पुख्‍ता, लिहाजा पिछले हफ्ते कोर्ट ने उनकी जमानत भी खारिज कर दी। अपनी...

तय करो किस ओर हो! FB की ओर हो या फेल्‍डा की ओर हो? 3

तय करो किस ओर हो! FB की ओर हो या फेल्‍डा की ओर हो?

अरविंद कु सेन ♦ एक तरफ फेसबुक है, जिसका आईपीओ बाजार में आने से पहले ही पूरे पश्चिमी मीडिया ने कंपनी की शान में कसीदे काढ़ने का अभियान छेड़ दिया था। फेसबुक को शेयर बाजार के मैदान में पछाड़ने वाली कंपनी उभरते एशिया की मलेशियाई पाम ऑयल कंपनी फेल्डा है, जिसके आईपीओ ने निवेशकों पर मुनाफे की बारिश कर दी है। फेल्डा की सफलता ने शेयर बाजार के इस बुनियादी सिद्धांत पर दोबारा मोहर लगायी है कि चाहे बाजार कितना ही डावांडोल हो, निवेशक मजबूत आधार और सुनहरे भविष्य वाली कंपनी में खुलकर पैसा लगाते है। फेल्डा की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पाम ऑयल कंपनी का आईपीओ मौजूदा साल में एशिया का सबसे बड़ा आईपीओ साबित हुआ है।

जो फिल्‍मों में गालियां नहीं पचा सकते, वे कल के दर्शक थे! 18

जो फिल्‍मों में गालियां नहीं पचा सकते, वे कल के दर्शक थे!

अनुराग कश्‍यप ♦ सिनेमा पहले दर्शक को ध्‍यान में रख कर लिखा जाता था। सिनेमा भी वोट बैंक की तरह सबको खुश रखता था। गालियां के बिना बेशक काम चल सकता है। लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। समाज वही है, लेकिन आज का फिल्‍मकार चीजों को सेंसर नहीं करना चाहता। आज के फिल्‍मकार को संस्‍कार से ज्‍यादा अपना बदसूरत चेहरा दिखाना है, क्‍योंकि हमने उसे जब भी देखा, करुणा के साथ, सिंपैथी के साथ देखा, अलग होके नहीं। और जो आज का दर्शक है, वो उन्‍हें पचा सकता है। और जो नहीं पचा सकते हैं, वो कल के दर्शक थे। उनका सिनेमा गया। अगर बहस सिर्फ भाषा पर है, और उसके परे नहीं जा सकती तो फिर क्‍या दर्शक हैं आप? और अगर शरम आती है घर वालों के साथ यह फिल्‍म देखते हुए तो मत देखें। डिज्‍नी वालों की भी एक पिक्‍चर लगी थी साथ में। यह मेरी फिल्‍म है, मेरी अभिव्‍यक्ति है, मुझे जो जैसे कहना है, वो वैसे कहूंगा।

लेखक को पैसे नहीं मिलेंगे, तो वो पक्‍का करप्ट हो जाएगा! 12

लेखक को पैसे नहीं मिलेंगे, तो वो पक्‍का करप्ट हो जाएगा!

विनीत कुमार ♦ बौद्धिक संपदा कानून पर कल बहसतलब में इस उम्मीद से गया था कि लेखकों के हक और लिखकर रोजी-रोटी जुटानेवालों के पक्ष में बातचीत होगी। लेकिन कल बहसतलब का शिल्प बहुत ही शांत और स्थिरचित्त था। पैसे और अधिकार के मामले में हिंदी समाज के दूसरे सेमिनारों की तरह वो भी अध्यात्म के दरवाजे में चला गया।

फिल्‍मवाले समाज से लेते हैं, पर समाज को लेने नहीं देते! 5

फिल्‍मवाले समाज से लेते हैं, पर समाज को लेने नहीं देते!

प्रकाश के रे ♦ कॉपीराइट की निर्धारित समयावधि को लगातार बढ़ाये जाने को चिंताजनक बताया और पूछा कि इसकी क्‍या जरूरत है? उन्‍होंने सवाल उठाया कि क्‍या इस संदर्भ में विकसित राष्‍ट्रों के नियम हमें ज्‍यों के त्‍यों अपनाने चाहिए? उन्‍होंने फिल्‍मों में कुछ लोकगीतों को लिये जाने का हवाला देते हुए कहा कि जब आपको लेना होता है तो आप ले लेते हैं, लेकिन जब हमें लेना होता है तो हमारे हाथ बांध दिये जाते हैं।

IHC में आज बहसतलब, थोड़ी तो कल फेसबुक पर हो गयी 0

IHC में आज बहसतलब, थोड़ी तो कल फेसबुक पर हो गयी

डेस्‍क ♦ मोहल्‍ला लाइव और यात्रा बुक्‍स की ओर से बौद्धिक संपदा कानून पर आज बहसतलब आयोजित की जा रही है। क्‍या बौद्धिक संपदा कानून समाज के सांस्‍कृतिक और वैचारिक विकास में बाधक है? इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर हॉल में शाम साढ़े छह बजे आयोजित इस बहसतलब के स्‍पीकर हैं, प्रबीर पुरकायस्‍था, दिबाकर घोष, रविकांत और सिरिल गुप्‍ता।

अब पूरी रामायण न लिखें, स्‍टेटस अपडेट करें! ट्वीट करें!! 3

अब पूरी रामायण न लिखें, स्‍टेटस अपडेट करें! ट्वीट करें!!

राहुल कुमार ♦ लोग फेसबुक के जरिये कल्पनाओं में जीते भी नजर आते हैं। जैसे फार्मविले में अपने एसी बेड रूम में बैठकर वर्चुअल खेती करना, कैफे वर्ल्ड में एक पूरे कैफे का मालिक होना, भले ही असल जिंदगी में आपको चाय बनानी न आती हो, पर यहां आप एक से एक लजीज व्यंजन तैयार कर सकते हैं। हाथों में जान हो कि न हो पर माफिया वार खेलते हुए एक मुक्के में चार लोगों को धराशायी करने का बचपन का सपना पूरा कर सकते हैं। गेम खेलने और जीतने के लिए अधिक से अधिक दोस्त चाहिए, ऐसे में हम धड़ल्ले से जाने-अनजाने लोगों को जोड़कर अपनी फ्रेंड लिस्ट को लंबा करने पर जोर देते हैं।

इना मीना डीका ! अमरीका रीका रीका !! रम पम पोश !!! 0

इना मीना डीका ! अमरीका रीका रीका !! रम पम पोश !!!

डेस्क ♦ कभी कभी किसी के वन लाइनर के बाद फेसबुक पर दिलचस्‍प बहस होती है। आमतौर पर रीयल विमर्श में उनलोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, जो ज्‍यादा प्रतिक्रियावादी होकर उथले विचारों के साथ अपनी बात रखते हैं। लेकिन फेसबुक पर उनमें ज्‍यादा देर तक बात होती है। वैभव सिंह ने वॉल पर अमेरिका के संदर्भ में एक टिप्‍पणी की, तो देखिए कि त्रिपाठी बाबा और पांडेय बाबा कैसे भिड़ गये हैं।

फेसबुक पर आशुतोष का सवाल, अब आप क्या करेंगे? 49

फेसबुक पर आशुतोष का सवाल, अब आप क्या करेंगे?

आशुतोष कुमार ♦ लीजिए, आपकी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार ने कह दिया, जैतापुर संहारयंत्र बन कर रहेगा। जैतापुर वालों को गोली मारो, देश भर में हो रहे जनविरोध को चूल्हे में डालो, संभावित सर्वनाश को अफवाह बता कर भूल जाओ, क्योंकि विदेशी साहूकारों से डील पहले ही पक्की हो चुकी है। अब आप क्या करेंगे? मनमोहन सिंह को कान पकड़ कर कुर्सी से उखाड़ लेंगे? सरकार बदलने के लिए अगले चुनावों का इंतज़ार करेंगे? फिर अगली सरकार को बदलने के लिए अगले चुनावों का?