Articles tagged with: first narendra memorial award
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उदय कह रहे हैं कि वे गोरखपुर के कार्यक्रम योगी की उपस्थिति का राजनीतिक पाठ नहीं कर पाये। लेकिन उदय का ये रूप उनके विचारों में आये ज़बरदस्त परिवर्तन का नतीजा है। इस बात को वे स्वीकार भी कर चुके हैं। दिक्क़त ये है कि उनके चाहने वाले उस उदय को खोज रहे हैं, जो प्रगतिशील मूल्यों का पक्षधर होने का दावा करता था। वे नहीं देख पा रहे कि आजकल उदय ‘औलिया’ की रहमत में दुनिया का मुस्तकबिल देख रहे हैं, और मानते हैं कि लेखक को विचारों की बाड़बंदी से ऊपर होना चाहिए।
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उदय हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्हें एक ख़बर की हैडिंग और एक फोटो की बिना पर लगातार जलील किया जा रहा है। बिना यह देखे कि उनकी रचनाएं क्या कहीं भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हत्यारों के पक्ष में खड़ी हैं? हम क्यों भूल जाते हैं कि ये वही उदय हैं, जिनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर इन्हीं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने हंगामा खड़ा किया था। गुजरात दंगों पर अपनी झूठी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए नकली कविताएं लिखने वाले उनकी अस्मितावादी कहानी ‘मोहनदास’ पढ़ें और देखें कि विचारधारा कोई हो, सत्ता के आगे एक व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का हश्र क्या होता है।
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♦ धीरेश सैनी
(एनबीटी यानी समीर जैन के नवभारत टाइम्स के एक प्रगतिशील क्रांतिकारी मुलाज़िम धीरेश ने उदय प्रकाश प्रकरण पर जनसत्ता में छपे लेख की प्रतिक्रिया में अपनी यह टिप्पणी लिखी है। इस टिप्पणी का तेवर ज़्यादा स्वाभाविक होता, अगर कुछ आरोपों का ज़िक्र करते हुए वे तथ्यात्मक ग़लतियों के रूप में अपना प्रतिशोध ज़ाहिर नहीं करते। बहरहाल हम इसे बिना किसी काट-छांट के पेश कर रहे हैं : मॉडरेटर)
उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर …
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इस प्रतिक्रियावादी हिंदी समाज में माफी और सार्वजनिक आत्म-स्वीकार ही उदय प्रकाश की नयी स्वीकृत रचना हो सकता था, जिसे रच कर उन्होंने अपनी शख्सियत को ऊंचा ही किया है। अपने ब्लॉग पर उन्होंने योगी के साथ अपनी मौजूदगी और उनके हाथों सम्मान लेने के लिए पाठकों से क्षमायाचना की है। क्षमायाचना के साथ ही यह अप्रिय विवाद ख़त्म हो जाना चाहिए। मगर उदय प्रकाश की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और प्रशस्ति से रश्क करने वाले उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाने के मौक़े से जैसे चूकना नहीं चाहते थे, आसानी से छूटना भी क्यों चाहेंगे।
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उदय प्रकाश ने अपनी ग़लती मान ली। हिंदी के मिट्टी-प्रदेश का इतना बड़ा लेखक अपनी ग़लती को लिख कर स्वीकार कर ले, तो मान लिया जाना चाहिए कि यह महान लेखक इस वक्त अफ़सोस के घोर क्षणों में जी रहा होगा। मुझे विश्वास है कि ऐसे मुश्किल क्षणों से गुज़र कर यह लेखक पहले से और बेहतर हो जाएगा। इतनी ही अपेक्षा की थी कि वे अपनी ग़लती मान लें। उन्होंने मान ली। उदय प्रकाश ने एक अच्छी शुरुआत की है। उनको स्कूल से बर्खास्त करने की आततायी प्रिंसिपली मानसिकता से बचना चाहिए।
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♦ उदय प्रकाश
मैंने और मेरे परिवार ने, एक बार नहीं कई कई बार लांछन, दंड, अपयश, अभाव और दुखों की ऐसी ही यंत्रणा झेली है। इस बार भी हमने पांच दिनों से न ठीक से खाया है, न सो सके हैं। मैंने बार-बार दुहराया है कि मैं कोई महान व्यक्ति नहीं हूं। कोई क्रांतिकारी, मठाधीश या सुपर स्टार नहीं। असली ज़िंदगी में एक बहुत साधारण मेहनत कश आम आदमी हूं। भाषा का मज़दूर। मेरा किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। मेरे लिए सभी राजनीतिक दल अब लगभग एक …
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अच्छा होता अगर योगी आदित्यनाथ के हाथों उदयप्रकाश कोई सम्मान न लेते। लेकिन उतना ही अच्छा होता अगर तमाम प्रगतिशील पत्रिकाओं में बीजेपी और कांग्रेसी और वामपंथी सरकारों के विज्ञापन न छपते (क्या ये बताने की जरूरत है कि भारत में सरकारों का चरित्र क्या होता है)। और शायद उससे भी अच्छा होता कि उदयप्रकाश के आदित्यनाथ से सम्मान लेने के खिलाफ गोलबंदी दिखाने वाले साहित्यकारों ने लालगढ़ में आदिवासियों के संहार के खिलाफ या नंदीग्राम और सिंगुर में राजकीय हिंसा के खिलाफ “भी” ऐसा ही एक वक्तव्य जारी किया होता (मैं जानता हूं कि ये बेहद अश्लील और सांप्रदायिक फासीवादी किस्म की अलोकतांत्रिक मांग है)।
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अशोक कुमार पाण्डेय
कई दिनों से बड़े दुखी मन से देख रहा था यह सब…
आज रहा नही गया। यह व्यक्तिगत क्या होता है? उदय जी आपको दिवंगत कुंवर साहब के प्रति पूरा आदर रखने की आजादी है पर उसके लिए सार्वजनिक समारोह में एक हत्यारे के साथ बैठना? इन व्यक्तिगतों से लड़कर ही लेखक विचार की राह पर आगे बढ़ता है। आप आज अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को जातिवादी कह रहे हैं। बहुत विनम्रता से बता दूँ किजिस कालेज में आपके दिवंगत अग्रज पढाते थे वह उसी गोरखनाथ मन्दिर द्वारा संचालित …
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(मुझे खुशी है कि मैं गलत साबित हुआ। हिंदी में गलत को गलत कहने वाले वीरों की कोई कमी नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण नीचे का विरोधपत्र है। हिंदी के 50 से ज्यादा महत्वपूर्ण लेखकों ने योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित होने के लिए उदयप्रकाश की निंदा की है। नीचे हस्ताक्षर करने वाले कुछ लेखकों ने सक्रियता दिखाते हुए बाकी लेखकों से टेलीफोन पर विरोधपत्र जारी करने पर सहमति ली है। क्या उदय प्रकाश अब भी कहेंगे कि उनकी आलोचना जातिवादी फासीवादियों की साजिश का नतीजा है: पंकज श्रीवास्तव, …
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निरंजन श्रोत्रिय
यह सब ग़लत हो रहा है। अब हिंदी साहित्य उस निम्न स्तर तक आ पहुंचा है, जब लेखक के हगने, मूतने, खांसने से उसकी प्रतिबद्धता तय की जा रही है। जो लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं, उन्हें इतना तो सोचना चाहिए था की क्या उदय दंगाइयों के पक्ष में खड़ा कोई छद्म लेखक है? जो कवि जनसत्ता में गुजरात विभीषिका पर ध्रुपद जैसी अद्भुत और मार्मिक कविता लिख रहा हो, उसके बारे में ऐसे शक कई दूसरे शक पैदा करते हैं। जो लोग उदय और अशोक वाजपेयी …



