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Articles tagged with: gorakhpur

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[28 Oct 2009 | 4 Comments | ]
अपने यहां के फेस्टिवल आम दर्शकों को डराते हैं!

अब्राहम हिंदीवाला ♦ दिल्‍ली में ओसियान फेस्‍टिवल चल रहा है। फिल्‍म पढ़ने से ज़्यादा मज़ा देखने में देती है। मौका निकालें और कुछ फिल्‍में देख आएं। वैसे अपने यहां के फेस्टिवल आम दर्शकों को डराते हैं। उनका हाल लगभग शास्‍त्रीय संगीत की तरह होता जा रहा है। अगर आप बुद्धि, अर्थ बौर कर्म से संपन्‍न हो तो फेस्टिवल में आओ। मैंने कभी किसी मज़दूर को फेस्टिवल में नहीं देखा। क्‍यों भाई, कभी उन्‍हें भी तो निमंत्रित करें। और यह जो अंग्रेज़ी का कारोबार है। उसकी वजह से मिनिमम योग्‍यता के बाद ही आप फेस्टिवल की गतिविधियों को समझ सकते हैं। वरना मुंह बाये सुनते रहिए और औंघाते रहिए।

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[21 Oct 2009 | 3 Comments | ]
वे मज़दूर थे, उन्‍हें माओवादी कह कर गिरफ़्तार किया गया

पहली बार करीब पांच महीने पहले तीन कारखानों के मजूदरों ने संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा बनाकर न्यूनतम मजदूरी देने और काम के घंटे कम करने की लड़ाई लड़ी और आंशिक कामयाबी पायी। इससे बरसों से नारकीय हालात में खट रहे हजारों अन्य मजदूरों को भी हौसला मिला। इसीलिए यह मजदूर आंदोलन इन दो कारखानों के ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम उद्योगपतियों को बुरी तरह खटक रहा है और वे हर कीमत पर इसे कुचलकर मजदूरों को ”सबक सिखा देना” चाहते हैं। कारखाना मालिक पवन बथवाल दबंग कांग्रेसी नेता है और भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का उसे खुला समर्थन प्राप्त है। प्रशासन और श्रम विभाग के अफसर बिके हुए हैं।

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[29 Jul 2009 | 4 Comments | ]
उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार

अनिल ♦ कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने-गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की दुखती रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?

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[27 Jul 2009 | 2 Comments | ]
हिंदी लेखक कहां खड़ा है?

रविभूषण ♦ विचारधारा से लेखक बंधे हुए हों या नहीं, लेकिन मानव जीवन, समय और समाज से वह सदैव बंधा हुआ है। कवियों, लेखकों, आलोचकों, संस्‍कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों से यह सदैव अपेक्षा की जाती है और हिंदी में इसके अनेक नायाब उदाहरण हैं कि वे उन लोगों के साथ न हों, मंचस्‍थ भी नहीं, एवं सांप्रदायिक शक्तियों का अपने लेखन-वाचन में विरोध करना और समय-समय पर उनके साथ, कुछ समय के लिए ही सही, खड़े होना किसी भी दृष्टि से मुनासिब नहीं।

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[25 Jul 2009 | 7 Comments | ]
हम अपने ख़याल को सनम समझे थे

उदय कह रहे हैं कि वे गोरखपुर के कार्यक्रम योगी की उपस्थिति का राजनीतिक पाठ नहीं कर पाये। लेकिन उदय का ये रूप उनके विचारों में आये ज़बरदस्त परिवर्तन का नतीजा है। इस बात को वे स्वीकार भी कर चुके हैं। दिक्क़त ये है कि उनके चाहने वाले उस उदय को खोज रहे हैं, जो प्रगतिशील मूल्यों का पक्षधर होने का दावा करता था। वे नहीं देख पा रहे कि आजकल उदय ‘औलिया’ की रहमत में दुनिया का मुस्तकबिल देख रहे हैं, और मानते हैं कि लेखक को विचारों की बाड़बंदी से ऊपर होना चाहिए।

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[23 Jul 2009 | 8 Comments | ]
हिंदी साहित्य में विष्ठावाद!

हिंदी भाषा अभी तक पंडिताऊ शब्दकोश से पूरी आज़ाद भी नहीं हुई थी कि इसे कीचड़ (पंक) में ढकेलने की कोशिशें जारी हो गयी हैं। पाठकों हिंदी भाषा को संपन्न और सामर्थ्यवान बनाने के इनके प्रयासों को आप अपना आशीर्वाद दीजिए। जो पाठक किसी कारणवश हिंदी साहित्य का इतिहास न पढ़ पाएं हों, उन्हें बता दें कि एक ज़माने में शुद्धतावादी ब्राह्मणीय हिंदी का बड़ा जोर था। लोग उससे ऊब गये, तब जाकर वो सहज भाषा की तरफ बढ़े। अब आपकी प्यारी हिंदी में विष्ठावाद आ चुका है। आप सब इसके लिए तैयार रहिए। ये न जाने कब जाएगा??

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[23 Jul 2009 | 5 Comments | ]
पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

♦ अनंत विजय
हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं। विवाद की जड़ में है – पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों पहला नरेंद्र स्मृति सम्मान लेना। जबसे यह ख़बर छपी है, पूरे साहित्य जगत में उदय की जम कर आलोचना शुरू हो गयी है। उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं, लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुंधला होकर भगवा …

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[21 Jul 2009 | 2 Comments | ]
चोरी तो नहीं की है, डाका तो नहीं डाला!

उदय हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्हें एक ख़बर की हैडिंग और एक फोटो की बिना पर लगातार जलील किया जा रहा है। बिना यह देखे कि उनकी रचनाएं क्या कहीं भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हत्यारों के पक्ष में खड़ी हैं? हम क्यों भूल जाते हैं कि ये वही उदय हैं, जिनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर इन्हीं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने हंगामा खड़ा किया था। गुजरात दंगों पर अपनी झूठी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए नकली कविताएं लिखने वाले उनकी अस्मितावादी कहानी ‘मोहनदास’ पढ़ें और देखें कि विचारधारा कोई हो, सत्ता के आगे एक व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का हश्र क्या होता है।

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[20 Jul 2009 | 4 Comments | ]
गू खाने को ट्रेंड बनाने की कोशिश

♦ धीरेश सैनी
(एनबीटी यानी समीर जैन के नवभारत टाइम्‍स के एक प्रगतिशील क्रांतिकारी मुलाज़‍िम धीरेश ने उदय प्रकाश प्रकरण पर जनसत्ता में छपे लेख की प्रतिक्रिया में अपनी यह टिप्‍पणी लिखी है। इस टिप्‍पणी का तेवर ज़्यादा स्‍वाभाविक होता, अगर कुछ आरोपों का ज़‍िक्र करते हुए वे तथ्‍यात्‍मक ग़‍लतियों के रूप में अपना प्रतिशोध ज़ाहिर नहीं करते। बहरहाल हम इसे बिना किसी काट-छांट के पेश कर रहे हैं : मॉडरेटर)
उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर …

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[19 Jul 2009 | 5 Comments | ]
और अंत में घृणा

इस प्रतिक्रियावादी हिंदी समाज में माफी और सार्वजनिक आत्‍म-स्‍वीकार ही उदय प्रकाश की नयी स्‍वीकृत रचना हो सकता था, जिसे रच कर उन्‍होंने अपनी शख्‍स‍ियत को ऊंचा ही किया है। अपने ब्‍लॉग पर उन्‍होंने योगी के साथ अपनी मौजूदगी और उनके हाथों सम्‍मान लेने के लिए पाठकों से क्षमायाचना की है। क्षमायाचना के साथ ही यह अप्रिय विवाद ख़त्‍म हो जाना चाहिए। मगर उदय प्रकाश की अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति और प्रशस्ति से रश्‍क करने वाले उनके ख़‍िलाफ़ अभियान चलाने के मौक़े से जैसे चूकना नहीं चाहते थे, आसानी से छूटना भी क्‍यों चाहेंगे।