Articles tagged with: harivansh
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
हरिवंश ♦ 2009 के चुनाव परिणाम, 2005 के चुनाव परिणामों से भी अधिक खंडित, जटिल और विभाजित है। इसका संकेत है कि खंड-खंड बंटा झारखंडी समाज, लगातार बंट और विभाजित हो रहा है। समाज के स्तर पर। इस चुनाव के मुख्य गेनर हैं, शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, सुदेश महतो और कांग्रेस। बाबूलाल और कांग्रेस दोनों एक दूसरे के पूरक साबित हुए हैं। बाबूलाल जी और कांग्रेस गंठजोड़ ने भाजपा की लुटिया डुबो दी है। शिबू सोरेन को तमाड़ चुनाव में मिली पराजय के बाद लोग हाशिये पर डाल रहे थे। पर झामुमो की कामयाबी ने साबित कर दिया है कि शिबू सोरेन आज भी झारखंडी माटी के बड़े नेता हैं। नक्सली या अतिवामपंथी ताकतों ने भी तीन राजनीतिक समूहों के प्रति अपनी सहानुभूति दिखायी है।
मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »
तथागत ♦ छापे के बाद पता चलता है कि प्रदीप कुमार के खाते से झारखंड के एक पत्रकार के बेटे के खाते में 36 लाख रुपये ट्रांसफर हुए हैं। खाते से पैसे की निकासी भी हो जाती है। सीबीआई के अधिकारी खाताधारी तक पहुंचते हैं और फिर उनके पत्रकार पिता तक। दरअसल ये पत्रकार पिता कोई और नहीं, हरिनारायण सिंह ही थे। सीबीआई को उन्होंने बताया कि ये पैसे डाकुमेंटरी फिल्म बनाने के लिए लिये गये हैं – लेकिन वे इस किस्म का कोई प्रोपोज़ल पेश नहीं कर पाते। बहरहाल, सीबीआई को जो जानना था, उसने जान लिया लेकिन दुनिया यह नहीं जान पायी कि वे पत्रकार कौन हैं। कहा जाता है कि हरिनारायण सिंह ने ये पैसे प्रदीप कुमार के घपलों-घोटालों पर पर्दा डालने के लिए बतौर घूस लिये।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
हरिवंश ♦ भाषाई आंदोलन, बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता, अब राज ठाकरे का मराठी मानुष, भिंडरावाले का आंदोलन, अयोध्या प्रकरण, सांप्रदायिक सवाल, जातिगत मुद्दे जैसे सवालों से इस देश में समय-समय पर जो आग लगी, उससे मुल्क ने क्या सीखा? क्या इन भावात्मक सवालों (आग) से कोई सबक मिला? कितना झुलसा है, यह देश, जिस देश कि चौहद्दी पर बार-बार चीन अपनी ताकत का एहसास कराये, आतंकवाद की चुनौती लगातार बनी हो, पचासों करोड़ नितांत गरीब, किसी तरह जी रहे हों, प्रधानमंत्री के शब्दों में, जहां आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती नक्सल समस्या मौजूद हो, वहां एक नया भानुमती का पिटारा खोलने के कदम को आप क्या कहेंगे?
समाचार, स्मृति »
हरिवंश ♦ उनके सान्निध्य में स्वामी सत्संगी जी ने रिखिया व आसपास के गांवों में प्रयोग किया। शिक्षा का। अंग्रेजी पढ़ाने का। कंप्यूटर सिखाने का। गांव के बच्चे-बच्चियों का आत्मविश्वास देख यकीन नहीं होगा। पर यह सब काम बिना प्रचार। परमहंस सत्यानंद जी का जाना, पिछले माह अचानक प्रभाष जोशी जी का न रहना, यह निजी दुख नहीं बंटनेवाला। पर यही संसार की लय है। महर्षि अरिवद के संदर्भ में दिनकर जी ने लिखा ‘जीवन, निद्रा और मृत्यु ये चेतना मार्ग पर स्टेशन मात्र हैं। सारी सृष्टि चित का विलास है। मृत्यु जीवन की अस्वीकृति नहीं, उसकी प्रक्रिया है।’ यह सृष्टि चक्र या भवसागर चक्र समझने की जो दृष्टि परमहंस सत्यानंद जी देते थे, वही आलोक पथ शेष है। पाथेय है। प्रेम है।
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हरिवंश ♦ घटते वोट क्या बताते हैं? हमारी मान्यता रही है, कोउ नृप होउ हमहि का हानी। कोई भी राजा हो, उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला? डॉ लोहिया ने भी निराशा के कर्तव्य में भारतीय मन की उदासी-तटस्थता का उल्लेख किया है। उनकी व्याख्या मानती है कि हज़ारों वर्ष की गुलामी ने हमें सत्वहीन कर दिया है। बाबरनामा में बाबर के सटीक अनुभव हैं। कैसे लाखोंलाख लोग सेना के मामूली टुकड़ी को मूकदर्शक बन कर स्वागत करते हैं। पराधीनता मान लेते हैं। इस तरह मतदाताओं के घटते रुझान की अनेक व्याख्या होती रही है। होती रहेगी। पर लोकतंत्र को हमारी मौजूदा राजनीति, अविश्वसनीय बना चुकी है। यह सच है।
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हरिवंश ♦ झारखंड के लोग याद रखें कि जब सरकारें और राजनीतिक दल उनके भविष्य की हत्या कर रहे थे, तब झारखंड के वीवीआईपी के बच्चों के लिए क्या अवसर थे? गुज़रे आठ वर्षो तक लगातार विभिन्न कोटों से इनके बच्चे सीधे दाखिला पा रहे थे। मेडिकल में। भले ही ये बच्चे लिख-लोढ़ा पढ़ पत्थर की योग्यतावाले रहे हों, पर वे सीधे डॉक्टर बन रहे थे। उन्हें प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने की मजबूरी नहीं थी, क्योंकि वे वीवीआईपी लोगों के बच्चे थे। दरअसल ये राजनीतिज्ञ इस नये दौर के नये राजा-महाराजा हैं। ये बार-बार आपको छलेंगे। जाति के नाम पर। धर्म के नाम पर। क्षेत्रवाद का नाम देकर। मोह कर। भ्रम में डाल कर। क्योंकि ये मानते हैं कि नासमझ मतदाताओं के बीच ठग ही राज करते हैं।
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रवि प्रकाश ♦ विनोद सिन्हा प्रकरण में एक बड़ी स्टोरी करायी गयी, लेकिन छापी नहीं गयी। लिखने वाले थे सुनील तिवारी। सुनील पहले आउटलुक के रिपोर्टर हुआ करते थे। बाद में प्रभात खबर ने उन्हें अप्वाइंट किया। केवल विनोद सिन्हा वाली खबर निकलवा कर उन्हें चलता कर दिया गया। तब मैं सिटी एडिटर था। यानी कि पहले दो किस्तों में स्टोरी छाप कर तत्कालीन मधु कोड़ा सरकार पर दबाव बनाया गया और तीसरी किस्त के लिए बार्गेनिंग करने की कोशिश की गयी। साफ है कि न सिर्फ मधु कोड़ा एंड कंपनी झारखंड के चमकते हुए हमाम में नहा रहे थे बल्कि पहले से नहाते आये उषा मार्टिन ग्रुप अपने लिए बड़ा हमाम मधु कोड़ा से चाह रहा था।
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तथागत ♦ कुछ दिनों पहले प्रभात खबर ने एक आचार संहिता का एलान किया था। इस अखबार ने अपने बारे में बार-बार कहा कि वह पक्षधर पत्रकारिता में विश्वास नहीं रखता, बल्कि निष्पक्षता उसकी शैली है। आचार संहिता में भी कुल यही बात कही। कहा कि पार्टियों से विज्ञापन लेंगे, लेकिन टेबल के ऊपर से। टेबल के नीचे से नहीं। लिहाज़ा अगर विज्ञापन वाली ख़बर भी छपी, तो उसके नीचे लिखेंगे कि ये ख़बर विज्ञापन का हिस्सा है। लेकिन प्रभात खबर की आचार संहिता एलान के 15 दिनों के भीतर दम तोड़ देगी, इसका क़तई अंदाज़ नहीं था।
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हरिवंश ♦ प्रभाषजी व्यक्ति नहीं, प्रतीक बन गये थे। श्रेष्ठ मूल्यों के। जीने के मकसद के। पत्रकारिता के उच्च प्रतिमानों के। तीन दिनों पहले पटना से उनका फ़ोन आया था। वह प्रभात खबर के पथ प्रदर्शक थे। निजी जीवन में भी अभिभावक। अत्यंत संवेदनशील। गांधी और विनोबा के जीवन मूल्यों का उन पर गहरा असर था। साधन और साध्य उनके जीवन के मापदंड थे। उनकी रुचि बहुआयामी थी। लेखन, खेल, संगीत, इतिहास, पाककला सबमें निपुणता। 1983 में उनके नेतृत्व में निकला जनसत्ता हिंदी अखबारों में मानक है। श्रेष्ठ टीम। और ऐसा अखबार, जो लीक से हट कर था। कहें, एक नयी राह बनायी।
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हरिवंश ♦ कितना धन चाहिए, एक इंसान को? धन की भूख की कोई सीमा है? 23 महीने सत्ता में रह कर कैसे लोग हजारों करोड़ कमा लेते हैं? यह किसी एक व्यक्ति का सवाल नहीं है। यह मानस है, जो हर जगह, हर तरफ़ है। इस मानस-मनोवृति की ललक क्या है? इस भूख का मनोवैज्ञानिक राज क्या है? बड़ा आसान फ़ार्मूला है। उपभोक्ता मानस को दोष देना। कहना कि यह पश्चिमी मानस है। पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव। लोभ-लालच को इसकी जड़ बताना। फ़िर भी पूरा उत्तर नहीं मिलता। जीने के लिए कितना और क्या? सर ढकने के लिए कितनी छत चाहिए? कितने देशों में और कितने शहरों में?


