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Articles tagged with: harivansh

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[24 Aug 2010 | 2 Comments | ]
प्रभात खबर VS भास्‍कर : हम किसी से कम नहीं

अविनाश ♦ दैनिक भास्‍कर में ब्रांडिंग और सर्कुलेशन के कामों पर नजर रखते हैं गिरीश अग्रवाल। सुधीर अग्रवाल के छोटे भाई हैं। गुजरात में दिव्‍य भास्‍कर और मुंबई में डीएनए की लॉन्चिंग और एफएम केंद्रों के प्रबंधन में गिरीश की बड़ी भूमिका रही है। सुधीर अग्रवाल के धीरज के मुकाबले गिरीश उतावले ज्‍यादा हैं और यही वजह है कि रिजल्‍ट के लिए वे किसी भी हद तक चले जाते हैं। छवि के नुकसान की नहीं सोचते, यही सोचते हैं कि बिजनेस में फायदा कैसे हो। सुधीर अग्रवाल कभी अपने संपादक को खबर छापने से नहीं रोकते – लेकिन गिरीश रोकते हैं और बुरी तरह रोकते हैं। ठीक यही बात प्रभात खबर के प्रबंधकीय लीडर केके गोयनका में है। उन्‍हें भी पहले बिजनेस चाहिए – बाद में खबर।

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[22 Aug 2010 | 8 Comments | ]
झारखंड में आज से आमने-सामने हैं मीडिया के दो दिग्‍गज

अविनाश ♦ सन चौरासी से छप रहे प्रभात खबर को सन 89 में जब उषा मार्टिन की ओर से हरिवंश जी ने अपने हाथ मे लिया, तब इसकी छह सौ कॉपी भी नहीं छपती थी। अपने जोशीले अंदाज, पत्रकारीय सूझबूझ और आक्रामक प्रबंधन शैली की वजह से हरिवंश जी ने इसे न सिर्फ झारखंड का नंबर वन अखबार बनाया बल्कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बेहतरीन क्षेत्रीय प‍त्रकारिता का उदाहरण भी पेश किया। एक सफल प्रयोग का आत्‍मविश्‍वास हरिवंश जी के साथ है, जो झारखंड में भास्‍कर से लड़ने में उनके काम आएगा। लेकिन दैनिक भास्‍कर से लड़ना प्रभात खबर के लिए उतना आसान नहीं होगा। भास्‍कर की कमान भी सुधीर अग्रवाल जैसे अतिशय सूझबूझ वाले शख्‍स के हाथ में है।

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[24 Mar 2010 | 5 Comments | ]
‘इमरजेंसी में हम डर से और अब पैसे के लिए गिर गये’

कुलदीप नैयर ♦ राजनीतिक दलों ने पैसा दिया और मालिक, उम्मीदवार सभी इस पाप में भागीदार रहे। इमरजेंसी के समय हम डर से और अब पैसे के लिए गिर गये। पहले के जर्नलिस्ट ऐसी धंधेबाजी में संलिप्त नहीं थे। कोई-कोई ही ऐसा मिलता था। लेकिन अब स्थितियां बदल गयी हैं। अब कोई-कोई ही ईमानदार मिलता है। हमारी क्रेडिविलिटी तभी आएगी, जब ईमानदारी से हम धर्म, जाति, राजनीति और पैसे पर न बिकने को संकल्पित हों। नया संकट यह है कि आज पत्रकारिता पर सरकार से ज्यादा कॉरपोरेट सेक्टर का दबाब है। पाठक अभी भी समझता है कि जो भी छपता है, वह सच है। 99 प्रतिशत अखबार फैमिली ओन हैं।

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[24 Dec 2009 | No Comment | ]
झारखंड चुनाव के संदेश

हरिवंश ♦ 2009 के चुनाव परिणाम, 2005 के चुनाव परिणामों से भी अधिक खंडित, जटिल और विभाजित है। इसका संकेत है कि खंड-खंड बंटा झारखंडी समाज, लगातार बंट और विभाजित हो रहा है। समाज के स्तर पर। इस चुनाव के मुख्य गेनर हैं, शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, सुदेश महतो और कांग्रेस। बाबूलाल और कांग्रेस दोनों एक दूसरे के पूरक साबित हुए हैं। बाबूलाल जी और कांग्रेस गंठजोड़ ने भाजपा की लुटिया डुबो दी है। शिबू सोरेन को तमाड़ चुनाव में मिली पराजय के बाद लोग हाशिये पर डाल रहे थे। पर झामुमो की कामयाबी ने साबित कर दिया है कि शिबू सोरेन आज भी झारखंडी माटी के बड़े नेता हैं। नक्सली या अतिवामपंथी ताकतों ने भी तीन राजनीतिक समूहों के प्रति अपनी सहानुभूति दिखायी है।

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[16 Dec 2009 | 2 Comments | ]
हिंदुस्‍तान से क्‍यों जाना पड़ा हरिनारायण सिंह को?

तथागत ♦ छापे के बाद पता चलता है कि प्रदीप कुमार के खाते से झारखंड के एक पत्रकार के बेटे के खाते में 36 लाख रुपये ट्रांसफर हुए हैं। खाते से पैसे की निकासी भी हो जाती है। सीबीआई के अधिकारी खाताधारी तक पहुंचते हैं और फिर उनके पत्रकार पिता तक। दरअसल ये पत्रकार पिता कोई और नहीं, हरिनारायण सिंह ही थे। सीबीआई को उन्‍होंने बताया कि ये पैसे डाकुमेंटरी फिल्‍म बनाने के लिए लिये गये हैं – लेकिन वे इस किस्‍म का कोई प्रोपोज़ल पेश नहीं कर पाते। बहरहाल, सीबीआई को जो जानना था, उसने जान लिया लेकिन दुनिया यह नहीं जान पायी कि वे पत्रकार कौन हैं। कहा जाता है कि हरिनारायण सिंह ने ये पैसे प्रदीप कुमार के घपलों-घोटालों पर पर्दा डालने के लिए बतौर घूस लिये।

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[14 Dec 2009 | No Comment | ]
आग से खेल!

हरिवंश ♦ भाषाई आंदोलन, बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता, अब राज ठाकरे का मराठी मानुष, भिंडरावाले का आंदोलन, अयोध्या प्रकरण, सांप्रदायिक सवाल, जातिगत मुद्दे जैसे सवालों से इस देश में समय-समय पर जो आग लगी, उससे मुल्क ने क्या सीखा? क्या इन भावात्मक सवालों (आग) से कोई सबक मिला? कितना झुलसा है, यह देश, जिस देश कि चौहद्दी पर बार-बार चीन अपनी ताकत का एहसास कराये, आतंकवाद की चुनौती लगातार बनी हो, पचासों करोड़ नितांत गरीब, किसी तरह जी रहे हों, प्रधानमंत्री के शब्दों में, जहां आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती नक्सल समस्या मौजूद हो, वहां एक नया भानुमती का पिटारा खोलने के कदम को आप क्या कहेंगे?

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[7 Dec 2009 | 3 Comments | ]
स्‍वामी सत्‍यानंद सरस्‍वती का निधन : ज्योतिपुंज का जाना!

हरिवंश ♦ उनके सान्निध्य में स्वामी सत्संगी जी ने रिखिया व आसपास के गांवों में प्रयोग किया। शिक्षा का। अंग्रेजी पढ़ाने का। कंप्यूटर सिखाने का। गांव के बच्चे-बच्चियों का आत्मविश्वास देख यकीन नहीं होगा। पर यह सब काम बिना प्रचार। परमहंस सत्यानंद जी का जाना, पिछले माह अचानक प्रभाष जोशी जी का न रहना, यह निजी दुख नहीं बंटनेवाला। पर यही संसार की लय है। महर्षि अरिवद के संदर्भ में दिनकर जी ने लिखा ‘जीवन, निद्रा और मृत्यु ये चेतना मार्ग पर स्टेशन मात्र हैं। सारी सृष्टि चित का विलास है। मृत्यु जीवन की अस्वीकृति नहीं, उसकी प्रक्रिया है।’ यह सृष्टि चक्र या भवसागर चक्र समझने की जो दृष्टि परमहंस सत्यानंद जी देते थे, वही आलोक पथ शेष है। पाथेय है। प्रेम है।

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[27 Nov 2009 | One Comment | ]
बिदकते वोटर!

हरिवंश ♦ घटते वोट क्या बताते हैं? हमारी मान्यता रही है, कोउ नृप होउ हमहि का हानी। कोई भी राजा हो, उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला? डॉ लोहिया ने भी निराशा के कर्तव्य में भारतीय मन की उदासी-तटस्थता का उल्लेख किया है। उनकी व्याख्या मानती है कि हज़ारों वर्ष की गुलामी ने हमें सत्वहीन कर दिया है। बाबरनामा में बाबर के सटीक अनुभव हैं। कैसे लाखोंलाख लोग सेना के मामूली टुकड़ी को मूकदर्शक बन कर स्वागत करते हैं। पराधीनता मान लेते हैं। इस तरह मतदाताओं के घटते रुझान की अनेक व्याख्या होती रही है। होती रहेगी। पर लोकतंत्र को हमारी मौजूदा राजनीति, अविश्वसनीय बना चुकी है। यह सच है।

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[24 Nov 2009 | One Comment | ]
कैसे हुई युवा भविष्‍य की हत्‍या?

हरिवंश ♦ झारखंड के लोग याद रखें कि जब सरकारें और राजनीतिक दल उनके भविष्य की हत्या कर रहे थे, तब झारखंड के वीवीआईपी के बच्चों के लिए क्या अवसर थे? गुज़रे आठ वर्षो तक लगातार विभिन्न कोटों से इनके बच्चे सीधे दाखिला पा रहे थे। मेडिकल में। भले ही ये बच्चे लिख-लोढ़ा पढ़ पत्थर की योग्यतावाले रहे हों, पर वे सीधे डॉक्टर बन रहे थे। उन्हें प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने की मजबूरी नहीं थी, क्योंकि वे वीवीआईपी लोगों के बच्चे थे। दरअसल ये राजनीतिज्ञ इस नये दौर के नये राजा-महाराजा हैं। ये बार-बार आपको छलेंगे। जाति के नाम पर। धर्म के नाम पर। क्षेत्रवाद का नाम देकर। मोह कर। भ्रम में डाल कर। क्योंकि ये मानते हैं कि नासमझ मतदाताओं के बीच ठग ही राज करते हैं।

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[21 Nov 2009 | 8 Comments | ]
मधु कोड़ा को ब्‍लैकमेल कर रहा था प्रभात खबर

रवि प्रकाश ♦ विनोद सिन्‍हा प्रकरण में एक बड़ी स्‍टोरी करायी गयी, लेकिन छापी नहीं गयी। लिखने वाले थे सुनील तिवारी। सुनील पहले आउटलुक के रिपोर्टर हुआ करते थे। बाद में प्रभात खबर ने उन्‍हें अप्‍वाइंट किया। केवल विनोद सिन्‍हा वाली खबर निकलवा कर उन्‍हें चलता कर दिया गया। तब मैं सिटी एडिटर था। यानी कि पहले दो किस्‍तों में स्‍टोरी छाप कर तत्‍कालीन मधु कोड़ा सरकार पर दबाव बनाया गया और तीसरी किस्‍त के लिए बार्गेनिंग करने की कोशिश की गयी। साफ है कि न सिर्फ मधु कोड़ा एंड कंपनी झारखंड के चमकते हुए हमाम में नहा रहे थे बल्कि पहले से नहाते आये उषा मार्टिन ग्रुप अपने लिए बड़ा हमाम मधु कोड़ा से चाह रहा था।