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Articles tagged with: hindi cinema

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[5 May 2012 | 4 Comments | ]
फरेबी मौतों, गुम कब्रों के सफे पर खड़ा है हिंदुस्‍तानी सिनेमा

प्रकाश के रे ♦ माहजबीन और मुमताज पकिस्तान क्यों नहीं चली गयीं, शायद बच जातीं, जैसे कि नूरजहां बचीं। तभी लगता है कि कहीं से कोई टोबा टेक सिंह चिल्लाता है, ‘क्या मंटो बचा पकिस्तान में?’ मंटो नहीं बचा। लेकिन सभी जल्दी नहीं मरते। कुछ मर-मर के मरते हैं। सिनेमा का पितामह फाल्के किसी तरह जीता रहा, जब मरा तो उसे कंधा देने वाला कोई भी उस मायानगरी का बाशिंदा न था। उस मायानगरी को तो उसके बाल-बच्चों की भी सुध न रही। कहते हैं कि यूनान का महान लेखक होमर रोटी के लिए तरसता रहा, लेकिन जब मरा तो उसके शरीर पर सात नगर-राज्यों ने दावा किया। हिंदुस्तान के सिनेमाई नगर-राज्यों ने फाल्के की तस्वीरें टांग ली हैं। पता नहीं, लाहौर, ढाका, सीलोन और रंगून में उनकी तस्वीरें भी हैं या नहीं।

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[26 Apr 2012 | No Comment | ]
हिंदी सिनेमा की हिंदी पत्रकारिता का अंधेरा छंटना जरूरी है

ब्रजेश कुमार झा ♦ सिनेमाई पत्रकारिता अब स्टार पर चलती है। यानी फलाना फिल्म को ढाई स्टार, फलाना को चार और फलाना को पांच। और फिर पांच स्टार पाने वाली फिल्म उक्त सिने पत्रकार की नजर में सर्वश्रेष्ठ हो जाती है। इन दिनों हम इसी ढर्रे पर हैं। याद करें 1998 का समय, जब फिल्म ‘सत्या’ आयी थी। यह शायद हिंदी की पहली फिल्म थी, जिसे स्टार का रिवाज चलाने वाले अखबार ने पूरे पांच स्टार दिये थे। इसके बावजूद शुरू के सप्ताह में फिल्म अधिक नहीं चली, लेकिन जो लोग इस फिल्म को देखकर आते, वे दोबारा दूसरे को लेकर पुन: फिल्म देखने जाते थे। स्वयं इस पंक्ति के लेखक ने कई मर्तबा यही किया। वह स्टार-मैनिया नहीं था, बल्कि माउथ पब्लिसिटी थी। पर यह भी सच है कि तभी से स्टार-मैनिया हावी है।

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[21 Sep 2011 | 8 Comments | ]

डेस्‍क ♦ सिनेमा एक ऐसी सार्वजनिक दिलचस्‍पी और हसरत से जुड़ा सृजन है, जिसको लेकर हिंदी में साझा विमर्श कम दिखता है। मोहल्‍ला लाइव ने पिछले कुछ सालों से कोशिश की है कि ऐसा हो और शास्‍त्रीय अंदाज में न हो – लोकप्रिय अंदाज में हो, ताकि इस विमर्श में हिस्‍सा लेने में किसी को हिचक न हो। कुछ समानधर्मा समूहों के साथ हमने पिछले साल एक विमर्श आयोजित किया था, जिसमें हिंदी सिनेमा से जुड़े कुछ जरूरी नामों के साथ बड़ी तादाद में सक्रिय दर्शकों ने आपस में बातचीत की थी। 23 सितंबर 2011 को, मोहल्‍ला लाइव जागरण फिल्‍म फेस्टिवल के साथ मिल कर सिने विमर्श आयोजित कर रहा है। थीम है, Hindi Cinema Beyond Bollywood… बॉलीवुडीय छायाओं से बाहर हिंदी सिनेमा।

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[9 Aug 2011 | No Comment | ]

विनीत कुमार ♦ आज यानी 9 अगस्त को हिंदी सिनेमा वाया दिल्ली विषय पर मोहल्ला लाइव की ओर से एक बातचीत का आयोजन किया जा रहा है। जाहिर है, इसमें जो भी वक्ता शामिल हैं, दरअसल दिल्ली को लेकर उनके अपने-अपने संस्करण हैं और जो लोग उन्‍हें सुनने आएंगे, टुकड़ों-टुकड़ों में उनके संस्करण से परिचित होंगे। ऐसे में हम कहना चािहए कि दिल्ली में रहनेवाले और उसके बारे में सोचनेवाले तमाम लोगों के पास अपनी अपनी दिल्ली है और उसको लेकर अपनी समझ है।

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[8 Aug 2011 | One Comment | ]

डेस्‍क ♦ हिंदी सिनेमा के भीतर दिल्‍ली के कितने इमेजेज हैं या हिंदी सिनेमा में दिल्‍ली किस तरह आयी है। कितनी बार यह सिर्फ शहर की तरह आयी है और कितनी बार विचार की तरह – यह देखने, समझने, सुनने, कहने के लिए आप कल आ रहे हैं इंडिया हैबिटैट सेंटर। मोहल्‍ला लाइव इस मसले पर जिस संवाद का आयोजन कर रहा है, उसकी स्‍पीकर लिस्‍ट तो आपके पास है। तो कल हम बेसब्री से आपका इंतजार कर रहे हैं…

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[3 Jul 2010 | 6 Comments | ]

अब्राहम हिंदीवाला ♦ हिंदी सिनेमा का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। बशर्ते हिंदी समाज यानी हिंदी प्रदेशों के दर्शक हिंदी फिल्मों में रुचि लें। वे सिनेमाघरों में फिल्में देखने जाएं। अपनी पसंद-नापसंद जाहिर करें। हिंदी प्रदेशों से निर्माता-निर्देशक आएं। वे अपने साथ हिंदी समाज की संवेदना और संस्‍कृति ला सकते हैं। ताजा उदाहरण है, ‘राजनीति’। फिल्में कलात्मक व्यवसाय हैं। एक प्रोडक्ट की तरह ही इनका निर्माण, वितरण और उपभोग होता है। हर निर्माता अपनी फिल्‍मों के ज्यादा से ज्यादा दर्शक चाहता है। बाजार में फिल्में एक ऐसा प्रोडक्ट है, जिसका एमआरपी सुनिश्चित नहीं है। मुंबई में आई हेट लव स्टोरीज के टिकट सप्ताहांत में 400 रुपये तक में बिकेंगे, जबकि यही फिल्म किसी छोटे शहर में 5 रुपये में देखी जाएगी।

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[24 Dec 2009 | 4 Comments | ]

डेस्‍क ♦ पूरब की वीनस कहलाने वाली अप्रतिम सौंदर्य की मलिका ने भारतीय सिनेमा जगत पर न केवल अपने सौंदर्य बल्कि अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। इसके बावजूद उन्हें न तो जीते जी और न ही उनके निधन के बाद वह सम्मान दिया गया, जिसकी वह हकदार थी। ऐसी ही कुछ बातें मधुबाला की जीवनी ‘मधुबाला – दर्द का सफर’ के लोकार्पण के मौके पर सामने आयीं। लोकार्पण समारोह में लोकसभा सांसद राशिद अल्वी, फिल्म प्रभाग के निदेशक एवं वृत्तचित्र निर्माता कुलदीप सिंह, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक एवं फिल्म शोधकर्ता शरद दत्त, संगीत विशेशज्ञ डा मुकेश गर्ग, बीते जमाने के मशहूर संगीत निर्देशक हुस्नलाल की बेटी एवं गायिका प्रियंबदा वशिष्‍ठ तथा सखा संगठन के अध्यक्ष अमरजीत सिंह कोहली मौजूद थे।

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[22 Dec 2009 | 5 Comments | ]

अनुराग अन्‍वेषी ♦ इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से। यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।

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[16 Dec 2009 | 12 Comments | ]

रवीश कुमार ♦ हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाक़ाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार है। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी लतखोर मीडिया की।

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[11 Nov 2009 | 2 Comments | ]

अब्राहम हिंदीवाला ♦ जेल इस साल की एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍म है। नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी और राहुल सिंह ने सपने, उम्‍मीद, हताशा और सदमे को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त किया है। ख़ास कर मनोज बाजपेयी अपने फॉर्म में लौटते नज़र आते हैं। इस फिल्‍म को देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्‍या यह हो गयी है कि हर फिल्‍म में हम मनोरंजन चाहते हैं। और मनोरंजन का खास संदर्भ और मतलब हो गया है। इसके अभाव में हमें हर फिल्‍म नीरस, शुष्‍क और बेजान लगती है।