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डेस्क ♦ पूरब की वीनस कहलाने वाली अप्रतिम सौंदर्य की मलिका ने भारतीय सिनेमा जगत पर न केवल अपने सौंदर्य बल्कि अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। इसके बावजूद उन्हें न तो जीते जी और न ही उनके निधन के बाद वह सम्मान दिया गया, जिसकी वह हकदार थी। ऐसी ही कुछ बातें मधुबाला की जीवनी ‘मधुबाला – दर्द का सफर’ के लोकार्पण के मौके पर सामने आयीं। लोकार्पण समारोह में लोकसभा सांसद राशिद अल्वी, फिल्म प्रभाग के निदेशक एवं वृत्तचित्र निर्माता कुलदीप सिंह, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक एवं फिल्म शोधकर्ता शरद दत्त, संगीत विशेशज्ञ डा मुकेश गर्ग, बीते जमाने के मशहूर संगीत निर्देशक हुस्नलाल की बेटी एवं गायिका प्रियंबदा वशिष्ठ तथा सखा संगठन के अध्यक्ष अमरजीत सिंह कोहली मौजूद थे।
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अनुराग अन्वेषी ♦ इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से। यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।
नज़रिया, मीडिया मंडी, सिनेमा »
रवीश कुमार ♦ हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाक़ाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार है। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी लतखोर मीडिया की।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ जेल इस साल की एक महत्वपूर्ण फिल्म है। नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी और राहुल सिंह ने सपने, उम्मीद, हताशा और सदमे को अच्छी तरह व्यक्त किया है। ख़ास कर मनोज बाजपेयी अपने फॉर्म में लौटते नज़र आते हैं। इस फिल्म को देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्या यह हो गयी है कि हर फिल्म में हम मनोरंजन चाहते हैं। और मनोरंजन का खास संदर्भ और मतलब हो गया है। इसके अभाव में हमें हर फिल्म नीरस, शुष्क और बेजान लगती है।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ हम सभी जानते हैं उन्हें। हिंदी फिल्मों में कपूर खानदान की विरासत को संभाल रही करीना कपूर उसे नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दम नहीं रखतीं। उनमें दंभ है। उन्हें लगता है कि 75 साल में अर्जित कपूर खानदान की प्रतिष्ठा का उन्हें फायदा तो मिलेगा ही। मिला भी। फिल्मों में आयीं तो अच्छी शुरुआत नहीं होने पर भी उन्हें मौके मिलते रहे। एक ज़माने में उन्हें फ्लॉप फिल्मों की श्रेष्ठ हीरोइन कहा जाता था। अगर उनकी फिल्मों पर गौर करें तो ज़्यादातर बिजनेस और क्वालिटी के हिसाब से कमज़ोर रही हैं। उन्होंने चमेली और ओमकारा जैसी कुछ अच्छी फिल्में की हैं। इन फिल्मों का श्रेय किसे मिलना चाहिए? आप जानते हैं।
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मिहिर पंड्या ♦ एक बार ओम शिवपुरी साहब ने अपने साहबज़ादे को एक चपत रसीद कर दी। अब कर दी तो कर दी। साहबज़ादे ने जवाब में अपने पिता से पूछा कि क्या आपके वालिद ने भी आपको बचपन में चपत रसीद की थी? तो उन्होंने जवाब में बताया, हां। और उनके पिता ने भी।। फिर जवाब मिला, हां। और उनके पिता ने भी? शिवपुरी साहब ने झल्लाकर पूछा, आख़िर तुम जानना क्या चाहते हो? तो जवाब में उनके साहबज़ादे ने कहा, “मैं जानना चाहता हूं कि आख़िर यह गुंडागर्दी शुरू कहां से हुई!” तो इसी तरह मैं भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए जो काम आजकल करता हूं, इसकी असल शुरुआत कहां से हुई, इसे जानने के लिए मैं सिनेमा के सबसे शुरुआती दौर की यात्रा पर निकल पड़ा…
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चंडीदत्त शुक्ल ♦ 1995 में रिलीज़ भई डीडीएलजे और ज़िंदगी जैसे बदल गयी! हम भी तब नवा-नवा इंटर कॉलेज छोड़िके डिग्री कॉलेज पहुंचे रहे। रैगिंग भी खत्म होइ गयी और लड़कियन के पहली बार अतनी नज़दीक से देखे के मिला। ये प्रॉब्लम भी सुलझि गयी थी कि मोहल्ले की लड़कियां बहिन होती हैं, उन्हें बुरी नज़र से नहीं देखा जा सकता। असल में बाहर से आने वाली लड़कियों के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं थी न! दूर-दूर से जो आती थीं लड़कियां, पहले तो हम उन्हें कॉलेज के बाद आंख उठाकर देखते भी नहीं। डीडीएलजे ने जो सबसे बड़ा कमाल किया, वो ये कि लड़कियां बस पकड़ने स्टैंड पे जातीं और हम उनके पीछे-पीछे जाते।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ कल तीन फिल्में रिलीज हो रही हैं। मुझे नहीं मालूम कि आप कौन-सी देखेंगे? मुझे तो तीनों देखनी है। अपना काम ही ऐसा है। फिल्में देखने के अपने फ़ायदे और नुक़सान हैं। कई बार अच्छा लगता है कि आप किसी फिल्म के बारे में पाठकों को बताते हैं कि वे उसे अवश्य देखें। कई बार मैं सावधान भी करता हूं। मेहनत से कमाया पैसा क्यों फालतू फिल्मों में गंवाया जाए। कुछ फिल्में अविवादित रूप से अच्छी होती हैं, तो कुछ निहायत ही घटिया होती हैं। अफ़सोस की बात है कि हम अधिकतर घटिया फिल्में ही बनाते हैं। साल में मुश्किल से दस फिल्में ऐसी आती हैं, जिन्हें देखने का आनंद आता है।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ सभी भारतवासियों और खास कर हिंदीभाषियों के लिए आज गौरव का दिन है। उनके इलाके से निकली एक प्रतिभा ने मनोरंजन जगत का दैदीप्यमान कर रखा है। इस उम्र में भी उनकी आभा कम नहीं हुई हैं। ताप ज़रूर कम हो गया है। कलाकार अमिताभ ने कई पीढ़ियों का मनोरंजन किया है। अपने हुनर से उन्होंने बाद की पीड़ी को प्रभावित भी किया है। उनमें दिलीप कुमार जैसी प्रतिभा नहीं है, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने असंभव लोकप्रियता हासिल की है। कहते हैं कि उन्होंने छल-प्रपंच भी किये हैं। मेंरे पास उनके प्रपंच के किस्से हैं, लेकिन आज उन्हें बयान करना उचित नहीं होगा। आज तो उनको बधाई।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ रानी के करिअर में गिरावट आदित्य चोपड़ा की नज़दीकी के बाद ही आयी। फिल्म जगत में जब भी किसी हीरोइन का प्रेम डायरेक्टर से होता है, वह कटती चली जाती है। इसके कई कारण हैं। एक तो अगर डायरेक्टर बड़ा हो तो हीरोइन को लगता है कि प्रेम करते ही वह भी उतनी पावरफुल हो गयी। वह किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती। लिहाजा दूसरे डायरेक्टर कन्नी काट लेने में ही भलाई समझते हैं। और तो और, आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी के दोस्त रहे करण जौहर तक ने उन्हें कोई फिल्म नहीं दी। कभी रानी से पूछ दो कि क्या आप यशराज की ही फिल्में करती रहेंगी, तो वह बिदक जाती हैं। उनके पास कोई जवाब ही नहीं रहता।


