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Articles tagged with: hindi cinema

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[9 Oct 2009 | 2 Comments | ]
क्‍या हैं रानी ?

अब्राहम हिंदीवाला ♦ रानी के करिअर में गिरावट आदित्‍य चोपड़ा की नज़दीकी के बाद ही आयी। फिल्‍म जगत में जब भी किसी हीरोइन का प्रेम डायरेक्‍टर से होता है, वह कटती चली जाती है। इसके कई कारण हैं। एक तो अगर डायरेक्‍टर बड़ा हो तो हीरोइन को लगता है कि प्रेम करते ही वह भी उतनी पावरफुल हो गयी। वह किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती। लिहाजा दूसरे डायरेक्‍टर कन्‍नी काट लेने में ही भलाई समझते हैं। और तो और, आदित्‍य चोपड़ा और रानी मुखर्जी के दोस्‍त रहे करण जौहर तक ने उन्‍हें कोई फिल्‍म नहीं दी। कभी रानी से पूछ दो कि क्‍या आप यशराज की ही फिल्‍में करती रहेंगी, तो वह बिदक जाती हैं। उनके पास कोई जवाब ही नहीं रहता।

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[7 Oct 2009 | No Comment | ]
चोरी के निर्देशक सुपर्ण वर्मा

अब्राहम हिंदीवाला ♦ सुपर्ण धर्मयुग में काम कर चुकीं सुदर्शना द्विवेदी के बेटे हैं। पत्रकारिता से उन्‍होंने शुरुआत की, लेकिन लक्ष्‍य फिल्‍मों में जाना रहा। ढेर सारे लोग पत्रकार बन कर पत्रकारिता की सीढ़ी लगा कर फिल्‍मों में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। ज़्यादातर गिर-पड़ जाते हैं। सुपर्ण सफल रहे। किसी ज़माने में उनकी मां सुदर्शना द्विवेदी भी फिल्‍मों के लिए लिखना चाहती थीं। उनकी अधूरी ख्‍वाहिश बेटे ने पूरी की। सुपर्ण को अवसर मिले। पहले लिखने के अवसर मिले और फिर निर्देशन का भी मौका मिला। उन्‍होंने एक हसीना एक खिलाड़ी का निर्देशन किया। वह वाहियात फिल्‍म थी। सुपर्ण की फिल्‍में चोरी की होती हैं। विदेशी फिल्‍मों से वे फ्रेम टू फ्रेम चुराते हैं। उनकी ताज़ा फिल्‍म के बारे में भी यही कहा जा रहा है।

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[27 Sep 2009 | 3 Comments | ]
व्‍हाट्स योर राशि नहीं चली, लेकिन आशुतोष चल रहे हैं

अब्राहम हिंदीवाला ♦ आशुतोष गोवारिकर सिर-पैर वाली फिल्‍में ही बनाते हैं। वे अपनी फिल्‍मों में कुछ नया और अर्थपूर्ण दिखाने की कोशिश करते हें। इस बार वे पिछली तीन फिल्‍मों की तरह सफल नहीं रहे। क्‍या किसी का असफल हो जाना घटिया काम है। आशुतोष की फिल्‍में सुरक्षित जोन में नहीं रहतीं। वे चाहते तो लगान की कामयाबी के बाद उसी फार्मूले पर फिल्‍में बनाते रहते। आशुतोष ने अपनी हर फिल्‍म में नयी कहानी चुनी और उस कहानी के मुताबिक शिल्‍प और संरचना में बदलाव किया। यहां उनके समकालीनों की तुलना करना उचित नहीं होगा। प्रसंगवश दूसरे फिल्‍मकारों की फिल्‍मों के बरक्‍स आशुतोष की फिल्‍में परखी जा सकती हैं। मुबई की समस्‍या यह है कि यहां सफलता का मतलब फिल्‍मों के चलने से जोड़ दिया जाता है।

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[23 Sep 2009 | 2 Comments | ]
हिंदी सिनेमा का देशकाल सेंस और आशुतोष गोवारिकर

अब्राहम हिंदीवाला ♦ आशुतोष ने हर बार देश के एक इलाके पर अपनी फिल्‍म केंद्रित की है। इस बार उन्‍होंने गुजरात की पृष्‍ठभूमि ली है। मैं यहां पहले इस फिल्‍म के बारे में संक्षिप्‍त जानकारी दे चुका हूं। आशुतोष ने गुजराती समाज की संस्‍कृति और उसकी भावनाओं को इस फिल्‍म में चित्रित किया है। इसके पहले जोधा अकबर में वे राजस्‍थान, स्‍वदेस में महाराष्‍ट्र और लगान में उत्तरप्रदेश को दिखा चुके हैं। उनकी अगली फिल्‍म में बंगाल की पृष्‍ठभूमि रहेगी। हिंदी फिल्‍मों में देशकाल गायब रहता है। इस संदर्भ में आशुतोष की यह कोशिश सराहनीय और उल्‍लेखनीय है।

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[15 Sep 2009 | One Comment | ]
टोरंटो में रानी मुखर्जी

अब्राहम हिंदीवाला ♦ पिछले कुछ सालों से भारतीय फिल्‍म मेकर टोरंटो फिल्‍म फेस्टिवल जाने लगे हैं। उनकी कोशिश रहती है कि उनकी फिल्‍में फेस्टिवल में प्रदर्शित हो जाएं। यहां मैं स्‍पष्‍ट कर दूं कि हिंदी की फिल्‍में फेस्टिवल का हिस्‍सा नहीं होतीं। उन्‍हें प्रदर्शन की जगह दे दी जाती है। भारतीय फिल्‍मकारों को लगता है कि टोरंटो फिल्‍म फेस्टिवल का हिस्‍सा बन जाने से उनकी फिल्‍म को इंटरनेशनल पहचान मिल जाती है। बाद में दर्शक जुटाने में टोरंटो का रेफरेंस काम आता है। यहां अपने देश में भी धौंस जम जाती है। हमारे मूर्ख फिल्‍मी पत्रकार टोरंटो गयी फिल्‍मों को ऐसा कवरेज देते हैं, मानो उस फिल्‍म ने हंगामा मचा दिया हो। सच्‍चाई यह होती है कि उनकी कदर सर्कस के अहाते में लगी पान की गुमटी से अधिक नहीं होती।

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[5 Sep 2009 | 4 Comments | ]
सच और सिनेमा की अंधेरी रोशनियों के बीच मोहनदास

मिहिर पंड्या ♦ उदय प्रकाश की मशहूर कहानी मोहनदास पर बनी फिल्‍म पर आख़‍िरकार सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गयी। मोहल्‍ले के पाठकों के लिए पेश है ओसियान के वक्‍त लिखी गयी इस फिल्‍म की समीक्षा। ओशियंस की वो स्क्रीनिंग दिल्ली में “मोहनदास” का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन थी। दिन था सत्रह जुलाई सन दो हज़ार आठ। मैंने इस प्रदर्शन के टिकट एक हफ़्ता पहले ही खरीद लिये थे और उस दिन हम दोस्तों के पूरे जमावड़े के साथ थियेटर में मौजूद थे। सिनेमा के तौर पर फ़िल्म कमज़ोर है, उसमें बहुत से झोल हैं लेकिन यह लेख सिर्फ़ फ़िल्म के बारे में नहीं है। यह हमारे समय के बारे में है।

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[3 Sep 2009 | One Comment | ]
61 साल के युवा निर्देशक रंजीत कपूर

अब्राहम हिंदीवाला ♦ रंजीत कपूर की फिल्‍म “चिंटू जी” 4 सितंबर को रिलीज हो रही है। इसमें ऋषि कपूर ने स्‍वयं की भूमिका निभायी है और खूब निभायी है। अपना ही मज़ाक और छीछालेदर करते ऋषि कपूर को देखते हुए बेहद हंसी आती है। सेलिब्रटी और आम नागरिक के मानस को अच्‍छी तरह से समझते हुए रंजीत कपूर ने मारक व्‍यंग्‍य किया है। ताज्‍जुब होता है कि ऋषि कपूर ऐसी भूमिका के लिए कैसे तैयार हो गये। हड़बहेड़ी और त्रिफला गांव की यह कहानी राजनीति, उद्योग और विकास की गलियों से गुजरती हुई एक क्‍लाइमेक्‍स पर पहुंचती है। कई परिचित नामों के रेफरेंस आते हैं और इन सभी के बीच अपने ऋषि कपूर भी हैं। इसमें राज कपूर की “मेरा नाम जोकर” की रूसी नायिका भी आयी हैं।

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[1 Sep 2009 | 2 Comments | ]
फिल्मों में बुलेट की सवारी और “आगे से राइट”

अब्राहम हिंदीवाला ♦ “आगे से राइट” में आपको बुलेट मोटर साइकिल दिखेगी। मोटर साइकिल के शौकीन बता सकते हैं कि बुलेट की सवारी का आनंद कैसा होता है? मेरे प्रिय सिनेमा साइट “पैशन फॉर सिनेमा” पर नलिन ने अच्छी-सी पोस्ट लिखी है… हिंदी सिनेमा और बुलेट। उन्होंने राजेश खन्ना के अंदाज़ का ज़िक्र किया है। हेमामालिनी को बुलेट पर बिठा कर “ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना” गाते हुए जब वे परदे पर आये थे तो अनगिनत दिलों को कुचल गये थे। शशि कपूर ने काला पत्थर में “एक रास्ता है ज़िन्दगी” इसी बुलेट पर गाया था। ज़ंजीर के विजय यानि अमिताभ बच्चन को कौन भूल सकता है? वे भी बुलेट पर सवार थे। अंधा कानून में रजनीकांत को भी आपने बुलेट पर देखा था।

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[24 Aug 2009 | No Comment | ]
देह का दम और अक्षय कुमार

अब्राहम हिंदीवाला ♦ अपनी पिछली फिल्मों की असफलता और दर्शकों की नापसंदगी से अक्षय कुमार ऐसे झेंपे हुए हैं कि चेहरा दिखाने से बच रहे हैं। उन्होंने दर्शकों को पीठ दिखायी है। चूंकि निर्देशक को उनकी पीठ और मांसपेशियां दिखानी थीं, इसलिए उनका नाम आरव रख दिया गया। आरव उनके बेटे का नाम है। उन्होंने बेटे का नाम अपनी पीठ पर गुदवा रखा है। कुछ और नाम रखा जाता, तो पहले से गोदे गये नाम को छिपाना पड़ता। उसमें समस्या यह थी कि दृश्य पानी में करना था, इसलिए गोदना छिपाने के लिए लगाया गया लेप बह जाता। मजबूरन लेखक को उनका नाम आरव करना पड़ा होगा। अब उसका तुक बिठाने के लिए उनके गर्दन पर ब्लू गोदा गया। मालूम नहीं इससे उनके किरदार और अभिनय में क्या बढ़ोत्तरी हुई होगी?

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[23 Aug 2009 | No Comment | ]
सिनेमा कहानी नहीं है, सिनेमा जादू है

वरुण ♦ सिनेमा को लेकर मेरी सबसे सीधी समझ यही है कि सिनेमा जादू है। एक जादूगर सिर्फ हाथ से सिक्का निकाल कर भी हमें मुग्ध कर सकता है, अगर उसने जादू टूटने नहीं दिया तो, और वहीं दूसरा जादूगर हाथी ग़ायब कर के भी कभी-कभी वो सम्मोहन नहीं ला पाता कि हम उस पर भरोसा कर लें – बिना सोचे ही ताली बजाने लग जाएं। (रजत कपूर का सिनेमा हमेशा छोटा जादू दिखाता है, पर शानदार दिखाता है। यश चोपड़ा का सिनेमा हर बार हाथी ग़ायब करने की फिराक में रहता है, पर हर बार हम पहले ही जादू पकड़ लेते हैं – जादूगर के बगल में खड़ी लड़की इतनी नकली लगती है कि हमें पहले ही पता चल जाता है कि हमें उल्लू बनाया जा रहा है।