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Articles tagged with: Hindi Literature

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[19 Aug 2010 | 11 Comments | ]

डेस्‍क ♦ मृणाल जी की एक टिप्‍पणी आज के द हिंदू में छपी है। विभूति की माफी के साथ इस प्रसंग को समाप्‍त मान लेने वालों के लिए यह भी सूचना है कि मेनस्‍ट्रीम मीडिया में इस पर टिप्‍पणियां आनी समाप्‍त नहीं हुई हैं। कल मृणाल जी ने ही दैनिक भास्‍कर में इस मसले पर कलम चलायी थी और आज द हिंदू के ओपेड पेज पर उन्‍होंने प्रतिक्रिया जाहिर की है। कई बार व्‍यवस्‍था जिस प्रसंग को अपनी परिधि में मैनेज कर लेती है, वह प्रसंग तब भी धधकता हुआ एक बड़ी नागरिकता के आंगन में घूमता रहता है। विभूति नारायण का प्रसंग कुछ ऐसा ही है।

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[13 Aug 2010 | 6 Comments | ]
“कवन ठगवा नगरिया लूटल हो…”

कलियुगी वेदव्यास ♦ अब क्या कहूं महाराज, इसकी पीठिका तो आप खुद ही बनाकर गये थे। आपकी ही देख-रेख में पीठ के प्रकाशन में आपके परम मित्र वर्धा नरेश ने स्त्री सेना के विरुद्ध एक अनर्गल टिप्पणी कर दी और आप तो जानते ही हैं महाराज इस कलिकाल में स्त्री-सेना से घातक कोई सेना नहीं है। उस पर हमला तो छोड़‍िए, हल्का सा कटाक्ष भी यमराज को आमंत्रण देने सरीखा है। बस, फिर क्या था, युद्ध की स्थितियां बदल गयीं। अब यह युद्ध मात्र कुरुवंश का युद्ध नहीं रहा, संपूर्ण आर्यावर्त का युद्ध हो गया। तमाम देशों के विद्वान धनुर्धर आपके और वर्धा नरेश के विरुद्ध लक्ष्यभेदी बाण चलाने लगे। कवि-महर्षि दुर्वासा ने भी अपना धनुष उठा लिया और चिर-परिचित अंदाज में लगे चहुंओर विध्वंस करने।

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[28 Jul 2010 | 3 Comments | ]
कृपाचार्य का दुख और जॉक देरिदा का मंत्रजाप

कलियुगी वेदव्यास ♦ कृपाचार्य: जिसका घर में सम्मान नहीं, उसका बाहर भी सम्मान नहीं हो सकता, वत्स। यह सब अमेरिकी पूंजीवादी षडयंत्र है और दक्षिणपंथी दुष्प्रचार। देखा नहीं, कैसे वह कुलद्रोही क्रूर, दक्षिणपंथी, माफिया साधु के हाथों पुरस्कार ले आया और तमाम भर्त्‍सना के बावजूद अपने इस कृत्य पर इतराता रहा। जो गुरुद्रोही होता है, उसका यही हश्र होता है पुत्र। उसे पागल कुत्ते की तरह घेरकर मारा जाता है। वह नरक का भागी होता है। याद रखो कि गुरु ही पिता है, गुरु ही माता है, गुरु ही भ्राता है, गुरु ही प्रेमी है और गुरु ही पति भी। ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा है। जॉक देरिदा, जॉक देरिदा, जॉक देरिदा। शिष्य: यह कौन सा मंत्र है गुरुदेव, जिसका आप लगातार सोते-जागते जाप करते रहते हैं?

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[12 Jul 2010 | 16 Comments | ]
धृतराष्ट्र-भीष्म पितामह संवाद : साहित्यिक प्रहसन

भीष्‍म पितामह ♦ हस्तिनापुर विद्यापीठ की सत्ता अब मथुरा के एक पंडे के हाथ में आ गयी है। उसने मेरे ही जमाता को आचार्य पद पर प्रतिस्थापित नहीं होने दिया। एक समय मैं खुद पदवियां बांटा करता था। अब असहाय हूं। अब गोष्ठियों की अध्यक्षता करने के सिवा मेरे पास कोई काम नहीं बचा है। कुरुवंश के साहित्य का मैं शो-पीस बनकर रह गया हूं। पुरानी तथाकथित प्रतिबद्धता और प्रतिष्ठा के कारण खाये-अघाये क्रांतिकारी और अफसर अब भी मेरे पास आते हैं, मदिरा सेवन कराते हैं और अपने ऊपर प्रायोजित गोष्ठियों की अध्यक्षता कराते हैं। अब तुम तो जानते हो पुत्र कि इस आयु में मदिरा सेवन के पश्चात मैं भावुक हो जाता हूं और इन खाये-अघाये क्रांतिकारी अफसरों को देखकर मुझे निराला और मुक्तिबोध याद आने लगते हैं।

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[10 Jul 2010 | 24 Comments | ]
धृतराष्ट्र-संजय संवाद : एक साहित्यिक प्रहसन

कलियुगी वेदव्यास ♦ धृतराष्ट्र : आखिर कुमार ऐसा क्यों कर रहे हैं? इस पूरे आर्यावर्त में उन जैसा वीर पुरुष तो मेरी दृष्टि में कोई दूसरा है नहीं। संजय : आपकी दृष्टि? खैर छोड़‍िए… आप तो जानते हैं कि बंग प्रदेश उनकी मातृभूमि है और फिर वे इन दिनों सनातन बाबू का दांपत्य छोड़ एक सुकुमारी कवयित्री के प्रेम में पड़ गये हैं और रास-रंग में लीन हैं। धृतराष्ट्र : ओह, उन्हें फौरन फोन लगाओ और कहो कि युद्धकाल में रास-रंग शास्त्रोचित नहीं है। संजय : उनका फोन स्विच ऑफ आ रहा है महाराज। लगता है कि वे रंगशाला में हैं। धृतराष्ट्र : ऐसे में कौरव सेना का नेतृत्व कौन कर रहा है वत्स? संजय : युद्ध का नेतृत्व कुमार दुर्योधन के प्रिय ‘अंग देश’ के मित्र नरेश सूतपुत्र कर्ण कर रहे हैं महाराज।

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[28 Oct 2009 | 6 Comments | ]
घोषणापत्र : मैं बुद्धिजीवी हूं, आप मेरे अनुयायी बनें

शशिभूषण ♦ मुझे एमए किये सात साल, शोध करते तीन साल और छोटी-मोटी नौकरी करते आठ साल हो गये। मैंने सब तरह के विचारों को ज़रूरत भर का समझ लिया। काम भर को मेरे संबंध बन गये। पहले मेरे संपादकीय पतों पर भेजे पत्र छपे, फिर रचनाएं भी छप चुकीं। इधर मैंने कंप्यूटर पर हिंदी टाइप करना भी सीख लिया। एसएमएस करना मुझे पहले ही आ गया था। अब मुझे किसी से कुछ पूछने में शरम आती है। पैर छूने के नाम पर तो मैं एकदम लाल हो जाता हूं। इन सब बातों को बताने का मक़सद यह है कि मैं खुद को बुद्धिजीवी घोषित करना चाहता हूं। ऐसा मैं इसी वक्त करना चाहता हूं ताकि मेरी किसी बड़े अखबार, पीठ, परिषद, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में से कहीं नियुक्ति की दावेदारी अकाट्य हो सके।

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[24 Oct 2009 | 32 Comments | ]
विजयशंकर चतुर्वेदी द्वारा लेखक संघ का बहिष्कार

♦ विजयशंकर चतुर्वेदी ♦ महाराष्ट्र जलेस ने बहिष्कार की घोषणा करके मुझ पर अहसान ही किया है। 10 वर्षो से मुझे आइसोलेशन में धकेलने के बावजूद मैं इस मुगालते में था कि ये मेरे शुभचिंतक लोग हैं। मैं अब भी इस मुगालते में रहना चाहता हूँ कि कुछ लोग अब भी वहां मेरे शुभचिंतक होंगे। आखिरकार मेरे दाम्पत्य जीवन तथा लेखन के शैशव काल से मेरा इनसे जुड़ाव रहा है। यहाँ मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं मूलतः गाँव का आदमी हूँ और मुझसे सामान्य व्यवहार तथा शिष्टाचार में कुछ गलतियां अवश्य हुई होंगी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं हत्यारा या साम्प्रदायिक हो गया। लेकिन अब जबकि इन लोगों से कोई वास्ता ही नहीं रहा तो मैं भुजा उठाकर स्वयं महाराष्ट्र जनवादी लेखक संघ का बहिष्कार करने की घोषणा करता हूँ।

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[21 Oct 2009 | 15 Comments | ]
एक दलील कवि के पक्ष में, जलेस पर सवाल

प्रणव प्रियदर्शी ♦ जलेस की महाराष्‍ट्र ईकाई का पत्र देखा। बतौर कवि विजय शंकर चतुर्वेदी के आकलन के लिए वह स्वतंत्र हैं, व्यक्ति के तौर पर भी विजय के अपने व्यक्तित्व और स्वभाव के आधार पर उनके प्रति अपना रवैया तय करने का अधिकार अन्य सभी व्यक्तियों की तरह जलेस के साथियों को भी है। लेकिन जलेस की भूमिका पर की गयी एक टिप्पणी के जवाब मे करीब दस साल पुरानी व्यक्तिगत जीवन की एक दुखद घटना को आधार बना कर उन पर हमला बोलना और उसमें भी तथ्यात्मक रूप से ग़लत आरोप लगाना कम से कम जलेस जैसे संगठन को शोभा नहीं देता।

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[20 Oct 2009 | 2 Comments | ]
घर में जल्लादी और गोष्ठियों में कवि होने की मुनादी

अरविंद शेष ♦ ऐसे तमाम तथाकथित लेखक मिल जाएंगे जो कथित तौर पर कविताएं लिखते हैं और कविता के मंचों पर क्रांतिकारी होने का तमगा लटकाये नाचते फिरते हैं – लेकिन घर में अपनी पत्नी और बच्चों को जूते की नोंक बराबर नहीं समझते। कविताई करने की महानता ओढ़ लेने के बाद शादी करते हैं और मौका मिलते ही कुत्तों की तरह दूसरी स्त्रियों के पीछे दुम हिलाने लगते हैं। फिर शुरू होता है पहले पत्नी को यह समझाने का दौर कि लेखक तो चार-चार स्त्रियों से संबंध रखते ही हैं, यही उनकी उपलब्धि है। और यह नहीं समझ पाने के बाद पत्नी पर मानसिक-शारीरिक अत्याचार। घर में जल्लादी और गोष्ठियों-बैठकों में कवि-लेखक और मानव-गुणी होने की मुनादी। पाखंडी क्रांतिकारिता और प्रतिबद्धता-निष्ठा का गौरवगान।

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[18 Oct 2009 | 7 Comments | ]
विजयशंकर चतुर्वेदी के ख़‍िलाफ़ बहिष्‍कार पत्र

जनवादी लेखक संघ ♦ हिंदी पाठकों को यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि इस तथाकथित महाकवि ने घर में ऐसी परिस्थिति पैदा की, जिससे तंग आकर पत्‍नी ने आत्‍महत्‍या जैसा क़दम उठाया। पत्‍नी की मृत्‍यु का कोई भी खेद उसे नहीं है। विजय शंकर चतुर्वेदी के सामने उसकी शालीन समर्पिता पत्‍नी ने शरीर पर घासलेट छिड़क कर आग लगा ली। और बकौल खुद विजय शंकर चतुर्वेदी, उसमें इतनी भी ताव न थी कि वह उठ कर उसे रोक पाता। वह जलती रही, उसकी अबोध बच्‍ची वहीं रोती रही और विजयशंकर उसे बचाने के लिए हाथ तक न उठा सका। क्‍योंकि रात के दो-तीन बजे विजयशंकर शराब के नशे में धुत होकर घर आया था।