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Articles tagged with: Hindi Literature

शब्‍द संगत »

[29 Mar 2011 | No Comment | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ कार्यक्रम में जामभर सिंह, कामेंद्र यादव, सढ़ीस कचौरी, मैलेंद्र राघव सबने एक सुर में बिजली रानी की कहानी पर बोलते हुए कहा कि निर्मल वर्मा की परिंदे के बाद बिजली रानी की दरिंदे हिंदी कथा साहित्य में मील का पत्थर है। क्या शिल्प, क्या सौष्ठव, क्या भाषा, क्या लालित्य। कहानी नहीं, पूरा भांग का पकौड़ा है। चूंकि माहौल होली का था इसलिए राग तरकारी वाले बाबा श्रीढाल जी भी देवर बन गये थे और बिजली रानी के साथ तरकारी काट रहे थे। उधर सारा दिन स्त्री विमर्श कर-करके थके-हारे लेखकों का समूह संध्या आचमन के समय बिजली रानी जी के देह विमर्श के सानिध्य को लालायित था।

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[28 Mar 2011 | 3 Comments | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ अपने इस अपमान की खीझ उन्होंने कुछ दिन बाद कुरुवंश के कुछ उत्साही युवा कवियों पर निकाली, जो इन दिनों कविता-कामिनी की दुर्बल काया से व्यथित हैं और ग्वालियर में ‘कविता समय’ नाम से एक आयोजन कर रहे हैं। संयोग से आयोजन के तीनों संयोजक ब्राह्मण निकले और बस, उद्दंड जी को अपनी उद्दंडता का मौका मिल गया। आयोजकों ने जब पूरी विनम्रता के साथ उद्दंड जी को इस आयोजन में शामिल होने का न्योता भेजा, तो उद्दंडजी बिफर गये। उन्होंने आयोजन का बहिष्कार तो किया ही, साथ ही फेसबुक पर लिख दिया कि यह कविता का नहीं बल्कि जातिवादियों, ब्राह्मणवादियों, सांप्रदायिक और फासिस्ट लोगों का जमघट है।

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[24 Mar 2011 | 2 Comments | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ समय पतनशील है और पितामह भीष्म मौनव्रत में जा चुके हैं। ऐसे में साहित्य की उच्च पुरातन कुल परंपराओं को सहेजना-संभालना बहुत दुष्कर प्रतीत होता है। महाराज धृतराष्ट्र ने युवाओं की जो वानर सेना बनायी है, वह बहुत दुघर्ष है और किसी परंपरा को नहीं मानती। उसके लिए यश-अपयश बराबर हैं और येन-केन-प्रकारेण पुरस्कार प्राप्ति ही सर्वोच्च लक्ष्य। उसके लिए हर प्रकार की नैतिकता मूर्खता है। इन दिनों घरेलू पुरस्कार योजनाओं का दौर भी शुरू हो चुका है। उसकी एकमात्र शर्त है कि आप ‘घरेलू’ हों। इधर कुमार दुर्योधन को सारे घरेलू पुरस्कार मिल चुके हैं और अयोध्या बाबू इब्रबतूता बन गये हैं।

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[23 Mar 2011 | No Comment | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ बिना रजिस्ट्रेशन के भी तद्-अभाव को सरकारी विज्ञापनों की कभी कमी नहीं हुई। वे वरिष्ठों के जितने प्रिय हैं, उतने ही युवाओं के भी। अफसरों के जितने प्रिय हैं, उतने ही बेरोजगारों के भी। अफसरों का तो ऐसा है कि उन्होंने इन अफसरों की सहस्र अक्षौहिणी सेना ही बना डाली और उसी के दम पर मध्य प्रदेश के जाबाल नरेश की चहल-पहल बंद करा दी। अब वे अकेले खड़े घंटा बजा रहे हैं। अफसरों की इसी सेना में पितामह भीष्म को भी गाहे-बगाहे कभी कोई निराला, तो कभी कोई मुक्तिबोध मिल जाता है। तो हे गजानन, इस तरह म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से यह सारा कारोबार चल रहा है और तद्-अभाव का विजय रथ चहुंओर अपनी विजय पताका फहरा रहा है।

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[22 Mar 2011 | 5 Comments | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ धृतराष्ट्र : हां वत्स संजय, ये सेनापति है कुल मिलाकर बेकार आदमी। हमारा एक काम फंसा था सरकार में, नहीं करवाया। अब हम भी अपनी पीठ में उसे ज्यादा भाव नहीं देते। लगा रहता है यदुकुल शिरोमणि शुक्राचार्य और भीष्म पितामह के पीछे-पीछे। ये दोनों इसके कथाभ्रम के वार्षिक स्थायी अध्यक्ष और मुख्य अतिथि हो गये हैं। सत्ता में था तो सुरा-सुंदरी और हवाई यात्रा आदि-आदि अनेक तरह के लाभ दिलाता रहता था, अब तो वे भी इसे ठेंगा दिखाने वाले हैं। तुम देख लेना। अब कोई इसके कथाभ्रम में भ्रमित होने वाला नहीं है।

शब्‍द संगत »

[20 Oct 2010 | No Comment | ]

डेस्‍क ♦ प्रथम सीता स्मृति सम्मान जाने-माने हिंदी कवि दिनेश कुमार शुक्ल को मिला है। उन्हें यह सम्मान कविता संग्रह “ललमुनिया की दुनिया” के लिए मिला है। डॉ सीता श्रीवास्तव मशहूर शिक्षाविद और राजनीतिशास्त्र की विद्वान थीं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय की मैत्रेयी कॉलेज की 15 वर्ष से ज्यादा समय तक प्रधानाचार्य रहीं। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह और कथाकार ममता कालिया के प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल ने 2009-10 के सीता स्मृति पुरस्कार विजेता का चयन करने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया अपनायी। कई दौर की परिचर्चा और व्यापक कसौटियों पर प्रविष्टियों के सतर्क मूल्यांकन, परीक्षण तथा छंटनी के बाद प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल ने दिनेश कुमार शुक्ल को प्रथम सीता स्मृति सम्मान के लिए चुना है।

मीडिया मंडी, विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[19 Aug 2010 | 43 Comments | ]

डेस्‍क ♦ मृणाल जी की एक टिप्‍पणी आज के द हिंदू में छपी है। विभूति की माफी के साथ इस प्रसंग को समाप्‍त मान लेने वालों के लिए यह भी सूचना है कि मेनस्‍ट्रीम मीडिया में इस पर टिप्‍पणियां आनी समाप्‍त नहीं हुई हैं। कल मृणाल जी ने ही दैनिक भास्‍कर में इस मसले पर कलम चलायी थी और आज द हिंदू के ओपेड पेज पर उन्‍होंने प्रतिक्रिया जाहिर की है। कई बार व्‍यवस्‍था जिस प्रसंग को अपनी परिधि में मैनेज कर लेती है, वह प्रसंग तब भी धधकता हुआ एक बड़ी नागरिकता के आंगन में घूमता रहता है। विभूति नारायण का प्रसंग कुछ ऐसा ही है।

मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[13 Aug 2010 | 6 Comments | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ अब क्या कहूं महाराज, इसकी पीठिका तो आप खुद ही बनाकर गये थे। आपकी ही देख-रेख में पीठ के प्रकाशन में आपके परम मित्र वर्धा नरेश ने स्त्री सेना के विरुद्ध एक अनर्गल टिप्पणी कर दी और आप तो जानते ही हैं महाराज इस कलिकाल में स्त्री-सेना से घातक कोई सेना नहीं है। उस पर हमला तो छोड़‍िए, हल्का सा कटाक्ष भी यमराज को आमंत्रण देने सरीखा है। बस, फिर क्या था, युद्ध की स्थितियां बदल गयीं। अब यह युद्ध मात्र कुरुवंश का युद्ध नहीं रहा, संपूर्ण आर्यावर्त का युद्ध हो गया। तमाम देशों के विद्वान धनुर्धर आपके और वर्धा नरेश के विरुद्ध लक्ष्यभेदी बाण चलाने लगे। कवि-महर्षि दुर्वासा ने भी अपना धनुष उठा लिया और चिर-परिचित अंदाज में लगे चहुंओर विध्वंस करने।

मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[28 Jul 2010 | 3 Comments | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ कृपाचार्य: जिसका घर में सम्मान नहीं, उसका बाहर भी सम्मान नहीं हो सकता, वत्स। यह सब अमेरिकी पूंजीवादी षडयंत्र है और दक्षिणपंथी दुष्प्रचार। देखा नहीं, कैसे वह कुलद्रोही क्रूर, दक्षिणपंथी, माफिया साधु के हाथों पुरस्कार ले आया और तमाम भर्त्‍सना के बावजूद अपने इस कृत्य पर इतराता रहा। जो गुरुद्रोही होता है, उसका यही हश्र होता है पुत्र। उसे पागल कुत्ते की तरह घेरकर मारा जाता है। वह नरक का भागी होता है। याद रखो कि गुरु ही पिता है, गुरु ही माता है, गुरु ही भ्राता है, गुरु ही प्रेमी है और गुरु ही पति भी। ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा है। जॉक देरिदा, जॉक देरिदा, जॉक देरिदा। शिष्य: यह कौन सा मंत्र है गुरुदेव, जिसका आप लगातार सोते-जागते जाप करते रहते हैं?

मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[12 Jul 2010 | 16 Comments | ]

भीष्‍म पितामह ♦ हस्तिनापुर विद्यापीठ की सत्ता अब मथुरा के एक पंडे के हाथ में आ गयी है। उसने मेरे ही जमाता को आचार्य पद पर प्रतिस्थापित नहीं होने दिया। एक समय मैं खुद पदवियां बांटा करता था। अब असहाय हूं। अब गोष्ठियों की अध्यक्षता करने के सिवा मेरे पास कोई काम नहीं बचा है। कुरुवंश के साहित्य का मैं शो-पीस बनकर रह गया हूं। पुरानी तथाकथित प्रतिबद्धता और प्रतिष्ठा के कारण खाये-अघाये क्रांतिकारी और अफसर अब भी मेरे पास आते हैं, मदिरा सेवन कराते हैं और अपने ऊपर प्रायोजित गोष्ठियों की अध्यक्षता कराते हैं। अब तुम तो जानते हो पुत्र कि इस आयु में मदिरा सेवन के पश्चात मैं भावुक हो जाता हूं और इन खाये-अघाये क्रांतिकारी अफसरों को देखकर मुझे निराला और मुक्तिबोध याद आने लगते हैं।