Articles tagged with: Hindi Literature
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, शब्द संगत »
शशिभूषण ♦ मुझे एमए किये सात साल, शोध करते तीन साल और छोटी-मोटी नौकरी करते आठ साल हो गये। मैंने सब तरह के विचारों को ज़रूरत भर का समझ लिया। काम भर को मेरे संबंध बन गये। पहले मेरे संपादकीय पतों पर भेजे पत्र छपे, फिर रचनाएं भी छप चुकीं। इधर मैंने कंप्यूटर पर हिंदी टाइप करना भी सीख लिया। एसएमएस करना मुझे पहले ही आ गया था। अब मुझे किसी से कुछ पूछने में शरम आती है। पैर छूने के नाम पर तो मैं एकदम लाल हो जाता हूं। इन सब बातों को बताने का मक़सद यह है कि मैं खुद को बुद्धिजीवी घोषित करना चाहता हूं। ऐसा मैं इसी वक्त करना चाहता हूं ताकि मेरी किसी बड़े अखबार, पीठ, परिषद, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में से कहीं नियुक्ति की दावेदारी अकाट्य हो सके।
ख़बर भी नज़र भी, मोहल्ला मुंबई, शब्द संगत »
♦ विजयशंकर चतुर्वेदी ♦ महाराष्ट्र जलेस ने बहिष्कार की घोषणा करके मुझ पर अहसान ही किया है। 10 वर्षो से मुझे आइसोलेशन में धकेलने के बावजूद मैं इस मुगालते में था कि ये मेरे शुभचिंतक लोग हैं। मैं अब भी इस मुगालते में रहना चाहता हूँ कि कुछ लोग अब भी वहां मेरे शुभचिंतक होंगे। आखिरकार मेरे दाम्पत्य जीवन तथा लेखन के शैशव काल से मेरा इनसे जुड़ाव रहा है। यहाँ मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं मूलतः गाँव का आदमी हूँ और मुझसे सामान्य व्यवहार तथा शिष्टाचार में कुछ गलतियां अवश्य हुई होंगी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं हत्यारा या साम्प्रदायिक हो गया। लेकिन अब जबकि इन लोगों से कोई वास्ता ही नहीं रहा तो मैं भुजा उठाकर स्वयं महाराष्ट्र जनवादी लेखक संघ का बहिष्कार करने की घोषणा करता हूँ।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्ला मुंबई, शब्द संगत »
प्रणव प्रियदर्शी ♦ जलेस की महाराष्ट्र ईकाई का पत्र देखा। बतौर कवि विजय शंकर चतुर्वेदी के आकलन के लिए वह स्वतंत्र हैं, व्यक्ति के तौर पर भी विजय के अपने व्यक्तित्व और स्वभाव के आधार पर उनके प्रति अपना रवैया तय करने का अधिकार अन्य सभी व्यक्तियों की तरह जलेस के साथियों को भी है। लेकिन जलेस की भूमिका पर की गयी एक टिप्पणी के जवाब मे करीब दस साल पुरानी व्यक्तिगत जीवन की एक दुखद घटना को आधार बना कर उन पर हमला बोलना और उसमें भी तथ्यात्मक रूप से ग़लत आरोप लगाना कम से कम जलेस जैसे संगठन को शोभा नहीं देता।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
अरविंद शेष ♦ ऐसे तमाम तथाकथित लेखक मिल जाएंगे जो कथित तौर पर कविताएं लिखते हैं और कविता के मंचों पर क्रांतिकारी होने का तमगा लटकाये नाचते फिरते हैं – लेकिन घर में अपनी पत्नी और बच्चों को जूते की नोंक बराबर नहीं समझते। कविताई करने की महानता ओढ़ लेने के बाद शादी करते हैं और मौका मिलते ही कुत्तों की तरह दूसरी स्त्रियों के पीछे दुम हिलाने लगते हैं। फिर शुरू होता है पहले पत्नी को यह समझाने का दौर कि लेखक तो चार-चार स्त्रियों से संबंध रखते ही हैं, यही उनकी उपलब्धि है। और यह नहीं समझ पाने के बाद पत्नी पर मानसिक-शारीरिक अत्याचार। घर में जल्लादी और गोष्ठियों-बैठकों में कवि-लेखक और मानव-गुणी होने की मुनादी। पाखंडी क्रांतिकारिता और प्रतिबद्धता-निष्ठा का गौरवगान।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला मुंबई, शब्द संगत »
जनवादी लेखक संघ ♦ हिंदी पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस तथाकथित महाकवि ने घर में ऐसी परिस्थिति पैदा की, जिससे तंग आकर पत्नी ने आत्महत्या जैसा क़दम उठाया। पत्नी की मृत्यु का कोई भी खेद उसे नहीं है। विजय शंकर चतुर्वेदी के सामने उसकी शालीन समर्पिता पत्नी ने शरीर पर घासलेट छिड़क कर आग लगा ली। और बकौल खुद विजय शंकर चतुर्वेदी, उसमें इतनी भी ताव न थी कि वह उठ कर उसे रोक पाता। वह जलती रही, उसकी अबोध बच्ची वहीं रोती रही और विजयशंकर उसे बचाने के लिए हाथ तक न उठा सका। क्योंकि रात के दो-तीन बजे विजयशंकर शराब के नशे में धुत होकर घर आया था।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
विवेक गुप्ता ♦ साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को लेकर इन दिनों काफी चर्चाएं हो रही हैं। हाल ही में कवि बद्रीनारायण का कथादेश में एक आलेख भी प्रकाशित हुआ है। और समयांतर भी लगातार इस संबंध में सामग्री प्रकाशित कर रहा है। लेखकों की समझौतावादी प्रवृत्ति और लगातार हो रहे पतन को लेकर समयांतर ने बहुत मजबूत स्टैंड लिया है, जिससे अन्य लोग हमेशा बचने, कतराने की कोशिश में ही नजर आते हैं। कई मुद्दे काफी विचारणीय हैं, जिन पर बहस और विचार विमर्श होना चाहिए। यह होना हमारे समय के लिए बेहद जरूरी है। अब इससे बचा नहीं जा सकता।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
एक प्रबुद्ध पाठक ♦ परिचय के बहाने बहुतेरे लेखकों की छवि भंजना और कुछ चाटुकार लेखकों के छवि निर्माण का जो फूहड़ और अश्लील खेल नया ज्ञानोदय के युवा कहानी विशेषांक में रवींद्र कालिया ने रचा था उससे सब वाकिफ हैं। तब इस प्रकरण की हुई तीव्र आलोचना और शायद मालिकों के हस्तक्षेप के कारण नया ज्ञानोदय में लेखकों का परिचय छपना बंद हो गया था। लेकिन नया ज्ञानोदय के अक्टूबर 2009 अंक में रचनाकारों के परिचय के बहाने रवींद्र कालिया ने वही खेल एक बार फिर खेला है, बस शब्दावली बदल गयी है। इस पाठक ने जब इस अंक में छपे लेखकों के परिचय पर गौर किया, तो पाया कि इस अंक में प्रकाशित सारे युवा लेखकों की कोई न कोई किताब भारतीय ज्ञानपीठ से छप चुकी है या उसकी एकमात्र उपलब्धि यह है कि उसकी पहली कहानी भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका में ही छ्प रही है।
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्ला भोपाल, शब्द संगत »
डेस्क ♦ वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी इंडिया के न्यूज़ एडिटर प्रियदर्शन को उनके कथा संग्रह ‘उसके हिस्से का जादू’ के लिए 2009 का स्पंदन कथा पुरस्कार मिला है। यह कहानी संग्रह राधाकृष्ण प्रकाशन से कुछ सालों पहले प्रकाशित हुआ है। प्रियदर्शन अपने व्यस्त पत्रकारीय जीवन में भी अपनी रचनात्मकता को लेकर बेहद सजग रहे हैं। उनकी कहानियां हंस से लेकर इंडिया टुडे तक में प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रियदर्शन झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं। उन्होंने काफी संघर्ष के बाद साहित्य और पत्रकारिता में अपनी एक ख़ास जगह बनायी है। जनसत्ता में कई सालों तक काम कर चुके प्रियदर्शन एनडीटीवी इंडिया की लांचिग के समय ही दिबांग की टीम के हिस्सा बने।
ख़बर भी नज़र भी, बात मुलाक़ात, शब्द संगत »
सत्यनारायण पटेल ♦ मैं आपको अपना साक्षात्कार भेज रहा हूं। मेरे से यह साक्षात्कार हंस मासिक पत्रिका द्वारा लिया गया था। कुछ इस तरह कि उन्होंने प्रश्नों की एक सूची भेजी थी और साथ में एक पत्र, जिसमें उन्होंने शीघ्रता से जवाब लिख भेजने की मांग की थी। सवालों के जवाब मैंने हंस को भेजे। संपादक महोदय को एक पत्र लिखा, जिसमें वर्तनी की त्रुटियां को ठीक करने के अलावा अनुरोध किया था कि संपादक की क़लम से कहीं इसकी आत्मा को मत छील देना। अब जब यह हंस (अक्टूबर 09) में छपा, तो मुझे लगा कि संपादक महोदय ने मेरे अनुरोध की लाज नहीं रखी। अब मैं उसे आपको भेज रहा हूं। अनुरोध है कि आप अपनी संपादक की कैंची को दूर रख इस साक्षात्कार को पढ़ें और प्रकाशित करें।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, शब्द संगत »
अभय ♦ विमल जैसी लेखिका का संस्मरण पुराण देख कर धक्का लगा। पुराण इसलिए कहा कि पुराण शैली में ही लेखिका ने अपनी राम कहानी कही है। इस सेमिनार में संस्मरण का भी सेशन भी रखा गया है, यह जानकर अच्छा लगा। लेखिका ने अपनी निजी खुन्नस को सिद्धांत का जामा पहनाना चाहा है। जो हर लिहाज से भर्त्सना योग्य है। कहते हैं कि हिंदी वाले निजी खुन्नस को जनम-जन्मांतर तक निभाते हैं। विमल थोराट ने इसे सही साबित कर दिया है। विमल थोराट को इतना तो समझना चाहिए कि संस्मरणों के आधार पर कुछ भी साबित किया जा सकता है। विमल थोराट से जुड़े संस्मरण सुनाने वाले भी ढेरों मिल जाएंगे।


