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विहंग सालगट को भोपाल सिटी भास्‍कर की ज़‍िम्‍मेदारी 0

विहंग सालगट को भोपाल सिटी भास्‍कर की ज़‍िम्‍मेदारी

डेस्‍क ♦ दैनिक भास्‍कर भोपाल के क्राइम रिपोर्टर विहंग सालगट को नयी ज़‍िम्‍मेदारी सौंपी गयी है। वे अब सिटी भास्‍कर के भोपाल प्रभारी होंगे। विहंग सालगट भास्‍कर के टेबलॉयड अख़बार डीबी स्‍टार की युवा टीम के सदस्‍य रहे हैं और उन्‍होंने कई सारी एक्‍सक्‍लूसिव स्‍टोरी ब्रेक की है। नई दुनिया से प‍त्रकारिता की शुरुआत करने वाले विहंग अभी अंडर थर्टी जर्नलिस्‍ट हैं। कम समय में उन्‍होंने अपनी जगह बनायी है। उधर रवींद्र कैलासिया को सिटी चीफ बनाया गया है। वे भोपाल की स्‍थानीय रिपोर्टिंग टीम को लीड करेंगे। डीबी स्‍टार की शुरुआती टीम में रवींद्र कैलासिया भी रहे हैं।

आहत-धर्म मन की खीस, संदर्भ : कागद कारे 1

आहत-धर्म मन की खीस, संदर्भ : कागद कारे

मुसाफिर बैठा ♦ जोशी साहब, आपने अपने इस व्यथा लेख में हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत कम नहीं गाया है। हालांकि यह अन्यथा नहीं है, बल्कि चोर की दाढ़ी में तिनका उग आने का निदर्शन है। अपनी नायाब सोच में अंटा कर आपने दलित-पिछड़ों-वाम आंदोलनों आदि से मीडिया के सरोकारहीन हो जाने को बाजारवाद और ब्राह्मणी पूंजीवाद के साथ साथ दलित-पिछड़ों की स्वार्थपरक राजनीति से मिसफिट कर दिया है। क्या प्रकारांतर से आप यह कहना चाहते हैं कि सवर्ण और दक्षिणपंथी आंदोलन आदि से मीडिया के सरोकार इसलिए हैं कि उनके राजनीतिक प्रतिनिधि, सवर्ण और दक्षिणपंथी, इन आंदोलनों का सिंचन करते रहे हैं तथापि ये धन व सत्तालोलुप नहीं हैं! इनकी ये कथित सफलताएं ही मीडिया के उपजीव्य हैं, न कि दलित-पिछड़ा-वाम राजनीति का क्षरण!

साइबर स्‍पेस में घायल प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव 1

साइबर स्‍पेस में घायल प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ नेट लेखन में नि‍ज-संदर्भ, विडंबना, प्रामाणि‍कता और पुनरावृत्ति पर सबसे ज्‍यादा लि‍खा जाता है। यह उत्तर आधुनि‍क खेल यहां पर भी चला। जो आलोचनात्‍मक टि‍प्‍पणि‍यां आयीं वे यथार्थ का अति‍क्रमण करने वाली थीं।‍ यथार्थ में इन दोनों लेखकों ने जो कहा उसकी इनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ में मीमांसा की गयी। प्रभाष जोशी-राजेंद्र यादव के भक्‍त चाहते थे, अतीत को अतीत रहने दो। उसे अब सामने लाने से क्‍या लाभ जबकि‍ अन्‍य कह रहे थे जब बहस उनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ पर हो रही है तो हमें उनके अतीत और व्‍यवहार को भी वि‍वादि‍त गद्य के साथ जोड़ कर देखना चाहि‍ए। वे इन दोनों लेखकों के बहाने वर्तमान में प्रेस और समाज की दशा पर भी बातें कर रहे थे।

ये मीडियाकर्मी किसी के नहीं होते, न हमारे न अपने मालिक के 1

ये मीडियाकर्मी किसी के नहीं होते, न हमारे न अपने मालिक के

विनीत कुमार ♦ आज वीओआई चैनल बंद है। सैकड़ों मीडियाकर्मी सड़कों पर आ गये हैं। उनकी जिम्मेवारी लेनेवाला कोई नहीं है। मैंने तब भी कहा कि चैनल धार्मिक विश्‍वासों के बूते नहीं, मार्केट स्ट्रैटजी के दम पर चलते हैं और अमित सिन्हा को चाहिए कि वो एक भावुक भक्त के बजाय एक प्रोफेशनल की तरह सोचें और काम करें। मेरी इस बात पर चैनल के ही एक एंकर-प्रोड्यूसर को इतनी मिर्ची लगी कि उन्होंने संजय मोरवाल, एक फर्जी नाम से हम पर बहुत ही बेहूदे और अपमानजनक तरीके से कमेंट किया। हम पर आरोप लगाये कि हमें कुछ भी पता नहीं है। हम लिखने के नाम पर बकवास कर रहे हैं। इस मामले में हमें कुछ भी बोलने की औकात नहीं है।

क्‍या वीओआई कर्मियों की आवाज़ अनसुनी ही रह जाएगी? 4

क्‍या वीओआई कर्मियों की आवाज़ अनसुनी ही रह जाएगी?

अविनाश ♦ हम मीडिया के लोग इस मायने में विपन्‍न हैं कि हमारे अधिकारों की लड़ाई हमारा अख़बार और हमारा टेलीविज़न नहीं लड़ सकता। प्रेस से जुड़े संगठनों का हाल सब जानते ही हैं। शायद ही कभी इन संगठनों ने कभी किसी मीडियाकर्मी का खोया हुआ वाज़‍िब अधिकार उसे वापिस दिलाया हो। दूसरे संगठनों और आंदोलनकारियों को इसलिए मतलब नहीं है क्‍योंकि संघर्षरत मीडियाकर्मियों का साथ देकर वो मीडिया-संस्‍थानों से बैर नहीं ले सकते। हमारे देश में तो बहुत सारे आंदोलन मीडिया अटेंशन की वजह से ही तो राष्‍ट्रीय ख्‍याति के बन गये! मीडियाकर्मियों का साथ देकर वो इस अटेंशन का आसमान क्‍यों खोना चाहेंगे?

आपने जीवन भर पत्रकारि‍ता कम, प्रौपेगैंडा ज़्यादा कि‍या 18

आपने जीवन भर पत्रकारि‍ता कम, प्रौपेगैंडा ज़्यादा कि‍या

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ प्रभाष जोशी आप धर्मनि‍रपेक्ष हैं। मुसलमानों के हि‍मायती हैं। कृपया बताएं आपके संपादन काल में मुसलमानों के कार्यव्‍यापार, जीवन शैली, सामाजि‍क दशा के बारे में कि‍तने लेख छपे थे। आपके यहां पांच अच्‍छे मुस्‍लि‍म पत्रकार नहीं थे। अब यह मत कहना मुसलमानों को लि‍खना-पढ़ना नहीं आता। खैर हिंदू पत्रकारों को तो आता था। उनसे ही मुसलमानों की जीवनदशा पर सकारात्‍मक नजरि‍ए से समूचे संपादनकाल में दस बेहतरीन खोजपरक लेख तैयार करवाये होते। कि‍सने रोका था? कोई चीज़ थी जो रोक रही थी। अभी भी हालात ज़्यादा बेहतर नहीं हैं।

अमर उजाला कर्मियों के नाम शशि शेखर का आख़‍िरी संदेश 9

अमर उजाला कर्मियों के नाम शशि शेखर का आख़‍िरी संदेश

शशि शेखर ♦ जहां भी रहूंगा, जैसा भी रहूंगा, स्नेह की यह डोर मेरे चारों ओर लिपटी रहेगी और एहसास दिलाएगी कि ईमानदारी का जवाब ईमानदारी है। भावना का जवाब भावना है। यह डोर इसकी गवाह है। आंधी और पानी के ये सात साल जाने कैसे गुज़र गये। मैंने अपने बच्चों को बड़ा होता हुआ नहीं देखा। पर अमर उजाला को बढ़ा देखता रहा। साथियों को पनपता देखता रहा। दिन, तारीख़ और साल ऐसे में कैसे दिखते? कृतज्ञ हूं कि मुझे आप जैसे सहयोगी मिले, जिन्होंने सुर से सुर मिलाया और हम एक महागान की सर्जना कर सके। मैं भाग्यशाली हूं कि इस दौरान मालिकों का भी भरपूर सहारा मिला। आपका सहयोग, उनका सहारा और मेरे सपने मिल-जुलकर एक मीठी कहानी-सी बन गये। उम्मीद है कि यह मिठास रह जाएगी।

अखिलेश अखिल की किताब पढ़ें : मीडिया, वेश्‍या या दलाल 9

अखिलेश अखिल की किताब पढ़ें : मीडिया, वेश्‍या या दलाल

सुशांत झा ♦ अखिलेश अखिल की ये किताब एक तरह से उनकी पत्रकारीय डायरी है, जिसमें वक्‍त वक्‍त उनके द्वारा की गयी बेमिसाल रिपोर्टिंग है, जो विभिन्‍न अखबारों और पत्रिकाओं में छपी। अखिलेश अखिल की भाषाई धार और तल्ख रिपोर्टिंग का अंदाज़ इस पूरी किताब में साफ झलकता है। ये वहीं अखिलेश अखिल हैं जिन्होने लालू यादव के जलवाई शासनकाल में – जब चारा घोटाला का आरोप लालू पर लगा था – उस वक्त बंदर के हाथ में बिहार नाम का लेख विचार मींमांसा में लिखा था। उस लेख से आहत होकर लालू समर्थकों ने अखिल पर हमला भी किया था, जिसमें वे बुरी तरह घायल हो गये थे।

आलोक तोमर को छोड़ो, प्रभाष जोशी पर बात करो 30

आलोक तोमर को छोड़ो, प्रभाष जोशी पर बात करो

अविनाश ♦ प्रभाष जोशी देवता नहीं हैं। वे एक चतुर सुजान हैं, जो जानता है कि कब क्‍या करने से लाभ की गठरी सरक कर उनके पास आएगी। वे अपनी जन-छवि बनाने के लिए आंदोलनों का इस्‍तेमाल करते हैं और कांग्रेस की कतार में खड़े होने के लिए भाजपा-आरएसएस पर कठोर कागद कारे लिखते हैं। 84 के जून में ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार के दौरान जब सेना के जवानों ने स्‍वर्ण मंदिर पर कब्‍जा कर लिया था, तो इन्‍हीं प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में बैनर हेडिंग लगाया था – सत श्री अकाल, जनरल दयाल। यह उस सांप्रदायिक और ज़हरीले संपादक का कारनामा था, जिस संपादक को आज सिद्ध और प्रसिद्ध बताया जा रहा है।

आलोक तोमर जी, कहां से आती है यह भाषा? 8

आलोक तोमर जी, कहां से आती है यह भाषा?

अरविंद शेष ♦ इतने हतभागे हैं आप कि यह मुनादी करते हुए इस बात का अंदाज़ा लगा पाने में सक्षम नहीं हैं कि आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर क्यों कहा होगा। यह कहते हुए दरअसल मैं जानबूझ कर यह तथ्य अनदेखा कर रहा हूं कि आप अच्छी तरह जानते थे और जानते हैं कि आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर क्यों कहा होगा। आपकी पूरी मानसिक संरचना जिस नींव पर खड़ी है और जिस मिट्टी से तैयार हुई है, वहां समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ भी किये जाने पर आपके भीतर से और निकल क्या सकता है? क्या इसी ज़हर के साथ आप “बहुत सारे ज़रूरी मुद्दे पर बात करने” का दम भर रहे हैं।