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विनीत कुमार ♦ कुल मिलाकर कहानी ये है कि जब भी हिंदी के चैनल बजट जैसे अंग्रेजी कार्यक्रमों को हिंदी में दिखाने के दावे करते हैं, उनकी खोखली और व्यावसायिक घोषणा ही होती है कि अपनी भाषा में बात समझी जाए, बहुत ही फूहड़ हो जाती है। उसके भीतर अचानक से दूरदर्शन की आत्मा घुस जाती है। मामला उबाऊ और बोझिल लगने लग जाता है। ऐसे में किशोर आजवाणी और अभिसार शर्मा जैसे काबिल एंकरों की भद्द पिटती है, मिसब्रैंडिंग होती है। अगर वो भाषाई स्तर के बदलाव को बारीकी स्तर पर नहीं समझ पाते हैं, इस काम के लिए पैसे खर्च नहीं करते हैं और सिर्फ हिंदी के नाम पर भुनाने के चक्कर में होते हैं, तो वो अपनी रेगुलर ऑडिएंस भी खो देते हैं, इसकी संभावना बनी रह जाती है।
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दुष्यंत ♦ तीन दिन, दुनिया भर के साठ कवि, जिनमें एक तिहाई भारत से, और अनुभव एक कविता सा। जैसे सात साल की प्रांजुला सिंह की कविता हिंदी, अंग्रेजी और स्पेनिश में सुनने को मिली, तो अनुवाद के अनगिन रंग, भाषाओं के स्वाद और वाचन वैविध्य की मधुरता की मनोरम स्मृतियां छोड़ गया यह आयोजन। कविताओं के साथ इस आयोजन में फिल्म और पेंटिग के रंगों ने जुड़ कर इसे खास बना दिया। नार्वे की कवयित्री एवं फिल्ममेकर ओदवे क्लिवये की भारतीय कवियों पर बनायी गयी फिल्में देखना एक रोमांचक और यादगार अनुभव था तो दिल्ली के साधो समूह की कविता फिल्में अपने आप में अद्भुत।
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ब्रज ♦ मैं धावक मिल्खा सिंह से मिलता रहता हूं। उनकी हिंदी और उर्दू से बेहद प्रभावित हूं। वो उस समय के हीरो हैं, जब टीवी चैनल नहीं थे। उन्होंने ओलिंपिक गोल्ड मेडल भी नहीं जीता लेकिन उनका वो अक्स सबके सामने रहता है… ट्रैक पर सपाट दौड़ते हुए। परगट सिंह से भी मिलकर मुझे ऐसा लगा कि हिंदी या हिंदुस्तानी बोलने पर उनके चेहरे पर वो खिंचाव नहीं आता। सवाल है कि हमारे यहां कितने लोग शूटिंग का खेल खेलते हैं… शायद 0.1 फीसदी लोग भी नहीं… कितने लोग अंग्रेजी बोलते हैं… पांच फीसदी भी नहीं। चीन के सारे एथलीट चीनी ही बोलते हैं। रशियन, गेर्मन, फ्रेंच सभी खिलाड़ी अपनी भाषा बोल लेते हैं। हिंदी बोलने में खुद का अपमान कैसा!
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वीना ♦ तभी तिरंगी पट्टी थामे कुछ हाथ मैदान में आये और शब्दों की पट्टी गले में पहने एक कन्या को बिन चेहरे के हथियारों के बीच खड़ा कर गायब हो गये। पट्टी पर लिखा है – ‘मराठी हिंदी की छोटी बहन या मौसी है। एक के प्रयोग से दूसरे के अपमान का सवाल ही नहीं उठता।’ कन्या के दो मुखौटे हैं। एक पर लिखा है ‘हिन्दी’ और दूसरे पर ‘मराठी।’ अपनी जान आफत में देख कन्या डरी-सहमी थर-थर कांप रही है। तिरंगे पट्टीधारी हाथों की इस हरकत से मुकुटधारी और नफ़रत से भर गये। इधर अकेली कन्या को देख दोनों तरफ के बिन चेहरे के हथियार अपना आपा खो बैठे, और कन्या के जिस्म से वस्त्र नोचने लगे।
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रवीश कुमार ♦ हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों ने किसानों के आंदोलन को अलग अलग चश्में से देखा। क्या अमर उजाला लिख सकता था कि किसानों ने दिल्ली बर्बाद कर दी। ट्रैफिक जाम लगा दिया। क्यों इस अखबार ने लघु-हेडर लगाए कि गन्ना मूल्य नीति के विरोध में किसानों का ज़ोरदार प्रदर्शन। क्या अगर अमर उजाला हिंदुस्तान टाइम्स की तरह लिखता तो उसके पाठक स्वीकार करते। भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के शहरों से निकलता हो लेकिन आज भी इन शहरों के लोग गांवों से जुड़े हैं। थोड़े किसान हैं या किसी किसान को जानते होंगे। हिंदुस्तान टाइम्स का पाठक बिल्कुल अलग। तो क्या पाठकों की संवेदनशीलता और वर्ग चरित्र के अनुसार एक ही घटना को दो चश्मे से देखेंगे?
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संजय द्विवेदी ♦ सच तो यह है कि हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे आप कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।
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संवाददाता ♦ “हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी” का मुद्दा पुराना रहा है। इसी विषय को लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र ने अपने दूसरे स्थापना दिवस और अल्युमनी मीट के अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। यह संगोष्ठी दो दिन 28-29 अक्टूबर 2009 तक चली, जिसमें साहित्य और मीडिया जगत के चर्चित नामों और जेएनयू के पूर्व छात्रों को आमंत्रित किया गया। हिंदी-उर्दू भाषा का यह झगड़ा पाकिस्तान के विभाजन का एक मूल कारण था, क्योंकि लोगों ने हिंदी को हिंदू और उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में स्वीकार किया। भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो चमनलाल ने हिंदुस्तानी भाषा को प्रेमचंद की विचारधारा से जोड़ कर बताया।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ जेएनयू के हिंदी-उर्दू के पूर्व छात्रों का समागम 27-29 अक्टूबर 2009 को हो रहा है। यह समागम इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि इसमें पहली बार नामवरजी नहीं हैं। जेएनयू का भारतीय भाषा केंद्र नामवर के बिना सूना लगता है। लगता है प्रो चमनलाल ने नामवरजी की उस बात का ख्याल रखा है जो उन्होंने जेएनयू में नामवर पुस्तक के लोकार्पण के समय दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में कही थी। नामवरजी ने कहा था, मैं चाहता हूं कभी मुझे सुनने के लिए भी बुलाया जाए। नामवर जी के छात्रों ने लगता है, उनकी बात रख ली है। देखते हैं आगे क्या होता है। आशा है इस मौके पर आदरणीय गुरुवर सुनने तो कम से कम ज़रूर आयेंगे। वैसे भी यदि वे कार्यक्रम में आ धमके और छात्रों ने मांग कर दी तो उन्हें मंच पर आने से कौन रोक पाएगा।
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सुशांत झा ♦ आज़ादी के बाद ही जब हम हिंदी के नाम पर आमराय नहीं बना पाये तो अब 21वीं सदी में इसकी संभावना बहुत मुश्किल लग रही है। अंग्रेज़ी का पिछले तीन सौ सालों का ढांचा इतना मज़बूत है जितना शायद ब्राह्मणवाद भी नहीं। जो लोग चीन, कोरिया और जापान का उदाहरण देते हैं उन्हें ये बात याद रखनी चाहिए कि उन देशों के हालात हमारे यहां से बिल्कुल उलट हैं। न तो मंदारिन या कोरियन की तरह हिंदी कभी 90 फीसदी लोगों की भाषा थी न ही नेहरुजी उसे पूरे देश पर थोप सकते थे। अगर हिंदी आज़ादी के बाद से ही पूरे देश की पहली भाषा होती, जिसमें तकनीक से लेकर प्रशासन तक के सारे काम होते, तो अभी तक हम इसे वाकई मजबूत बना लेते लेकिन क्या ऐसा हो पाया या हालात ने ऐसी इजाज़त दी?
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विभा रानी ♦ हिंदी में हम केवल कविता, कहानी, उपन्यास लिख कर साहित्य की खानापूरी करते रहते हैं। विषय विविध हैं, मगर उस पर लिखने का वक़्त नहीं है। वक़्त से ज़्यादा उन पर लिखने-काम करनेवालों का सम्मान नहीं है। शब्दकोश, विकासात्मक, विज्ञान, समाज, रहस्य-रोमांच जैसे विषयों पर मौलिक किताबें नहीं हैं। हैरी पॉटर जैसी किताबें किशोरों के लिए आज कहां हैं? नर्सरी राइम्स जैसी किताबें भी हिंदी में बमुश्किल मिलती हैं। अभी भी लेखकों की लंबी क़तार है, जो नेट और उसके फायदे से कोई साबका नहीं रखते। राजभाषा हिंदी से तो साहित्यकारों का खासा बैर भाव है ही। सरकार के बड़े-बड़े पदों पर रहे स्वनामधन्य लेखक भी यही कहते रहे कि राजभाषा हिंदी तो केवल हिंदी अधिकारी ही समझ सकता है।


