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Articles tagged with: hindi

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[24 Oct 2011 | 22 Comments | ]

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ♦ हम चेतन की बात पर नाराज हो सकते हैं, पर सच्चाई कहां टलने वाली। चेतन एक समूह के प्रतीक हैं, आधार हैं, तभी चेतन सफल हैं। परिवर्तन जिस रुख से हो रहा है, चेतन उसी धारा में हैं। धारा बदलने का सोच और संकल्प चेतन के चेतन/अवचेतन किसी में नहीं है। हम उन्हें गलत भी नहीं कह सकते।

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[24 Oct 2011 | 34 Comments | ]

हिंदी कुमार ♦ चेतन भगत भले ही प्रेमचंद न हो लेकिन वो प्रभात रंजन, गीत चतुर्वेदी जैसों से लाख गुना बेहतर है। जाहिर है कि भगत का दुनियावी IQ (IIT+IIM) इन दोनों से ऊपर है लेकिन उसका साहित्यिक IQ भी इन जैसों से ऊपर है। गीत चतुर्वेदी तो इतना चीप है कि अपनी किताब के शीर्षक से चार गुना बड़ा अपना नाम लिखवाता है।

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[23 Oct 2011 | 28 Comments | ]

प्रभात रंजन ♦ हिंदी के मार-तमाम लोग कुछ लाख पाठक नहीं पैदा कर सकते। हिंदी के मार-तमाम लोग कुछ लाख पाठक नहीं पैदा कर सकते। क्योंकि वह उनकी शिक्षा की भाषा हो भी तो उनके लिए शान की भाषा नहीं बन पायी है। हिंदी-पट्टी में हिदी आज भी शर्म की भाषा ही बनी हुई है। नयी पीढ़ी हिंदी की किताबें तब भी कम खरीदता था, आज भी कम खरीदता है।

शब्‍द संगत »

[19 Sep 2011 | 3 Comments | ]

नीलांबुज ♦ एक खास बात जो मुझे अच्छी लगी – गोपालस्वामी जी ने बताया कि हम लोग हर दो महीने पर किसी पुस्तक पर चर्चा करते हैं। पुस्तक पहले ही तय कर दी जाती है। सारे सदस्य उस किताब को खरीद कर पढ़ते हैं। फिर उस पर चर्चा होती है। अब तक हर विधा की महत्वपूर्ण किताबों पर चर्चा हो चुकी है।

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[3 Aug 2011 | 15 Comments | ]

श्याम बिहारी श्यामल ♦ हिंदी में व्‍यापक और मूल्‍यवान लेखन हो रहा है, इसे सत्‍यापित करने के लिए किसी के अनापत्ति-प्रमाणपत्र या सहमति-पत्र की कदापि आवश्‍यकता नहीं। हिंदी बोलने वाले करोड़ों आम नागरिकों के आत्‍मगौरव में भी कहीं से कोई गिरावट नहीं है। इसकी स्‍थलीय जांच कभी भी की, करायी जा सकती है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[14 Mar 2011 | One Comment | ]

पशुपति शर्मा ♦ नूर ने भाषा को मजहब से जोड़ने को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मजहब के साथ जुड़कर दोनों ही भाषाओं का नुकसान हुआ है। आज दोनों भाषाओं के पैरोकार अंग्रेजी के करीब जाने में हिचक महसूस नहीं करते लेकिन एक-दूसरे से ‘भाषाई दुश्मनी’ बखूबी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उर्दू जबान में ‘सेक्रेटरी’ का इस्तेमाल तो हो सकता है लेकिन ‘सचिव’ से तौबा कर ली गयी है। हालांकि उन्होंने इसके लिए ‘राजनीति’ से ज्यादा व्यक्तिगत ‘ईगो’ को जिम्मेदार बताया।

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[29 Jul 2010 | 14 Comments | ]

दिलीप मंडल ♦ कविता कोई भी लिख सकता है। सबको अधिकार है। नरेंद्र मोदी को, जगदीश टाइटलर को, सज्जन कुमार को, मुतालिक को, निठारी के पंढेर को, मिर्चपुर के बांके जवानों को, खैरलांजी के हत्यारों को, शाहबुद्दीन को, रणवीर सेना के वीर जवानों को… साहित्‍य के लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है। और फिर कविता तो मनुष्य को उदात्त बनाती है। किसी से उदात्त होने का हक छीन लेना तो अमानवीय होगा? राजेंद्र यादव ने कह ही दिया है कि शास्त्रार्थ की हमारे यहां परंपरा पुरानी है और तालिबानी सख्ती से उसे नहीं दबाया जाना चाहिए। साहित्य के लोकतंत्र में तमाम कवियों का स्वागत है। कवि को कविता के अलावा किसी भी और कसौटी पर कसना असाहित्यिक है।

शब्‍द संगत »

[6 Jul 2010 | 5 Comments | ]

भैंसा देहलवी ♦ इधर युवा लेखक वरिष्ठ लेखकों और आलोचकों से खासे नाराज हैं। उन्हें लग रहा है कि वरिष्ठ लेखक युवाओं की लोकप्रियता से ईर्ष्‍यालु हो उठे हैं, जो उनकी टिप्पणियों से बार-बार जाहिर हो रहा है। अभी हाल ही में एक युवा लेखक ने एक वरिष्ठ आलोचक को “करिया अच्छर भैंस बराबर” लिख दिया। साथ ही युवा लेखकों को भैंसों का झुंड बताते हुए लिखा कि कोई न कोई योग्य ग्वाला पहचान लेगा कि कौन किसकी भैंस है और कौन कितना दूध देती है। कहने का अर्थ यह कि ग्वाले यानी आलोचकों को पहचानना होगा कि युवा भैंसों के झुंड में कौन रवींद्र कालिया की भैंस है, कौन उदय प्रकाश की, कौन अशोक वाजपेयी की और कौन राजेंद्र यादव या विष्णु खरे की। एक युवा लेखक ने घोषित किया कि वह उदय प्रकाश की भैंस है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[30 Jun 2010 | 2 Comments | ]

रंग प्रसंग ♦ हिंदी अपने विकास-क्रम में एक केंद्रीय स्थान ग्रहण कर चुकी है, इसलिए हिंदी रंगकर्म पर कोई भी विचार दूसरी देशी-विदेशी भाषाओं पर विचार किये बिना अधूरा ही रहेगा। हिंदी के नाटक भले ही दूसरी भाषाओं में अनूदित हो कर मंचित न हुए हों, लेकिन दूसरी भाषाओं के अनगिनत नाटक हिंदी में तर्जुमा करके खेले गये हैं। और इसके साथ-साथ उन भाषाओं में जो नाट्य-चिंतन हुआ है, उसका असर हिंदी रंगमंच पर पड़ा है। हिंदी रंगकर्म की इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए यह जायजा लेने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती है कि हिंदी नाटक और रंगमंच के डेढ़ सौ साल के मौजूदा दौर में आज इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के आखिरी साल में हम कहां खड़े हैं।

मोहल्ला दिल्ली, समाचार »

[7 Apr 2010 | No Comment | ]

सलाम बिजेन सिंह ♦ ‘भाषाई एवं सांस्‍कृतिक विविधता में राष्‍ट्र भाषा हिंदी’ विषय पर आयोजित इस वाक् स्‍पर्धा में कुल 14 राज्‍यों से प्रतिस्‍पर्धी उपस्थित थे। प्रतिस्‍पर्धियों को तीन भाग क, ख और ग में बांटा गया था। पहला क भाग, यानी हिंदी भाषी क्षेत्र, जिसके अंतर्गत बिहार, यूपी और एमपी आता है। ख भाग यानी मध्‍य जिसमें, गुजरात, महाराष्‍ट्र और पंजाब आदि शामिल है और ग यानी दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत, जिसमें केरल, तमिल, कर्नाटक, मणिपुर, नगालैंड, असम और मिजोरम आदि शामिल है। ग क्षेत्र से रेशमा बाबू (बंगलुरू) ने प्रथम स्‍थान पाया। सलीम (बंगलुरू) दूसरे स्‍थान पर रहे और रंजन सिंह (देवघर) तीसरे स्‍थान पर आये।