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Articles tagged with: hindi

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[29 Jul 2010 | 14 Comments | ]
कवि होना वैसा ही है, जैसे कसाई होना या मेहतर होना!

दिलीप मंडल ♦ कविता कोई भी लिख सकता है। सबको अधिकार है। नरेंद्र मोदी को, जगदीश टाइटलर को, सज्जन कुमार को, मुतालिक को, निठारी के पंढेर को, मिर्चपुर के बांके जवानों को, खैरलांजी के हत्यारों को, शाहबुद्दीन को, रणवीर सेना के वीर जवानों को… साहित्‍य के लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है। और फिर कविता तो मनुष्य को उदात्त बनाती है। किसी से उदात्त होने का हक छीन लेना तो अमानवीय होगा? राजेंद्र यादव ने कह ही दिया है कि शास्त्रार्थ की हमारे यहां परंपरा पुरानी है और तालिबानी सख्ती से उसे नहीं दबाया जाना चाहिए। साहित्य के लोकतंत्र में तमाम कवियों का स्वागत है। कवि को कविता के अलावा किसी भी और कसौटी पर कसना असाहित्यिक है।

शब्‍द संगत »

[6 Jul 2010 | 5 Comments | ]
ग्वाला बनाम भैंस विमर्श

भैंसा देहलवी ♦ इधर युवा लेखक वरिष्ठ लेखकों और आलोचकों से खासे नाराज हैं। उन्हें लग रहा है कि वरिष्ठ लेखक युवाओं की लोकप्रियता से ईर्ष्‍यालु हो उठे हैं, जो उनकी टिप्पणियों से बार-बार जाहिर हो रहा है। अभी हाल ही में एक युवा लेखक ने एक वरिष्ठ आलोचक को “करिया अच्छर भैंस बराबर” लिख दिया। साथ ही युवा लेखकों को भैंसों का झुंड बताते हुए लिखा कि कोई न कोई योग्य ग्वाला पहचान लेगा कि कौन किसकी भैंस है और कौन कितना दूध देती है। कहने का अर्थ यह कि ग्वाले यानी आलोचकों को पहचानना होगा कि युवा भैंसों के झुंड में कौन रवींद्र कालिया की भैंस है, कौन उदय प्रकाश की, कौन अशोक वाजपेयी की और कौन राजेंद्र यादव या विष्णु खरे की। एक युवा लेखक ने घोषित किया कि वह उदय प्रकाश की भैंस है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[30 Jun 2010 | One Comment | ]
आप हिंदी रंगमंच के बारे में क्‍या सोचते हैं, कृपया बताएं

रंग प्रसंग ♦ हिंदी अपने विकास-क्रम में एक केंद्रीय स्थान ग्रहण कर चुकी है, इसलिए हिंदी रंगकर्म पर कोई भी विचार दूसरी देशी-विदेशी भाषाओं पर विचार किये बिना अधूरा ही रहेगा। हिंदी के नाटक भले ही दूसरी भाषाओं में अनूदित हो कर मंचित न हुए हों, लेकिन दूसरी भाषाओं के अनगिनत नाटक हिंदी में तर्जुमा करके खेले गये हैं। और इसके साथ-साथ उन भाषाओं में जो नाट्य-चिंतन हुआ है, उसका असर हिंदी रंगमंच पर पड़ा है। हिंदी रंगकर्म की इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए यह जायजा लेने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती है कि हिंदी नाटक और रंगमंच के डेढ़ सौ साल के मौजूदा दौर में आज इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के आखिरी साल में हम कहां खड़े हैं।

मोहल्ला दिल्ली, समाचार »

[7 Apr 2010 | No Comment | ]
हिंदी की दशा दिशा पर दिल्‍ली में भाषण प्रतियोगिता

सलाम बिजेन सिंह ♦ ‘भाषाई एवं सांस्‍कृतिक विविधता में राष्‍ट्र भाषा हिंदी’ विषय पर आयोजित इस वाक् स्‍पर्धा में कुल 14 राज्‍यों से प्रतिस्‍पर्धी उपस्थित थे। प्रतिस्‍पर्धियों को तीन भाग क, ख और ग में बांटा गया था। पहला क भाग, यानी हिंदी भाषी क्षेत्र, जिसके अंतर्गत बिहार, यूपी और एमपी आता है। ख भाग यानी मध्‍य जिसमें, गुजरात, महाराष्‍ट्र और पंजाब आदि शामिल है और ग यानी दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत, जिसमें केरल, तमिल, कर्नाटक, मणिपुर, नगालैंड, असम और मिजोरम आदि शामिल है। ग क्षेत्र से रेशमा बाबू (बंगलुरू) ने प्रथम स्‍थान पाया। सलीम (बंगलुरू) दूसरे स्‍थान पर रहे और रंजन सिंह (देवघर) तीसरे स्‍थान पर आये।

नज़रिया, मीडिया मंडी »

[26 Feb 2010 | 4 Comments | ]
टीवी चैनलों की फूहड़ हिंदी में बेमज़ा बजट भाषण, ओह…

विनीत कुमार ♦ कुल मिलाकर कहानी ये है कि जब भी हिंदी के चैनल बजट जैसे अंग्रेजी कार्यक्रमों को हिंदी में दिखाने के दावे करते हैं, उनकी खोखली और व्यावसायिक घोषणा ही होती है कि अपनी भाषा में बात समझी जाए, बहुत ही फूहड़ हो जाती है। उसके भीतर अचानक से दूरदर्शन की आत्मा घुस जाती है। मामला उबाऊ और बोझिल लगने लग जाता है। ऐसे में किशोर आजवाणी और अभिसार शर्मा जैसे काबिल एंकरों की भद्द पिटती है, मिसब्रैंडिंग होती है। अगर वो भाषाई स्तर के बदलाव को बारीकी स्तर पर नहीं समझ पाते हैं, इस काम के लिए पैसे खर्च नहीं करते हैं और सिर्फ हिंदी के नाम पर भुनाने के चक्कर में होते हैं, तो वो अपनी रेगुलर ऑडिएंस भी खो देते हैं, इसकी संभावना बनी रह जाती है।

शब्‍द संगत »

[19 Feb 2010 | 7 Comments | ]
मैसूर में कविता के तीन दिन : एक काव्‍योत्‍सव

दुष्‍यंत ♦ तीन दिन, दुनिया भर के साठ कवि, जिनमें एक तिहाई भारत से, और अनुभव एक कविता सा। जैसे सात साल की प्रांजुला सिंह की कविता हिंदी, अंग्रेजी और स्पेनिश में सुनने को मिली, तो अनुवाद के अनगिन रंग, भाषाओं के स्वाद और वाचन वैविध्य की मधुरता की मनोरम स्मृतियां छोड़ गया यह आयोजन। कविताओं के साथ इस आयोजन में फिल्म और पेंटिग के रंगों ने जुड़ कर इसे खास बना दिया। नार्वे की कवयित्री एवं फिल्ममेकर ओदवे क्लिवये की भारतीय कवियों पर बनायी गयी फिल्में देखना एक रोमांचक और यादगार अनुभव था तो दिल्‍ली के साधो समूह की कविता फिल्में अपने आप में अद्भुत।

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[18 Jan 2010 | 13 Comments | ]
हिंद को जिस पर नाज़ है, उसे हिंदी पर नाज़ क्यों नहीं?

ब्रज ♦ मैं धावक मिल्खा सिंह से मिलता रहता हूं। उनकी हिंदी और उर्दू से बेहद प्रभावित हूं। वो उस समय के हीरो हैं, जब टीवी चैनल नहीं थे। उन्होंने ओलिंपिक गोल्ड मेडल भी नहीं जीता लेकिन उनका वो अक्स सबके सामने रहता है… ट्रैक पर सपाट दौड़ते हुए। परगट सिंह से भी मिलकर मुझे ऐसा लगा कि हिंदी या हिंदुस्तानी बोलने पर उनके चेहरे पर वो खिंचाव नहीं आता। सवाल है कि हमारे यहां कितने लोग शूटिंग का खेल खेलते हैं… शायद 0.1 फीसदी लोग भी नहीं… कितने लोग अंग्रेजी बोलते हैं… पांच फीसदी भी नहीं। चीन के सारे एथलीट चीनी ही बोलते हैं। रशियन, गेर्मन, फ्रेंच सभी खिलाड़ी अपनी भाषा बोल लेते हैं। हिंदी बोलने में खुद का अपमान कैसा!

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[29 Nov 2009 | 5 Comments | ]
हिंदी मराठी ज़िंदाबाद, भारतमाता कौन हैं आप?

वीना ♦ तभी तिरंगी पट्टी थामे कुछ हाथ मैदान में आये और शब्दों की पट्टी गले में पहने एक कन्या को बिन चेहरे के हथियारों के बीच खड़ा कर गायब हो गये। पट्टी पर लिखा है – ‘मराठी हिंदी की छोटी बहन या मौसी है। एक के प्रयोग से दूसरे के अपमान का सवाल ही नहीं उठता।’ कन्या के दो मुखौटे हैं। एक पर लिखा है ‘हिन्दी’ और दूसरे पर ‘मराठी।’ अपनी जान आफत में देख कन्या डरी-सहमी थर-थर कांप रही है। तिरंगे पट्टीधारी हाथों की इस हरकत से मुकुटधारी और नफ़रत से भर गये। इधर अकेली कन्या को देख दोनों तरफ के बिन चेहरे के हथियार अपना आपा खो बैठे, और कन्या के जिस्म से वस्त्र नोचने लगे।

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[23 Nov 2009 | 4 Comments | ]
हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का किसान अलग क्यों होता है?

रवीश कुमार ♦ हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों ने किसानों के आंदोलन को अलग अलग चश्में से देखा। क्या अमर उजाला लिख सकता था कि किसानों ने दिल्ली बर्बाद कर दी। ट्रैफिक जाम लगा दिया। क्यों इस अखबार ने लघु-हेडर लगाए कि गन्ना मूल्य नीति के विरोध में किसानों का ज़ोरदार प्रदर्शन। क्या अगर अमर उजाला हिंदुस्तान टाइम्स की तरह लिखता तो उसके पाठक स्वीकार करते। भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के शहरों से निकलता हो लेकिन आज भी इन शहरों के लोग गांवों से जुड़े हैं। थोड़े किसान हैं या किसी किसान को जानते होंगे। हिंदुस्तान टाइम्स का पाठक बिल्कुल अलग। तो क्या पाठकों की संवेदनशीलता और वर्ग चरित्र के अनुसार एक ही घटना को दो चश्मे से देखेंगे?

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[10 Nov 2009 | 12 Comments | ]
हिंदी से क्यों डरते हैं क्षेत्रीय राजनीति के विषधर

संजय द्विवेदी ♦ सच तो यह है कि हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे आप कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।