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हमारी फिल्‍मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्‍यों हैं? 29

हमारी फिल्‍मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्‍यों हैं?

शीबा असलम फहमी ♦ हमारी फिल्मों में तो कल्पना भी नहीं की जाती एक ‘कम-जात’ के प्रतिभावान होने की! अगर इसके बर-अक्स आप को कोई ऐसी फिल्म याद आ रही हो, तो मेरी जानकारी में इजाफा कीजिएगा… हां खुदा न खासता अगर कोई प्रतिभा होगी तो तय-शुदा तौर पर अंत में वो कुलीन परिवार के बिछड़े हुए ही में होगी। ‘सुजाता’ याद है आपको? कितनी अच्छी फिल्म थी। बिलकुल पंडित नेहरु के जाति-सौहार्द को साकार करती! अछूत-दलित कन्या ‘सुजाता’ को किस आधार पर स्वीकार किया जाता है, और उसे शरण देनेवाला ब्राह्मण परिवार किस तरह अपने आत्म-द्वंद्व से मुक्ति पाता है? वहां भी उसकी औकात-जात का वर ढूंढ कर जब लाया जाता है, तो वह व्यभिचारी, शराबी और दुहाजू ही होता है, और कमसिन सुजाता का जोड़ बिठाते हुए, अविचलित माताजी के अनुसार ‘इन लोगों में यही होता है’।

प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है, अनुराग! 56

प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है, अनुराग!

दिलीप मंडल ♦ प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है। अमर्त्य सेन को बचपन में पलामू या मिर्जापुर या कूचबिहार के किसी गांव के स्कूल में पढ़ते हुए सोचिए। प्रतिभा के बारे में सारे भ्रम दूर हो जाएंगे। जब भारत के हर समुदाय और तबके से प्रतिभाएं सामने आएंगी, तभी यह देश आगे बढ़ सकता है। चंद समुदायों और व्यक्तियों का संसाधनों और प्रतिभा पर जब तक एकाधिकार बना रहेगा, जब तक इस देश में सबसे ज्यादा अंधे रहेंगे, सबसे ज्यादा अशिक्षित रहेंगे, सबसे ज्यादा कुपोषित होंगे और आपकी सोने की चिड़िया का यूएन के वर्ल्ड ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में स्थान 134वां या ऐसा ही कुछ बना रहेगा। प्रश्न सिर्फ इस बात का है कि क्या एक सचेत व्यक्ति के तौर पर हम यह सब होते देख पा रहे हैं।

त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहस तलब 2 की उपलब्धि रही 4

त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहस तलब 2 की उपलब्धि रही

ब्रजेश कुमार झा ♦ कुछ अटकाव के बावजूद बहसतलब-दो कायदे का रहा। बड़ी सहजता से नाटक की दुनिया से जुड़ीं त्रिपुरारी शर्मा ने इसे समझाया भी। सवाल हुए तो बड़े उदात्त भाव से कहा, “बहस कहां हो रही है, मेरे लिए यह सवाल महत्व का नहीं है। महत्व की बात तो इतनी भर है कि आम आदमी के लिए बहस जारी है।” दरअसल यही वह बिंदु है, जो बहसतलब में जान डालती है। उसके मतलब को बताती है। साथ ही उसे आगाह भी करती है। कुल मिलाकर त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहसतलब की उपलब्धियां रहीं। वहां न कोई आक्रामकता थी, न दंभ। न ही अपने खास होने का बोध। दरअसल आज वही तो है आम आदमी।

अब ऑडियो सुनें, बहसतलब दो में किसने क्‍या कहा… 0

अब ऑडियो सुनें, बहसतलब दो में किसने क्‍या कहा…

विनीत कुमार ♦ 18 जून को मोहल्ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स की साझा पेशकश के दौरान अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी में जिस बहस की शुरुआत हुई, उसके कई संस्करण अब वर्चुअल स्पेस की दुनिया में पसर रहे हैं। इस बहस में जो भी लोग शामिल हुए, वो वक्ताओं से या तो असहमत हैं या उनकी बातों को सिरे से खारिज करते हैं या फिर उन्हें लग रहा है कि इस तरह के आयोजन आम आदमी के सवाल को ईमानदारी से उठाने में बहुत मददगार साबित होंगे, इसे लेकर पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। तमाम वक्ताओं को लेकर लगातार असहमति और बहस जारी रहे, अच्छा रहेगा। लेकिन उन्होंने दरअसल कहा क्या, उससे हम हूबहू सुनकर लगातार टकरा सकें, अपनी बात के बीच उनकी बात को उसी शक्ल में रख सकें, फिलहाल उस नीयत से उनकी बात ऑडियो की शक्ल में सुनिए…

बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं… 7

बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं…

हिमानी दीवान ♦ भीड़ भरे भारत देश की तरह हैबिटैट सेंटर के इस हॉल में भी कुछ लोग जगह न मिलने की वजह से खड़े थे और कुछ लोग आम आदमी की इस खास बहस को सुनने के लिए जमीन पर ही बैठ गये थे। नजारा यकीनन अदभुत था लेकिन नजरें फिर भी न जाने क्यों आम आदमी की बहस में आम आदमी को ढूंढ़ रही थी। तमाम तीखे, फीके और चटपटे जायके वाले सवाल पूछे गये। लाजवाब, जवाब भी दिये गये लेकिन ऐसा लगा कि सब अपने आप में कहीं न कहीं मजबूर से हैं। बात बात पर पैसे की मजबूरी। जब उनकी मशहूरी सुनी थी तब लगा कि वो लोग खास हैं, और जब मजबूरी सुनी तब जाना कि कितने आम इंसान हैं।

बहसतलब ‘दो’ में अचानक पहुंचे अनुराग, सवालों से घिरे 14

बहसतलब ‘दो’ में अचानक पहुंचे अनुराग, सवालों से घिरे

डेस्‍क ♦ मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स के आयोजन बहसतलब दो अचानक पहुंच कर फिल्‍म निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने सबको चौंका दिया। बात उन्‍हीं से शुरू हुई। अनुराग ने कहा कि सिनेमा एक खर्चीला माध्‍यम है, इसलिए ये बाजार की कैद में है। जिस सिनेमा में आम आदमी की चिंता की जाती है, वह हॉल तक पहुंच ही नहीं पाता। समांतर सिनेमा को सरकार का सपोर्ट था। एनएफडीसी को फिर से खड़ा करने की बात चल रही है, उसके बाद कुछ फिल्‍मों में आम आदमी दिख सकता है। लेकिन अगर इस बार भी दर्शकों ने परदे पर आम आदमी को खारिज कर दिया, तो सिनेमा जैसे माध्‍यमों में आम आदमी की बात बेमानी हो जाएगी।

आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी एक भी नहीं! 12

आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी एक भी नहीं!

आशीष कुमार ‘अंशु’ ♦ यदि आप आगे से बहसतलब में कम से कम तैंतीस प्रतिशत दलित और आदिवासी समाज के श्रोताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करें तो क्या इससे बहसतलब का रंग और नहीं निखरेगा? सक्षम आयोजकों के लिए यह अधिक मुश्किल भी नहीं होगा। क्या आपको ‘अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी’ के ऊपर अपनी बात रखने के लिए एक भी अच्छा आदिवासी या दलित समाज का प्रतिनिधि नहीं मिला। कैजुरिना में आयोजक, मॉडरेटर से लेकर सभी के सभी वक्ता तक सवर्ण ही थे। ऐसा क्यों भाई, क्या आपको आदिवासी और दलित समाज से एक भी चेहरा ऐसा नहीं मिला, जो मुकम्मल तरिके से अपना पक्ष रखता।

बहसतलब की दूसरी कड़ी का आयोजन आज, सवाल पूछें 4

बहसतलब की दूसरी कड़ी का आयोजन आज, सवाल पूछें

डेस्‍क ♦ बहसतलब की दूसरी कड़ी का आयोजन आज, शुक्रवार, 18 जून को इंडिया हैबिटैट सेंटर के कैजुरिना हॉल में हो रहा है। विषय है, अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी। हमारे तमाम अभिव्‍यक्ति माध्‍यम आज शहरी बाजार की कठपुतलियों जैसा बर्ताव कर रहे हैं। इसी बाजार के किस्‍से, इसी बाजार के कंसर्न से उन्‍हें मतलब रह गया है। वो आम आदमी कहीं नहीं दिखता, जिसकी बुनियाद पर इस देश के लोकतंत्र की इमारत की खड़ी है। एक हास्‍यास्‍पद मुहावरे की तरह ये दो शब्‍द कितने निरीह लगते हैं, इसकी कल्‍पना नहीं की जा सकती। यानी ये मान लिया जाना चाहिए कि आम आदमी अब अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों की सरहद से हमेशा के लिए बाहर हो चुका है और अब उसकी वापसी की गुंजाइश नहीं है?

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं 25

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं

डेस्‍क ♦ साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। इनकी दुश्मनी पुरानी है। फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है। मीडिया को साहित्य की जरूरत है। मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने ये बातें मंगलवार को दिल्‍ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में कहीं। मौका था मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स की साझेदारी में पहले बहसतलब का। मीडिया में साहित्‍य की खत्‍म होती जगह पर बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है। जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा।

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं 13

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं

डेस्‍क ♦ क्‍या हिंदी साहित्‍य मीडिया के लिए सेलेबल कमॉडिटी (बिकाऊ माल) क्‍यों नहीं है? इस मसले पर हिंदी की वर्चुअल दुनिया के सबसे पॉपुलर मंच जनतंत्र/मोहल्‍ला लाइव और पेंगुइन प्रकाशन के हिंदी सहयोगी यात्रा बुक्‍स के साझा प्रयास से एक सेमिनार का आयोजन किया गया है। 18 मई की शाम सात बजे इंडिया हैबिटैट सेंटर, नयी दिल्‍ली के गुलमोहर सभागार में आयोजित इस सेमिनार में हिंदी साहित्‍य और मीडिया के पांच जरूरी नाम सेमिनार में अपनी बात रखेंगे। ये वक्‍ता होंगे : राजेंद्र यादव, सुधीश पचौरी, ओम थानवी, रवीश कुमार और शीबा असलम फहमी।