Articles tagged with: jansatta
मोहल्ला लाइव, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
विनीता भारती ♦ मोहल्ला, जो वीएन राय के दलित विरोधी, जातिवादी चरित्र का भंडाफोड़ कर रहा था और वर्धा के उत्पीड़ित छात्रों के सघर्ष का साथी बना हुआ था, वहां होने वाली नियुक्तियों की अनियमियतताओं का सच सामने ला रहा था, ‘चोरगुरु’, महाश्वेता देवी के नाम का टकसाली व्यापार करने वाले कृपाशंकर चौबे का पर्दाफाश कर रहा था, ‘ब्रूनो की बेटियों’ के कवि आलोकधन्वा और उन्हें कोसने वाले पत्रकार राजकिशोर के खुद उसी ‘हरम’ में पहुंच जाने पर ‘मुंह में कालिख’ पोतने की बात कर रहा था, वह खुद इसी खेल में शामिल हो गया। क्या यह सच नहीं कि अब ‘मोहल्ला’ और कुछ नहीं, ओम थानवी के रिमोट पर चलने वाला ‘जनसत्ता’ का ‘एक्स्टेंडेड वेब एडीशन’ बन चुका है। चुका हुआ और बिका हुआ।
नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
गिरिराज किराड़ू ♦ यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामले का पटाक्षेप हो गया है। अव्वल तो यही कि माननीय राष्ट्रपति महोदया से लेखकों की मुलाकात और ज्ञानपीठ न्यास की बैठक के नतीजे अभी आने बाकी हैं। और जैसा कि अपने विवादास्पद लेख में विष्णु खरे ने कहा है, यह संघर्ष सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह जाना चाहिए। उनके लेख की इस सबसे सार्थक बात का पाठ यह किया जाना चाहिए कि अगर बर्खास्तगी न हो तो आने वाले दिनों में साहित्य में ऐसी गुटबाजियां, मिलीभगत और गुपचुप कारगुजारियां नहीं चलने दी जाएं। अगर बर्खास्तगी की मांग का ‘वामपंथी’ तरीका कामयाब नहीं होता है तो वर्तमान कुलपति और निदेशक संपादक के बने रहने तक दोनों संस्थाओं से असंबद्धता का ‘गांधीवादी’ तरीका अपनाया जाना चाहिए।
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जनसत्ता संवाददाता ♦ साहित्य अकादेमी की गोवा के कलंगूट तट पर आयोजित सामान्य परिषद जनरल काउंसिल की बैठक अपूर्व हंगामे के साथ संपन्न हुई। बैठक में विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के आचरण के विरोध में एक सदस्य ने निंदा का प्रस्ताव रखा। अकादेमी के नियमों में न होने की वजह से उसे स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन उपाध्यक्ष सतिंदर सिंह नूर सहित सदस्यों ने लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहने-छापने की अनौपचारिक रूप से भर्त्सना की। निंदा प्रस्ताव सभा में हरीश नारंग ने रखा। इसका फौरी समर्थन नंदकिशोर आचार्य ने किया। नारंग ने कहा कि वीएन राय का महिला लेखकों के बारे में दिया गया आपत्तिजनक वक्तव्य साहित्य जगत में अपूर्व हादसा है।
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अजितकुमार ♦ इस नयी लहर की झोंक में पड़ कर किन्हीं लेखिकाओं ने अगर आत्मकथाओं में अपने पराक्रमों की सच्ची-झूठी गाथाएं लिख कर वाहवाही लूटी और इससे व्यथित होकर पुरानी चाल का कोई व्यक्ति इसे ‘छिनरपन’ समझ बैठा… तो उचित था कि उसकी दकियानूसी हंस कर बिसरा दी जाती। जरूरी न था कि तमाम लेखिकाएं – लेखक व्यग्र हो स्त्री की सीता-सावित्री-छवि बरकरार रखने में जुट जाएं। अभियान चलाने से वह छवि लौटने वाली नहीं – अगर वह होगी या रहेगी तो स्त्री-पुरुषों के और पूरे समाज के संयत-मर्यादित आचरण से ही… स्वेच्छाचार की नकारात्मकता के आंतरिक बोध से ही… इसका अभियान तो केवल कुंठित-प्रतिबंधित ही करेगा – सबसे अधिक उस स्वतंत्रचेता नारी समुदाय को ही…
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अनामिका ♦ देहवाद क्या होता है? सर्वथा देहवादी तो कोई भी चित्रण नहीं होता – अगर वह साहित्यिक और सौंदर्य शास्त्रीय ताने-बाने में गुंथा हुआ है और उसे पढ़ने वाली गांव-कस्बों तक की स्त्रियां उसमें अपनी समस्याओं का प्रतिबिंबन पाती हैं। कौन माई का लाल कहता है कि स्त्री आत्मकथाकारों के यहां दैहिक दोहन का चित्रण पोर्नोग्राफिक है? घाव दिखाना क्या देह दिखाना है? पूरा स्त्री-शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है। स्त्रियां घर की देहरी लांघती हैं तो एक गुरु, एक मित्र की तलाश में, पर गुरु मित्र आदि के खोल में उन्हें मिलते हैं भेड़िये। और उसके बाद प्रचलित कहावत में ‘रोम’ को ‘रूम’ बना दें तो कहानी यह बनती नजर आती है कि ‘ऑल रोड्स लीड टु अ रूम।’
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डेस्क ♦ नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने माफी मांगी है। इसी सिलसिले में उन्होंने एक चिट्ठी जनसत्ता को भेजी है। माफी इसलिए नहीं कि उनसे भूल हुई। वो छिनाल कांड से हिंदी साहित्य जगत को कितनी शर्मिंदगी होगी, इसका अंदाजा नहीं लगा सके। बल्कि माफी इसलिए कि विभूति नारायण राय का इंटरव्यू उन्होंने पढ़ा नहीं था और वो हू-ब-हू छप गया। मतलब साफ है, रवींद्र कालिया झूठ बोल रहे हैं। उनमें तो इतना नैतिक साहस भी नहीं कि गलती कबूल करें और संपादक होने का फर्ज अदा करें। वो अपना गुनाह दूसरों पर थोप रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे विभूति नारायण राय ने गुनाह कबूल करने से पहले कहा था कि उन्होंने छिनाल शब्द का प्रयोग ही नहीं किया था। मतलब कालिया विभूति नारायण राय की तरह ही कायर भी हैं।
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विष्णु खरे ♦ जहां तक मेरा आकलन है, हिंदी साहित्य में राय-कालिया की प्रतिष्ठा यदि कभी थी भी तो आज फूटी कौड़ी की नहीं रह गयी है। लेकिन अधिकांश ऐसे प्राणी, उनके सरपरस्त और समर्थक गंडक-चर्म में वाराहावतार होते हैं। उन्हें न व्यापै जगत-गति। फिर जिस समाज में हत्यारे, बलात्कारी, डकैत, स्मग्लर, करोड़ों का गबन करने वाले संसद तक पहुंच रहे हों वहां हिंदी, जो खुद गरीब की जोरू की तरह सबकी भौजाई या साली है, भले ही उसका एक गांधी विश्वविद्यालय हो, उसकी लेखिकाओं को छिनाल कह देना तो एक होली की ठिठोली से ज्यादा कुछ नहीं। हिंदी साहित्य को अब ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ से कुलटा, रखैल, समलिंगी, हिजड़ा, ‘निंफोमैनिएक’ सुपर-विशेषांकों और ग्रंथों की विकल प्रतीक्षा रहेगी।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
विष्णु खरे ♦ ‘जिन्हें देवता बर्बाद करना चाहते हैं पहले उन्हें विकल मस्तिष्क कर देते हैं’ वाली यूनानी कहावत के मुताबिक हमारे कुलपति का दिमाग लेखक होने के उनके वहम और वामपंथियों के अपनी वर्दी की कई जेबों में होने की खुशफहमी ने तो खराब कर ही दिया होगा, हिंदी कुलपति होने की सत्ता के कारण राष्ट्रव्यापी अधिकांश हिंदी प्राध्यापक-लेखक-प्रकाशक गुलामी जो उन्हें अनायास प्राप्त हो गयी उसने उन्हें विभूति-विभ्रम का आखेट बना डाला। हम अधिकांश हिंदी विभागों की गलाजतों को जानते ही हैं। स्वयं गांधी विवि में सैकड़ों पद और छात्रवृत्तियां हैं, एमलिट, एमफिल, पीएचडी के निबंध-प्रबंध हैं, अपने अपने रुझान के उपयुक्त छात्र-छात्राएं हैं, लेखक-लेखिकाओं को बुलाने के लिए बहाने, बहकावे-बहलावे हैं।
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जनसत्ता ♦ विभूतिनारायण राय जैसे लोग अगर ज्ञानपीठ पुरस्कार की चयन समिति के सदस्य हैं तो प्रतिष्ठान की दशा का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। यानी न्यास के प्रकाशनों, पुरस्कार और पत्रिका सबको समझौते की राह पर हांक दिया गया है। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में पतन की यह दोहरी मिसाल है। राय के साथ कालिया की युगलबंदी समझी जा सकती है। जिस कुलपति और संपादक को स्त्रियों के रचनात्मक संघर्ष और साहसिक लेखन में चरित्रहीनता नजर आती हो, उनकी मानसिकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। बहरहाल, एक कमइल्म कुलपति से तो शायद मानव संसाधन मंत्रालय निपट ले, एक कमजर्फ संपादक को नसीहत कहां से मिलेगी?
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आशुतोष भारद्वाज ♦ हिंदी की कुछ प्रमुख लेखिकाओं ने वीएन राय को सत्ता के मद में चूर बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की मांग की है। मशहूर लेखक कृष्णा सोबती ने कहा, ‘अगर उन्होंने ऐसा कहा है, तो यह न केवल महिलाओं का अपमान है बल्कि हमारे संविधान का उल्लंघन भी है। सरकार को उन्हें तत्काल बर्खास्त करना चाहिए।’ मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं, ‘राय का बयान पुरुषों की उस मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो पहले नयी लेखिकाओं का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं और नाकाम रहने पर उन्हें बदनाम करते हैं।’ वे कहती हैं, ‘ये वे लोग हैं जो अपनी पवित्रता की दुहाई देते हुए नहीं थकते हैं।’ पुष्पा कहती हैं, ‘क्या वे अपनी छात्रा के लिए इसी विशेषण का इस्तेमाल कर सकते हैं?’



