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Articles tagged with: jansatta

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[7 Mar 2010 | One Comment | ]
इस देश में आहत भावनाओं की सियासत होती है जनाब!

साजिद रशीद ♦ कैसी विडंबना है कि भावनाओं के आहत होने के प्रश्न पर कट्टरपंथी मुसलमानों और फासीवादी हिंदुओं के साथ मार्क्सवादी भी खड़े नजर आते हैं। खैर, यहां मार्क्सवादियों पर बहस इसलिए नहीं करना चाहूंगा कि वे अब कांग्रेसियों का एक शिष्ट रूप धारण कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में तसलीमा नसरीन के साथ उन्होंने जो सलूक किया, उसके बाद तो उनके चेहरे से सारे नकाब उतर गये हैं। दरअसल, उन्हें भी सत्ता की राजनीति का खेल रास आ गया है और अब वे सिद्धांतों और राजनीतिक मूल्यों की बहस में पड़ना नहीं चाहते हैं।

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[7 Mar 2010 | 4 Comments | ]
हुसैन लीला का उत्तर कांड

अशोक वाजपेयी ♦ अनेक राजनीतिक दलों ने हुसेन की वापसी की गुहार अब लगायी है। इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने हुसेन के खिलाफ अभियान चलाया और उसे शह दी। क्यों नहीं अब सब दल मिलकर हुसेन के बारे में एक संयुक्त बयान जारी करते? क्यों भारत सरकार दोहरी नागरिकता पर बनने वाले और स्थगित कानून को पास कराके हुसेन की भारतीय नागरिकता बनी रहने का जतन नहीं करती? क्यों नहीं भारत सरकार हुसेन को भारत रत्न से सम्मानित करती? सौ से अधिक कलाकारों-लेखकों-बुद्धिजीवियों ने तीन बरस पहले इसके लिए राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया था। क्यों नहीं राज्य सरकारों को हिदायत दी जाती कि वे हुसेन को मारने या घायल करने की सार्वजनिक धमकियां देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करें?

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[7 Mar 2010 | One Comment | ]
वक्त को छोड़ कर हुसेन के पास सब कुछ इफरात में है

विष्‍णु खरे ♦ हुसेन ने कतर की नागरिकता क्यों स्वीकार की? क्या उन्होंने इसके लिए कोई अर्जी-दरख्वास्त दी या आरजू मिन्नत की या वह उन्हें एकतरफा मेहरबानी में अता की गयी? यह तो सभी को मालूम है कि जब हिंदुस्तान का कोई मुसलिम नागरिक किसी भी हलके में अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर लेता है तो सारा इस्लाम उस पर सही फख्र करने लगता है और सारे मुसलिम देशों और शासकों की सरहदें और दर उसके लिए ठीक ही खुल जाते हैं – आखिर भारतीय हिंदू क्या ऐसा नहीं करते? शेख हम्माद और शेखा मोजा भी हुसेन के जाती दोस्त और सरपरस्त हैं। शायद उन्हें जब ऐसा लगा होगा कि उनका दोस्त अपने मुल्क में ही मुसीबत में है, तो उसे अपनी बादशाहत में पनाह देना उन्होंने गैर-मुनासिब न समझा।

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[24 Feb 2010 | One Comment | ]
पुणे के सतीश शेट्टी… बेगूसराय के शशिधर मिश्रा…

जनसत्ता ♦ पुणे के सतीश शेट्टी के बाद बिहार में बेगूसराय के शशिधर मिश्र ऐसे दूसरे शख्स थे, जिन्हें सिर्फ इसलिए जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों का पर्दाफाश करने के लिए सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल किया था। यों बिहार से लगातार ऐसी खबरें आती रही हैं कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई का इस्तेमाल करने वाले लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है या फिर झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें तबाह करने की कोशिश की जा रही है। एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या यह बताती है कि बदलाव और विकास के शोर के पीछे बिहार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

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[14 Feb 2010 | 22 Comments | ]
जब ब्रूनो की बेटियां भी पूर्व IPS के हरम में खुश हैं…

राजकिशोर ♦ हमारी प्रार्थना यह है कि तलवार उठा ही ली है, तो उससे सिर्फ घास-फूस न काटिए, ऐसी डालियों पर भी वार करें जो बगीचे की पूरी हवा में विष और बदबू घोल रही हैं। समकालीन हिंदी साहित्य का परिदृश्य विचार के स्तर पर वीरगाथा काल का है, पर आचरण के स्तर पर भक्तिकाल और रीतिकाल कुछ ज्यादा ही हावी हैं। यह वह समय है जब ब्रूनो की बेटियां भी एक पूर्व पुलिस अधिकारी के हरम में शामिल होकर प्रसन्न हैं। ऐसे माहौल में, वाग्वीरता को कर्मवीरता में बदला जा सके, तो पचास साल बाद होने वाली क्रांति पांच साल में ही हो सकती है।

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[26 Jan 2010 | 10 Comments | ]
तुम्‍हारे पास कांव-कांव, हमारे पास कट्ठा कट्ठा अखबार!

विनीत ♦ एक-दो वेबसाइटों के बहाने कैसे उन्होंने पूरे हिंदी वेबमीडिया को परिभाषित करने का काम किया, ये हम सबसे छिपा नहीं है। इसलिए ये लेख पाठकों के प्रति ईमानदारी बरतते हुए किसी भी तरह की नॉलेज शेयरिंग के बजाय अखाड़ों के पैंतरे बतलाने के लिए लिखे गये। बदले की उस भावना के तहत लिखे गये कि तुम्हारे पास कांव-कांव करने के लिए ब्लॉग या वेबसाइट का छज्जा है, तो मेरे पास दहाड़ने के लिए संपादकीय और कॉलम के डेढ़ से दो कठ्ठे की जमीन में फैली अटारी है। यकीन न हो तो जनसत्ता के लेख की भाषा में ही देख लीजिए, ब्लॉग-जगत के चंद नियतिहीन कोनों में हिंदी के कुछ मीडियाकर्मी न्यूयॉर्क की सड़कों पर पखावज बजा कर कीर्तन करने वाले हरे-कृष्ण अनुयायियों की तरह कुछेक सुरीले-बेसुरे नारे जरूर उठा रहे हैं; पर उनके सुरों में दम नहीं।

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[25 Jan 2010 | 5 Comments | ]
न्‍यू मीडिया पर अलग-अलग नज़र

डेस्‍क ♦ इस रविवार दो अख़बारों में न्‍यू मीडिया पर दो महत्‍वपूर्ण लोगों ने कलम चलायी। जनसत्ता में अपने नये कॉलम का आगाज़ करते हुए मृणाल पांडे ने और हिंदुस्‍तान टाइम्‍स में वीर सांघवी ने। न्‍यू मीडिया को जहां मृणाल पांडे संदेह और अस्‍पृश्‍य नज़रों से देख रही हैं, वहीं वीर सांघवी इसे कमाल का माध्‍यम बता रहे हैं। हम दोनों ही नज़रियों को आमने-सामने रख रहे हैं। फ़ैसला आप करें कि किसकी बात में कितना वज़न है।

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[24 Jan 2010 | 11 Comments | ]
भद्र बंगाल का नया शगल : बीवियों के पोर्न वीडियो

तसलीमा नसरीन ♦ बंगाली सेक्स वीडियो देख कर सोचती हूं कि जिन स्त्रियों को यौनदासी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, क्या वे चाह कर भी लोरेना बबिट हो सकती हैं? लिंडा बोरमैन हो सकती हैं? अमेरिकी महिला लिंडा बोरमैन का पति जबर्दस्ती उसकी पोर्न तस्वीरें बनाता था। मारने की धमकी देता था। कनपटी पर पिस्तौल रख कर उसके कपड़े उतरवाता, सेक्स करता और उन सबकी वीडियो तस्वीरें बना कर बाहर बेच देता। डर के मारे लिंडा अपने पतिदेव का निर्देश मानने को बाध्य होती। लेकिन एक दिन वह डर-भय त्याग कर दृढ़ होकर खड़ी हो गयी। उसने कानून का दरवाजा खटखटाया, पति को तलाक दे दिया।

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[24 Jan 2010 | 3 Comments | ]
विकास का पहिया

ओम थानवी ♦ मुख्य सड़कों के समांतर बनी ये सड़कें लगभग आठ फुट चौड़ी होंगी। सड़कों पर तीन साइकिल सवार एक साथ गुजर सकते हैं। कार वाले साइकिल सवार के लिए अदब से रुक जाते हैं। साइकिल वाले पैदल चलने वाले के लिए। साइकिल पथ पर कई जगह अब लाल-हरी बत्तियां भी लगा दी गयी हैं। बत्तियों से पहले रेलिंग लगी हैं। इन पर लिखा है, ‘जनाब, यहां पांव रख कर सुस्ताएं। और शहर में साइकिल सवारी के लिए शुक्रिया।’ मुख्य सड़कों के हाशिये पर चौड़े से स्तंभ स्थापित हैं। इनमें लगा उपकरण पास से गुजरने वाली साइकिलों की गणना करता है। शहर के तापमान और वक्त के साथ आप देख सकते हैं कि उस रोज और महीने में अब तक कितने साइकिल सवार वहां से गुजर चुके हैं।

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[24 Jan 2010 | 5 Comments | ]
ऊबे हुए दुखी

ओम थानवी ♦ डेनमार्क में भ्रष्टाचार भी कम है। या कहें, ईमानदारी बहुत है। कहा जाता है, दुनिया में सबसे ज्यादा। इसका एक सुखद अनुभव मुझे भी हुआ। तड़के चार बजे हवाई अड्डे पहुंचा। टैक्सी वाले से पूछ लिया था कि कितना भाड़ा होगा। उसने कहा कि मीटर पर निर्भर है, पर अंदाजन ढाई सौ क्रोनर (ढाई हजार रुपये)। मैंने बताया कि मीटर ज्यादा बोला तो आपको बाकी यूरो लेने पड़ेंगे। वह राजी था। मैं रास्ते में सोचता रहा, पता नहीं कितने यूरो और देने होंगे। हवाई अड्डे पहुंच उसने बटन दबाकर मीटर देखा, मेरा सामान उतारा और बोला – दो सौ पच्चीस। मैंने सांस ली और ढाई सौ क्रोनर उसकी हथेली पर रख दिये – बाकी आपके। डेनमार्क में टिप का कायदा नहीं है। उसने कुछ झुक कर कहा – टक!