Articles tagged with: JNU
विश्वविद्यालय, संघर्ष »
तैमूर रहमान ♦ मैं यह भी कहना चाहूंगा, अगर मैं सुर में न गाऊं तो क्या आप खड़े होकर चल देंगे! मैं कहता हूं कि मुझे सुनें, मैं आपके लिए गाऊंगा, मेरी कोशिश होगी कि मैं सुर के साथ गा सकूं। मैं संगीत के माध्यम से कहानी कहना चाहता हूं। यह कहानी हमारे संघर्ष की कहानी है। यह बेसुरा है, गड्डमड्ड है, शोर से भरा है, बिखरा है, क्योंकि हमारी इस दुनिया के संदर्भ में हमारी कहानी भी ऎसी ही है। मैं बस इतना भरोसा दिलाना चाहता हूं, यह हमारी कहानी है, यह दिल से निकलती है। पाकिस्तान में कम्युनिस्टों के बीच में हुई टूट का हिंदुस्तान की टूटों से लेना-देना नहीं है। पकिस्तान में बस दो ही पार्टियां हैं जो अपने को कम्युनिस्ट पार्टी कहती हैं, कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट मजदूर किसान पार्टी, और हम दोनों में घनिष्ठ संबंध हैं।
नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
अपूर्वानंद ♦ त्रिथा ने युवावस्था के कच्चे उत्साह में अपना लाल आंचल लहरा कर कहा कि मैं भी लाल हूं। उस पूरे माहौल में स्वीकार किये जाने का यह आग्रह कैसे ग्रहण किया गया, मालूम नहीं। फिर वे गाने लगीं। लेकिन जो गा रही थीं, वह कोई जन गीत नहीं था, न क्रांतिकारी संगीत ही। वह शास्त्रीय रागों की उनकी आवाज और पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों के मेल से की गयी अदाकारी थी। आवाज में दम था तो आशंकित श्रोता-वर्ग पर उन्होंने असर छोड़ा। लेकिन तीसरा गीत ‘गणपति’ जैसे ही उन्होंने शुरू किया, जन-समूह में बेचैनी की लहर दौड़ने लगी। ‘वापस जाओ’, ‘गो बैक’ कह कर उन्हें दुरदुराया जाने लगा। तुरत ही मंच पर आयोजक पहुंच गये और त्रिथा को उन्होंने गाना बंद कर देने को कहा। यह सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या की एक घटना थी।
असहमति, विश्वविद्यालय, शब्द संगत, संघर्ष »
रेयाज उल हक ♦ हिरावल ने जो गीत पेश किये, उनमें बहुत सोच-समझ कर गोरख के गीत से नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम, मार्क्स, लेनिन, माओ, भोजपुर आदि के संदर्भ हटा दिये गये थे। यह पहला मौका नहीं था, जब इन पंक्तियों को गीत में नहीं गाया गया… जबकि ये पंक्तियां ही गीत की वास्तविक राजनीति को पेश करती हैं। वैसे भी यह गीत बिहार-उत्तर प्रदेश की संघर्षरत जनता के बीच रचा गया था और गोरख ने इसे इस रूप में लिख कर बाकी इलाकों में बेहद लोकप्रियता दी थी। हिरावल ने वीरेन डंगवाल की जो कविता गाकर पेश की, वह अपनी मूल बनावट में निजी पूंजी और इससे पैदा हुए व्यापक संबंधों-संदर्भों को चुनौती देना तो दूर, खुद को इन संबंधों और संदर्भों के आधार पर ही विकसित करती है।
असहमति, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
प्रकाश के रे ♦ जेएनयू के उस खुले मैदान और वहां आये लोगों के हिसाब से, फिर बैंड के संगीत की जरूरत के मुताबिक, जिस तरह के साजो-सामान की जरूरत थी, उसका खर्चा ही अकेले लाख रुपये से कहीं अधिक होता है। इसमें साउंड-सिस्टम, टेंट-दरी, रौशनी आदि शामिल हैं। आप खर्च में खाने-पीने, आने-जाने, प्रचार आदि को भी जोड़ सकते हैं। शुभम का फीस की बात कहना बिना किसी आधार का है और इसे उन्हें ठीक कर लेना चाहिए। रही बात, कॉमरेडों की पैसे को लेकर चिंतित होने की बात, तो मैं बस यही कहना चाहता हूं कि यह चिंता नहीं होती, बल्कि एक आयोजन करने का रोमांच होता है, उलझने होती हैं, मजा होता है, परेशानी होती है, संतोष का कोना होता है।
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आशुतोष कुमार ♦ बैंड ने ‘उम्मीदे सहर’ से ले कर ‘जागो जागो सर्वहारा’ तक अपने सभी मशहूर नंबर पेश किये। स्टीरियो की जबरदस्त धमक और गिटार की गूंज के बीच ‘नाल फरीदा’ भी आया और ‘दहशतगर्दी मुर्दाबाद’ भी। इस गाने के पहले तैमूर ने साफ-साफ कहा भी कि पाकिस्तान की सारी तरक्कीपसंद अवाम अच्छी तरह जानती है कि मजहबी दहशतगर्द सामराज के पिट्ठू और लट्टू हैं। उन की आपसी लड़ाई एक धोखा है। असली लड़ाई अवाम और सामराज के बीच है। मजहबी दहशतगर्द अवाम के साथ नहीं, सामराज के साथ हैं। लेकिन कुछ वामपंथी भी अपने भोले जोश में इन्हें सामराज-दुश्मन माने बैठे हैं और हमारी बहस उनसे भी है। तैमूर की आशंका सच निकली। अनेक कट्टर क्रांतिकारी अब इसी गाने के लिए उन की लानत-मलामत कर रहे हैं।
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शुभम श्री ♦ हैचेट और पेंगविन अगर हॉब्सबाम और मार्क्स को बेच रहे हैं तो उनका चरित्र नहीं बदल जाता। लाल एक मशहूर बैंड है पर वो उसी तरह प्रोफेशनल है जैसे बाकी के बैंड्स। बस उसका कंटेट अलग है। सिर्फ इसलिए कि लाल फैज को गा रहा था, हम उनके खराब गाने की तारीफ तो नहीं कर सकते। फैब इंडिया के ब्रांड एंबैसेडर्स के इस कैंपस में जहां आज भी लोग अंग्रेजी की भारी-भरकम रीडिंग्स को समझने में संघर्ष करते हैं, मुक्तिबोध और गोरख को गाया जाना बहुत बड़ा सुकून है। लेकिन उस सुकून देने वालों का क्या आदर हुआ, सबने देखा। हिरावल को ढंग से इंट्रोड्यूस करना तो दूर, एक बुके तक नहीं दिया गया। क्या जसम की इकाई होने के कारण वह घर की मुर्गी दाल बराबर है?
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
तैमूर रहमान ♦ मेरा नौजवान कॉलेज ग्रेजुएट वाला ‘आत्म’, जिसे असली दुनिया का कोई अनुभव नहीं था, जिसने रोजी-रोटी के लिए या किसी आंदोलन के लिए कभी काम नहीं किया था, जिसे मेहनतकश तबके की असली राजनीति का कोई अनुभव नहीं था, वह मुझे, इस 36 साला व्यक्ति को एक छद्म-बुर्जुआ बुद्धिजीवी समझता जो यह सब कुछ अपने को आगे बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने के लिए कर रहा है। इसीलिए मैं समझ सकता हूं कि क्यों कुछ अनुभवहीन नौजवान कॉमरेड आज मेरे बारे में ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन मेरा भरोसा है कि वह दिन आएगा, जब उन्हें भी अपने आज के जवान और आदर्शवादी निर्णयों पर पुनर्विचार करना होगा।
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झेल कुमारी ♦ मोरल ऑफ द कमेंट्री ये है कि किताबें छपवाने के लिए औरतें भले महिला लेखन की विशेष श्रेणी का प्रयोग करें पर असल में वो इस श्रेणिबद्धता के खिलाफ हैं। “फेमिनिज्म जिस पुरुषविहीन समाज की कल्पना करता है मैं उससे इत्तेफाक नहीं रखती – मनीषा कुलश्रेष्ठ ” [पुरुषविहीन पर तवज्जो दी जाए, स्पिवाक माता की पोथी भी देखी जाए] वैसे भी दोस्तो, मुंह से बोलकर क्रांति करने में तो भारतीय लेखक उस्ताद हैं ही, बस वो क्रांति छपने और प्रकाशन के स्तर पर नहीं होनी चाहिए। बाकी तो मामला फिट रहता है। दूसरा मोरल कि यूनिवर्सिटी प्रोफेसर [वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व] स्वाभाविक रूप से घमंडी होता है, साहित्य का है तो लेखकों को फूटी आंख पसंद नहीं करता, अगर वो उसकी पार्टी के नहीं हैं तो।
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राहुल तिवारी ♦ सवाल पर सवाल और हर सवाल पर उसी संयम और सहजता के साथ जवाब देख-सुन कर रामायण के राम और रावण के बीच चलने वाले तीर के टकरा कर गिर जाने का वो दृश्य याद आ रहा था, पर यहां राम एक थे और विपक्ष की ओर से आने तीरों की भरमार थी। संजीवनी के नाम पे एक पुड़िया पान मंगाया गया था उनके लिए। रात हो चुकी थी। उनका चश्मा था, जो उतरने का नाम नहीं ले रहा था। हो सकता है रेबैन कारण!! और इसी के साथ एक ऐतिहासिक दिन का अंत हुआ, जिसमें भविष्य के इतिहास पुरुष ने अपना इतिहास हमारे सामने साझा किया … यूं तो लोग उनसे हाथ मिलाने की होड़ लगा रहे थे, पर पता नहीं क्यूं मेरा मन हाथ मिलाने का बिलकुल भी नहीं हुआ और मेरा माथा झुक गया और मैंने उनके पैर छू लिये।
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महताब आलम ♦ इरफान जेएनयू पहुंच चुके थे। जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया। आयोजकों की ओर से औपचारिक स्वागत भी हुआ। तोहफे के तौर पर एक कलम, महान अभिनेता बलराज साहनी जी का एक भाषण, जो जेएनयू के एक कॉनवोकेशन में दिया गया था और रमाशंकर विद्रोही जी का काव्य संकलन, “नई खेती” पेश किया गया। मेरी समझ में इन तीनों में सबसे अहम विद्रोही जी का काव्य संकलन था, जो इरफान को पेश किया गया। जो विद्रोही को सुन चुके हैं, मिल चुके हैं, वो मेरी इस बात को अहम बताने की वजह समझ सकते हैं। हां, एक बात और कि मेरे कहने का मतलब ये बिलकुल नहीं की बलराज साहनी का भाषण कम अहम है। मामला असल में संदर्भों का है।


