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मुझे मिला उस ‘अपराध’ का दंड, जो मैंने किया ही नहीं! 30

मुझे मिला उस ‘अपराध’ का दंड, जो मैंने किया ही नहीं!

कपिल शर्मा ♦ थाने में मुझे बाथरूम के अंदर ले जाकर एक मेज पर लिटा दिया गया। मेरे हाथ-पांव को चार-पांच लोगों ने पकड़ लिया। उसके बाद एक कांस्टेबल ने मेरे चेहरे पर गीला कपड़ा रखकर जकड़ दिया और ऊपर से पानी डालने लगा। ऐसे में मेरी सांस कुछ क्षणों के लिए रुक गयी और मैं छटपटाने लगा। हाथ-पैर भी दूसरों की पकड़ में होने के कारण मैं हील-डुल भी नहीं पा रहा था। उस समय मैं न तो सांस ले सकता था और न ही छोड़ सकता था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो नदी में डूब रहा हूं और किसी भी समय मैं खत्‍म हो जाऊंगा।

ये क्‍या हो गया है फिल्‍म पत्रकारों को… 5

ये क्‍या हो गया है फिल्‍म पत्रकारों को…

अब्राहम हिंदीवाला ♦ अफसोस नहीं होता। कोफ्त होती है। दोस्‍तों की हालत देख कर, जब एक टुच्‍ची खबर से उनकी नौकरी दावं पर लग जाती है। फिल्‍म पत्रकार हैं तो फिल्‍मों के अलावा सारी बातें करें। लाइफ स्‍टाइल और कपड़ों की बातें करे। स्‍टारों के अफेयर के बारे में रस लेकर बताएं। फिल्‍म की थीम और ट्रीटमेंट पर आप क्‍यों बात करते हैं… अरे भाई, रीडर नहीं चाहता कि आप गंभीर बातें करें। उसे तो सनसनी और उत्तेजना चाहिए। आप नहीं समझते तो नाहक यहां क्‍यों आ गये। मोहल्‍ला में दलित विमर्श चल रहा है। वंचितों की बात हो रही है। भाई मीडिया को भी वंचितों की परवाह नहीं है। वंचित अगर उनके संचित धन में इजाफा करता है, तो वह उपयोगी है। वर्ना लाइफ स्‍टाइल बेचो।

निरुपमा हत्‍याकांड : सीबीआई जांच का भरोसा मिला 1

निरुपमा हत्‍याकांड : सीबीआई जांच का भरोसा मिला

डेस्‍क ♦ प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने ‘निरुपमा को न्याय’ अभियान को आश्वासन दिया है कि वे पत्रकार निरुपमा पाठक की हत्या के मामले को संबंधित अधिकारियों के सामने उठाएंगे और इसे सीबीआई को सौंपने की प्रक्रिया तेज करने की कोशिश करेंगे। निरुपमा की मौत पर दुःख और चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि निरुपमा और उसका दोस्त भले ही अलग-अलग जातियों के रहे हों लेकिन वास्तव में, उनकी जाति और समुदाय एक ही – पत्रकार – थी जो कि आज के आधुनिक और वैश्विक होती दुनिया में ज्यादा महत्वपूर्ण है।

निरुपमा पाठक की हत्‍या हुई थी : फोरेंसिक रिपोर्ट 1

निरुपमा पाठक की हत्‍या हुई थी : फोरेंसिक रिपोर्ट

डेस्‍क ♦ पाठक परिवार चाहे जितना भी खुद को बेदाग़ साबित करने की कोशिश करे लेकिन निरुपमा की मौत से जुड़े परिस्थितिजन्य साक्ष्य चीख चीख कर कह रहे हैं कि उसकी ह्त्या की गयी थी। झारखंड की सरकारी फोरेंसिक प्रयोगशाला की प्राथमिक जांच रिपोर्ट के मुताबिक नीरू की ह्त्या की गयी थी। अंग्रेजी दैनिक “टाइम्स ऑफ इंडिया” ने राज्य पुलिस के सूत्रों के हवाले से बताया है कि पाठक परिवार के दावे के मुताबिक़ जिस पंखे से निरुपमा पाठक की लाश लटकती हुई पायी गयी थी, वह अपने “पर्फेक्ट शेप” यानी वास्तविक आकार में ही है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर नीरू ने सचमुच ख़ुदकुशी की होती तो पंखे के ब्लेड और दूसरे पुर्जों को कुछ नुकसान जरूर हुआ होता। यह रिपोर्ट राज्य के पुलिस महानिदेशक को सौंप दी गयी है।

टीवी पत्रकार अक्षय को बचा लीजिए, वह जीना चाहता है 8

टीवी पत्रकार अक्षय को बचा लीजिए, वह जीना चाहता है

अतुल पाठक ♦ प्राइवेट बिजनेस करने वाले पिता सुधीर कात्यानी ने बेटे के इलाज के लिए अपने जीवन भर की कमाई खपा दी। गाड़ी बंगला बेच दिया। लेकिन वो ठीक नहीं हुआ। अब अचानक डाक्टरों ने बताया कि इस बीमारी का कारगर इलाज आ गया है। सिर्फ दो लाख खर्च होंगे। लेकिन अब जबकि वो दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं, बेटे के इलाज के लिए दो लाख कहां से लाएं। तो क्या, इकलौते जवान बेटे को यूं ही हाथ से चले जाने दें। मजबूर पिता क्या करे? मदद के नाम पर सबने हाथ खड़े कर दिये हैं। बेटे को अल्सरेटिव्ह कोलाइटिस है। खून की उल्टी, दस्त होते हैं।

कौन कहता है कि “पा” अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म है? 5

कौन कहता है कि “पा” अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म है?

अनुराग अन्‍वेषी ♦ इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से। यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।

क्‍यों छुपायी जा रही है “पा” की असली कहानी? 12

क्‍यों छुपायी जा रही है “पा” की असली कहानी?

रवीश कुमार ♦ हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाक़ाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार है। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी लतखोर मीडिया की।

“मोहल्‍ला लाइव बंगाल पुलिस का दलाल हो गया है!” 9

“मोहल्‍ला लाइव बंगाल पुलिस का दलाल हो गया है!”

डेस्‍क ♦ कल एक साथी ने कहा कि मोहल्‍ला लाइव पुलिस का दलाल हो गया है। वे हंस कर टालना चाह रहे थे, लेकिन मामला गंभीर था। संदर्भ आप समझ रहे हैं। छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के लिए बंगाल पुलिस का पत्रकार बनने का स्‍वांग। हमने सिर्फ यही सवाल उठाया कि बंगाल पुलिस ने अगर पत्रकार बन कर अपने लक्ष्‍य में कामयाबी पा ली, तो पत्रकारों को मिर्ची क्‍यों लग गयी? बहुत सारे मौक़ों पर बर्बर और शातिर जैसी संज्ञाओं से पुलिस को नहलाने वाले मीडिया को अगर पुलिस ने दुलत्ती दी है, तो अपनी चारित्रिक विशेषताओं का ही एक नमूना दिखाया है। ऐसा तो है नहीं कि पुलिस इस प्रकरण में ही साज़‍िश कर रही हो और बाक़ी तमाम पिछले कारनामों में पवित्रता से काम करती रही हो?

छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के तरीक़े पर सवाल क्‍यों? 11

छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के तरीक़े पर सवाल क्‍यों?

डेस्‍क ♦ अभी जब लालगढ़ में छत्रधर महतो गिरफ़्तार हुए, तो बिरादराना अस्मिता के हिमायती पत्रकारों की एक बड़ी फौज कलम लेकर उठ खड़ी हुई। “बंगाल पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया” और “पुलिस के धोखे से पत्रकारों की जान ख़तरे में, मीडिया ख़ामोश” जैसे नारों के साथ वर्चुअल पन्‍ने रंगे गये। लेकिन सवाल ये है कि पुलिस ने क्‍या ग़लत किया? जिसे वह पकड़ना चाहती है, उस तक पहुंचने के लिए उसने वही हथकंडे अपनाये, जिसका चलन पहले भी रहा है। वह आम आदमी के वेश में भी आरोपियों को पकड़ती रही है, तब तो किसी मीडिया वाले ने ये सवाल खड़ा नहीं किया कि पुल‍िस का ये तरीक़ा आम आदमी के भरोसे से खिलवाड़ है?

दलाल पत्रकारों की न सुनें, वीओआई कर्मियों का साथ दें 30

दलाल पत्रकारों की न सुनें, वीओआई कर्मियों का साथ दें

डेस्‍क ♦ वॉयस ऑफ इंडिया न्यूज चैनल मीडिया में टाइटैनिक जहाज की तरह आया। आज वो उसी टाइटैनिक की तरह डूब रहा है। किसी ने कल्‍पना भी नहीं की होगी की यहां के पत्रकारों को भूखे रहने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जो दूसरों के हक़ की बात करते हैं, आज उनका ही हक़ मारा जा रहा है। वॉयस ऑफ इंडिया के पत्रकार अब भी हड़ताल पर है। कई महीनों से बकाया अपनी तनख्वाह पाने के लिए वे धरने पर बैठे हैं। वीओआईकर्मियों ने तब तक धरने पर बैठने का फैसला किया है, जब तक उन्हें सारे पैसे न मिल जाएं। कर्मचारियों के इस क़दम से मालिकान हर चतुराई निबटने की कोशिश कर रहे हैं।