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Articles tagged with: kabaadkhaana

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[27 Dec 2009 | No Comment | ]
नारायण नारायण : कलजुगी औतारी उर्फ़ नौछम्मी नरैण

अशोक पांडे ♦ पर्वतपुत्र विकासपुरुष के नाम से ब्रह्मांड में ख्यात एक देवतुल्य राजनेता उर्फ़ नौछम्मी नरैण एक बार पुनः अपने अन्तःपुर में गोपियों के साथ पाये गये। पता नहीं इतना बावेला काहे मचा पड़ा है। उत्तराखंड में तो हर कोई कृष्णावतार की अलौकिक लीलाओं से वाकिफ़ है ही भाई! किन्तु धन्य हो! नब्बे का आंकड़ा छूने को तैयार बैठे इन्‍हीं कलयुगी कृष्णावतार की प्रशस्ति में गढ़वाल के मशहूर और अतीव लोकप्रिय गायक और मेरे अजीज़ मित्र श्री नरेंद्र सिंह नेगी ने कुछ वर्ष पूर्व इन्हीं देवतुल्य राजनेता पर आधारित एक गीत लिखा और गाया था। सूचना विभाग में अधिकारी के पद पर तैनात नेगी जी को इन्हीं नरैण की कृपा से नौकरी छोड़नी पड़ी थी।

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[29 Jul 2009 | 4 Comments | ]
उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार

अनिल ♦ कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने-गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की दुखती रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?

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[27 Jul 2009 | 2 Comments | ]
हिंदी लेखक कहां खड़ा है?

रविभूषण ♦ विचारधारा से लेखक बंधे हुए हों या नहीं, लेकिन मानव जीवन, समय और समाज से वह सदैव बंधा हुआ है। कवियों, लेखकों, आलोचकों, संस्‍कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों से यह सदैव अपेक्षा की जाती है और हिंदी में इसके अनेक नायाब उदाहरण हैं कि वे उन लोगों के साथ न हों, मंचस्‍थ भी नहीं, एवं सांप्रदायिक शक्तियों का अपने लेखन-वाचन में विरोध करना और समय-समय पर उनके साथ, कुछ समय के लिए ही सही, खड़े होना किसी भी दृष्टि से मुनासिब नहीं।

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[25 Jul 2009 | 7 Comments | ]
हम अपने ख़याल को सनम समझे थे

उदय कह रहे हैं कि वे गोरखपुर के कार्यक्रम योगी की उपस्थिति का राजनीतिक पाठ नहीं कर पाये। लेकिन उदय का ये रूप उनके विचारों में आये ज़बरदस्त परिवर्तन का नतीजा है। इस बात को वे स्वीकार भी कर चुके हैं। दिक्क़त ये है कि उनके चाहने वाले उस उदय को खोज रहे हैं, जो प्रगतिशील मूल्यों का पक्षधर होने का दावा करता था। वे नहीं देख पा रहे कि आजकल उदय ‘औलिया’ की रहमत में दुनिया का मुस्तकबिल देख रहे हैं, और मानते हैं कि लेखक को विचारों की बाड़बंदी से ऊपर होना चाहिए।

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[21 Jul 2009 | 2 Comments | ]
चोरी तो नहीं की है, डाका तो नहीं डाला!

उदय हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्हें एक ख़बर की हैडिंग और एक फोटो की बिना पर लगातार जलील किया जा रहा है। बिना यह देखे कि उनकी रचनाएं क्या कहीं भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हत्यारों के पक्ष में खड़ी हैं? हम क्यों भूल जाते हैं कि ये वही उदय हैं, जिनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर इन्हीं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने हंगामा खड़ा किया था। गुजरात दंगों पर अपनी झूठी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए नकली कविताएं लिखने वाले उनकी अस्मितावादी कहानी ‘मोहनदास’ पढ़ें और देखें कि विचारधारा कोई हो, सत्ता के आगे एक व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का हश्र क्या होता है।

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[20 Jul 2009 | 4 Comments | ]
गू खाने को ट्रेंड बनाने की कोशिश

♦ धीरेश सैनी
(एनबीटी यानी समीर जैन के नवभारत टाइम्‍स के एक प्रगतिशील क्रांतिकारी मुलाज़‍िम धीरेश ने उदय प्रकाश प्रकरण पर जनसत्ता में छपे लेख की प्रतिक्रिया में अपनी यह टिप्‍पणी लिखी है। इस टिप्‍पणी का तेवर ज़्यादा स्‍वाभाविक होता, अगर कुछ आरोपों का ज़‍िक्र करते हुए वे तथ्‍यात्‍मक ग़‍लतियों के रूप में अपना प्रतिशोध ज़ाहिर नहीं करते। बहरहाल हम इसे बिना किसी काट-छांट के पेश कर रहे हैं : मॉडरेटर)
उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर …

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[19 Jul 2009 | 5 Comments | ]
और अंत में घृणा

इस प्रतिक्रियावादी हिंदी समाज में माफी और सार्वजनिक आत्‍म-स्‍वीकार ही उदय प्रकाश की नयी स्‍वीकृत रचना हो सकता था, जिसे रच कर उन्‍होंने अपनी शख्‍स‍ियत को ऊंचा ही किया है। अपने ब्‍लॉग पर उन्‍होंने योगी के साथ अपनी मौजूदगी और उनके हाथों सम्‍मान लेने के लिए पाठकों से क्षमायाचना की है। क्षमायाचना के साथ ही यह अप्रिय विवाद ख़त्‍म हो जाना चाहिए। मगर उदय प्रकाश की अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति और प्रशस्ति से रश्‍क करने वाले उनके ख़‍िलाफ़ अभियान चलाने के मौक़े से जैसे चूकना नहीं चाहते थे, आसानी से छूटना भी क्‍यों चाहेंगे।

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[19 Jul 2009 | 10 Comments | ]
उदय प्रकाश का सत्यार्थ प्रकाश – भूल चूक लेनी देनी

उदय प्रकाश ने अपनी ग़लती मान ली। हिंदी के मिट्टी-प्रदेश का इतना बड़ा लेखक अपनी ग़लती को लिख कर स्वीकार कर ले, तो मान लिया जाना चाहिए कि यह महान लेखक इस वक्त अफ़सोस के घोर क्षणों में जी रहा होगा। मुझे विश्वास है कि ऐसे मुश्किल क्षणों से गुज़र कर यह लेखक पहले से और बेहतर हो जाएगा। इतनी ही अपेक्षा की थी कि वे अपनी ग़लती मान लें। उन्होंने मान ली। उदय प्रकाश ने एक अच्छी शुरुआत की है। उनको स्कूल से बर्खास्त करने की आततायी प्रिंसिपली मानसिकता से बचना चाहिए।

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[18 Jul 2009 | 5 Comments | ]
यंत्रणा और आत्‍मद्वंद्व के अंधेरे दिन

♦ उदय प्रकाश
मैंने और मेरे परिवार ने, एक बार नहीं कई कई बार लांछन, दंड, अपयश, अभाव और दुखों की ऐसी ही यंत्रणा झेली है। इस बार भी हमने पांच दिनों से न ठीक से खाया है, न सो सके हैं। मैंने बार-बार दुहराया है कि मैं कोई महान व्यक्ति नहीं हूं। कोई क्रांतिकारी, मठाधीश या सुपर स्टार नहीं। असली ज़िंदगी में एक बहुत साधारण मेहनत कश आम आदमी हूं। भाषा का मज़दूर। मेरा किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। मेरे लिए सभी राजनीतिक दल अब लगभग एक …

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[17 Jul 2009 | 3 Comments | ]
हिंदी साहित्य में ब्लॉग का हस्तक्षेप और उदयप्रकाश विवाद का सबऑल्टर्न पाठ

अच्छा होता अगर योगी आदित्यनाथ के हाथों उदयप्रकाश कोई सम्मान न लेते। लेकिन उतना ही अच्छा होता अगर तमाम प्रगतिशील पत्रिकाओं में बीजेपी और कांग्रेसी और वामपंथी सरकारों के विज्ञापन न छपते (क्या ये बताने की जरूरत है कि भारत में सरकारों का चरित्र क्या होता है)। और शायद उससे भी अच्छा होता कि उदयप्रकाश के आदित्यनाथ से सम्मान लेने के खिलाफ गोलबंदी दिखाने वाले साहित्यकारों ने लालगढ़ में आदिवासियों के संहार के खिलाफ या नंदीग्राम और सिंगुर में राजकीय हिंसा के खिलाफ “भी” ऐसा ही एक वक्तव्य जारी किया होता (मैं जानता हूं कि ये बेहद अश्लील और सांप्रदायिक फासीवादी किस्म की अलोकतांत्रिक मांग है)।