Articles tagged with: kapil sibal
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
डेस्क ♦ विभूति नारायण राय की महिलाओं के बारे में की गयी अमरवाणी के सिलसिले में आज महिलाओं का एक डेलीगेशन मानव संसाधन मंत्री से मिला। डेलीगेशन मंत्री से मिल कर माफीनामे की गारंटी लेकर निकला – लेकिन कार्रवाई के मसले पर जब मंत्री ने हाथ खड़े कर दिये, तो डेलीगेशन के पास भी वापस लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था। इससे पहले विभूति नारायण राय आज सुबह दस बजे ही कपिल सिब्बल से मिले। सूत्रों के मुताबिक सिब्बल ने उनको धैर्यपूर्वक सुनने के बाद कहा कि आप एक संवैधानिक पद पर हैं और इस मामले में काफी कंट्रोवर्सी हो चुकी है, लिहाजा आप अनकंडिशनल माफीनामा लिख कर दें…
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
हमलोग ♦ वर्धा विश्वविद्यालय के वीसी की अश्लील टिप्पणी से पूरे साहित्यिक और अकादमिक जगत में रोष है और समाज में इसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई है। विभूति नारायण राय ने इससे पहले अपने विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एल करुण्यकारा को बाबा साहेब आंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर हुए कार्यक्रम में शामिल होने के लिए नोटिस जारी किया था, जिसकी तमाम दलित और लोकतांत्रिक बुद्धिजीवियों ने कड़ी निंदा की थी। विभूति नारायण राय के वीसी रहने के दौरान यह विश्वविद्यालय लगातार गलत कारणो से चर्चा में है और वहां शैक्षणिक माहौल खत्म हो चुका है। इस वीसी के रहते महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में उचित शैक्षणिक माहौल नहीं बन सकता।
मोहल्ला दिल्ली, विश्वविद्यालय, शब्द संगत, समाचार »
डेस्क ♦ विभूति नारायण राय अब मुश्किल में हैं। जी न्यूज की वेबसाइट पर छपी खबर के मुताबिक मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि अगर विभूति ने लेखिकाओं के प्रति भद्दी टिप्पणी की है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। कपिल सिब्बल ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां महिलाओं के प्रति उस व्यक्ति की सोच को दर्शाती हैं और एक कुलपति ऐसी बात कहे, यह समझ से परे है। यह उस पद की गरिमा के विरुद्ध है और ऐसे व्यक्ति को उस पद पर बने रहने का कोई हक नहीं। समाचार एजेंसी पीटीआई की तरफ से जारी की गयी इस खबर के मुताबिक कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि जांच में दोषी पाये जाने पर विभूति नारायण राय के खिलाफ कार्रवाई होगी।
नज़रिया, समाचार »
आलोक श्रीवास्तव ♦ भारत में साक्षरता से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक था कि इस अवधि को 50 वर्ष से घटा कर 30 या 40 साल किया जाए। यह बिल्कुल अव्यवहारिक है कि यह अवधि 50 या 60 साल हो। एक उदाहरण देना चाहूंगा, 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस ने देश में सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शुरू कर दिया था। क्या यह आवश्यक नहीं है कि देश में बड़े पैमाने पर भारत की वास्तविक सर्वधर्म संस्कृति का बोध पैदा हो? जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया भारत के इस साझे इतिहास का गहरा बोध अपने पाठक के मन में पैदा करती है। परंतु भारत के शिक्षित समुदाय में से बहुत ही कम लोगों ने इस पुस्तक को पढ़ा होगा। सन 2025 में यह किताब कॉपीराइट मुक्त हो सकेगी।
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
अजित सिंह ♦ राज्यसभा में 29 सदस्यों ने इस विधेयक के विरोध में अपना भाषण दिया लेकिन विडंबना यह है कि जनता के हितों के बारे में गंभीरता से विचार करने वाले इस सदन के एक भी सदस्य ने इस विधेयक के ख़िलाफ वोट देने का साहस नहीं जुटाया। इस विधेयक का नाम तो शिक्षा अधिकार विधेयक है, जिसके बारे में इसके पक्षधर कह रहे हैं कि यह 6-14 साल के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन वे बड़ी सफाई से इस बात को गोल कर देते हैं कि इस विधेयक के लागू होने के पहले तक सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले के आधार पर पहले से ही 0-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला हुआ है।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
हेमेंद्र मिश्र ♦ अभी अभी बीते आम चुनाव में खबरों को जब बाजार की सुनहली पालकी में झुला कर उपभोक्ता के सामने रखा गया, तो खूब हाय-तौबा मची। चारों ओर से यह आवाज उठने लगी कि पत्रकारीय मूल्य में गिरावट आ गयी है और ख़बरों को अर्थ के आधार पर तय किया जाने लगा है। आप कुछ भी छापें हमें फर्क नहीं पड़ता… और खबरों से खेलना ही आपकी पत्रकारिता है… जैसे जुमले प्रयोग होने लगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि ख़बरों को मसाले की छौंक मारकर परोसने का धंधा हाल ही में शुरू हुआ है। बल्कि इस तथाकथित मज़बूत स्तंभ पर आर्थिक या यूं कहे मिलावट की पुताई आज़ादी के बाद से ही शुरु हो गयी थी।
नज़रिया »
ख़बरों में मिलावट को रोकने के लिए कानून बना पाना संभव होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। अमूमन सभी मीडिया संस्थान किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। हर जगह ख़बरों के साथ घालमेल किया जाता है और सबसे बड़ी बात अगर कभी मीडिया को क्रॉसचेक करने के लिए कानून बनाने की बात की जाती है, तो हम सब यानी पूरा मीडिया ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर अंकुश लगाने के आधार पर ऐसे किसी कानून का विरोध करने लगेंगे। निकट भविष्य में यह जरूर संभव हो सकता है कि मीडिया के लिए कोई गाइडलाइन बनायी जाए और उन गाइडलाइंस का पालन न करने वालों पर जुर्माना लगाया जाए। पर, ऐसी कोई गाइडलाइन तैयार कर पाना भी आसान काम नहीं होगा।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
घूम फिरकर आपकी शिक़ायत उस मीडिया से है, जो बाज़ार के हाथों गिरवी हो गया है। मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि जिस मीडिया को आप बाजार की रखैल साबित करने पर तुले हैं, उसकी परिभाषा के दायरे में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया क्यों है। आपके पूरे लेख में जिस तरह के सवाल खड़े किये गये हैं, उनकी जद में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया ही क्यों है? क्या आप ये मानकर चल रहे हैं कि अख़बारों में ख़बरों के साथ खिलवाड़ नहीं होता? या ख़बरों का सेलेक्शन करते हुए इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि कौन सी ख़बर पाठकों की लारग्रंथियों में हलचल मचाएगी? कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते कि ख़बर को सनसनीखेज़ करने, न्यूडिटी का छौंका लगाने से लेकर उसे मसालेदार बनाकर परोसने तक का काम केवल न्यूज चैनल करते हैं?
नज़रिया, मीडिया मंडी »
मीडिया में सेंटिंग-गेटिंग का खेल बहुत पुराना है – लेकिन अभी यह अपने शबाब पर है। जिसे पसंद नहीं करते हो, मंदी के बहाने उसे निकालो। अपने लोगो को भर लो। क्या ये सच नहीं? ऐसे ही किसी सेमिनार में एक सीनियर ने कहा था, हमारे मीडिया के हैडलाइंस विदेशों से तय होते हैं। हम उनके हाथों की कठपुतलियां बन कर रह गये हैं। नव-साम्राज्यवाद का एक पूंजीवादी चेहरा ये भी है। जहां तक दलाली का सवाल है, चर्चा थी कि एक नये-नवेले चैनल के मालिक ने अपने पत्रकारों (पढ़ें – नौकरों) से कहा कि रोज़ाना 5 हज़ार लेकर आओ, तो नौकरी बचेगी। क्या यह सच नहीं है?
नज़रिया, मीडिया मंडी »
ख़बर में मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ कानून बनाने का जो शिगूफा “आउटलुक” के सम्पादक नीलाभ ने छोड़ा है, वह बेमतलब की बहस के अलावा कुछ नहीं है। इस देश में किसी भी चीज़ में मिलावट के लिए कानून हैं। क्या मिलावट रुकी? ख़बर में मिलावट करने वाले ही तो अन्य चीजों में मिलावट के ख़िलाफ़ दिन रात चीख़ते रहते हैं। लेकिन उनकी सुनता कौन है? सुनें भी क्यों जब वह ख़ुद मिलावटखोर हैं। कपिल सिब्बल ने शायद ग़लत नहीं कहा था कि मीडिया के छापने या नहीं छापने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वाकई अब ख़बरों के छपने से आसमान नहीं टूट पड़ता।



