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देवाशीष प्रसून ♦ आप एक पुलिस वाले की तुलना एक प्रशिक्षित कुत्ते से भी कर सकते हैं। पुलिसवाले अपने मालिक के सामने पूंछ तो हिला नहीं सकते तो इसकी भरपाई बूट ठोंक कर करते हैं। कुत्तों की तरह पुलिसवालों के नुकीली दांत नहीं होते तो बेचारे लाठीचार्ज करते या करवाते हैं और अधिक हो गया तो गोलियां चलती हैं। कुल मिला कर पुलिस वालों की जिंदगी कुत्तों की तरह ही कटती है, पर इनमें से कुछ श्वानवत पुलिसवाले बड़े ओहदे पर जा बैठते हैं और निरंकुश हो जाते हैं। परंपरा रही है कि निरंकुश और पागल कुत्तों को गोली मार दिया जाता है। लेकिन अब सवाल यह उठता है वह जीव जो जिस्मानी तौर पर इंसान है और अथक परिश्रम से उसने कुत्तत्व धारण किया है, उसके पागल होने पर क्या किया जाए?
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डेस्क ♦ दो सितंबर की रात दस बजे। परिसर स्थित गोरख पांडेय छात्रावास में हफ्तों में बिजली-पानी और भोजन की समस्या के खस्ताहाल छात्रों ने गुहार लगाने और अपने असंतोष का इजहार करने के लिए कुलपति विभूति नारायण राय से मिलने का मन बनाया। छात्रावास से आधे किलोमीटर दूर कुलपति आवास पर वे इकट्ठा हुए। कोई बातचीत सुनने के बजाय पुलिसिया पृष्ठभूमि का यह बर्बर और उजड्ड कुलपति अपना रिवाल्वर लहराते हुए अपने आवास से निकला और विद्यार्थियों को मां-बहन की गाली और स्त्री गुप्तांगों की गालियां देते हुए अपनी सनक में गार्डों को लाठी चार्ज करने का आदेश दिया।
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वर्धा संवाददाता ♦ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में कुलपति के आदेश पर गुरुवार की शाम गोरखपांडे छात्रावास के छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया। लाठीचार्ज में कई छात्र घायल हो गये हैं। छात्र बिजली-पानी की मुश्किलों से गुस्से में थे और नारेबाजी कर रहे थे। उनका गुस्सा विश्वविद्यालय में कई तरह की धांधलियों के साथ ही इस बुनियादी मसले पर था और वे कुलपति वीएन राय के पास अपनी बात रखने गये थे। लेकिन सूत्रों के मुताबिक नशे में धुत वीएन राय ने अपने जवानों को उन पर लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। वहीं खड़े कवि आलोकधन्वा यह सब तमाशा देखते रहे। उन्होंने एक बार भी वीएन राय को ऐसा करने से मना नहीं किया।
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वर्धा पोस्ट ♦ जनसंचार के अलावा वर्धा में दो और विभागों – भाषा विद्यापीठ और साहित्य विद्यापीठ में भी पीएचडी में प्रवेश होना है। पहले मैं भाषा विद्यापीठ की चयन सूची में आने वाले नामों की विस्तृत जानकारी दे दूं। वैसे एक बात तय है कि भाषा विद्यापीठ में ब्राह्मण होने का लाभ अवश्य मिलता है क्योंकि यह ऐसा विभाग है जहां छात्र से लेकर अध्यापक ब्राह्मणों की संख्या सर्वाधिक है… बाकी सीट दलितों के लिए है। वश चलता तो नहीं ही भरा जाता, पर भरना जरूरी है। आ जाएगा कोई उस पर। उन सीटों की परवाह किसी को नहीं है। साहित्य विद्यापीठ की चयन सूची और भावी चयनार्थियों की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है।
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एक पूर्व छात्रा ♦ अभी वर्धा में पीएचडी प्रवेश को लेकर एक बार फिर से घमासान मचा हुआ है। सारे अध्यापक और छात्र अपने-अपने गुणा-गणित लगा रहे हैं। सभी अपने चहेतों को भरने की फिराक में हैं। अपनी धृष्टता और अजब-गजब कारनामों के लिए कुख्यात चोर-गुरु भी कमर कसकर बैठे हैं। चेले उनके लगातार चक्कर इसलिए लगा रहे हैं कि कहीं उनका नाम लिस्ट बनाते समय ध्यान से न हट जाए। आइए बताते हैं आपको वह सूची, जिन पर चोर-गुरु सहित तमाम गुरुओं की कृपा होने वाली है। यदि मेरे तथ्य और यह सूची परिणाम की सूची से नहीं मेल खा पायी तो मैं चोर-गुरु और कुलपति के सारे धतकर्मों को सही और वाजिब ठहराते हुए आगे से उनके पक्ष में लिखूंगी।
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संवाददाता ♦ क्या युवा कथाकार और हिंदी विश्वविद्यालय के व्याख्याता, विभूति के विवादस्पद साक्षात्कार के प्रणेता, राकेश मिश्र को जेल होगी? क्या हिंदी विश्वविद्यालय के व्याख्याता, साक्षात्कार के अंकों में हेर-फेर से पदासीन होने वाले अमरेंद्र शर्मा, को जेल होगी? क्या हिंदी विश्वविद्यालय के शोध सहायक, यूजीसी का फर्जी सर्टिफिकेट पेश करने वाले, शिवप्रिय को जेल होगी? जी, इन तीनों को वर्धा जिला न्यायालय के चीफ जुडिसिअल मजिस्ट्रेट पीएम दुनेदार ने अपनी 15/12/2008 की इनक्वाइरी रिपोर्ट में न्यायालय के साथ धोखाधड़ी का दोषी पाया है। शिकायतकर्ता एमएम मून (प्रफुल) ने इस रिपोर्ट के आधार पर एक केस किया है, जिसकी पहली सुनवाई, 27 अगस्त, 2010 को एस कुरैशी, चीफ जुडिसिअल मजिस्ट्रेट के कोर्ट में हुई।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
डेस्क ♦ वर्धा जिला न्यायालय के फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, धनंजय निकम ने भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका “नया ज्ञानोदय” में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं को दी गयी गाली मामले में राय, रवींद्र कालिया और साक्षात्कारकर्ता राकेश मिश्र के खिलाफ क्रिमिनल नोटिस जारी की है। 23 अगस्त के अपने ऑर्डर में निकम ने कहा कि सभी कागजात देखने के बाद तथा शिकायतकर्ता की दलीलें सुनाने के बाद यह मामला प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि इस प्रकरण से महिला लेखिकाओं का अपमान हुआ है। अतः तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 499, 500, 501 तथा 509 के तहत नोटिस किया जा सकता है। कालिया, राय और मिश्र को 20 सितंबर तब अपना जवाब रखना है।
नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
ईपीडब्ल्यू ♦ उनका लेखन यौन संबंधों या स्त्री यौनिकता पर महिलाओं के परिप्रेक्ष्य को छूता है, तो उन्हें असहजता चुभने लगती है और वे उसे खारिज करने पर तुल जाते हैं। 1980 में, हिंदी साहित्य संसार मृदुला गर्ग के खिलाफ लगाये गये अश्लीलता के आरोपों से हिल गया था, जिनके उपन्यास चितकोबरा में एक नायिका है, जिसके लिए यौन-कार्य बहुत उबाऊ और मशीनी होता है, जिससे वो दूसरे मुद्दों की ओर अपना दिमाग घुमाती है। इस लेखन के लिए मृदुला गर्ग को यहां तक कि गिरफ्तार कर लिया गया था। दूसरी ओर कुछ लेखिकाओं ने चिंता और नाराजगी जतायी है कि कुछ प्रकाशन घरानों ने उन महिलाओं के लेखन को प्रकाशित करने से इनकार किया है, जिन्हें वे व्याख्यायित करते हैं कि वह “पर्याप्त साहसी नहीं” है।
मोहल्ला लाइव, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
विनीता भारती ♦ मोहल्ला, जो वीएन राय के दलित विरोधी, जातिवादी चरित्र का भंडाफोड़ कर रहा था और वर्धा के उत्पीड़ित छात्रों के सघर्ष का साथी बना हुआ था, वहां होने वाली नियुक्तियों की अनियमियतताओं का सच सामने ला रहा था, ‘चोरगुरु’, महाश्वेता देवी के नाम का टकसाली व्यापार करने वाले कृपाशंकर चौबे का पर्दाफाश कर रहा था, ‘ब्रूनो की बेटियों’ के कवि आलोकधन्वा और उन्हें कोसने वाले पत्रकार राजकिशोर के खुद उसी ‘हरम’ में पहुंच जाने पर ‘मुंह में कालिख’ पोतने की बात कर रहा था, वह खुद इसी खेल में शामिल हो गया। क्या यह सच नहीं कि अब ‘मोहल्ला’ और कुछ नहीं, ओम थानवी के रिमोट पर चलने वाला ‘जनसत्ता’ का ‘एक्स्टेंडेड वेब एडीशन’ बन चुका है। चुका हुआ और बिका हुआ।
नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
गिरिराज किराड़ू ♦ यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामले का पटाक्षेप हो गया है। अव्वल तो यही कि माननीय राष्ट्रपति महोदया से लेखकों की मुलाकात और ज्ञानपीठ न्यास की बैठक के नतीजे अभी आने बाकी हैं। और जैसा कि अपने विवादास्पद लेख में विष्णु खरे ने कहा है, यह संघर्ष सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह जाना चाहिए। उनके लेख की इस सबसे सार्थक बात का पाठ यह किया जाना चाहिए कि अगर बर्खास्तगी न हो तो आने वाले दिनों में साहित्य में ऐसी गुटबाजियां, मिलीभगत और गुपचुप कारगुजारियां नहीं चलने दी जाएं। अगर बर्खास्तगी की मांग का ‘वामपंथी’ तरीका कामयाब नहीं होता है तो वर्तमान कुलपति और निदेशक संपादक के बने रहने तक दोनों संस्थाओं से असंबद्धता का ‘गांधीवादी’ तरीका अपनाया जाना चाहिए।



