Articles tagged with: mahatma gandhi international hindi university
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अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम ♦ आश्चर्य होता है कि हमारे कुलपति पुलिस के इतने बड़े अधिकारी रहे हैं! कुलपति जी बार-बार यह कह रहे हैं कि उन्होंने दलितों के लिए काफी लिखा है, बोला है। ठीक बात है। उन्हें जब दलितों पर बोलने और लिखने का अवसर मिला, उन्होंने लिखा और बोला। आज उन्हें दलितों के लिए कुछ करने का अवसर मिला है तो वे वही कर रहे हैं, जो उन्हें करना चाहिए। भारत के ज्यादातर सवर्ण कम्युनिस्ट ऐसे ही हैं। दलितों पर खूब लिखते हैं, बोलते हैं और जब कुछ करने की बारी आती है तो “विभूति नारायण राय” हो जाते हैं। बाकी अब हम और कुछ नहीं कहेंगे।
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दिलीप ♦ कुलानुशासक ने अनिल को 6 महीने के लिए निष्कासित किये जाने का नोटिस भिजवाया जबकि नियम यह कहता है कि कुलानुशासक किसी भी विद्यार्थी को अधिकतम दो हफ्ते के लिए ही निष्कासित कर सकते हैं। इस फैसले के विरोध में छात्रों ने कुलानुशासक से जवाब मांगा तो उन्होंने यह माना कि नियम का इस मामले में पालन नहीं किया गया है लेकिन अगर फैसला हो गया है तो अनिल को इसे मानना चाहिए। प्रशासन का यह कहना है कि जब तक अनुशासन कमेटी की रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक के लिए उसे निष्कासित किया जाएगा। यह पूछे जाने पर कि अगर उसे दोषी नहीं पाया गया तो पहले ही उसको मिल गयी सजा की भरपाई कौन करेगा? कुलानुशासक मानना था कि “निष्कासन सजा नहीं होती”।
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डेस्क ♦ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कार्य परिषद से साहित्यकार और पत्रकार मृणाल पांडे ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कल राष्ट्रपति को एक चिट्ठी लिख कार्यपरिषद से अलग होने की इच्छा जाहिर की है। हम मान सकते हैं कि अपनी तरफ से इस पूरे प्रकरण में जो तफसील मृणाल पांडे ने जुटायी, उसके मुताबिक उन्हें लगा कि अनिल चमड़िया के मामले में विभूति नारायण राय ने पूरी चालाकी के साथ कार्यपरिषद का इस्तेमाल किया और इसी से दुखी होकर उन्होंने कार्यपरिषद से अलग होने का फैसला लिया है।
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विभूति नारायण राय ♦ उस दिन जो जुलूस निकला, उसमें जातिवादी नारे लगाये गये। हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है, वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारा से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गये? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाये जाएं, तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।
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डेस्क ♦ अपनी किताबों में नकल के आरोपों से बुरी तरह घिरे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पत्रकारिता विभाग के एचओडी डॉ अनिल कुमार राय अंकित के खिलाफ वीसी विभूति नारायण राय ने जांच के आदेश दे दिये हैं। उनकी किताबों में दूसरी किताबों से नकल है या नहीं, इसकी जांच अब प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह कुशवाहा करेंगे। सुरेंद्र सिंह कुशवाहा रांची विश्वविद्यालय, झारखंड और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के कुलपति रहे हैं। जांच के दौरान उनके सारे खर्चे विश्वविद्यालय उठाएगा। लेकिन आदेश पत्र में ये साफ नहीं है कि जांच के दौरान डॉ अनिल कुमार राय अपने पद पर बने रहेंगे या नहीं।
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दिलीप ♦ मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया। तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख्तर आलम की शिकायत पर फैसला लिया है। फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूं बल्कि यह ‘चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है, जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है। विश्वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूं कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूं कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले।
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डेस्क ♦ महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में बेशर्मी की नयी हद ये है कि एक असहमत छात्र को वीसी ने दूसरे बहानों से छह महीने के लिए कैंपस से बाहर निकाल दिया है। अनिल ने प्रोफेसर चमड़िया प्रकरण और कई दूसरी वजहों से क्षुब्ध होकर अपनी पीएचडी की डिग्री छोड़ने का फ़ैसला लिया था और इस आशय का एक निजी पत्र वीसी को मेल किया था। जब हफ्ते भर बाद भी उनका कोई जवाब नहीं आया, तो अनिल ने उस मेल को सार्वजनिक कर दिया। तमतमाये वीसी ने कुछ पुराने मामूली मामले निकलवाये और कुलानुशासक के जरिये कार्रवाई कर दी।
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रतन लाल ♦ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के बाद बिना कोई कारण बताये उनकी सेवा समाप्त करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाये जाने की जरूरत है। आईएएस और आईपीएस पृष्ठभूमि के कुलपतियों के कार्यकाल में कई तरह की मानमानी किये जाने की शिकायतें मिलती रही हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के प्रोफेसर अनिल चमड़िया को सात महीने के बाद जिस तरह से विश्वविद्यालय से बाहर किये जाने का मामला सामने आया है, वह एक नयी तरह की प्रवृत्ति को सामने लाता है।
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चंद्रिका ♦ विश्वविद्यालय ने छह माह पूर्व 12 नियुक्तियां की थी। मीडिया विभाग में अनिल चमड़िया, कृपाशंकर चौबे और अनिल राय अंकित के साथ अख्तर आलम की। अनिल अंकित चोरी करके किताबें लिखने के कारण ख्याति पा चुके हैं तो अनिल चमड़िया अपनी पत्रकारिता के कारण लोगों में जाने जाते हैं। ऐसे में कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाविदों के होते हुए, जो यह मानते हैं कि शिक्षा सामाजिक विकास का पीढ़ीगत हस्तांतरण है, भी अनिल चमड़िया का निष्कासन और चोर गुरु के नाम से कुख्यात अनिल अंकित को लिया जाना विश्वविद्यालय के ईसी सदस्यों पर ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार और इन बुद्धिजीवियों द्वारा उस भ्रष्टाचार की पुष्टि अफसोसजनक है और सवाल खड़ा करती है।
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छात्र-छात्राएं ♦ यह कदम कुलपति विभूति नारायण राय के मनमानेपन और नियम कानून को ताक पर रख काम करने के उनके रवैये की ही एक कड़ी है। इस निर्णय से न सिर्फ विश्वविद्यालय, उसके अधिनियम और न्याय की भावना के साथ खिलवाड़ हुआ है बल्कि न्यायालय के निर्णय से पहले ही स्वघोषित, मनमाना निर्णय सुनाया है, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी घोर उल्लंघन किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में, इक्जिक्यूटिव कौंसिल को मामले की आधी-अधूरी जानकारी देते हुए उसे एक कवर के रूप में इस्तेमाल किया गया है। हम कुलपति के इस निरंकुश निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित हैं और इसके खिलाफ अनिश्िचतकालीन बहिष्कार की घोषणा करते हैं।


